दलित विमर्श के विभिन्न आयाम: सदानन्द वर्मा

समीक्षित पुस्तक: मुकेश मिरोठा, दलित विमर्श : दशा और दिशा, ए.आर.पब्लिशिंग कंपनी, दिल्ली, 2017 डॉ. मुकेश मिरोठा की आलोचनात्मक कृति “दलित विमर्श : दशा और दिशा” दलित लेखन और आंदोलन के विभिन्न आयामों को रेखांकित करती है। गौरतलब है कि लेखक ने दलित लेखन में चली आ रही ऐतिहासिक पड़ताल के साथ-साथ दलित विमर्श की स्थिति, दलित…

बोलियों की शक्ति: शिप्रा किरण

हिन्दी की शक्ति बोलियों में छुपी है। हिन्दी प्रदेश की प्रमुख बोलियों जैसे भोजपुरी, मैथिली, वज्जिका, अंगिका, अवधी, ब्रज आदि में तो इस विविधता को खासकर महसूस किया जा सकता है। भोजपुरी की बात करें तो पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के अलग अलग क्षेत्रों में भोजपुरी के ही कई रंग-रूप देखने को मिल जाते…

हफ्ते की किताब: पल्लव- ‘नीलकान्त का सफ़र’

कहानी कहना मनुष्य की आदिम प्रवृत्ति है और कहानीकारों में उन्हीं लेखकों को स्मृति में स्थान मिल पाता है जो कहानी लिखने और सुनाने का भेद पाट सकें। अस्सी के दशक में नयी कहानी के बाद उठ खड़े हुए अनेक कहानी आन्दोलनों के कारण कहानी में बहुत अराजकता फ़ैल गई थी। इस दौर में जिन…

मुश्किल होता सफर: गणपत तेली

जिस तरह सरकार ‘कम किराया ही रेल्वे की समस्या’ है और ‘सुविधाएँ चाहिए तो भुगतान करना होगा’ जैसे तर्कों को जन मानस में पैठाने में कामयाब हुई है, उसी तरह से इसके अगले चरण में यह बात स्वीकार कराने की कोशिश करेगी कि हमारा रेल्वे सिस्टम नकारा हो गया है, जो निजीकरण के बिना ठीक नहीं हो सकता। यह बहुत चिंताजनक स्थिति होगी। रेल ने इस देश की भौगोलिक और सामाजिक दूरियों को कम करने और विभिन्न समुदायों के बीच संपर्क तथा संवाद स्थापित करने की ऐतिहासिक भूमिका निभाई है। इसकी यह भूमिका आज भी प्रासंगिक है, इसलिए समाज के सभी वर्गों के लिए इसके दरवाज़े खुले रहने चाहिए।