पूछो कि पूछने से बनती है दुनिया: निरंजन सहाय

‘मूल्यांकन ने अंकन में ज़्यादा से ज़्यादा निष्पक्षता के प्रति अपने पागलपन के कारण तथा बच्चों के कोमल दिमाग को अनगिनत जानकारी के बेकार टुकड़ों (स्वेज नहर किसने बनाई ? 19 नवंबर को सूर्य कहाँ होगा ? हेयर कौन है और उसके उपकरणों के बारे में तुम क्या जानते हो ?) से भरने की अंतहीन…

‘हम भी मुँह में ज़बान रखते हैं…’ : निरंजन सहाय

भारत में जेंडर के बारे में नये तरीक़े से सोच-विचार की प्रक्रिया बहुत पुरानी नहीं है । लेकिन उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध के दशकों से ही आधुनिक संदर्भों में स्त्रियों की मौजूदगियों को पहचानने और स्थापित करने की मुहिम शुरू हो चुकी थी । आम तौर पर लंबे समय तक सत्ता पर काबिज रहने वाले…

उत्पीड़न का विकल्प-जन प्रतिबद्ध सृजन: निरंजन सहाय

क्या ज्ञान कि कोई प्रक्रिया अराजनीतिक हो सकती है ? बदलाव के आदर्श और व्यवहारवाद के नज़रिए में तनाव या द्वन्द्व की क्या कोई भूमिका होती है ? धर्म के रूपक कैसे पुरुष वर्चस्व और सत्ता की तरफदारी में अपनी सारी मेधा का उपयोग करते हैं ?  क्या समाज में सक्रिय कोई भी नज़रिया एक…

क्या शिक्षा एक सांस्कृतिक कार्यवाही है?: निरंजन सहाय

‘लोकतंत्र में नागरिकता की परिभाषा में कई बौद्धिक, सामाजिक व नैतिक गुण शामिल होते हैं: एक लोकतांत्रिक नागरिक में सच को झूठ से अलग छांटने, प्रचार से तथ्य अलग करने, धर्मान्धता और पूर्वाग्रहों के खतरनाक आकर्षण को अस्वीकार करने की समझ व बौद्धिक क्षमता होनी चाहिए…. वह न तो पुराने को इसलिए नकारे क्योंकि वह…

हफ्ते की किताब: पल्लव- शिक्षा की चिंता करता एक कथाकार

हिन्दी साहित्य में अब ऐसे लेखक बहुत कम बचे हैं जो शुद्ध साहित्य से इतर लिखना सामाजिक जिम्मेदारी मानते हों। अब साहित्य लेखन भी दरअसल एक कैरियर बनता जा रहा है तब इतर मसलों पर लिखना खतरनाक भी हो सकता है। जैसे ही आप कविता की रेशमी दुनिया से बाहर आएंगे और अपने परिवेश की समस्याओं पर…

ब्रजभाषा पाठशाला: दलपत राजपुरोहित

गुजरात के कच्छ राज्य की राजधानी भुज में 18वीं सदी के मध्य में एक स्कूल स्थापित हुआ, जिसे ‘ब्रजभाषा पाठशाला’ या ‘भुज की काव्यशाला’ कहा जाता था। इस पाठशाला के संस्थापक राव लखपत (शासनकाल 1741-61 ई.) स्वयं कवि थे और साहित्य, स्थापत्य, संगीत आदि कलाओं को संरक्षण देने वाले शासक भी।