अभिमन्यु अनत : इतिहास से संवाद करता लेखक- देवेंद्र चौबे

जिस दिन सूरज को माजदूरों की ओर से गवाही देनी थी Abhimanyu Anath1

उस दिन सुबह नहीं हुई

सुना गया कि

मालिक के यहां की पार्टी में

सूरज ने ज्यादा पी ली थी
– अभिमन्यु अनत, मारिशस

अभिमन्यु अनत! हिन्दी के विदेशी लेखकों में सार्वाधिक प्रतिष्ठित नाम| लोग उन्हें मारिशस का प्रेमचन्द भी कहते है| भारतीय लेखकों में प्रेमचन्द सिर्फ़ एक नामभर नहीं है , वह ब्रिटिश भारत में हो रहे आर्थिक-सामाजिक-राजनितिक शोषण, उत्पीड़न और गुलामी के खिलाफ आवाज उठाने वाली एक आवाज भी है| यहां तक कि तत्कालीन भारत में पारम्परिक जीवन की जो अंर्तधारा थी तथा आधुनिकता के कारण
भारत की सामाजिक ज़िन्दगी में जो बदलाव आ रहे थे; प्रेमचन्द उसे गहरी चेतना के साथ हिन्दी लेखन का हिस्सा बनाते है| मारिशस में अभिमन्यु अनत भी यही कार्य करते है! प्रवासी मजदूरों की कथा कहते-कहते वे कब मारिशस के इतिहास के आख्याता बन जाते है, पता ही नहीं चलता है| फिर क्या कहना, मारिशस की एक-एक छोटी-छोटी बातें, उनके कथन का हिस्सा बनने लगती है| मारिशस की धरती, वहां के लोग, वहां की हवा, वहां का पानी, समुद्र, मछलियां, खेतों में काम करते गिरमीटिया मजदूर, माजदुरों पर हो रहे अत्याचार, पीठ पर बरसते कोड़े, निकलते पसीने, पसीने मे मिले सफेद रक्तकण, गन्ने के लहलहाते खेत, पथरीली ज़मीन, कपड़े मीलों में काम करती महिलायें, सुनहरे भविष्य का सपना देखती लड़कियां, कठिन जीवन व्यतीत करते आमजन, समुद्री तूफान में ऊजड़ते लोगों के घर, आपसी विछोह की पीडा, युवा वर्ग आदि ऐसे ही संदर्भ हैं, जिनसे मारिशस का समाजिक – भौगोलिक इतिहास बनता है| जाहिर है, यह वही इतिहास है, जिसे बनाने नें अौपनिवेशिक सत्ता केन्द्रों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है जो तात्कालीन भारत अौर मारिशस मे कमोबेश एक जैसी थी|

abhimanyu3भारत में हो रहे परिवार्तन का भी लगभग यह वही दौर है जो 1764 के बक्सर युद्ध के बाद कंपनी के साथ भी और समानांतार चलते रहता है| खास बात यह है कि इस कंपनी राज में शुरु हुई जमीन की नयी बन्दोबस्त प्रथा के कारण ही लोग देश छोड़कर गिरमीटिया मजदूर बनकर मारिशस, सूरीनाम, फिजी आदि देशों में जाने को मजबूर हो रहे थे| 1813 के बाद दास प्रथा की समाप्ति और 1834 में शर्त बंद प्रथा के बाद भारत, खासकर भोजपुरी क्षेत्रों से जिस बड़े पैमाने पर लोग गिरमीटिया मजदूर बनकर दूर देशों में प्रवसन की पीडा से गुजरते है, अनत जी उन्हीं का इतिहास कभी कहानी, तो कभी कविता; कभी उपन्यास, तो कभी लेखों में लिखते रहते है| ‘लाल पसीना’, ‘गांधीजी बोले थे”, ‘और नदी बहती रही’ आदि उपन्यास, ‘खामोशी के चीत्कार’ कहानी संग्रह, ‘नागफनी में उलझी सांसे’ जैसे काव्य संग्रह उनकी रचनात्मकता के बेहतरीन उदाहरण है|

आखिर प्रवसन की वह कौन- सी पीडा है, ज़िसे अनत जी अपने लेखन में रचते है? उसका समाजिक आधार क्या है? संस्कृति और जातीय जीवन के किन सवालों से वह टकराता हैं? उसके होने का अर्थ क्या है? क्या उनका विशालकाय लेखन मारिशस की जातीय ज़िन्दागी को समझने में मदद करता है? ये कुछ ऐसे सवाल है जो समकालीन आप्रवासी लेखन और वहां की ज़िन्दगी को देखकर उठता है| इसे समझने के लिए अभिमन्यु अनत के पाठों के कुछ अंशों को समझना ज़रूरी है जहाँ वे इतिहास से लेकर अौपनिवेशिक – साम्राज्यवादी भारत से मारिशस गए गिरमीटिया मजदूरों की ज़िन्दगी के यथार्थ को समकालीन संदर्भ में उठाते है| उन्होनें 1977 में प्रकाशित अपने चार्चित उपन्यास ‘लाल पसीना’ के शुरुआत में दिये गए समर्पण के पृष्ठ पर लिखा है : “खेर जगत सिंह को जिनके भीतर इतिहास आज भी जीवित है|”
abhimanyu2मारिशस के लिए यह जगत सिंह उसी तरह के थे जैसे कि भारत के लिए स्वाधीनता आंदोलन के नेता| जो हमेशा अपने देश के बारे में सोचता रहता है| उसके इतिहास और सामाजिक विकास और जनहित की चिंता में लगा रहता है| अनत जी ऐसे ही पात्रों को अपने लेखन का हिस्सा बनाते है| ‘लाल पसीना ‘ का कैदी जब असमय चीखता चिल्लाता है, तब उसके बारे में अनत जी लिखते है :
” कैदखाने की पत्थर की ऊँची दीवारों से झनझनाता हुआ किसी बन्दी का स्वर गुंजता रहा – मूसे मारते के खेतवा में सोना फड़ल बा| हमर तोहर हथवा में लोहा ऊगल बा!!
कुन्दान इस स्वर को पहचानता था| वही पागल कैदी लोहे की छड़ो को दोनों मुठियों से पकडे कभी उन्हें ईख समझकर दांतों से छिलके ऊतारने की कोशिश करने लगता था| कहा जाता है, वह भारत का कोई बहुत बड़ा क्रांतिकारी था| अंग्रेज सरकार ने गिरफतारी के बाद उसे इस द्विप में भेज दिया था| कालापानी|”
अनत जी का यह वही इतिहास बोध है , जो उन्हें अन्य मारीशियान कथाकारों से अलग करता है| संवेदनात्मक अलगाव के बहाने वे मारिशस के प्रवासी मजदूरों की जातीय ज़िन्दगी का इतिहास रचते है| उनके बारे में 2009 के प्रसिद्ध फ्रांसीसी नोबेल पुरस्कार विजेता जां मारी लेक्लेज्यों का ‘लाल पसीना ‘ के बारे मे यह कहना कि ” यह गाथा उनलोगों की है ज़िन्होनें अपने हाथों धरती को आकार दियाऔर सींचा अपने पसीनों की बूंदों से |” पिछले 4 जून 2018 उनका निधन हो गया| उनका जाना , एक बड़े लेखक का जाना है; उस लेखक का जाना ज़िसे इतिहास , परम्परा और समाज की जातीय ज़िन्दगी में गहरी दिलचस्पी हो| ज़िसके लिए साहित्य सिर्फ मनबहलाव की वस्तु नहीं था , अपितु देश की जातीय ज़िन्दगी को जानने और समझने का एक बड़ा ज़रिया था|

दैनिक जागरण, 10.06.18

cdevendra@gmail.com

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