यह अच्छे-बुरे लोकतंत्र का समय है: प्रो. मैनेजर पाण्डेय

[हिंदी के प्रसिद्ध आलोचक और विचारक प्रो. मैनेजर पाण्डेय पिछले वर्ष पचहत्तर वर्ष के हो गये। अपने जीवन की इस लंबी अवधि में वे भारत समेत पूरी दुनिया में हो रहे परिवर्तनों के साक्षी रहे हैं। खासकर, साहित्य और विचारधारा में हो रही तब्दीलियों को उन्होंने करीब से देखा और महसूस किया है। इन तमाम…

अभिव्यक्ति की आज़ादी और संवादहीनता: मणीन्द्रनाथ ठाकुर

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के हालिया घटनाक्रम में जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार की गिरफ्तारी हमारी प्रशासनिक व्यवस्था के ऐतबार से एक चौंकानेवाली घटना है. हर विश्वविद्यालय में उसकी अपनी एक प्रशासनिक इकाई (प्रॉक्टोरियल बोर्ड) होती है, जो उसके परिसर में घटनेवाली घटनाओं का संज्ञान लेती रहती है. परिसर के भीतर घटनेवाली हर घटना पर वह…

एक अधूरा साक्षात्कार: प्रो. मणीन्‍द्रनाथ ठाकुर

कवि विद्रोही का जीवन दर्शन कल शाम अचानक पता चला कि कवि ‘विद्रोही’ नहीं रहे. वैसे तो आजकल कम ही कवि विद्रोही रह गए हैं, लेकिन मैं बात कर रहा हूँ कवि रमाशंकर यादव ‘विद्रोही’ की जिनका वजूद ही एक तरह का विद्रोह था; जवाहरलाल नेहरु विश्व विद्यालय के प्रांगन में लगातार बने रह कर…