बोलियों की शक्ति: शिप्रा किरण

हिन्दी की शक्ति बोलियों में छुपी है। हिन्दी प्रदेश की प्रमुख बोलियों जैसे भोजपुरी, मैथिली, वज्जिका, अंगिका, अवधी, ब्रज आदि में तो इस विविधता को खासकर महसूस किया जा सकता है। भोजपुरी की बात करें तो पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के अलग अलग क्षेत्रों में भोजपुरी के ही कई रंग-रूप देखने को मिल जाते…

साम्राज्यवादी हिंदी का प्रश्न और दूसरी भाषाएँ: अरिमर्दन कुमार त्रिपाठी

आम तौर पर किसी भाषा का विकास एवं विस्तार उसके समाज के साथ होता है, लेकिन हिंदी के संदर्भ में यह तथ्य शतांश सत्य नहीं है। हिंदी का विकास जिस खड़ी बोली से हो रहा था एवं इधर महात्मा गांधी जिस ‘हिंदुस्तानी’ की बात कर रहे थे, उन दोनों हिंदी के दो अलग लक्ष्य थे।…

भाषाई उपेक्षा और असमानता: गणपत तेली

यह सही है कि भाषा संवाद का प्रभावी माध्यम हैं लेकिन भाषाई राजनीति और विवाद-विमर्श के मुद्दों को संवाद मात्र तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए। चाहे हम देश के वर्तमान भाषिक परिदृश्य को गुलामी की भाषा में परिभाषित न कर पाए फिर भी भाषाई असमानता को संवादहीनता मात्र नहीं कहा जा सकता है और सौहार्द के अभाव को ही संवाद का बाधक नहीं ठहराया जा सकता।

भाषाई उपेक्षा का दंश: गणपत तेली

भारतीय भाषाओं की उपेक्षा कोई प्रशासनिक सेवाओं का अलग-थलग मसला नहीं है, बल्कि हमारे देश की उस अकादमिक व्यवस्था का एक विस्तार है, जहां भारतीय भाषाओं की इसी तरह की उपेक्षा होती है और जो इन भाषाओं के पठन-पाठन की गतिविधियों और इनके विद्यार्थियों के लिए अकादमिक और पेशेगत अवसरों को सीमित करती है। अगर हम उच्च शिक्षा की स्थिति पर एक नजर डालें तो स्पष्ट हो जाएगा कि सरकारी नीतियां इस असमान व्यवस्था को प्रोत्साहित करती हैं।