साझी विरासत, साझी अदावत!: निरंजन सहाय

  हिंदी – उर्दू के रोचक रिश्ते को समझने के लिहाज से एक हालिया प्रकरण का उल्लेख करना मौजू लग रहा है | राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 के बाद हिन्दी की जो किताबें एन.सी.ई.आर.टी. दिल्ली ने पूरे देश के लिए बनायी थी , उसमें अनेक बदलाव किए गए थे | अब हुआ यह है…

औपनिवेशिक सत्ता की भाषा नीति और हिंदी-उर्दू विवाद: गणपत तेली

शुरू में अपने अकादमिक साधनों से अंग्रेजों ने भारत को असभ्य और जड़ बताया और उसे सभ्य बनाने के कार्य का श्रेय लिया। सभ्यता के इस मिशन में उन्होंने भारत के सामाजिक क्षेत्रों में हस्तक्षेप कर सुधार कार्य भी किये। ब्रिटिश शासन के इन हस्तक्षेपों का भारतीय समाज की प्रतिगामी ताकतों द्वारा बड़े पैमाने पर विरोध…

इतिहास बोध और हिन्दी प्रदेश: गणपत तेली

: पुस्तक समीक्षा: देवीशंकर अवस्थी सम्मान (2014) से सम्मानित पुस्तक ‘भारतीय इतिहास बोध का संघर्ष और हिन्दी प्रदेश’ की (बनास जन, मार्च 2014 में प्रकाशित) समीक्षा हिन्दी क्षेत्र के बौद्धिक विकास में हिन्दी नवजागरण का प्रमुख स्थान है। हालांकि विभिन्न नये शोधों द्वारा इस नवजागरण के चरित्र पर सवाल उठाये गए हैं, लेकिन इस बात से इंकार…

भाषा विवाद और राजनीति: गणपत तेली

सम्मेलन के संग्रहालय या पुस्तकालय में ऐतिहासिक महत्त्व की कई पुरानी पुस्तकें और पत्रिकाएं धूल खा रही हैं और नष्ट होने के कगार पर हैं। यही स्थिति नागरी प्रचारिणी सभा की भी है। किसी भी शोधार्थी के लिए उस संदर्भ सामग्री तक पहुंच पाना बहुत ही मुश्किल काम हो जाता है। इस सामग्री के संरक्षण के लिए विद्वानों ने सरकार को ज्ञापन भी दिया था, लेकिन सरकार को क्या पड़ी है, यह सब करने की। कितना अच्छा होता कि अगर सम्मेलन मुकदमे में लगाए संसाधनों का सदुपयोग अपने संग्रहालय में रखी ऐतिहासिक महत्त्व की बहुमूल्य सामग्री को संरक्षित करने में लगाता।