नयी चुनौतियां साहित्य को सार्थक दिशा देती हैं: असग़र वजाहत

असग़र वजाहत हिन्दी के जाने माने लेखक हैं। अनेक महत्त्वपूर्ण उपन्यासों और नाटकों के रचनाकार असग़र मूलत: किस्सागो हैं। बीते दिनों उनका आख्यान ‘बाक़र गंज के सैयद‘ बेहद प्रसिद्ध हुआ। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम ए, पीएच डी और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली से पोस्ट डॉक्टोरल रिसर्च करने के बाद वे 1971 से…

सूफी काव्य : रहस्यवाद का रहस्य-गणपत तेली

हमारे धार्मिक विश्वासों, सामाजिक संस्थाओं, हमारी जीवन शैली, हमारे साहित्य, हमारी भाषाओं और कई अन्य पहलुओं पर भक्तिकाल का पूरा प्रभाव रहा है। इसने धार्मिकता को बहुरंगी बनाया और यह मानवमात्र की समानता अवधारणा का पक्षधर था- इसने जाति-प्रथा को नकारा, धर्म के बंधन तोड़े, इसने प्रेम की शिक्षा दी- ईश्वर के प्रेम की, मानवमात्र…

हमारी साझी संस्कृति का ताना-बाना: भीष्म साहनी

(पी.सी जोशी स्मृति व्याख्यान, 1999) एक ऐसे व्यक्ति की स्मृति में आयोजित इस व्याख्यान श्रृंखला में आमन्त्रण पाकर मैं स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर रहा हूँ, जिसने हमारे राष्ट्रीय जीवन के राजनीतिक और सांस्कृतिक दोनों क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। चौथे दशक के प्रारंभिक वर्षों में ही श्री पी.सी. जोशी एक जाना-माना नाम हो…

2015: हिन्दी साहित्य- गणपत तेली

साहित्यिक प्रवृत्तियों के लिहाज से किसी एक वर्ष विशेष में प्रकाशित और चर्चित हुई कृतियों का महत्व यह होता है कि उससे लेखन-पठन के नए रुझान समझे जा सकते हैं। हालांकि किन्हीं प्रवृत्तियों के प्रचलन को समझ पाने के लिए एक साल की अवधि बहुत कम समय होता है, फिर भी पिछले साल में हुई…

मीरां के जीवन और समाज की पड़ताल: गणपत तेली

भक्तिकालीन कविता में मीरा का नाम एक लोकप्रिय कवि के रूप में हमारे सामने आता है, लेकिन मीरा को सही परिप्रेक्ष्य में समझने की कोशिशें बहुत कम हुई है। साहित्य के इतिहास ग्रंथों में तो मीरा को कोई विशेष स्थान नहीं मिला लेकिन पिछले कुछ वर्षों में अकादमिक दुनिया में मीरा पर केन्द्रित कुछ महत्वपूर्ण…

मीरां लोक में बनती-बिगड़ती है: प्रो माधव हाड़ा से गणपत तेली की बातचीत

मीरां पर अपनी शोधपरक पुस्तक ‘पचरंग चोला पहन सखी री’ के लिए आलोचक माधव हाड़ा इन दिनों चर्चा में हैं। उदयपुर के मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय में हिन्दी के आचार्य और विभागाध्यक्ष हाड़ा इससे पहले समकालीन कविता पर दो तथा मीडिया पर दो पुस्तकें लिख चुके हैं। उनसे मीरां के जीवन के सम्बन्ध मे बातचीत हुई। प्रस्तुत…

औपनिवेशिक सत्ता की भाषा नीति और हिंदी-उर्दू विवाद: गणपत तेली

शुरू में अपने अकादमिक साधनों से अंग्रेजों ने भारत को असभ्य और जड़ बताया और उसे सभ्य बनाने के कार्य का श्रेय लिया। सभ्यता के इस मिशन में उन्होंने भारत के सामाजिक क्षेत्रों में हस्तक्षेप कर सुधार कार्य भी किये। ब्रिटिश शासन के इन हस्तक्षेपों का भारतीय समाज की प्रतिगामी ताकतों द्वारा बड़े पैमाने पर विरोध…

‘अच्छा! यह जेएनयू से है!’ : प्रो. नामवर सिंह से बातचीत

जाने माने आलोचक प्रो. नामवर सिंह जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एमरिटस हैं। जेएनयू के भारतीय भाषा केन्द्र की संकल्पना में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। सैद्धांतिकी पर जोर देने वाले पाठ्यक्रमों और सतत मूल्यांकन पद्धति के साथ-साथ उनका महत्वपूर्ण योगदान हिन्दी और उर्दू दोनों भाषाओं का एक ही केन्द्र बनाना भी है। एक ही परिवेश के…

कालेधन का कुचक्र: गणपत तेली

पिछले कुछ वर्षों से स्विस बैंकों (टैक्स हेवन) में भारत के अवैध/काले धन की जमाखोरी का मुद्दा चर्चित विषय रहा है। अलग-अलग व्यक्तियों/एजेंसियों ने विदेशी बैंकों में जमा काले धन के बारे में अलग-अलग आंकड़े दिए हैं- ग्लोबल फाइनेंसियल इंटिग्रीटी (जीएफआइ) के अनुसार 462 अरब (बिलियन) अमरीकी डॉलर (1948-2008), सीबीआइ के अनुसार 500 अरब अमरीकी…

मीडिया: कितना हकीकत, कितना अफ़साना: गणपत तेली

पुस्तक समीक्षा- सीढ़ियां चढ़ता मीडिया, माधव हाड़ा, आधार प्रकाशन, पंचकूला, हरियाणा जनसंचार या मीडिया के व्यापक इतिहास का प्रारंभ छापाखाने के अविष्कार के साथ होता है। छापाखाने के अविष्कार ने जहाँ एक तरफ छपाई का काम आसान कर दिया था, वहीं कम समय, श्रम और लागत के कारण लोक भाषाओं में भी सूचनाओं का प्रसारण…

शिक्षा की कसौटी: गणपत तेली

सय्यद मुबीन जेहरा ने ‘पढ़ाई में भटकाव के रास्ते’ (जनसत्ता, 12 अप्रैल) में शिक्षा पर बात करते हुए कुछ महत्त्वपूर्ण मुद्दे उठाए हैं। उन्होंने ठीक ही बाजारीकरण और निजीकरण के हमले को शिक्षा-व्यवस्था के लिए खतरनाक माना है। निजीकरण और बाजारीकरण के बाद शिक्षा पाने के लिए आम छात्रों को काफी मुश्किलों का सामना करना…

इतिहास बोध और हिन्दी प्रदेश: गणपत तेली

: पुस्तक समीक्षा: देवीशंकर अवस्थी सम्मान (2014) से सम्मानित पुस्तक ‘भारतीय इतिहास बोध का संघर्ष और हिन्दी प्रदेश’ की (बनास जन, मार्च 2014 में प्रकाशित) समीक्षा हिन्दी क्षेत्र के बौद्धिक विकास में हिन्दी नवजागरण का प्रमुख स्थान है। हालांकि विभिन्न नये शोधों द्वारा इस नवजागरण के चरित्र पर सवाल उठाये गए हैं, लेकिन इस बात से इंकार…

भाषाई उपेक्षा और असमानता: गणपत तेली

यह सही है कि भाषा संवाद का प्रभावी माध्यम हैं लेकिन भाषाई राजनीति और विवाद-विमर्श के मुद्दों को संवाद मात्र तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए। चाहे हम देश के वर्तमान भाषिक परिदृश्य को गुलामी की भाषा में परिभाषित न कर पाए फिर भी भाषाई असमानता को संवादहीनता मात्र नहीं कहा जा सकता है और सौहार्द के अभाव को ही संवाद का बाधक नहीं ठहराया जा सकता।

सड़क पर दौड़ता भय: गणपत तेली

महिलाओं के निर्भय विचरण और सुरक्षित यातायात के लिए यह आवश्यक है कि इसे महिलाओं के लिए बेखौफ आज़ादी के प्रयास से अलग-थलग करके नहीं देखा जाय बल्कि उस अभियान का विस्तार सार्वजनिक यातायात तक किया जाय। इसके लिए आम यात्रियों के साथ-साथ, विशेष रूप से सार्वजनिक यातायात से जुड़े लोगों- बस स्टॉफ, ऑटो-टेक्सी चालक, यातायात पुलिस आदि को जेंडर के मुद्दें पर संवेदनशील बनाया जाना चाहिए और उन्हें हस्तक्षेप के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

मुश्किल होता सफर: गणपत तेली

जिस तरह सरकार ‘कम किराया ही रेल्वे की समस्या’ है और ‘सुविधाएँ चाहिए तो भुगतान करना होगा’ जैसे तर्कों को जन मानस में पैठाने में कामयाब हुई है, उसी तरह से इसके अगले चरण में यह बात स्वीकार कराने की कोशिश करेगी कि हमारा रेल्वे सिस्टम नकारा हो गया है, जो निजीकरण के बिना ठीक नहीं हो सकता। यह बहुत चिंताजनक स्थिति होगी। रेल ने इस देश की भौगोलिक और सामाजिक दूरियों को कम करने और विभिन्न समुदायों के बीच संपर्क तथा संवाद स्थापित करने की ऐतिहासिक भूमिका निभाई है। इसकी यह भूमिका आज भी प्रासंगिक है, इसलिए समाज के सभी वर्गों के लिए इसके दरवाज़े खुले रहने चाहिए।

Gandhi and His Hindustani: Ganpat Teli

During the freedom movement of India, the complex and controversial of the
National Language was raised. In this controversy Gandhi supported the concept of
Hindustani. Gandhi’s thoughts on languages are discussed in this paper. This article
will try to look on other dimensions of his thoughts on languages as well. Gandhi
accepts religion as a base to consolidate his views on language. However, Gandhi’s
concept was an expression of exclusion in some sense, as non-northern and nonHindu
and non-Muslims weren’t part of it. In addition to these features, Gandhi’s
contradictions regarding thoughts on language will also be discussed.

चुनाव में नया कोण: गणपत तेली

दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की गुजरात यात्रा और दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी कार्यालय पर आम आदमी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं के टकराव की तमाम घटनाओं के बीच यह स्पष्ट हो गया है कि आम आदमी पार्टी अपने आप को राष्ट्रीय चुनावों में भाजपा के समक्ष खड़ी करने में सफल हो रही है। इससे पहले भी आम आदमी पार्टी ने भाजपा और नरेंद्र मोदी को कई मौकों पर ललकारा लेकिन मोदी ने कभी उसका जवाब नहीं दिया और चतुराई से भाजपा भी इन सभी मुद्दों को टालती रही। कई बार सीधे-सीधे खुद पर स्पष्ट सवाल उठाए जाने के बावजूद मोदी आप और इसके नेताओं को नजरअंदाज करते रहे।

Revisiting the Making of Hindi as a ‘National’ Language: Ganpat Teli

In the first quarter of last the century a consciousness building campaign was started among the literate people of north India. At that time as a result of a long lobbying process, Hindi language and Nagari Script had already been recognized the purpose of official usage. Thus, the leadership of this lobby started to demand a new status of the National Language for Hindi written in Nagari script. In the contest for the National Language status, Hindustani and Urdu languages were counterparts of Hindi. Supporters of both the languages – Hindi and Urdu – symbolized them with Hindu and Muslim community respectively. On the other side, Hindustani which was a colloquial language was supported by the camp of progressive writers and Gandhi.

Strong supporters of Hindi opposed the idea of Hindustani and advocated the usage of Sanskritized Hindi. They argued that Sanskrit is the pure and divine language of Hindus, so only Sanskritized Hindi can bear the cultural heritage of the community. They subscribed to the logic of Devvani and Mother Language. At the time of this debate the literacy level in India was very low. On other side, the supporters of Hindi were preparing a Language which was highly Sankritized, but did not belong to the common people, especially the marginalized groups of both Hindu and Muslim communities. This happened because Sanskrit language and its words were not used in large scale on a daily basis. The Sanskritized Hindi not only marginalized people of non-privileged social strata socially and economically, but also deprived them the opportunity to become a part of the knowledge process.

भाषा विवाद और राजनीति: गणपत तेली

सम्मेलन के संग्रहालय या पुस्तकालय में ऐतिहासिक महत्त्व की कई पुरानी पुस्तकें और पत्रिकाएं धूल खा रही हैं और नष्ट होने के कगार पर हैं। यही स्थिति नागरी प्रचारिणी सभा की भी है। किसी भी शोधार्थी के लिए उस संदर्भ सामग्री तक पहुंच पाना बहुत ही मुश्किल काम हो जाता है। इस सामग्री के संरक्षण के लिए विद्वानों ने सरकार को ज्ञापन भी दिया था, लेकिन सरकार को क्या पड़ी है, यह सब करने की। कितना अच्छा होता कि अगर सम्मेलन मुकदमे में लगाए संसाधनों का सदुपयोग अपने संग्रहालय में रखी ऐतिहासिक महत्त्व की बहुमूल्य सामग्री को संरक्षित करने में लगाता।

भाषाई उपेक्षा का दंश: गणपत तेली

भारतीय भाषाओं की उपेक्षा कोई प्रशासनिक सेवाओं का अलग-थलग मसला नहीं है, बल्कि हमारे देश की उस अकादमिक व्यवस्था का एक विस्तार है, जहां भारतीय भाषाओं की इसी तरह की उपेक्षा होती है और जो इन भाषाओं के पठन-पाठन की गतिविधियों और इनके विद्यार्थियों के लिए अकादमिक और पेशेगत अवसरों को सीमित करती है। अगर हम उच्च शिक्षा की स्थिति पर एक नजर डालें तो स्पष्ट हो जाएगा कि सरकारी नीतियां इस असमान व्यवस्था को प्रोत्साहित करती हैं।