पूछो कि पूछने से बनती है दुनिया: निरंजन सहाय

‘मूल्यांकन ने अंकन में ज़्यादा से ज़्यादा निष्पक्षता के प्रति अपने पागलपन के कारण तथा बच्चों के कोमल दिमाग को अनगिनत जानकारी के बेकार टुकड़ों (स्वेज नहर किसने बनाई ? 19 नवंबर को सूर्य कहाँ होगा ? हेयर कौन है और उसके उपकरणों के बारे में तुम क्या जानते हो ?) से भरने की अंतहीन…

उत्पीड़न का विकल्प-जन प्रतिबद्ध सृजन: निरंजन सहाय

क्या ज्ञान कि कोई प्रक्रिया अराजनीतिक हो सकती है ? बदलाव के आदर्श और व्यवहारवाद के नज़रिए में तनाव या द्वन्द्व की क्या कोई भूमिका होती है ? धर्म के रूपक कैसे पुरुष वर्चस्व और सत्ता की तरफदारी में अपनी सारी मेधा का उपयोग करते हैं ?  क्या समाज में सक्रिय कोई भी नज़रिया एक…

क्या शिक्षा एक सांस्कृतिक कार्यवाही है?: निरंजन सहाय

‘लोकतंत्र में नागरिकता की परिभाषा में कई बौद्धिक, सामाजिक व नैतिक गुण शामिल होते हैं: एक लोकतांत्रिक नागरिक में सच को झूठ से अलग छांटने, प्रचार से तथ्य अलग करने, धर्मान्धता और पूर्वाग्रहों के खतरनाक आकर्षण को अस्वीकार करने की समझ व बौद्धिक क्षमता होनी चाहिए…. वह न तो पुराने को इसलिए नकारे क्योंकि वह…

हफ्ते की किताब: पल्लव- शिक्षा की चिंता करता एक कथाकार

हिन्दी साहित्य में अब ऐसे लेखक बहुत कम बचे हैं जो शुद्ध साहित्य से इतर लिखना सामाजिक जिम्मेदारी मानते हों। अब साहित्य लेखन भी दरअसल एक कैरियर बनता जा रहा है तब इतर मसलों पर लिखना खतरनाक भी हो सकता है। जैसे ही आप कविता की रेशमी दुनिया से बाहर आएंगे और अपने परिवेश की समस्याओं पर…

शिक्षा की कसौटी: गणपत तेली

सय्यद मुबीन जेहरा ने ‘पढ़ाई में भटकाव के रास्ते’ (जनसत्ता, 12 अप्रैल) में शिक्षा पर बात करते हुए कुछ महत्त्वपूर्ण मुद्दे उठाए हैं। उन्होंने ठीक ही बाजारीकरण और निजीकरण के हमले को शिक्षा-व्यवस्था के लिए खतरनाक माना है। निजीकरण और बाजारीकरण के बाद शिक्षा पाने के लिए आम छात्रों को काफी मुश्किलों का सामना करना…