नयी चुनौतियां साहित्य को सार्थक दिशा देती हैं: असग़र वजाहत

असग़र वजाहत हिन्दी के जाने माने लेखक हैं। अनेक महत्त्वपूर्ण उपन्यासों और नाटकों के रचनाकार असग़र मूलत: किस्सागो हैं। बीते दिनों उनका आख्यान ‘बाक़र गंज के सैयद‘ बेहद प्रसिद्ध हुआ। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम ए, पीएच डी और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली से पोस्ट डॉक्टोरल रिसर्च करने के बाद वे 1971 से…

बनास जन के असगर वजाहत विशेषांक का लोकार्पण

लेखक का सम्मान करना अकादमिकी का प्राथमिक कर्तव्य है। बड़े लेखक भाषाओं के दायरे में नहीं देखे जाते। असग़र वजाहत का लेखन उन्हें भारत के संदर्भ में सचमुच बड़ा लेखक बनाता है।  गुरु गोबिंद सिंह इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित ‘बनास जन’ के लोकार्पण समारोह में मीडिया संकाय के अधिष्ठाता प्रो अनूप बेनिवाल ने कहा कि बहुत कम…

संभावना का व्याख्यान और ‘बनास जन’ का विमोचन

चित्तौड़गढ़ 13 अक्टूबर । कविता अपने जीवन में सत्ता से हमेशा टकराती है क्योंकि कविता ही वह विधा है जो युग बदलाव की संरचना का मार्ग प्रशस्त करती है। कविता संवेदना से ही चलती है और जीवित मनुष्यता को रेखांकित करती हैं । बिना औचित्य के कविता सामाजिक नहीं हो सकती। विख्यात कवि और आलोचक प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल ने  संभावना…

हमारी साझी संस्कृति का ताना-बाना: भीष्म साहनी

(पी.सी जोशी स्मृति व्याख्यान, 1999) एक ऐसे व्यक्ति की स्मृति में आयोजित इस व्याख्यान श्रृंखला में आमन्त्रण पाकर मैं स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर रहा हूँ, जिसने हमारे राष्ट्रीय जीवन के राजनीतिक और सांस्कृतिक दोनों क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। चौथे दशक के प्रारंभिक वर्षों में ही श्री पी.सी. जोशी एक जाना-माना नाम हो…

हफ्ते की किताब: पल्लव- ‘तीन सौ तीस कहावती कहानियाँ’

विजयदान देथा जिन्हें बिज्जी के नाम से लोग कहीं ज्यादा जानते हैं उन बिरले लोगों में थे जिन्होंने किसी एक जूनून के लिए पूरा जीवन समर्पित कर दिया। उन्होंने राजस्थानी में अपना लेखन शुरू किया था और बहुत प्रारम्भ में ही प्रतिज्ञा ले ली कि जीवन भर अपनी भाषा में ही लिखूंगा भले अन्य पाठकों के लिए उसे…

हफ्ते की किताब: पल्लव- ‘जलमुर्गियों का शिकार’

‘क्योंकि मैं हमेश से इस बात का कायल रहा हूँ कि आपके कहन की ख़ूबसूरती इसमें है कि आप जो कहते हैं,वह नहीं कहते। और मेरा तो कौल है कि मैं जो कहता हूँ, उससे बाहर बहुत-कुछ कहता हूँ।’                                  …

हफ्ते की किताब: पल्लव- ‘बारिश, धुआँ और दोस्त’

‘कहानी क्या होती है?’ एक बार उसने पूछा था। ‘वह चीज, जिसके आईने में हम ज़िंदगी को नए सिरे से पहचानते हैं।‘ सवाल खत्म नहीं हुआ था।’कहानी कहां से मिलती है?’ ’जिंदगी को क़रीब से देखने से, रुक कर।’                     ( ‘बारिश,धुआँ और दोस्त’ कहानी से ) कहानी लिखना इधर फैशन भी है। कहानीकार नयी नयी…

हफ्ते की किताब: पल्लव- ‘जानकीदास तेजपाल मैनशन’

भारत में भूमंडलीकरण या उदारीकरण अथवा साफ़ साफ़ कहें तो बाजारीकरण की प्रक्रिया ने गहरे बदलाव किए हैं। अकारण नहीं कि इस प्रक्रिया के प्रारम्भ होने के बाद अधिकाँश साहित्यकारों की चिंता में यह परिघटना है। बीते दशकों के उपन्यासों, कहानियों और कविताओं में इस परिघटना के मनुष्य विरोधी और धन लोलुप चेहरे को बार बार…

हफ्ते की किताब: ‘श्यामलाल का अकेलापन’ – पल्लव

[पल्लव बनास जन के संपादक हैं और जाने माने कथा समीक्षक।  हमारे आग्रह पर उन्होंने तय  किया है कि हर सप्ताह अपनी पसन्द की किसी एक नयी-पुरानी किताब पर लिखेंगे। आशा है, आप पसंद करेंगे।   वे शुरुआत कर रहे हैं, संजय कुंदन के कहानी संग्रह ‘श्यामलाल का अकेलापन’ से] ‘यह डराना ही तो है। वह कहना चाहता है कि…

घर मुबारक: जवाहरलाल नेहरू

गाड़िया लौहार राजस्थान की एक घुमक्कड़ जनजाति हैं, जिसने यह प्रण लिया था कि जब तक पराधीनता रहेगी, वे स्थायी रूप से नहीं रहेंगे। देश की आज़ादी के बाद सरकार ने उन्हें बसाने की पहल की। इसी संबंध में चित्तौड़गढ़ में देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें संबोधित किया था। उनके उस ऐतिहासिक भाषण के मुख्य…

सौ बरस के भीष्म साहनी: पल्लव

भीष्म साहनी हिन्दी के सबसे सम्मानित कथाकारों में हैं। सम्मानित से आशय है जिन्हें पाठकों, आलोचकों और व्यापक समाज से लेखन के लिए भरपूर सम्मान और प्रेम मिला। स्वतंत्रता पूर्व रावलपिंडी में 1915 के 8 अगस्त को उनका जन्म हुआ था। उनके पिता कपडे के सामान्य व्यापारी थे और चाहते थे कि उनके दोनों बेटे भी…

बनास जन – 10: डॉ. रेणु व्यास

एक ज़माना था जब तोपें मुक़ाबिल होने पर अख़बार निकाले जाते थे। आज़ साम्राज्यवादी तोपों से बड़ा ख़तरा नवसाम्राज्यवादी – मात्र सरकार-समर्थित नहीं, वरन् सरकारों की रीति-नीति को संचालित करने वाली संगठित कोर्पोरेटी पूँजी से है। और उतना ही बड़ा ख़तरा इस खुली लूट से जनता का ध्यान बँटाने वाली – मात्र असहिष्णु ही नहीं,…

इतिहास बोध और हिन्दी प्रदेश: गणपत तेली

: पुस्तक समीक्षा: देवीशंकर अवस्थी सम्मान (2014) से सम्मानित पुस्तक ‘भारतीय इतिहास बोध का संघर्ष और हिन्दी प्रदेश’ की (बनास जन, मार्च 2014 में प्रकाशित) समीक्षा हिन्दी क्षेत्र के बौद्धिक विकास में हिन्दी नवजागरण का प्रमुख स्थान है। हालांकि विभिन्न नये शोधों द्वारा इस नवजागरण के चरित्र पर सवाल उठाये गए हैं, लेकिन इस बात से इंकार…