‘जाऊँगा कहाँ, रहूँगा यहीं’ : निरंजन सहाय

वह 19 मार्च की ऐसी खौफनाक शाम थी, जिस पर विश्वास करने के लिए मन तैयार नहीं हुआ| गुरुवर, मेरे सबसे प्रिय कवि और इन सभी शिखरों से भी बड़े मनुष्य केदारनाथ सिंह अब नहीं रहे| अनहोनी की आशंका रह-रह कर मन बेचैन कर दे रही थी पिछले तीन महीनों से| पर यह मनहूस खबर…

यह अच्छे-बुरे लोकतंत्र का समय है: प्रो. मैनेजर पाण्डेय

[हिंदी के प्रसिद्ध आलोचक और विचारक प्रो. मैनेजर पाण्डेय पिछले वर्ष पचहत्तर वर्ष के हो गये। अपने जीवन की इस लंबी अवधि में वे भारत समेत पूरी दुनिया में हो रहे परिवर्तनों के साक्षी रहे हैं। खासकर, साहित्य और विचारधारा में हो रही तब्दीलियों को उन्होंने करीब से देखा और महसूस किया है। इन तमाम…

स्वयं प्रकाश का सफ़र: हिमांशु पंड्या

हिंदी के जाने-माने कथाकार  ‘स्वयं प्रकाश की चुनिंदा कहानियांं’ पुस्तक की भूमिका के रूप में पुस्तक के संपादक और युवा आलोचक हिमांशु पंड्या ने यह लेख लिखा था। इस वर्ष इस किताब का दूसरा संस्करण प्रकाशित हुआ है।  इस माह स्वयं प्रकाश अपना सत्तरवां जन्मदिन मना रहे हैं। इस अवसर पर प्रस्तुत है- स्वयं प्रकाश की कहानियों…

संभावना का व्याख्यान और ‘बनास जन’ का विमोचन

चित्तौड़गढ़ 13 अक्टूबर । कविता अपने जीवन में सत्ता से हमेशा टकराती है क्योंकि कविता ही वह विधा है जो युग बदलाव की संरचना का मार्ग प्रशस्त करती है। कविता संवेदना से ही चलती है और जीवित मनुष्यता को रेखांकित करती हैं । बिना औचित्य के कविता सामाजिक नहीं हो सकती। विख्यात कवि और आलोचक प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल ने  संभावना…

अमृतलाल नागरः ग्रामीण इतिहास का राष्ट्रवादी संदर्भ-  देवेंद्र चौबे

हिंदी के जिन लेखकों के लेखन में भारतीय इतिहास लेखन के कुछ सूत्र मिलते हैं उनमें अमृतलाल नागर (17.8.1916-22.2.1990) का स्थान महत्त्वपूर्ण है। उनकी छवि एक ऐसे कथाकार के रूप में उभरकर सामने आती है जिसने भारतीय समाज के इतिहास और शहरों की संस्कृति को जातीय (राष्ट्रीय) जीवन से जोड़कर लोक समाज के इतिहास को…

People’s literature: Devendra Choubey

The last two-three decades have witnessed a change in the literary discourse in our country. The issue of social identity has forced the writers and thinkers to discuss and debate upon questions that were hitherto not a part of the mainstream literary discourse; although it is difficult to say whether only the rise of the…

प्रो. तुलसीराम: एक मास्टर नरेटर का स्केच- नूरजहाँ मोमिन

प्रो. तुलसीराम से मेरी मुलाक़ात एम.फिल. (जेएनयू) के पहले सेमेस्टर में उस समय हुई, जब मैंने उनका कोर्स ‘इंटरनेशनल कम्युनिस्ट मूवमेंट’ लिया था। चूंकि मेरी रुचि रूसी राजनीति में थी इसलिए मैंने उस सत्र में रूसी भाषा के अलावा प्रो. अनुराधा मित्र चिनॉय, प्रो. तुलसीराम और प्रो. अरुण मोहंती के कोर्स लिये थे। शुरुआती दिनों…

हमारी साझी संस्कृति का ताना-बाना: भीष्म साहनी

(पी.सी जोशी स्मृति व्याख्यान, 1999) एक ऐसे व्यक्ति की स्मृति में आयोजित इस व्याख्यान श्रृंखला में आमन्त्रण पाकर मैं स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर रहा हूँ, जिसने हमारे राष्ट्रीय जीवन के राजनीतिक और सांस्कृतिक दोनों क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। चौथे दशक के प्रारंभिक वर्षों में ही श्री पी.सी. जोशी एक जाना-माना नाम हो…

हफ्ते की किताब: पल्लव- ‘पाकिस्तान का मतलब क्या?’

असग़र वजाहत को अपनी पीढ़ी का सबसे प्रयोगशील कथाकार कहा जाये तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। कोई लेखक अपनी विचारधारा से समझौता किये बगैर किस तरह अपनेलेखन में लगातार सार्थक प्रयोग कर सकता है इसके लिए वजाहत के लेखन को देखना चाहिए।  उनका तीसरा यात्रा आख्यान ‘पाकिस्तान का मतलब क्या?’ पढ़ना इसलिएअद्भुत अनुभव नहीं है कि…

हफ्ते की किताब: पल्लव- ‘किस्सा कोताह’

अगर काशी का अस्सी, बना रहे बनारस और बहती गंगा जैसी किताबें न होती तो क्या हम बनारस को जान पाते? हम यानी वह पाठक समाज जो बनारस नहीं गया है,बनारस में नहीं रहता। कवि राजेश जोशी ने अभी एक किताब लिखी है – ‘किस्सा कोताह’, और यहाँ भोपाल जिस तरह किताब में आया है उसे…

2015: हिन्दी साहित्य- गणपत तेली

साहित्यिक प्रवृत्तियों के लिहाज से किसी एक वर्ष विशेष में प्रकाशित और चर्चित हुई कृतियों का महत्व यह होता है कि उससे लेखन-पठन के नए रुझान समझे जा सकते हैं। हालांकि किन्हीं प्रवृत्तियों के प्रचलन को समझ पाने के लिए एक साल की अवधि बहुत कम समय होता है, फिर भी पिछले साल में हुई…

हफ्ते की किताब: पल्लव- ‘हम न मरब’

‘जिंदगी स्साली, बस,  निरंतर तलाश है। और सुख भैंचो कहीं होता ही नहीं। जिंदगी सुख के पीछे एक चूतियाचन्दन वाली दौड़ है।  ख़त्म नहीं होती क्योंकि सुख तो कभी मिलने का नहीं। अरे, जे सुख नाम की चीज़ जो कहीं होए तब तो मिले ना। समझो, सुख कहीं होता ही नहीं डॉक्टर साहब। सब दुखी हैं। और…

मीरां के जीवन और समाज की पड़ताल: गणपत तेली

भक्तिकालीन कविता में मीरा का नाम एक लोकप्रिय कवि के रूप में हमारे सामने आता है, लेकिन मीरा को सही परिप्रेक्ष्य में समझने की कोशिशें बहुत कम हुई है। साहित्य के इतिहास ग्रंथों में तो मीरा को कोई विशेष स्थान नहीं मिला लेकिन पिछले कुछ वर्षों में अकादमिक दुनिया में मीरा पर केन्द्रित कुछ महत्वपूर्ण…

हफ्ते की किताब: पल्लव- ‘नीलकान्त का सफ़र’

कहानी कहना मनुष्य की आदिम प्रवृत्ति है और कहानीकारों में उन्हीं लेखकों को स्मृति में स्थान मिल पाता है जो कहानी लिखने और सुनाने का भेद पाट सकें। अस्सी के दशक में नयी कहानी के बाद उठ खड़े हुए अनेक कहानी आन्दोलनों के कारण कहानी में बहुत अराजकता फ़ैल गई थी। इस दौर में जिन…

विद्यासागर नौटियाल से लक्ष्मण व्यास की बातचीत

विद्यासागर नौटियाल कथा लेखन का सुपरिचित नाम हैं।‘सूरज सबका है’ और ‘उत्तर बायां है’ जैसे उपन्यासों के लिए चर्चित विद्यासागर नौटियाल ने लेखन 1949 में प्रारम्भ किया था और नयी कहानी के उर्वर दिनों में उन्होंने ‘भैंस का कट्या’ जैसी अविस्मरणीय कहानी लिखी। फिर वे अरसे तक लेखन से दूर रहे। सन् 1990 में उन्होंने…

हफ्ते की किताब: पल्लव- ‘जलमुर्गियों का शिकार’

‘क्योंकि मैं हमेश से इस बात का कायल रहा हूँ कि आपके कहन की ख़ूबसूरती इसमें है कि आप जो कहते हैं,वह नहीं कहते। और मेरा तो कौल है कि मैं जो कहता हूँ, उससे बाहर बहुत-कुछ कहता हूँ।’                                  …

हफ्ते की किताब: पल्लव- ‘बारिश, धुआँ और दोस्त’

‘कहानी क्या होती है?’ एक बार उसने पूछा था। ‘वह चीज, जिसके आईने में हम ज़िंदगी को नए सिरे से पहचानते हैं।‘ सवाल खत्म नहीं हुआ था।’कहानी कहां से मिलती है?’ ’जिंदगी को क़रीब से देखने से, रुक कर।’                     ( ‘बारिश,धुआँ और दोस्त’ कहानी से ) कहानी लिखना इधर फैशन भी है। कहानीकार नयी नयी…

हफ्ते की किताब: पल्लव- ‘जानकीदास तेजपाल मैनशन’

भारत में भूमंडलीकरण या उदारीकरण अथवा साफ़ साफ़ कहें तो बाजारीकरण की प्रक्रिया ने गहरे बदलाव किए हैं। अकारण नहीं कि इस प्रक्रिया के प्रारम्भ होने के बाद अधिकाँश साहित्यकारों की चिंता में यह परिघटना है। बीते दशकों के उपन्यासों, कहानियों और कविताओं में इस परिघटना के मनुष्य विरोधी और धन लोलुप चेहरे को बार बार…

हफ्ते की किताब: ममता कालिया का बाल साहित्य -पल्लव

हिन्दी में बच्चों और बड़ों के लेखन में बड़ी दूरियां हैं। सामान्यत: हिन्दी के लेखक बच्चों के लिए नहीं लिखते। अगर लिखते भी हैं तो उसे अपने मुख्य लेखन के समकक्ष उसे देखना या देखा जाना उन्हें पसन्द नहीं होता। वे इसे क्षतिपूर्ति या भलाई में किये गये काम से ज्यादा नहीं समझते। ऐसे में…

हफ्ते की किताब: ‘श्यामलाल का अकेलापन’ – पल्लव

[पल्लव बनास जन के संपादक हैं और जाने माने कथा समीक्षक।  हमारे आग्रह पर उन्होंने तय  किया है कि हर सप्ताह अपनी पसन्द की किसी एक नयी-पुरानी किताब पर लिखेंगे। आशा है, आप पसंद करेंगे।   वे शुरुआत कर रहे हैं, संजय कुंदन के कहानी संग्रह ‘श्यामलाल का अकेलापन’ से] ‘यह डराना ही तो है। वह कहना चाहता है कि…

मीडिया: कितना हकीकत, कितना अफ़साना: गणपत तेली

पुस्तक समीक्षा- सीढ़ियां चढ़ता मीडिया, माधव हाड़ा, आधार प्रकाशन, पंचकूला, हरियाणा जनसंचार या मीडिया के व्यापक इतिहास का प्रारंभ छापाखाने के अविष्कार के साथ होता है। छापाखाने के अविष्कार ने जहाँ एक तरफ छपाई का काम आसान कर दिया था, वहीं कम समय, श्रम और लागत के कारण लोक भाषाओं में भी सूचनाओं का प्रसारण…