‘पर्सनल  इज पोलिटिकल’ का मुहावरा युग सत्य – सुधा अरोड़ा

दिल्ली। ‘स्त्री मुखर हुई है, उसकी शक्ति ज्यादा धारदार हुई है, तो उसके संघर्ष भी गहन और लंबे होंगे। आज भी उसका संघर्ष थमा नहीं है। वह संघर्ष कर रही है, पुरुषों के मोर्चे पर पुरुषों के साथ और अपने मोर्चे पर पुरुषवादी स्त्रियों के साथ भी। वक्त के बदलने के साथ संघर्ष का स्वरूप…

समकालीन कहानी का लोकतंत्र: गणपत तेली

‘कहानी का लोकतंत्र’ समकालीन कहानी पर युवा आलोचक पल्लव की किताब है, जिसमें उन्होंने समकालीन हिन्दी कहानी के बहाने हमारे समय की एक मुकम्मल तस्वीर प्रस्तुत की है। इस किताब में पल्लव ने समकालीन कहानी में आ रही उन सभी संवेदनाओं का अध्ययन किया है, जिससे आज की कहानी का ताना-बाना बना है। इन संवेदनाओं…

नयी चुनौतियां साहित्य को सार्थक दिशा देती हैं: असग़र वजाहत

असग़र वजाहत हिन्दी के जाने माने लेखक हैं। अनेक महत्त्वपूर्ण उपन्यासों और नाटकों के रचनाकार असग़र मूलत: किस्सागो हैं। बीते दिनों उनका आख्यान ‘बाक़र गंज के सैयद‘ बेहद प्रसिद्ध हुआ। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम ए, पीएच डी और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली से पोस्ट डॉक्टोरल रिसर्च करने के बाद वे 1971 से…

आनंद कुरेशी के कहानी संग्रह ‘औरतखोर’ का लोकार्पण

डूंगरपुर। बहुत सा श्रेष्ठ साहित्य भी विभिन्न कारणों से पाठकों तक पहुँच नहीं पाता. आनंद कुरेशी जैसे कथाकार को भी व्यापक हिन्दी पाठक वर्ग तक पहुंचाने के लिए हम सबको प्रयास करने होंगे. हिन्दी के प्रसिद्ध लेखक असग़र वजाहत ने डूंगरपुर के दिवंगत लेखक आनंद कुरेशी के ताजा प्रकाशित कहानी संग्रह ‘औरतखोर’ के लोकार्पण समारोह…

‘रचना और रचनाकार’ विषय पर हिन्दू कालेज में गोष्ठी

  दिल्ली। हमारी जड़ें कहाँ हैं? हमारे बच्चों की जड़ें कहाँ हैं? हम बिना जड़ों के कब तक जी पाएंगे? हमारी पहचान क्या है? कहीं हम समाज के उस वंचित समूह की तरह ही तो नहीं हो गए, जिन्हें औरत कहते हैं। जो बिना जड़ों के, बिना खाद-पानी के, किसी भी जलवायु में पनपने का…

पुस्तक मेला-2017: गतिविधियाँ

 ‘कालिया और कालिया‘ में ‘मेरी प्रिय कहानियाँ‘ का लोकार्पण कहानी लिखना एक साधना और एकाकी कला है। चाहे कितने आधुनिक साधन और संजाल आपके सामने बिछे हों, लिखना आपको अपनी नन्हीं कलम से ही है। कई कई दिन कहानी दिल दिमाग में पडी करवटें बदलती रहती हैं। अंतत: जब कहानी लिख डालने का दबाव होता है,अपने…

संभावना का व्याख्यान और ‘बनास जन’ का विमोचन

चित्तौड़गढ़ 13 अक्टूबर । कविता अपने जीवन में सत्ता से हमेशा टकराती है क्योंकि कविता ही वह विधा है जो युग बदलाव की संरचना का मार्ग प्रशस्त करती है। कविता संवेदना से ही चलती है और जीवित मनुष्यता को रेखांकित करती हैं । बिना औचित्य के कविता सामाजिक नहीं हो सकती। विख्यात कवि और आलोचक प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल ने  संभावना…

हफ्ते की किताब: पल्लव- शिक्षा की चिंता करता एक कथाकार

हिन्दी साहित्य में अब ऐसे लेखक बहुत कम बचे हैं जो शुद्ध साहित्य से इतर लिखना सामाजिक जिम्मेदारी मानते हों। अब साहित्य लेखन भी दरअसल एक कैरियर बनता जा रहा है तब इतर मसलों पर लिखना खतरनाक भी हो सकता है। जैसे ही आप कविता की रेशमी दुनिया से बाहर आएंगे और अपने परिवेश की समस्याओं पर…

हफ्ते की किताब: पल्लव- ‘पाकिस्तान का मतलब क्या?’

असग़र वजाहत को अपनी पीढ़ी का सबसे प्रयोगशील कथाकार कहा जाये तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। कोई लेखक अपनी विचारधारा से समझौता किये बगैर किस तरह अपनेलेखन में लगातार सार्थक प्रयोग कर सकता है इसके लिए वजाहत के लेखन को देखना चाहिए।  उनका तीसरा यात्रा आख्यान ‘पाकिस्तान का मतलब क्या?’ पढ़ना इसलिएअद्भुत अनुभव नहीं है कि…

हफ्ते की किताब: पल्लव- ‘किस्सा कोताह’

अगर काशी का अस्सी, बना रहे बनारस और बहती गंगा जैसी किताबें न होती तो क्या हम बनारस को जान पाते? हम यानी वह पाठक समाज जो बनारस नहीं गया है,बनारस में नहीं रहता। कवि राजेश जोशी ने अभी एक किताब लिखी है – ‘किस्सा कोताह’, और यहाँ भोपाल जिस तरह किताब में आया है उसे…

हफ्ते की किताब: पल्लव- ‘हम न मरब’

‘जिंदगी स्साली, बस,  निरंतर तलाश है। और सुख भैंचो कहीं होता ही नहीं। जिंदगी सुख के पीछे एक चूतियाचन्दन वाली दौड़ है।  ख़त्म नहीं होती क्योंकि सुख तो कभी मिलने का नहीं। अरे, जे सुख नाम की चीज़ जो कहीं होए तब तो मिले ना। समझो, सुख कहीं होता ही नहीं डॉक्टर साहब। सब दुखी हैं। और…

हफ्ते की किताब: पल्लव- ‘नीलकान्त का सफ़र’

कहानी कहना मनुष्य की आदिम प्रवृत्ति है और कहानीकारों में उन्हीं लेखकों को स्मृति में स्थान मिल पाता है जो कहानी लिखने और सुनाने का भेद पाट सकें। अस्सी के दशक में नयी कहानी के बाद उठ खड़े हुए अनेक कहानी आन्दोलनों के कारण कहानी में बहुत अराजकता फ़ैल गई थी। इस दौर में जिन…

हफ्ते की किताब: पल्लव- ‘तीन सौ तीस कहावती कहानियाँ’

विजयदान देथा जिन्हें बिज्जी के नाम से लोग कहीं ज्यादा जानते हैं उन बिरले लोगों में थे जिन्होंने किसी एक जूनून के लिए पूरा जीवन समर्पित कर दिया। उन्होंने राजस्थानी में अपना लेखन शुरू किया था और बहुत प्रारम्भ में ही प्रतिज्ञा ले ली कि जीवन भर अपनी भाषा में ही लिखूंगा भले अन्य पाठकों के लिए उसे…

हफ्ते की किताब: पल्लव- ‘जलमुर्गियों का शिकार’

‘क्योंकि मैं हमेश से इस बात का कायल रहा हूँ कि आपके कहन की ख़ूबसूरती इसमें है कि आप जो कहते हैं,वह नहीं कहते। और मेरा तो कौल है कि मैं जो कहता हूँ, उससे बाहर बहुत-कुछ कहता हूँ।’                                  …

हफ्ते की किताब: पल्लव- ‘बारिश, धुआँ और दोस्त’

‘कहानी क्या होती है?’ एक बार उसने पूछा था। ‘वह चीज, जिसके आईने में हम ज़िंदगी को नए सिरे से पहचानते हैं।‘ सवाल खत्म नहीं हुआ था।’कहानी कहां से मिलती है?’ ’जिंदगी को क़रीब से देखने से, रुक कर।’                     ( ‘बारिश,धुआँ और दोस्त’ कहानी से ) कहानी लिखना इधर फैशन भी है। कहानीकार नयी नयी…

हफ्ते की किताब: पल्लव- ‘जानकीदास तेजपाल मैनशन’

भारत में भूमंडलीकरण या उदारीकरण अथवा साफ़ साफ़ कहें तो बाजारीकरण की प्रक्रिया ने गहरे बदलाव किए हैं। अकारण नहीं कि इस प्रक्रिया के प्रारम्भ होने के बाद अधिकाँश साहित्यकारों की चिंता में यह परिघटना है। बीते दशकों के उपन्यासों, कहानियों और कविताओं में इस परिघटना के मनुष्य विरोधी और धन लोलुप चेहरे को बार बार…

हफ्ते की किताब: ममता कालिया का बाल साहित्य -पल्लव

हिन्दी में बच्चों और बड़ों के लेखन में बड़ी दूरियां हैं। सामान्यत: हिन्दी के लेखक बच्चों के लिए नहीं लिखते। अगर लिखते भी हैं तो उसे अपने मुख्य लेखन के समकक्ष उसे देखना या देखा जाना उन्हें पसन्द नहीं होता। वे इसे क्षतिपूर्ति या भलाई में किये गये काम से ज्यादा नहीं समझते। ऐसे में…

हफ्ते की किताब: ‘श्यामलाल का अकेलापन’ – पल्लव

[पल्लव बनास जन के संपादक हैं और जाने माने कथा समीक्षक।  हमारे आग्रह पर उन्होंने तय  किया है कि हर सप्ताह अपनी पसन्द की किसी एक नयी-पुरानी किताब पर लिखेंगे। आशा है, आप पसंद करेंगे।   वे शुरुआत कर रहे हैं, संजय कुंदन के कहानी संग्रह ‘श्यामलाल का अकेलापन’ से] ‘यह डराना ही तो है। वह कहना चाहता है कि…

सौ बरस के भीष्म साहनी: पल्लव

भीष्म साहनी हिन्दी के सबसे सम्मानित कथाकारों में हैं। सम्मानित से आशय है जिन्हें पाठकों, आलोचकों और व्यापक समाज से लेखन के लिए भरपूर सम्मान और प्रेम मिला। स्वतंत्रता पूर्व रावलपिंडी में 1915 के 8 अगस्त को उनका जन्म हुआ था। उनके पिता कपडे के सामान्य व्यापारी थे और चाहते थे कि उनके दोनों बेटे भी…

बनास जन – 10: डॉ. रेणु व्यास

एक ज़माना था जब तोपें मुक़ाबिल होने पर अख़बार निकाले जाते थे। आज़ साम्राज्यवादी तोपों से बड़ा ख़तरा नवसाम्राज्यवादी – मात्र सरकार-समर्थित नहीं, वरन् सरकारों की रीति-नीति को संचालित करने वाली संगठित कोर्पोरेटी पूँजी से है। और उतना ही बड़ा ख़तरा इस खुली लूट से जनता का ध्यान बँटाने वाली – मात्र असहिष्णु ही नहीं,…