समकालीन कहानी का लोकतंत्र: गणपत तेली

‘कहानी का लोकतंत्र’ समकालीन कहानी पर युवा आलोचक पल्लव की किताब है, जिसमें उन्होंने समकालीन हिन्दी कहानी के बहाने हमारे समय की एक मुकम्मल तस्वीर प्रस्तुत की है। इस किताब में पल्लव ने समकालीन कहानी में आ रही उन सभी संवेदनाओं का अध्ययन किया है, जिससे आज की कहानी का ताना-बाना बना है। इन संवेदनाओं…

‘छबीला रंगबाज का शहर’ का लोकार्पण

हमारे चरित्रहीन समय में बड़े चरित्रों का बनना बंद हो गया है इसलिए परिवेश ने अब चरित्रों का स्थान ले लिया है। ‘छबीला रंगबाज का शहर’ में ऐसे ही चरित्रहीन परिवेश की कहानियां हैं जहाँ कथाकार वास्तविक पात्रों की काल्पनिक कहानियां दिखा रहा है। सुप्रसिद्ध कथाकार स्वयं प्रकाश ने साहित्य अकादेमी सभागार युवा कथाकार प्रवीण…

स्वयं प्रकाश का सफ़र: हिमांशु पंड्या

हिंदी के जाने-माने कथाकार  ‘स्वयं प्रकाश की चुनिंदा कहानियांं’ पुस्तक की भूमिका के रूप में पुस्तक के संपादक और युवा आलोचक हिमांशु पंड्या ने यह लेख लिखा था। इस वर्ष इस किताब का दूसरा संस्करण प्रकाशित हुआ है।  इस माह स्वयं प्रकाश अपना सत्तरवां जन्मदिन मना रहे हैं। इस अवसर पर प्रस्तुत है- स्वयं प्रकाश की कहानियों…

हफ्ते की किताब: पल्लव- ‘नीलकान्त का सफ़र’

कहानी कहना मनुष्य की आदिम प्रवृत्ति है और कहानीकारों में उन्हीं लेखकों को स्मृति में स्थान मिल पाता है जो कहानी लिखने और सुनाने का भेद पाट सकें। अस्सी के दशक में नयी कहानी के बाद उठ खड़े हुए अनेक कहानी आन्दोलनों के कारण कहानी में बहुत अराजकता फ़ैल गई थी। इस दौर में जिन…