‘जाऊँगा कहाँ, रहूँगा यहीं’ : निरंजन सहाय

वह 19 मार्च की ऐसी खौफनाक शाम थी, जिस पर विश्वास करने के लिए मन तैयार नहीं हुआ| गुरुवर, मेरे सबसे प्रिय कवि और इन सभी शिखरों से भी बड़े मनुष्य केदारनाथ सिंह अब नहीं रहे| अनहोनी की आशंका रह-रह कर मन बेचैन कर दे रही थी पिछले तीन महीनों से| पर यह मनहूस खबर…

यह अच्छे-बुरे लोकतंत्र का समय है: प्रो. मैनेजर पाण्डेय

[हिंदी के प्रसिद्ध आलोचक और विचारक प्रो. मैनेजर पाण्डेय पिछले वर्ष पचहत्तर वर्ष के हो गये। अपने जीवन की इस लंबी अवधि में वे भारत समेत पूरी दुनिया में हो रहे परिवर्तनों के साक्षी रहे हैं। खासकर, साहित्य और विचारधारा में हो रही तब्दीलियों को उन्होंने करीब से देखा और महसूस किया है। इन तमाम…

‘रचना और रचनाकार’ विषय पर हिन्दू कालेज में गोष्ठी

  दिल्ली। हमारी जड़ें कहाँ हैं? हमारे बच्चों की जड़ें कहाँ हैं? हम बिना जड़ों के कब तक जी पाएंगे? हमारी पहचान क्या है? कहीं हम समाज के उस वंचित समूह की तरह ही तो नहीं हो गए, जिन्हें औरत कहते हैं। जो बिना जड़ों के, बिना खाद-पानी के, किसी भी जलवायु में पनपने का…

रैदासः बेगमपुरा शहर को नाऊँ- निरंजन सहाय

आम आदमी के सरोकारों से जुड़ी रैदास की कविता का जादू आज भी बरकरार है | बल्कि यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि रैदास की कविता मौजूदा सन्दर्भ में पहले से कहीं ज़्यादा शिद्दत से याद आती है | यह कविता अपने जनसरोकारों में इस कदर प्रतिबद्ध है कि वह कर्मसौन्दर्य के लिए गंगास्नान ,तीर्थादि…

संभावना का व्याख्यान और ‘बनास जन’ का विमोचन

चित्तौड़गढ़ 13 अक्टूबर । कविता अपने जीवन में सत्ता से हमेशा टकराती है क्योंकि कविता ही वह विधा है जो युग बदलाव की संरचना का मार्ग प्रशस्त करती है। कविता संवेदना से ही चलती है और जीवित मनुष्यता को रेखांकित करती हैं । बिना औचित्य के कविता सामाजिक नहीं हो सकती। विख्यात कवि और आलोचक प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल ने  संभावना…

People’s literature: Devendra Choubey

The last two-three decades have witnessed a change in the literary discourse in our country. The issue of social identity has forced the writers and thinkers to discuss and debate upon questions that were hitherto not a part of the mainstream literary discourse; although it is difficult to say whether only the rise of the…

हफ्ते की किताब: ममता कालिया का बाल साहित्य -पल्लव

हिन्दी में बच्चों और बड़ों के लेखन में बड़ी दूरियां हैं। सामान्यत: हिन्दी के लेखक बच्चों के लिए नहीं लिखते। अगर लिखते भी हैं तो उसे अपने मुख्य लेखन के समकक्ष उसे देखना या देखा जाना उन्हें पसन्द नहीं होता। वे इसे क्षतिपूर्ति या भलाई में किये गये काम से ज्यादा नहीं समझते। ऐसे में…