‘पर्सनल  इज पोलिटिकल’ का मुहावरा युग सत्य – सुधा अरोड़ा

दिल्ली। ‘स्त्री मुखर हुई है, उसकी शक्ति ज्यादा धारदार हुई है, तो उसके संघर्ष भी गहन और लंबे होंगे। आज भी उसका संघर्ष थमा नहीं है। वह संघर्ष कर रही है, पुरुषों के मोर्चे पर पुरुषों के साथ और अपने मोर्चे पर पुरुषवादी स्त्रियों के साथ भी। वक्त के बदलने के साथ संघर्ष का स्वरूप…

‘जाऊँगा कहाँ, रहूँगा यहीं’ : निरंजन सहाय

वह 19 मार्च की ऐसी खौफनाक शाम थी, जिस पर विश्वास करने के लिए मन तैयार नहीं हुआ| गुरुवर, मेरे सबसे प्रिय कवि और इन सभी शिखरों से भी बड़े मनुष्य केदारनाथ सिंह अब नहीं रहे| अनहोनी की आशंका रह-रह कर मन बेचैन कर दे रही थी पिछले तीन महीनों से| पर यह मनहूस खबर…

कश्मीरनामा: … और बहने लगता है इतिहास- गणपत तेली

हिन्दी क्षेत्र के पब्लिक स्फीयर में शायद ही कोई ऐसा अवसर आता होगा, जब कश्मीर का जिक्र नहीं आता हो। चाहे देशभक्ति की बात हो, धर्म-सांप्रदायिकता की बात हो, या राजनीति की- कश्मीर के ज़िक्र के बिना कोई चर्चा पूरी नहीं होती है। लेकिन हमारी इन चर्चाओं में कश्मीर की उपस्थिति जितनी उग्र होती है,…

यह अच्छे-बुरे लोकतंत्र का समय है: प्रो. मैनेजर पाण्डेय

[हिंदी के प्रसिद्ध आलोचक और विचारक प्रो. मैनेजर पाण्डेय पिछले वर्ष पचहत्तर वर्ष के हो गये। अपने जीवन की इस लंबी अवधि में वे भारत समेत पूरी दुनिया में हो रहे परिवर्तनों के साक्षी रहे हैं। खासकर, साहित्य और विचारधारा में हो रही तब्दीलियों को उन्होंने करीब से देखा और महसूस किया है। इन तमाम…

नयी चुनौतियां साहित्य को सार्थक दिशा देती हैं: असग़र वजाहत

असग़र वजाहत हिन्दी के जाने माने लेखक हैं। अनेक महत्त्वपूर्ण उपन्यासों और नाटकों के रचनाकार असग़र मूलत: किस्सागो हैं। बीते दिनों उनका आख्यान ‘बाक़र गंज के सैयद‘ बेहद प्रसिद्ध हुआ। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम ए, पीएच डी और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली से पोस्ट डॉक्टोरल रिसर्च करने के बाद वे 1971 से…

सूफी काव्य : रहस्यवाद का रहस्य-गणपत तेली

हमारे धार्मिक विश्वासों, सामाजिक संस्थाओं, हमारी जीवन शैली, हमारे साहित्य, हमारी भाषाओं और कई अन्य पहलुओं पर भक्तिकाल का पूरा प्रभाव रहा है। इसने धार्मिकता को बहुरंगी बनाया और यह मानवमात्र की समानता अवधारणा का पक्षधर था- इसने जाति-प्रथा को नकारा, धर्म के बंधन तोड़े, इसने प्रेम की शिक्षा दी- ईश्वर के प्रेम की, मानवमात्र…

रूसी क्रांति के सौ वर्ष: प्रो रिज़वान क़ैसर

वर्ष 2017 में बोल्शेविकों के नेतृत्व में की गई रूसी क्रांति को सौ वर्ष पूरे हो रहे हैं। इस क्रांति ने न केवल रूस के समाज को नई दिशा दी बल्कि वैश्विक राजनीतिक को भी प्रभावित किया। सोवियत संघ ने विश्व-राजनीति में अपने आपको स्थापित किया और दुनिया के अलग-अलग देशों में सोवियत समाज के मूल्यों के प्रचार-प्रसार का…

रैदासः बेगमपुरा शहर को नाऊँ- निरंजन सहाय

आम आदमी के सरोकारों से जुड़ी रैदास की कविता का जादू आज भी बरकरार है | बल्कि यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि रैदास की कविता मौजूदा सन्दर्भ में पहले से कहीं ज़्यादा शिद्दत से याद आती है | यह कविता अपने जनसरोकारों में इस कदर प्रतिबद्ध है कि वह कर्मसौन्दर्य के लिए गंगास्नान ,तीर्थादि…

भारत की ज्ञान परंपरा: प्रो दीपक कुमार

प्रो. दीपक कुमार ने जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय नई दिल्ली के हिंदी एकक द्वारा आयोजित विश्व हिंदी दिवस समारोह में ‘भारत की ज्ञान परंपरा’ विषयक चौथा गुणाकर मुले स्मृति व्याख्यान दिया. प्रो. दीपक कुमार जेएनयू में इतिहास और विज्ञान के प्रोफेसर हैं। प्रस्तुत है वह व्याख्यान :    

संभावना का व्याख्यान और ‘बनास जन’ का विमोचन

चित्तौड़गढ़ 13 अक्टूबर । कविता अपने जीवन में सत्ता से हमेशा टकराती है क्योंकि कविता ही वह विधा है जो युग बदलाव की संरचना का मार्ग प्रशस्त करती है। कविता संवेदना से ही चलती है और जीवित मनुष्यता को रेखांकित करती हैं । बिना औचित्य के कविता सामाजिक नहीं हो सकती। विख्यात कवि और आलोचक प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल ने  संभावना…

People’s literature: Devendra Choubey

The last two-three decades have witnessed a change in the literary discourse in our country. The issue of social identity has forced the writers and thinkers to discuss and debate upon questions that were hitherto not a part of the mainstream literary discourse; although it is difficult to say whether only the rise of the…

2015: हिन्दी साहित्य- गणपत तेली

साहित्यिक प्रवृत्तियों के लिहाज से किसी एक वर्ष विशेष में प्रकाशित और चर्चित हुई कृतियों का महत्व यह होता है कि उससे लेखन-पठन के नए रुझान समझे जा सकते हैं। हालांकि किन्हीं प्रवृत्तियों के प्रचलन को समझ पाने के लिए एक साल की अवधि बहुत कम समय होता है, फिर भी पिछले साल में हुई…

हफ्ते की किताब: पल्लव- ‘तीन सौ तीस कहावती कहानियाँ’

विजयदान देथा जिन्हें बिज्जी के नाम से लोग कहीं ज्यादा जानते हैं उन बिरले लोगों में थे जिन्होंने किसी एक जूनून के लिए पूरा जीवन समर्पित कर दिया। उन्होंने राजस्थानी में अपना लेखन शुरू किया था और बहुत प्रारम्भ में ही प्रतिज्ञा ले ली कि जीवन भर अपनी भाषा में ही लिखूंगा भले अन्य पाठकों के लिए उसे…

हफ्ते की किताब: पल्लव- ‘जलमुर्गियों का शिकार’

‘क्योंकि मैं हमेश से इस बात का कायल रहा हूँ कि आपके कहन की ख़ूबसूरती इसमें है कि आप जो कहते हैं,वह नहीं कहते। और मेरा तो कौल है कि मैं जो कहता हूँ, उससे बाहर बहुत-कुछ कहता हूँ।’                                  …

हफ्ते की किताब: पल्लव- ‘बारिश, धुआँ और दोस्त’

‘कहानी क्या होती है?’ एक बार उसने पूछा था। ‘वह चीज, जिसके आईने में हम ज़िंदगी को नए सिरे से पहचानते हैं।‘ सवाल खत्म नहीं हुआ था।’कहानी कहां से मिलती है?’ ’जिंदगी को क़रीब से देखने से, रुक कर।’                     ( ‘बारिश,धुआँ और दोस्त’ कहानी से ) कहानी लिखना इधर फैशन भी है। कहानीकार नयी नयी…

हफ्ते की किताब: पल्लव- ‘जानकीदास तेजपाल मैनशन’

भारत में भूमंडलीकरण या उदारीकरण अथवा साफ़ साफ़ कहें तो बाजारीकरण की प्रक्रिया ने गहरे बदलाव किए हैं। अकारण नहीं कि इस प्रक्रिया के प्रारम्भ होने के बाद अधिकाँश साहित्यकारों की चिंता में यह परिघटना है। बीते दशकों के उपन्यासों, कहानियों और कविताओं में इस परिघटना के मनुष्य विरोधी और धन लोलुप चेहरे को बार बार…

हफ्ते की किताब: ममता कालिया का बाल साहित्य -पल्लव

हिन्दी में बच्चों और बड़ों के लेखन में बड़ी दूरियां हैं। सामान्यत: हिन्दी के लेखक बच्चों के लिए नहीं लिखते। अगर लिखते भी हैं तो उसे अपने मुख्य लेखन के समकक्ष उसे देखना या देखा जाना उन्हें पसन्द नहीं होता। वे इसे क्षतिपूर्ति या भलाई में किये गये काम से ज्यादा नहीं समझते। ऐसे में…

साम्राज्यवादी हिंदी का प्रश्न और दूसरी भाषाएँ: अरिमर्दन कुमार त्रिपाठी

आम तौर पर किसी भाषा का विकास एवं विस्तार उसके समाज के साथ होता है, लेकिन हिंदी के संदर्भ में यह तथ्य शतांश सत्य नहीं है। हिंदी का विकास जिस खड़ी बोली से हो रहा था एवं इधर महात्मा गांधी जिस ‘हिंदुस्तानी’ की बात कर रहे थे, उन दोनों हिंदी के दो अलग लक्ष्य थे।…

इतिहास बोध और हिन्दी प्रदेश: गणपत तेली

: पुस्तक समीक्षा: देवीशंकर अवस्थी सम्मान (2014) से सम्मानित पुस्तक ‘भारतीय इतिहास बोध का संघर्ष और हिन्दी प्रदेश’ की (बनास जन, मार्च 2014 में प्रकाशित) समीक्षा हिन्दी क्षेत्र के बौद्धिक विकास में हिन्दी नवजागरण का प्रमुख स्थान है। हालांकि विभिन्न नये शोधों द्वारा इस नवजागरण के चरित्र पर सवाल उठाये गए हैं, लेकिन इस बात से इंकार…

Gandhi and His Hindustani: Ganpat Teli

During the freedom movement of India, the complex and controversial of the
National Language was raised. In this controversy Gandhi supported the concept of
Hindustani. Gandhi’s thoughts on languages are discussed in this paper. This article
will try to look on other dimensions of his thoughts on languages as well. Gandhi
accepts religion as a base to consolidate his views on language. However, Gandhi’s
concept was an expression of exclusion in some sense, as non-northern and nonHindu
and non-Muslims weren’t part of it. In addition to these features, Gandhi’s
contradictions regarding thoughts on language will also be discussed.

Revisiting the Making of Hindi as a ‘National’ Language: Ganpat Teli

In the first quarter of last the century a consciousness building campaign was started among the literate people of north India. At that time as a result of a long lobbying process, Hindi language and Nagari Script had already been recognized the purpose of official usage. Thus, the leadership of this lobby started to demand a new status of the National Language for Hindi written in Nagari script. In the contest for the National Language status, Hindustani and Urdu languages were counterparts of Hindi. Supporters of both the languages – Hindi and Urdu – symbolized them with Hindu and Muslim community respectively. On the other side, Hindustani which was a colloquial language was supported by the camp of progressive writers and Gandhi.

Strong supporters of Hindi opposed the idea of Hindustani and advocated the usage of Sanskritized Hindi. They argued that Sanskrit is the pure and divine language of Hindus, so only Sanskritized Hindi can bear the cultural heritage of the community. They subscribed to the logic of Devvani and Mother Language. At the time of this debate the literacy level in India was very low. On other side, the supporters of Hindi were preparing a Language which was highly Sankritized, but did not belong to the common people, especially the marginalized groups of both Hindu and Muslim communities. This happened because Sanskrit language and its words were not used in large scale on a daily basis. The Sanskritized Hindi not only marginalized people of non-privileged social strata socially and economically, but also deprived them the opportunity to become a part of the knowledge process.