बहरहाल–फिलहाल: कथाकार काशीनाथ सिंह की बातें – सिद्धार्थ सिंह

कथाकार काशीनाथ सिंह की बातें उनके बेटे प्रोफेसर सिद्धार्थ सिंह की जुबानी   बचपन से शुरुआत करता हूँ तो याद आता है कि शायद पापा से भी पहले हम दोनों भाईयों की मुलाक़ात उनके मुसुक से हुयी थी |  मुसुक यानि भुजाओं की मसल्स ; जिन्हें पंजाबी लोग डोले – शोले भी कहते हैं |…

समकालीन कहानी का लोकतंत्र: गणपत तेली

‘कहानी का लोकतंत्र’ समकालीन कहानी पर युवा आलोचक पल्लव की किताब है, जिसमें उन्होंने समकालीन हिन्दी कहानी के बहाने हमारे समय की एक मुकम्मल तस्वीर प्रस्तुत की है। इस किताब में पल्लव ने समकालीन कहानी में आ रही उन सभी संवेदनाओं का अध्ययन किया है, जिससे आज की कहानी का ताना-बाना बना है। इन संवेदनाओं…

राष्ट्रीय अस्मिता और अंबेडकरी चिंतन: शरण कुमार लिम्बाले

जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग द्वारा जामिया के पहले हिंदी शिक्षक देवदास गांधी की स्मृति में नौंवा देवदास गांधी स्मृति व्याख्यान दिनांक 23.02.2016 को आयोजित किया गया। इस वर्ष यह व्याख्यान जाने-माने मराठी साहित्यकार प्रो शरण कुमार लिंबाले ने ‘राष्ट्रीय अस्मिता और अंबेडकरी चिंतन’ विषय पर अभिव्यक्त किया। यह व्याख्यान आप यहां सुन-देख…

‘रचना और रचनाकार’ विषय पर हिन्दू कालेज में गोष्ठी

  दिल्ली। हमारी जड़ें कहाँ हैं? हमारे बच्चों की जड़ें कहाँ हैं? हम बिना जड़ों के कब तक जी पाएंगे? हमारी पहचान क्या है? कहीं हम समाज के उस वंचित समूह की तरह ही तो नहीं हो गए, जिन्हें औरत कहते हैं। जो बिना जड़ों के, बिना खाद-पानी के, किसी भी जलवायु में पनपने का…