संभावना का व्याख्यान और ‘बनास जन’ का विमोचन

चित्तौड़गढ़ 13 अक्टूबर । कविता अपने जीवन में सत्ता से हमेशा टकराती है क्योंकि कविता ही वह विधा है जो युग बदलाव की संरचना का मार्ग प्रशस्त करती है। कविता संवेदना से ही चलती है और जीवित मनुष्यता को रेखांकित करती हैं । बिना औचित्य के कविता सामाजिक नहीं हो सकती। विख्यात कवि और आलोचक प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल ने  संभावना…

एक अधूरा साक्षात्कार: प्रो. मणीन्‍द्रनाथ ठाकुर

कवि विद्रोही का जीवन दर्शन कल शाम अचानक पता चला कि कवि ‘विद्रोही’ नहीं रहे. वैसे तो आजकल कम ही कवि विद्रोही रह गए हैं, लेकिन मैं बात कर रहा हूँ कवि रमाशंकर यादव ‘विद्रोही’ की जिनका वजूद ही एक तरह का विद्रोह था; जवाहरलाल नेहरु विश्व विद्यालय के प्रांगन में लगातार बने रह कर…

बनास जन – 10: डॉ. रेणु व्यास

एक ज़माना था जब तोपें मुक़ाबिल होने पर अख़बार निकाले जाते थे। आज़ साम्राज्यवादी तोपों से बड़ा ख़तरा नवसाम्राज्यवादी – मात्र सरकार-समर्थित नहीं, वरन् सरकारों की रीति-नीति को संचालित करने वाली संगठित कोर्पोरेटी पूँजी से है। और उतना ही बड़ा ख़तरा इस खुली लूट से जनता का ध्यान बँटाने वाली – मात्र असहिष्णु ही नहीं,…