हफ्ते की किताब: पल्लव- शिक्षा की चिंता करता एक कथाकार

हिन्दी साहित्य में अब ऐसे लेखक बहुत कम बचे हैं जो शुद्ध साहित्य से इतर लिखना सामाजिक जिम्मेदारी मानते हों। अब साहित्य लेखन भी दरअसल एक कैरियर बनता जा रहा है तब इतर मसलों पर लिखना खतरनाक भी हो सकता है। जैसे ही आप कविता की रेशमी दुनिया से बाहर आएंगे और अपने परिवेश की समस्याओं पर…

हफ्ते की किताब: पल्लव- ‘पाकिस्तान का मतलब क्या?’

असग़र वजाहत को अपनी पीढ़ी का सबसे प्रयोगशील कथाकार कहा जाये तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। कोई लेखक अपनी विचारधारा से समझौता किये बगैर किस तरह अपनेलेखन में लगातार सार्थक प्रयोग कर सकता है इसके लिए वजाहत के लेखन को देखना चाहिए।  उनका तीसरा यात्रा आख्यान ‘पाकिस्तान का मतलब क्या?’ पढ़ना इसलिएअद्भुत अनुभव नहीं है कि…

हफ्ते की किताब: पल्लव- ‘किस्सा कोताह’

अगर काशी का अस्सी, बना रहे बनारस और बहती गंगा जैसी किताबें न होती तो क्या हम बनारस को जान पाते? हम यानी वह पाठक समाज जो बनारस नहीं गया है,बनारस में नहीं रहता। कवि राजेश जोशी ने अभी एक किताब लिखी है – ‘किस्सा कोताह’, और यहाँ भोपाल जिस तरह किताब में आया है उसे…

हफ्ते की किताब: पल्लव- ‘हम न मरब’

‘जिंदगी स्साली, बस,  निरंतर तलाश है। और सुख भैंचो कहीं होता ही नहीं। जिंदगी सुख के पीछे एक चूतियाचन्दन वाली दौड़ है।  ख़त्म नहीं होती क्योंकि सुख तो कभी मिलने का नहीं। अरे, जे सुख नाम की चीज़ जो कहीं होए तब तो मिले ना। समझो, सुख कहीं होता ही नहीं डॉक्टर साहब। सब दुखी हैं। और…

हफ्ते की किताब: पल्लव- ‘नीलकान्त का सफ़र’

कहानी कहना मनुष्य की आदिम प्रवृत्ति है और कहानीकारों में उन्हीं लेखकों को स्मृति में स्थान मिल पाता है जो कहानी लिखने और सुनाने का भेद पाट सकें। अस्सी के दशक में नयी कहानी के बाद उठ खड़े हुए अनेक कहानी आन्दोलनों के कारण कहानी में बहुत अराजकता फ़ैल गई थी। इस दौर में जिन…

हफ्ते की किताब: पल्लव- ‘तीन सौ तीस कहावती कहानियाँ’

विजयदान देथा जिन्हें बिज्जी के नाम से लोग कहीं ज्यादा जानते हैं उन बिरले लोगों में थे जिन्होंने किसी एक जूनून के लिए पूरा जीवन समर्पित कर दिया। उन्होंने राजस्थानी में अपना लेखन शुरू किया था और बहुत प्रारम्भ में ही प्रतिज्ञा ले ली कि जीवन भर अपनी भाषा में ही लिखूंगा भले अन्य पाठकों के लिए उसे…

हफ्ते की किताब: पल्लव- ‘जलमुर्गियों का शिकार’

‘क्योंकि मैं हमेश से इस बात का कायल रहा हूँ कि आपके कहन की ख़ूबसूरती इसमें है कि आप जो कहते हैं,वह नहीं कहते। और मेरा तो कौल है कि मैं जो कहता हूँ, उससे बाहर बहुत-कुछ कहता हूँ।’                                  …

हफ्ते की किताब: पल्लव- ‘बारिश, धुआँ और दोस्त’

‘कहानी क्या होती है?’ एक बार उसने पूछा था। ‘वह चीज, जिसके आईने में हम ज़िंदगी को नए सिरे से पहचानते हैं।‘ सवाल खत्म नहीं हुआ था।’कहानी कहां से मिलती है?’ ’जिंदगी को क़रीब से देखने से, रुक कर।’                     ( ‘बारिश,धुआँ और दोस्त’ कहानी से ) कहानी लिखना इधर फैशन भी है। कहानीकार नयी नयी…

हफ्ते की किताब: ममता कालिया का बाल साहित्य -पल्लव

हिन्दी में बच्चों और बड़ों के लेखन में बड़ी दूरियां हैं। सामान्यत: हिन्दी के लेखक बच्चों के लिए नहीं लिखते। अगर लिखते भी हैं तो उसे अपने मुख्य लेखन के समकक्ष उसे देखना या देखा जाना उन्हें पसन्द नहीं होता। वे इसे क्षतिपूर्ति या भलाई में किये गये काम से ज्यादा नहीं समझते। ऐसे में…

हफ्ते की किताब: ‘श्यामलाल का अकेलापन’ – पल्लव

[पल्लव बनास जन के संपादक हैं और जाने माने कथा समीक्षक।  हमारे आग्रह पर उन्होंने तय  किया है कि हर सप्ताह अपनी पसन्द की किसी एक नयी-पुरानी किताब पर लिखेंगे। आशा है, आप पसंद करेंगे।   वे शुरुआत कर रहे हैं, संजय कुंदन के कहानी संग्रह ‘श्यामलाल का अकेलापन’ से] ‘यह डराना ही तो है। वह कहना चाहता है कि…