साम्राज्यवादी हिंदी का प्रश्न और दूसरी भाषाएँ: अरिमर्दन कुमार त्रिपाठी

आम तौर पर किसी भाषा का विकास एवं विस्तार उसके समाज के साथ होता है, लेकिन हिंदी के संदर्भ में यह तथ्य शतांश सत्य नहीं है। हिंदी का विकास जिस खड़ी बोली से हो रहा था एवं इधर महात्मा गांधी जिस ‘हिंदुस्तानी’ की बात कर रहे थे, उन दोनों हिंदी के दो अलग लक्ष्य थे।…

औपनिवेशिक सत्ता की भाषा नीति और हिंदी-उर्दू विवाद: गणपत तेली

शुरू में अपने अकादमिक साधनों से अंग्रेजों ने भारत को असभ्य और जड़ बताया और उसे सभ्य बनाने के कार्य का श्रेय लिया। सभ्यता के इस मिशन में उन्होंने भारत के सामाजिक क्षेत्रों में हस्तक्षेप कर सुधार कार्य भी किये। ब्रिटिश शासन के इन हस्तक्षेपों का भारतीय समाज की प्रतिगामी ताकतों द्वारा बड़े पैमाने पर विरोध…

हिन्दी एक भाषा मंच है:  विश्वनाथ त्रिपाठी

विश्वनाथ त्रिपाठी से पल्लव का साक्षात्कार हिन्दी की अब तक प्रगति को आप किस रूप में देखते है? देखिए, भाषाओं का इतिहास होता है और इतिहास की एक प्रक्रिया होती है. इस प्रक्रिया में सब चीजें होती है.हिन्दी भी इसी ऐतिहासिक प्रक्रिया में है. जो भी जिस रूप में है, बिल्कुल ठीक उसी रूप में आगे नहीं रह…