यह अच्छे-बुरे लोकतंत्र का समय है: प्रो. मैनेजर पाण्डेय

[हिंदी के प्रसिद्ध आलोचक और विचारक प्रो. मैनेजर पाण्डेय पिछले वर्ष पचहत्तर वर्ष के हो गये। अपने जीवन की इस लंबी अवधि में वे भारत समेत पूरी दुनिया में हो रहे परिवर्तनों के साक्षी रहे हैं। खासकर, साहित्य और विचारधारा में हो रही तब्दीलियों को उन्होंने करीब से देखा और महसूस किया है। इन तमाम…

‘हम भी मुँह में ज़बान रखते हैं…’ : निरंजन सहाय

भारत में जेंडर के बारे में नये तरीक़े से सोच-विचार की प्रक्रिया बहुत पुरानी नहीं है । लेकिन उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध के दशकों से ही आधुनिक संदर्भों में स्त्रियों की मौजूदगियों को पहचानने और स्थापित करने की मुहिम शुरू हो चुकी थी । आम तौर पर लंबे समय तक सत्ता पर काबिज रहने वाले…

आशिक की तलाश में नौटंकी : लोकेंद्र प्रताप

किसी भी कला को सत्ता नहीं, जनता जीवित रखती है | जनता उसे जब तक दिलों में सजाए रखती है, सत्ता की मजबूरी रहती है कि उस कला को संरक्षण एवं प्रोत्साहन देती रहे | जब जनता ही अपनी कला को भूलने लगे तो समझिए की मामला कुछ और है | कभी लाखों दिलों को…

हमारी साझी संस्कृति का ताना-बाना: भीष्म साहनी

(पी.सी जोशी स्मृति व्याख्यान, 1999) एक ऐसे व्यक्ति की स्मृति में आयोजित इस व्याख्यान श्रृंखला में आमन्त्रण पाकर मैं स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर रहा हूँ, जिसने हमारे राष्ट्रीय जीवन के राजनीतिक और सांस्कृतिक दोनों क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। चौथे दशक के प्रारंभिक वर्षों में ही श्री पी.सी. जोशी एक जाना-माना नाम हो…

विद्यासागर नौटियाल से लक्ष्मण व्यास की बातचीत

विद्यासागर नौटियाल कथा लेखन का सुपरिचित नाम हैं।‘सूरज सबका है’ और ‘उत्तर बायां है’ जैसे उपन्यासों के लिए चर्चित विद्यासागर नौटियाल ने लेखन 1949 में प्रारम्भ किया था और नयी कहानी के उर्वर दिनों में उन्होंने ‘भैंस का कट्या’ जैसी अविस्मरणीय कहानी लिखी। फिर वे अरसे तक लेखन से दूर रहे। सन् 1990 में उन्होंने…

औपनिवेशिक सत्ता की भाषा नीति और हिंदी-उर्दू विवाद: गणपत तेली

शुरू में अपने अकादमिक साधनों से अंग्रेजों ने भारत को असभ्य और जड़ बताया और उसे सभ्य बनाने के कार्य का श्रेय लिया। सभ्यता के इस मिशन में उन्होंने भारत के सामाजिक क्षेत्रों में हस्तक्षेप कर सुधार कार्य भी किये। ब्रिटिश शासन के इन हस्तक्षेपों का भारतीय समाज की प्रतिगामी ताकतों द्वारा बड़े पैमाने पर विरोध…