‘पर्सनल  इज पोलिटिकल’ का मुहावरा युग सत्य – सुधा अरोड़ा

दिल्ली। ‘स्त्री मुखर हुई है, उसकी शक्ति ज्यादा धारदार हुई है, तो उसके संघर्ष भी गहन और लंबे होंगे। आज भी उसका संघर्ष थमा नहीं है। वह संघर्ष कर रही है, पुरुषों के मोर्चे पर पुरुषों के साथ और अपने मोर्चे पर पुरुषवादी स्त्रियों के साथ भी। वक्त के बदलने के साथ संघर्ष का स्वरूप…

लोकतंत्र बढ़ने के स्थान पर घटा है – असग़र वजाहत

जयपुर । ‘‘साम्प्रदायिक विभाजन की चेतना व्यक्तियां को अन्दर व बाहर से तोडती है और पूरे समाज को गहरे अंधेरे में ले जाती है। बड़े देश पहचान की राजनीति का खेल खेलते हैं और विकासशील देशों में विकास का पहिया गरीब एवं शोषित जनता को कुचलता है और ऐसे में हिंसा का दानव खुलकर खेलता है।” सुप्रसिद्ध…

‘जाऊँगा कहाँ, रहूँगा यहीं’ : निरंजन सहाय

वह 19 मार्च की ऐसी खौफनाक शाम थी, जिस पर विश्वास करने के लिए मन तैयार नहीं हुआ| गुरुवर, मेरे सबसे प्रिय कवि और इन सभी शिखरों से भी बड़े मनुष्य केदारनाथ सिंह अब नहीं रहे| अनहोनी की आशंका रह-रह कर मन बेचैन कर दे रही थी पिछले तीन महीनों से| पर यह मनहूस खबर…

यह अच्छे-बुरे लोकतंत्र का समय है: प्रो. मैनेजर पाण्डेय

[हिंदी के प्रसिद्ध आलोचक और विचारक प्रो. मैनेजर पाण्डेय पिछले वर्ष पचहत्तर वर्ष के हो गये। अपने जीवन की इस लंबी अवधि में वे भारत समेत पूरी दुनिया में हो रहे परिवर्तनों के साक्षी रहे हैं। खासकर, साहित्य और विचारधारा में हो रही तब्दीलियों को उन्होंने करीब से देखा और महसूस किया है। इन तमाम…

दलित विमर्श के विभिन्न आयाम: सदानन्द वर्मा

समीक्षित पुस्तक: मुकेश मिरोठा, दलित विमर्श : दशा और दिशा, ए.आर.पब्लिशिंग कंपनी, दिल्ली, 2017 डॉ. मुकेश मिरोठा की आलोचनात्मक कृति “दलित विमर्श : दशा और दिशा” दलित लेखन और आंदोलन के विभिन्न आयामों को रेखांकित करती है। गौरतलब है कि लेखक ने दलित लेखन में चली आ रही ऐतिहासिक पड़ताल के साथ-साथ दलित विमर्श की स्थिति, दलित…

राष्ट्रीय अस्मिता और अंबेडकरी चिंतन: शरण कुमार लिम्बाले

जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग द्वारा जामिया के पहले हिंदी शिक्षक देवदास गांधी की स्मृति में नौंवा देवदास गांधी स्मृति व्याख्यान दिनांक 23.02.2016 को आयोजित किया गया। इस वर्ष यह व्याख्यान जाने-माने मराठी साहित्यकार प्रो शरण कुमार लिंबाले ने ‘राष्ट्रीय अस्मिता और अंबेडकरी चिंतन’ विषय पर अभिव्यक्त किया। यह व्याख्यान आप यहां सुन-देख…

रूसी क्रांति के सौ वर्ष: प्रो रिज़वान क़ैसर

वर्ष 2017 में बोल्शेविकों के नेतृत्व में की गई रूसी क्रांति को सौ वर्ष पूरे हो रहे हैं। इस क्रांति ने न केवल रूस के समाज को नई दिशा दी बल्कि वैश्विक राजनीतिक को भी प्रभावित किया। सोवियत संघ ने विश्व-राजनीति में अपने आपको स्थापित किया और दुनिया के अलग-अलग देशों में सोवियत समाज के मूल्यों के प्रचार-प्रसार का…

‘कबीरा खड़ा बाज़ार में’ का मंचन: एम के रैना

जीवन, मृत्यु, दंगे, लूटपाट, हत्याओं के प्रत्यक्ष अनुभव और इन घटनाओं के सूक्ष्म निरीक्षण करने की भीष्म साहनी क्षमता ने दमितों और शोषितों की वास्तविक स्थितियों को समझने में उनकी मदद की। उनके भीतर के जमीनी और सशक्त कार्यकर्ता का मेल ही उन्हें अपनी कहानियों और उलझे हुये विषयों को भी सटीक तरीके से चित्रित…

संभावना का व्याख्यान और ‘बनास जन’ का विमोचन

चित्तौड़गढ़ 13 अक्टूबर । कविता अपने जीवन में सत्ता से हमेशा टकराती है क्योंकि कविता ही वह विधा है जो युग बदलाव की संरचना का मार्ग प्रशस्त करती है। कविता संवेदना से ही चलती है और जीवित मनुष्यता को रेखांकित करती हैं । बिना औचित्य के कविता सामाजिक नहीं हो सकती। विख्यात कवि और आलोचक प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल ने  संभावना…

अमृतलाल नागरः ग्रामीण इतिहास का राष्ट्रवादी संदर्भ-  देवेंद्र चौबे

हिंदी के जिन लेखकों के लेखन में भारतीय इतिहास लेखन के कुछ सूत्र मिलते हैं उनमें अमृतलाल नागर (17.8.1916-22.2.1990) का स्थान महत्त्वपूर्ण है। उनकी छवि एक ऐसे कथाकार के रूप में उभरकर सामने आती है जिसने भारतीय समाज के इतिहास और शहरों की संस्कृति को जातीय (राष्ट्रीय) जीवन से जोड़कर लोक समाज के इतिहास को…

‘हम भी मुँह में ज़बान रखते हैं…’ : निरंजन सहाय

भारत में जेंडर के बारे में नये तरीक़े से सोच-विचार की प्रक्रिया बहुत पुरानी नहीं है । लेकिन उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध के दशकों से ही आधुनिक संदर्भों में स्त्रियों की मौजूदगियों को पहचानने और स्थापित करने की मुहिम शुरू हो चुकी थी । आम तौर पर लंबे समय तक सत्ता पर काबिज रहने वाले…

People’s literature: Devendra Choubey

The last two-three decades have witnessed a change in the literary discourse in our country. The issue of social identity has forced the writers and thinkers to discuss and debate upon questions that were hitherto not a part of the mainstream literary discourse; although it is difficult to say whether only the rise of the…

उत्पीड़न का विकल्प-जन प्रतिबद्ध सृजन: निरंजन सहाय

क्या ज्ञान कि कोई प्रक्रिया अराजनीतिक हो सकती है ? बदलाव के आदर्श और व्यवहारवाद के नज़रिए में तनाव या द्वन्द्व की क्या कोई भूमिका होती है ? धर्म के रूपक कैसे पुरुष वर्चस्व और सत्ता की तरफदारी में अपनी सारी मेधा का उपयोग करते हैं ?  क्या समाज में सक्रिय कोई भी नज़रिया एक…

प्रो. तुलसीराम: एक मास्टर नरेटर का स्केच- नूरजहाँ मोमिन

प्रो. तुलसीराम से मेरी मुलाक़ात एम.फिल. (जेएनयू) के पहले सेमेस्टर में उस समय हुई, जब मैंने उनका कोर्स ‘इंटरनेशनल कम्युनिस्ट मूवमेंट’ लिया था। चूंकि मेरी रुचि रूसी राजनीति में थी इसलिए मैंने उस सत्र में रूसी भाषा के अलावा प्रो. अनुराधा मित्र चिनॉय, प्रो. तुलसीराम और प्रो. अरुण मोहंती के कोर्स लिये थे। शुरुआती दिनों…

हमारी साझी संस्कृति का ताना-बाना: भीष्म साहनी

(पी.सी जोशी स्मृति व्याख्यान, 1999) एक ऐसे व्यक्ति की स्मृति में आयोजित इस व्याख्यान श्रृंखला में आमन्त्रण पाकर मैं स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर रहा हूँ, जिसने हमारे राष्ट्रीय जीवन के राजनीतिक और सांस्कृतिक दोनों क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। चौथे दशक के प्रारंभिक वर्षों में ही श्री पी.सी. जोशी एक जाना-माना नाम हो…

हफ्ते की किताब: पल्लव- शिक्षा की चिंता करता एक कथाकार

हिन्दी साहित्य में अब ऐसे लेखक बहुत कम बचे हैं जो शुद्ध साहित्य से इतर लिखना सामाजिक जिम्मेदारी मानते हों। अब साहित्य लेखन भी दरअसल एक कैरियर बनता जा रहा है तब इतर मसलों पर लिखना खतरनाक भी हो सकता है। जैसे ही आप कविता की रेशमी दुनिया से बाहर आएंगे और अपने परिवेश की समस्याओं पर…

बोलियों की शक्ति: शिप्रा किरण

हिन्दी की शक्ति बोलियों में छुपी है। हिन्दी प्रदेश की प्रमुख बोलियों जैसे भोजपुरी, मैथिली, वज्जिका, अंगिका, अवधी, ब्रज आदि में तो इस विविधता को खासकर महसूस किया जा सकता है। भोजपुरी की बात करें तो पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के अलग अलग क्षेत्रों में भोजपुरी के ही कई रंग-रूप देखने को मिल जाते…

हफ्ते की किताब: पल्लव- ‘पाकिस्तान का मतलब क्या?’

असग़र वजाहत को अपनी पीढ़ी का सबसे प्रयोगशील कथाकार कहा जाये तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। कोई लेखक अपनी विचारधारा से समझौता किये बगैर किस तरह अपनेलेखन में लगातार सार्थक प्रयोग कर सकता है इसके लिए वजाहत के लेखन को देखना चाहिए।  उनका तीसरा यात्रा आख्यान ‘पाकिस्तान का मतलब क्या?’ पढ़ना इसलिएअद्भुत अनुभव नहीं है कि…

हफ्ते की किताब: पल्लव- ‘किस्सा कोताह’

अगर काशी का अस्सी, बना रहे बनारस और बहती गंगा जैसी किताबें न होती तो क्या हम बनारस को जान पाते? हम यानी वह पाठक समाज जो बनारस नहीं गया है,बनारस में नहीं रहता। कवि राजेश जोशी ने अभी एक किताब लिखी है – ‘किस्सा कोताह’, और यहाँ भोपाल जिस तरह किताब में आया है उसे…

2015: हिन्दी साहित्य- गणपत तेली

साहित्यिक प्रवृत्तियों के लिहाज से किसी एक वर्ष विशेष में प्रकाशित और चर्चित हुई कृतियों का महत्व यह होता है कि उससे लेखन-पठन के नए रुझान समझे जा सकते हैं। हालांकि किन्हीं प्रवृत्तियों के प्रचलन को समझ पाने के लिए एक साल की अवधि बहुत कम समय होता है, फिर भी पिछले साल में हुई…

मीरां के जीवन और समाज की पड़ताल: गणपत तेली

भक्तिकालीन कविता में मीरा का नाम एक लोकप्रिय कवि के रूप में हमारे सामने आता है, लेकिन मीरा को सही परिप्रेक्ष्य में समझने की कोशिशें बहुत कम हुई है। साहित्य के इतिहास ग्रंथों में तो मीरा को कोई विशेष स्थान नहीं मिला लेकिन पिछले कुछ वर्षों में अकादमिक दुनिया में मीरा पर केन्द्रित कुछ महत्वपूर्ण…

‘हस्ताक्षर’ के दस साल: रोहित शर्मा

हिन्दी अगर देश के बड़े भूभाग की भाषा है तो यह स्वाभाविक है कि अनेक प्रयोग और नवाचार इस भाषा और साहित्य में होते हों। देश की राजधानी दिल्ली में सौ साल से भी अधिक पुराने हिन्दू कालेज में ऐसे एक प्रयोग को दस साल पूरे हुए। यहाँ के हिंदी विभाग द्वारा एक हस्तलिखित पत्रिका निकाली…

विद्यासागर नौटियाल से लक्ष्मण व्यास की बातचीत

विद्यासागर नौटियाल कथा लेखन का सुपरिचित नाम हैं।‘सूरज सबका है’ और ‘उत्तर बायां है’ जैसे उपन्यासों के लिए चर्चित विद्यासागर नौटियाल ने लेखन 1949 में प्रारम्भ किया था और नयी कहानी के उर्वर दिनों में उन्होंने ‘भैंस का कट्या’ जैसी अविस्मरणीय कहानी लिखी। फिर वे अरसे तक लेखन से दूर रहे। सन् 1990 में उन्होंने…

हफ्ते की किताब: पल्लव- ‘तीन सौ तीस कहावती कहानियाँ’

विजयदान देथा जिन्हें बिज्जी के नाम से लोग कहीं ज्यादा जानते हैं उन बिरले लोगों में थे जिन्होंने किसी एक जूनून के लिए पूरा जीवन समर्पित कर दिया। उन्होंने राजस्थानी में अपना लेखन शुरू किया था और बहुत प्रारम्भ में ही प्रतिज्ञा ले ली कि जीवन भर अपनी भाषा में ही लिखूंगा भले अन्य पाठकों के लिए उसे…

हफ्ते की किताब: पल्लव- ‘जलमुर्गियों का शिकार’

‘क्योंकि मैं हमेश से इस बात का कायल रहा हूँ कि आपके कहन की ख़ूबसूरती इसमें है कि आप जो कहते हैं,वह नहीं कहते। और मेरा तो कौल है कि मैं जो कहता हूँ, उससे बाहर बहुत-कुछ कहता हूँ।’                                  …

हफ्ते की किताब: पल्लव- ‘बारिश, धुआँ और दोस्त’

‘कहानी क्या होती है?’ एक बार उसने पूछा था। ‘वह चीज, जिसके आईने में हम ज़िंदगी को नए सिरे से पहचानते हैं।‘ सवाल खत्म नहीं हुआ था।’कहानी कहां से मिलती है?’ ’जिंदगी को क़रीब से देखने से, रुक कर।’                     ( ‘बारिश,धुआँ और दोस्त’ कहानी से ) कहानी लिखना इधर फैशन भी है। कहानीकार नयी नयी…

एक अधूरा साक्षात्कार: प्रो. मणीन्‍द्रनाथ ठाकुर

कवि विद्रोही का जीवन दर्शन कल शाम अचानक पता चला कि कवि ‘विद्रोही’ नहीं रहे. वैसे तो आजकल कम ही कवि विद्रोही रह गए हैं, लेकिन मैं बात कर रहा हूँ कवि रमाशंकर यादव ‘विद्रोही’ की जिनका वजूद ही एक तरह का विद्रोह था; जवाहरलाल नेहरु विश्व विद्यालय के प्रांगन में लगातार बने रह कर…

हफ्ते की किताब: पल्लव- ‘जानकीदास तेजपाल मैनशन’

भारत में भूमंडलीकरण या उदारीकरण अथवा साफ़ साफ़ कहें तो बाजारीकरण की प्रक्रिया ने गहरे बदलाव किए हैं। अकारण नहीं कि इस प्रक्रिया के प्रारम्भ होने के बाद अधिकाँश साहित्यकारों की चिंता में यह परिघटना है। बीते दशकों के उपन्यासों, कहानियों और कविताओं में इस परिघटना के मनुष्य विरोधी और धन लोलुप चेहरे को बार बार…

हफ्ते की किताब: ममता कालिया का बाल साहित्य -पल्लव

हिन्दी में बच्चों और बड़ों के लेखन में बड़ी दूरियां हैं। सामान्यत: हिन्दी के लेखक बच्चों के लिए नहीं लिखते। अगर लिखते भी हैं तो उसे अपने मुख्य लेखन के समकक्ष उसे देखना या देखा जाना उन्हें पसन्द नहीं होता। वे इसे क्षतिपूर्ति या भलाई में किये गये काम से ज्यादा नहीं समझते। ऐसे में…

हफ्ते की किताब: ‘श्यामलाल का अकेलापन’ – पल्लव

[पल्लव बनास जन के संपादक हैं और जाने माने कथा समीक्षक।  हमारे आग्रह पर उन्होंने तय  किया है कि हर सप्ताह अपनी पसन्द की किसी एक नयी-पुरानी किताब पर लिखेंगे। आशा है, आप पसंद करेंगे।   वे शुरुआत कर रहे हैं, संजय कुंदन के कहानी संग्रह ‘श्यामलाल का अकेलापन’ से] ‘यह डराना ही तो है। वह कहना चाहता है कि…

मीरां लोक में बनती-बिगड़ती है: प्रो माधव हाड़ा से गणपत तेली की बातचीत

मीरां पर अपनी शोधपरक पुस्तक ‘पचरंग चोला पहन सखी री’ के लिए आलोचक माधव हाड़ा इन दिनों चर्चा में हैं। उदयपुर के मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय में हिन्दी के आचार्य और विभागाध्यक्ष हाड़ा इससे पहले समकालीन कविता पर दो तथा मीडिया पर दो पुस्तकें लिख चुके हैं। उनसे मीरां के जीवन के सम्बन्ध मे बातचीत हुई। प्रस्तुत…

साम्राज्यवादी हिंदी का प्रश्न और दूसरी भाषाएँ: अरिमर्दन कुमार त्रिपाठी

आम तौर पर किसी भाषा का विकास एवं विस्तार उसके समाज के साथ होता है, लेकिन हिंदी के संदर्भ में यह तथ्य शतांश सत्य नहीं है। हिंदी का विकास जिस खड़ी बोली से हो रहा था एवं इधर महात्मा गांधी जिस ‘हिंदुस्तानी’ की बात कर रहे थे, उन दोनों हिंदी के दो अलग लक्ष्य थे।…

औपनिवेशिक सत्ता की भाषा नीति और हिंदी-उर्दू विवाद: गणपत तेली

शुरू में अपने अकादमिक साधनों से अंग्रेजों ने भारत को असभ्य और जड़ बताया और उसे सभ्य बनाने के कार्य का श्रेय लिया। सभ्यता के इस मिशन में उन्होंने भारत के सामाजिक क्षेत्रों में हस्तक्षेप कर सुधार कार्य भी किये। ब्रिटिश शासन के इन हस्तक्षेपों का भारतीय समाज की प्रतिगामी ताकतों द्वारा बड़े पैमाने पर विरोध…

हिन्दी एक भाषा मंच है:  विश्वनाथ त्रिपाठी

विश्वनाथ त्रिपाठी से पल्लव का साक्षात्कार हिन्दी की अब तक प्रगति को आप किस रूप में देखते है? देखिए, भाषाओं का इतिहास होता है और इतिहास की एक प्रक्रिया होती है. इस प्रक्रिया में सब चीजें होती है.हिन्दी भी इसी ऐतिहासिक प्रक्रिया में है. जो भी जिस रूप में है, बिल्कुल ठीक उसी रूप में आगे नहीं रह…