साझी विरासत, साझी अदावत!: निरंजन सहाय

  हिंदी – उर्दू के रोचक रिश्ते को समझने के लिहाज से एक हालिया प्रकरण का उल्लेख करना मौजू लग रहा है | राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 के बाद हिन्दी की जो किताबें एन.सी.ई.आर.टी. दिल्ली ने पूरे देश के लिए बनायी थी , उसमें अनेक बदलाव किए गए थे | अब हुआ यह है…

‘हम भी मुँह में ज़बान रखते हैं…’ : निरंजन सहाय

भारत में जेंडर के बारे में नये तरीक़े से सोच-विचार की प्रक्रिया बहुत पुरानी नहीं है । लेकिन उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध के दशकों से ही आधुनिक संदर्भों में स्त्रियों की मौजूदगियों को पहचानने और स्थापित करने की मुहिम शुरू हो चुकी थी । आम तौर पर लंबे समय तक सत्ता पर काबिज रहने वाले…

औपनिवेशिक सत्ता की भाषा नीति और हिंदी-उर्दू विवाद: गणपत तेली

शुरू में अपने अकादमिक साधनों से अंग्रेजों ने भारत को असभ्य और जड़ बताया और उसे सभ्य बनाने के कार्य का श्रेय लिया। सभ्यता के इस मिशन में उन्होंने भारत के सामाजिक क्षेत्रों में हस्तक्षेप कर सुधार कार्य भी किये। ब्रिटिश शासन के इन हस्तक्षेपों का भारतीय समाज की प्रतिगामी ताकतों द्वारा बड़े पैमाने पर विरोध…

‘अच्छा! यह जेएनयू से है!’ : प्रो. नामवर सिंह से बातचीत

जाने माने आलोचक प्रो. नामवर सिंह जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एमरिटस हैं। जेएनयू के भारतीय भाषा केन्द्र की संकल्पना में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। सैद्धांतिकी पर जोर देने वाले पाठ्यक्रमों और सतत मूल्यांकन पद्धति के साथ-साथ उनका महत्वपूर्ण योगदान हिन्दी और उर्दू दोनों भाषाओं का एक ही केन्द्र बनाना भी है। एक ही परिवेश के…

साहित्य का उद्देश्य: प्रेमचंद

साहित्यकार का लक्ष्य केवल महफिल सजाना और मनोरंजन का सामान जुटाना नहीं है,- उसका दरजा इतना न गिराइए।… हमारी कसौटी पर वही साहित्य खरा उतरेगा, जिसमें उच्च चिंतन हो, स्वाधीनता का भाव हो, सौंदर्य का सार हो, सृजन की आत्मा हो, जीवन की सचाइयों का प्रकाश हो- जो हममें गति और बेचैनी पैदा करे, सुलाए नहीं; क्योंकि अब और ज्यादा सोना मृत्यु का लक्षण है।

ब्रजभाषा पाठशाला: दलपत राजपुरोहित

गुजरात के कच्छ राज्य की राजधानी भुज में 18वीं सदी के मध्य में एक स्कूल स्थापित हुआ, जिसे ‘ब्रजभाषा पाठशाला’ या ‘भुज की काव्यशाला’ कहा जाता था। इस पाठशाला के संस्थापक राव लखपत (शासनकाल 1741-61 ई.) स्वयं कवि थे और साहित्य, स्थापत्य, संगीत आदि कलाओं को संरक्षण देने वाले शासक भी।

मीडिया: कितना हकीकत, कितना अफ़साना: गणपत तेली

पुस्तक समीक्षा- सीढ़ियां चढ़ता मीडिया, माधव हाड़ा, आधार प्रकाशन, पंचकूला, हरियाणा जनसंचार या मीडिया के व्यापक इतिहास का प्रारंभ छापाखाने के अविष्कार के साथ होता है। छापाखाने के अविष्कार ने जहाँ एक तरफ छपाई का काम आसान कर दिया था, वहीं कम समय, श्रम और लागत के कारण लोक भाषाओं में भी सूचनाओं का प्रसारण…