‘जाऊँगा कहाँ, रहूँगा यहीं’ : निरंजन सहाय

वह 19 मार्च की ऐसी खौफनाक शाम थी, जिस पर विश्वास करने के लिए मन तैयार नहीं हुआ| गुरुवर, मेरे सबसे प्रिय कवि और इन सभी शिखरों से भी बड़े मनुष्य केदारनाथ सिंह अब नहीं रहे| अनहोनी की आशंका रह-रह कर मन बेचैन कर दे रही थी पिछले तीन महीनों से| पर यह मनहूस खबर इतनी जल्दी आएगी, इस पर कतई भरोसा नहीं हो रहा था| तकरीबन साढ़े आठ बजे मोबाइल पर जेएनयू में मेरे वरिष्ठ रहे आत्मीय सुबोध जी का दुखद संदेश मिला `केदार जी नहीं रहे’| सन्न कर देने वाली इस सूचना पर भरोसा ही नहीं हो रहा था| अभी कुछ ही दिन पहले की तो बात है, उनकी बेटी संध्या जी से बात हुई थी, मैंने यह जानने के लिए फोन किया था कि सर की तबीयत अब कैसी है| बमुश्किल इतना बोल पाईं कि ‘ठीक नहीं है, पिताजी की हालत’| इससे आगे बात करने की मेरी हिम्मत नहीं हुई| मैंने बेचैन मन से सुबोध जी से बात की, उन्होंने कहा- तबीयत तो ज़्यादा खराब है और सर वेंटिलेटर पर हैं| पर उन्होंने यह भी कहा कि एम्स से लोग कई बार वेंटिलेटर पर जाने के बावजूद स्वस्थ हो घर लौट आते हैं| मुझे लगा केदार जी ज़रूर लौटेंगे| मन ही मन संकल्प किया कि जल्दी ही केदार जी से मिलने दिल्ली जाऊँगा| पर महज दो दिन बाद मेरे जीवन की सबसे दुखद खबर मिली कि वे नहीं रहे| सब कुछ इतना जल्दी घटित होगा, ऐसा किसी भी सूरत में नहीं लगता था| केदार जी हर गर्मी में अपने पुश्तैनी गाँव चकिया (बलिया, उत्तर प्रदेश) और जाड़े में कोलकाता ज़रूर जाते थे| सोचा था इस बार भी केदार जी को दिल्ली वापसी के समय 2014 की तरह अपने घर ज़रूर लाऊँगा| पर शायद नियति ने मेरे दुर्भाग्य को पहले ही निर्धारित कर रखा था|इसी साल जनवरी महीने में कोलकाता में उन्हें निमोनिया हुआ था, वे ठीक हो गए थे और दिल्ली चले आए थे| उन्हें दुबारा निमोनिया हो गया|लगातार उन्हें बार-बार सर्दी से संक्रमण की दिक्कते होती रहीं| पेट में संक्रमण के कारण उनके स्वास्थ्य की हालत इतनी बिगड़ गई कि वे पहले वेंटिलेटर पर रखे गए, फिर कोमा में चले गए और अंत में उनका देहावसान हो गया | निधन के समय उनकी उम्र 83 वर्ष थी |

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उन्हें कोई ऐसी बीमारी भी नहीं थी जो हमारे समय में आम है, यानी रक्तचाप, मधुमेह आदि – आदि| मन में ऐसा गहरा विश्वास था कि ईया (उनकीमाँ) की तरह कम-से-कम शतायु तो ज़रूर होंगे| चार साल पहले जब घर आए थे, उनकी व्यवस्थित दिनचर्या जिसमें टहलना, व्यायाम और खानपान में अत्यंत सावधानी की मौजूदगी थी उनके सक्रिय और ऊर्जस्वित जीवन के पुरनूर होने का भरोसा मिल रहा था| उस यात्रा के दरमियान उन्होंने मुझे डांटा था कि मैं अपने मोटापे को कम करूँ|

अब जबकि उनकी शारीरिक उपस्थिति हमारे बीच नहीं है, उन अनेक सन्दर्भों के कदाचित सही और सटीक आकलन के अवसर उभरते हैं कि आखिर उनमें ऐसी कौन सी बात थी जिससे वे हिंदी के उन बिरले कवियों में शुमार हुए जिनकी एक अखिल भारतीय छवि की स्पृहणीय ऊंचाई साफ तौरपर देखी जा सकती है; या कि उनके न रहने से जो खालीपन उभरा उसमें हिन्दी दुनिया के इतने रहवासी क्यों शामिल हुए; आखिर उनके काव्यलोक में ऐसा क्या था जिसका असर उनके बाद की चार पीढ़ियों के काव्यलोक पर तारी हुआ; उनके गद्यलोक की विविधवर्णी छवियों में किन लोकों की मौजूदगी है जिनसे हमारे समय की सर्वाधिक विश्वसनीय छवियों के साथ का अवसर हासिल होता है; वे एक साथ जनवादी और रूपवादी दोनों तरह के रचना कौशलों को कैसे साध लेते हैं; और मुझ जैसे पाठकों, विद्यार्थियों के लिए सबसे अहम् बात यह कि वैचारिक प्रतिबद्धता का अप्रतिहत जीवन राग कैसे बरकरार रखा जाता है ?

‘अभी बिल्कुल अभी’, ‘जमीन पक रही है’, ‘यहां से देखो’, ‘अकाल में सारस’, ‘बाघ’, ‘टॉलस्टॉय और साइकिल’ और ‘सृष्टि पर पहरा’ केदारनाथ सिंह के प्रकाशित काव्य संग्रह हैं| ‘सृष्टिपर पहरा’ के बाद भी उनकी कविताएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकशित हुईं हैं|सम्भवत: भविष्य में एक और काव्यसंग्रह प्रकाशित हों, इसमें उक्त कविताओं के साथ अप्रकाशित कविताओं को भी शामिल किया जाय| केदारनाथ सिंह हिन्दी कविता के ऐसे विलक्षण कवि के रूप में सहज ही समादृत हैं, जिनके काव्यवृत्त में अनेक पीढियों ने रचबस कर अपने काव्यलोक की भूमि को सिरजा| ऐसे हिन्दी कवियों की फेहरिश्त काफी लम्बी हो सकती है| विचार और सौन्दर्य कैसे काव्यबोध में रूपांतरित होता है, यह काव्यलोक के फलक और अनुभव के कलात्मक रूपान्तरण पर निर्भर करता है| अपने समय को सिरजने की जिद , अमानवीयता के खिलाफ सजग, अडिग और अप्रतिहत साहस, लोक और तन्त्र के रिश्ते की शिनाख्त, भाषा के उस आदिम राग को परखने का वैभव जो मनुष्य के गाढे समय की सबसे करीब हमसफर होती है आदि अनेक बिंदु हैं, जहां केदार जी की कविता हमें सर्वाधिक विश्वसनीय ढंग से आश्वस्त करती है| केदार जी अनेक अर्थों में अपने समकालीनों से अलग हैं| उनकी कविता जितनी सहजता से दिल्ली की गहमागहमी, बदलती तस्वीर और सूखती  संवेदना की वीरानगी को पकड़ती है, उतनी ही सहजता से सुदूर पूर्वी उत्तर प्रदेश के बलिया जनपद के भागड़ नाले की जलमुर्गियों और दलपतपुर की बुढ़िया की खो गयी बकरियों के इर्द – गिर्द विचरती है| देश – दुनिया  के भूगोल में शामिल केवल दिल्ली ही नहीं बल्कि वरुणा और गंगा के दियारे के बनारस और कुशीनगर के वृक्ष  की चिंता करती यह कविता कुम्भनदास, त्रिलोचन शास्त्री, राजेन्द्र यादव से बतियाती हुयी ज्यां पाल सार्त्र की समाधि, मुक्तिबोध के सवालों और उदय प्रकाश को भी अपनी दुनिया में समेटती हुयी मुकम्मल काव्य आख्यान का सृजन करती है |

यह केदार जी के काव्य लोक की विशिष्टता है की यहाँकाव्य अनुभव कवि कौतुक न होकर सौन्दर्य और अभिव्यक्ति के अपरिहार्य अनुभव का हिसा बन जाता है | तकरीबनपचास सालसे हिन्दी कविता की दुनिया को अनुपम और अपूर्व काव्यभूमि से संपन्न करने वाले केदार जी सच्ची भारतीय कविता का खाका तय करते नज़र आते हैं |केदार जी की कविताओं में अनेक अर्थछवियाँव्याप्त हैं | कविता की लंबी यात्रा के दौरान कहने और रचने केउनके बहुविध संसार में अनेक बदलाव हुए | चाहे विषयों का चयन हो , या भाषा की रवानगी या फिर बिम्बों का समय सापेक्ष प्रयोग| कहते हैं जो कवि कालजीवी  नहीं होता वह कालजयी भी नहीं हो सकता | केदार जी समय में जीते- रचते हुए अपने समय का अतिक्रमण भी करते हैं और इसका उत्स है मनुष्यता की चिंता , भारतीयता की पक्षधरता और विचारधारा की सजगता | इसी अर्थ में वे हिन्दी की दुनिया में रहते हुए उसका अतिक्रमण भी करते हैं और भारतीय कविता काविश्वसनीय खाका बनाते हैं| यह अकारण नहीं है कि वे समकालीन  हिन्दी कविता के उन थोड़े  कवियों में शामिल हैं  जिनकी कविता की व्याप्ति हिंदीतर पाठकों के बीच बेहद सम्मानजनक और विश्वसनीय रूप में है |

अनुभव की अंतर्यात्रा, समकालीन राजनीति का काव्य रूपांतरण, लिपि और भाषा की घेरेबंदी को तोड़ती और अपने फलक को विस्तृत करती अनुभव संपदा, खाऊ-पकाऊ और विवेकशून्य राजनीति के समानांतर उठते जनविरोध की संगति का आख्यान, किसानों की आत्महत्या और बदलते लोकतंत्र पर पैनी नज़र, सत्ता और साहित्य के रिश्ते की संश्लिष्टता की पहचान जैसे अनेक विषय के साथ घर और प्रेम पर भी विलक्षण  काव्य अभिव्यक्तियाँ हैं| कवि के पहले संग्रह `अभी बिलकुल अभी’ और तीसरा सप्तक में शामिल रचनाओं में अनेक गीत भी शामिल थे| बाद के संग्रहों में गीत शामिल नहीं हुए| अंतिम संग्रह `सृष्टि पर पहरा’ में गीत , ग़ज़ल जैसे रूप फिर शामिल हुए|

 

सवाल किया जा सकता है कि कवि की लम्बी काव्ययात्रा का उत्स या प्राणतत्त्व क्या है ? दरअसल कवि की परिवेश सजग आँखों की बेचैनी उसकी कविता को पुनर्नवा बनाती है , और उनसे दीवानगी की हद तक किया जानेवाला प्यार धारोष्ण काव्यानुभव को सिरजता है | बकौल कवि-

हिन्दी मेरा देश है

भोजपुरी मेरा घर

घर से निकलता हूँ

तो चला जाता हूँ देश में

देश से

छुट्टी मिलती है

तो लौट आता हूँ घर

इस आवाजाही में

कई बार घर में चला आता है देश

देश में कई बार

छूट जाता है घर

मैं दोनों को प्यार करता हूँ

और देखिए न मेरी मुश्किल

पिछले साठ बरसों से

दोनों में दोनों को

खोज रहा हूँ |

जिसे घर के प्यार का ककहरा मालूम है, वही पड़ोस, गाँव, मुहल्ले, कस्बे और देश से जिजीविषा की हद तक प्यार भी कर सकता है| केदार जी सौन्दर्य के कवि के रूप में प्रतिष्ठित हैं| इस सौन्दर्य का आधार तत्त्व है अधूरी दुनिया, ख़्वाब या यूं कहें अधूरेपन को पूरा करने की बचैनी| कहना न होगा इस बेचैनी का सिरा नष्ट होती दुनिया को बचाने की ललक और प्रतिबद्धता से जुड़ी है| जो काव्य विवेक ईमानदार होता है, वह जितनी बहिर्यात्रा करता है, उतनी ही अंतर्यात्रा भी|

केदार जी के काव्यविकास की अनेक मंजिलें हैं, जिन पर एक नज़र मुनासिब होगा| उनके आरम्भिक दौर की कविताओं के साक्ष्य के रूप में हम `तीसरा सप्तक’(1959) की कविताओं और `अभी बिल्कुल अभी’ (1960) देख सकते हैं| सप्तक की वे कविताएँ जो लोकभूमि पर रचित थीं उनसे छायावादोत्तर काव्य परिदृश्य में पाठकों को टटकेपन का अहसास हुआ| गीतों में लोकबिम्बों के सघन प्रयोग और आत्मीय भाषा का यह कमाल हुआ कि उनकी कविताएँ लोगों की जुबां पर चढ़ गयीं| उस दौर की कविताओं के प्रस्थान बिंदु के सूत्रों को समझने के लिए तीसरा सप्तक में संकलित उनके वक्तव्य को देखा जा सकता है- `कविता, संगीत और अकेलापन, तीन चीजें मुझे बहुत पसंद हैं |` उन्होंने अपनी रचना प्रक्रिया के बारे में राय दी कि वे बिम्बों पर सबसे अधिक ध्यान देते हैं| गीतों के साथ ही इस दौर में उनके द्वारा ऐसी कविताएँ भी खूब लिखीं गयीं जिनसे उनकी वैचारिक मुद्रा और प्रतिबद्धता का पता मिलता है| अनागत, दिग्विजय का अश्व कविताएँ साक्ष्य के रूप में उद्धृत की जा सकतीं हैं| अपने व्यक्तित्व की ही तरह उनकी काव्य सजगता अप्रतिम है, बकौल रामस्वरूप चतुर्वेदी , `अतिकथन और मितकथन के बीच का रास्ता केदार ने बड़ी चिंता के साथ खोजा है |’ `ज़मीन पका रही है’ और `यहाँ से देखो’ में केदार जी में कुछ बदलाव नज़र आते हैं , रोमानियत का रंग थोड़ा हल्का पड़ता है और प्रकृति की अपेक्षा वे मनुष्य को तरजीह देते नज़र आते हैं| इस दौर की अनेक कविताओं में केदार जी साधारण मनुष्य की चिंता करते नज़र आते हैं| ख़ास बात यह है कि यह साधारण मनुष्य भी उनकी कविताओं में असाधारण रूप में उपस्थित हुआ| बकौल नंदकिशोर नवल, `साधारण मनुष्य या आम आदमी हिन्दी आलोचना का एक चालू मुहावरा है| केदार जी ने अपनी कविता के नायक को इस मुहावरे से नहीं उठाया, बल्कि वह अपनी जगह से चलकर उनकी कविताओं में आया है| इसका सबूत यह है कि वह हमेशा अपने परिवेश और अपने व्यक्तित्त्व से युक्त है, वह अकेले हो या समूह में|’ हिंदी काव्य संसार में उनकी जादूई उपस्थिति को रचने में उस दौर की `सन 47 को याद करते हुए’, `बनारस’,`उस आदमी को देखो’ जैसी अनेक कविताएँ याद की जा सकती हैं| उम्मीद को प्राणवायु की तरह समेटती उस दौर की कविता और टटके बिम्ब को देखिए-

मुझे आदमी का सड़क पार करना

हमेशा अच्छा लगता है

क्योंकि इस तरह

एक उम्मीद सी होती है

कि दुनिया जो इस तरफ है

शायद उससे कुछ बेहतर हो

सड़क के उस तरफ|

अगले संग्रह`अकाल में सारस’ (1988) की कविताओं में वे अपनी निजी काव्यभाषा और काव्ययुक्ति की और बढ़ते नज़र आते हैं| इस दौर की कविता की एक और ख़ास बात की ओर नज़र जाना लाजिम है, वह है जीवन और मृत्यु के द्वंद्व का चित्रण| अरुण कमल कहते हैं , `केदारनाथ सिंह के पूरे काव्य जीवन में यह एक बड़े परिवर्तन को लक्षित करता है| जीवन और मृत्यु का द्वंद्व प्राय: सभी कवियों में कभी-न-कभी, किसी–न-किसी स्तर पर ज़रूर व्यक्त हुआ है| केदारनाथ सिंह ने जीवन और मृत्यु को एक साथ रखकर उनके विभिन्न संयोगों को देखा है|’ इस सिलसिले में इस संग्रह की अपेक्षाकृत कम चर्चित कविता `पर्व स्नान’ देखी जा सकती है –

ऊपर कौए मंडरा रहे थे

और नीचे –

काँपते हुए जल में अमरता की छपाछप होड़ थी |

सम्भावनाओं की निरंतर तलाश केदार जी के काव्यलोक की धुरी रही| मार्मिक यह है कि इस सिलसिले में वे अपने को हिन्दी मन की जातीय परम्परा से सन्नद्धकर देते हैं – `

तब से कितना समय बीता

हम अब भी चल रहे हैं

आगे-आगे कवि त्रिलोचन

पीछे–पीछे मैं

एक ऐसे बाघ की तलाश में

जो एक सुबह

धरती पर गिराकर टूट जाने से पहले

वह था|’

अगले संग्रह `उत्तर कबीर औरअन्य कविताएँ (1995) में केदार जी व्यवस्था और समाज की जटिलताओं के प्रति ज़्यादा चौकन्नेनज़र आए | `खुलेपन में पहिया’ , `विकासकथा’ जैसी कविताएँ इस संग्रह की उपलब्धि बनीं, जिनमें वर्तमान विसंगत आर्थिक नीतियों का विरोध मुखर हुआ | चीजों के गायब होने या गंवा देने के दंश का मार्मिक आख्यान करती अनेक कविताएँ इस संकलन का हिस्सा बनीं | `गाँव आने पर’ कविता में गाँव से विस्थापन और बेघर होने का दर्द ;`घर का विचार’, `गूँज’ जैसी कविताओं में बेघर होने की ट्रेजडी ; `कुदाल’.`कुँए’ जैसी कविताओं में श्रम के बेकार और अर्थहीन करार दिए जाने का अवसाद ; `भिखारी ठाकुर‘ `लोरी’ जैसी कविताओं में लोक संस्कृति के पूर्णत: उपेक्षित होने की त्रासदी का बयान; `विकास गाथा’ और`खुलेपन में पहिया’ जैसी कविताओं में बाज़ार होते देश और उदारीकरण के छल-छद्मों का मार्मिक काव्यात्मक रूपांतरण हुआ |

`बाघ’(1996) बीतती सदी के अंतिम दौर का ऐसा मिथकीय आख्यान था, जिसमें सौन्दर्य और आतंक को एक ही बिंदु यानी बाघ बिम्ब द्वारा अनेक रूपों में प्रकट किया गया | व्यतीत होते समय और सम्भावनाओं को रचने की जिद को जिस अंदाज़ में कवि ने कहा , वह अत्यंत विलक्षण था –

`उन्हें डर है कि एक दिन

नष्ट हो जाएँगे सारे-के-सारे बाघ

कि एक दिन ऐसा आएगा

जब कोई दिन नहीं होगा

और पृथ्वी के सारे-के-सारे बाघ धरे रह जाएँगे

बच्चों की किताबों में |’

कवि केदार के काव्य आख्यान की बुनियादी चिंताओं में शामिल अप्रतिहत जीवन राग इस संग्रह में अनोखे बिम्बों द्वारा प्रकट हुआ

`वही एक कच्चा-सा

वही आदिम मिट्टी जैसा ताज़ा आरम्भ

जहाँ से हर चीज़

फिर से शुरू हो सकती है

फिर से खड़िया

ककहरा फिर से

फिर से गिनती सौ से शून्य की तरफ

सूर्यास्त से धूपघड़ी की तरफ

समय फिर से

यह`फिर’ भी

फिर से |’

बाघ संग्रह का सबसे खूबसूरत पक्ष है जीवंत नाटकीय युक्तियों का वह आख्यान जिसमें अनेक संवेदनाओं खूबसूरती से अभिव्यक्त हुईं | केदार जी का बहुचर्चित संग्रह `तालस्ताय और साईकिल’ (2005) काव्य विषय और काव्य समय दोनों ही नज़रिए से सांस्कृतिक बहुलता को अपने विशिष्ट अंदाज़ में रचा| अपने समय और मनुष्यता की चिंताओं को सहेजता यह संग्रह कवि के रूपक का इस्तेमाल करें तो ज़रूरी चिट्ठी के मसविदे की तरह अपने वजूद को सम्भव किया| ये चिंताएं कहीं पानी की प्रार्थना के रूप में प्रकट हुईं, तो कहीं भूगोल का अतिक्रमण कर त्रिनिदाद पहुँचगईं, कहीं पांडुलिपियों की चिंताओं से सन्नद्ध हुईं तो घोसलों के इतिहास से विचरती, बर्लिन की टूटी दीवारों को निगाहों में बसाए जेएनयू की हिंदी का दीदार करती, चींटियों की रुलाई को सुनती, इब्राहिम मियाँ ऊँटवाले के साथ हमारे युगविवेक को संवारती हमारे समक्ष आईं| सांस्कृतिक बहुलता से रची-बसी ये कविताएँ अनेक अर्थों में अपने समय के काव्यरूपों और काव्ययुक्तियों का अतिक्रमण करने में सफल हुईं |

KEDARNATH`सृष्टि पर पहरा’(2014) केदार जी का अंतिम संग्रह था | इस संग्रह में असाधारण रूप से सत्ता तंत्र पर अनेक काव्य अभिव्यक्तियाँ शामिल हुईं| केदारनाथ सिंह ने बेहद बेबाकी और संवेदनशीलता इसके विविध संश्लिष्ट पहलुओं से संग्रह के काव्यलोक को सिरजा | कोई भी सत्तास्वाधीन चेतना की तपिश को बर्दाश्त नहीं करती | ध्यान देने की बात है कि समय से कवि का रिश्ता अनेक रूपम में बनता नज़र आया| कोई कविता यदि इक्कीसवीं सदी के पहले और दूसरे दशक में लिखी जा रही है , तब कवि समय की परिधि में नव उदारवाद , नक्सलवाद, जन विमुख सरकारी तंत्र , फासीवादी मंसूबों का दुनिया में तेज़ी से विस्तार , सांप्रदायिक उन्माद किस रूप में आता है , यह देखना ज़रूरी हो जाता है | ऐसा संभव नहीं है कि किसी बड़े कवि में अपने समय की पीड़ा और आकांक्षा की काव्य अभिव्यक्तियाँ न हों | सवाल यह है कि केदार जी कैसे इन स्थितियों से रूबरू हुए| यह ध्यातव्य है कि अपने अन्य समकालीनों जैसे अशोक वाजपेयी से वे इन सन्दर्भों में बिलकुल अलग नज़र आए| आइए इन सन्दर्भों को और गहरायी से देखने का प्रयास किया जाय |कुम्भनदास की काव्य पंक्ति `आवत जात पनहिया टूटी बिसर गयो हरिनाम ’हिन्दी संसार में मुहावरे के रूप में तब्दील हो चुकी है | सत्ता और कवि के संश्लिष्ट अनुभवों को बेबाकी से रखती ये पंक्तियाँ सैकड़ों वर्षों से हिंदी संसार का कंठहार बनी हुयी है | केदार जी की कविता `कवि कुम्भनदास के प्रति’ कुम्भनदास के बहाने अपने समय को काव्य आस्वाद में रूपांतरित की –

`सन्तकवि

खड़ा हूँ आपकी समाधि के सामने

और मेरे दिमाग़ में गूँज रही है

आपकी वह पंक्ति –

`संतान को कहाँ सीकरी सों काम’

सदियों पुरानी एक छोटी – सी पंक्ति

और उसमें

इतना ताप

कि लगभग पांच सौ वर्षों से हिला रही है हिन्दी को |

अहंकार और दर्प में डूबी-बौरायी सत्ता और प्रतिपक्ष में खड़ी सत्याग्रह करती कविता की विरासत | ` लगभग पांच सौ वर्षों से हिला रही है हिन्दी को’ काव्य पंक्ति में जैसे हिन्दी अपनी विरासत ढूँढ़ रही हो | कवियों ने सत्याग्रह की इस परंपरा को अपने – अपने समय में अपने – अपने तरीकों से पुरनूर विचारों और असहमतियों के विवेक से भरा | इस कविता के तीन शेड हैं  – हिन्दी की विरासत , समय की विवशता और कवि का पक्ष |जीना तो इसी संसार में है , जहाँ जीवन जगत की बाध्यताओं के कदम सत्ता के राजमार्ग से होकर गुज़रते हैं | अब सीकरी का तिलस्म पहले से कहीं ज़्यादा गहरा हो चुका है | बकौलकवि,

`जाना होगा दिल्ली ही

और दिल्ली आज की सीकरी है संतप्रवर

तब तो एक थी

अब एक के अन्दर एक

जाने कितनी सीकरियाँ हैं !’

कविता अपना पक्ष चुनती है –

`कविता और सीकरी के बीच

कि सदियाँ गुज़र गईं

और दोनों में आज तक पटी ही नहीं !’

जब आवाज़ के सारे मंसूबे पराजित हो जाते हैं तब भी एक उम्मीद बाक़ी रहती है | वह आवाज कविता की होती है | यह अकारण नहीं है कि ` निराला की आवाज़’ कविता में केदार जी को कविकर्म विलक्षण रूप में याद आया –

`शहर बनारस का वह पुराना स्कूल

मंच नहीं था श्रोता नहीं थे

कोई शब्द नहीं था

सिर्फ एक –

`पत्रोत्कन्ठित’ पेड़ वहाँ खड़ा था

और निराला बोल रहे थे |’

सत्ता और कविता के रिश्ते पर उनकी एक मार्मिक कविता है – `घास’ | तंत्र अपनी परिधि से लगातार जन को खदेड़ रहा है | पर जन तो जन है , वह तन्त्र के हर किए धरे पर पानी फेर देता है | तंत्र नयी – नयी युक्तियाँ गढ़ता है तो जन प्रतिरोध के नए – नए तेवरों से अपने संपर्क पुख्ता करता है | कविता में आह्वान है किजन के प्रतीक घास के पक्ष में विचार रखा जाय  |सभ्यता की नयी इबारतों ने आम आदमी को बेदखल करने का अभियान चलाया है | यह आम आदमी विस्थापित होने के बावजूद उन जगहों पर अपना अक्स ढूँढ़ता है , जहां से वह खदेड़ा गया है | घास के बिम्ब से उसे रूपायित करते हुए केदार जी ने कहा –

`घास परेशान है इन दिनों

आने दो उसे

अगर आती है वह

दुनिया के तमाम शहरों से खदेड़ी हुई

जिप्सी है वह

तुम्हारे शहर की धूल में अपना खोया हुआ नाम

और पता खोजती हुई |’

कविता अपना पक्ष चुनती है , और वह जोखिम उठाती हुई जन के पक्ष में खडी होती है | सत्ता और प्रतिपक्ष के द्वंद्व में अमरता की आकांक्षा लिए ज्ञान के विभिन्न अनुशासनों की देशकाल निरपेक्ष गति से केदार जी असहमत थे | उन्होंने दार्शनिक, कवि, प्रोफेसर आदि से यह उम्मीद की कि वे अपने अस्तित्त्व को जन से आबद्ध करें| सत्तावादी समूह  शायरी, कविता, दर्शन, शिक्षाआदि का इस्तेमाल अपने हक़ में करता है| पारंपरिक वर्चस्व के आतंक तले विकसते अवसरवादी गठजोड़ों से कवि सावधान करते हुए, प्रस्तावित कियाकि घास पर अखंड बहस हो| यानी जन कभी ओझल न हो तंत्र से| कवि की प्रतिबद्धता का आलम यह है कि यह बहस न भी हो , तब भी वे अपना पक्ष निर्विवाद रख सके–

`शुरुआत के तौर पर मैं घोषित करता हूँ

कि अगले चुनाव में

मैं घास के पक्ष में

मतदान करूंगा |’

भारत में किसान जीवन लगातार दुस्तर होता जा रहा है | उदारीकरण की आंधी में सत्ता ने सबसे ज़्यादा किसानों को बेदखल किया है | भारत के राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार 1995 से 2014 के बीच साढ़े तीन लाख से भी ज़्यादा किसानों ने आत्महत्या की है| गौरतलब  यह है किसान इन सन्दर्भों में खुद को कहाँ खडा पाता है? एक मध्यवर्गीय किसान के बेटे के रूप में कविकी दुनिया में किसानी जीवन की अनेक अर्थछवियाँ व्याप्त हैं| संग्रह में कहीं किसान हताश है तो कहीं प्रतिरोध की अलख जगाता नज़र आता है | `फसल’ कविता का किसान विस्थापन से हतप्रभ है –

`उधर हुआ यह

कि ज्यों ही पहुँचा मरखहिया मोड़

कहीं पीछे से एक तेज़ भोंपू की आवाज़ आई

और कहते हैं – क्योंकि देखा किसी ने नहीं –

उसे रौंदती चली गई’| `

देखा किसी  ने नहीं’ उस निर्लज्जता की याद दिलाता है जहाँव्यवस्थाओं द्वारा की गयी हत्या को आँकड़ों की बाजीगरी में उलझा कर कुंद कर दिया जाता है | पर इस विकट समय में रास्ता किधर है ? केदार जी गहरे जीवन राग के कवि थे| वह जीवनराग जो देशकाल निरपेक्ष अमूर्त की कुलांचे नहीं भरता , बल्कि अपने समय की बेचैनियों , संघर्षों और सपनों से बावस्ता होता है |इस लिहाज से संग्रह की किसान जीवन पर ही आधारित कविता `एकठेठ किसान के सुख’ कविता देखी जा सकती है| आतंक और सौन्दर्य को एक ही बिंदु पर सिरजना कवि के काव्यलोक का हिस्सा रहा है , आइए यह देखा जाय कि आलोच्य कविता में काव्य आस्वाद का रूप इस लिहाज से कैसा है ? आये दिन अखबार की सुर्ख़ियों में भूमि अधिग्रहण का फरमान और जीवन – मरण के लिए संघर्ष करते किसानों की ख़बरें आतीं हैं | इस कविता में ऐसे ही एक किसान का ज़िक्र है जिसकी ज़मीन के अधिग्रहण का फरमान जारी कर करारनामे पर हस्ताक्षर के लिए कचहरी बुलाया गया है |पूरी कविता की बुनावट शानदार है | जब किसान सुस्त और निढाल था , तभी चमकती आँखों वाला साँप दिखायी पड़ा | जोखिम में उसे सौन्दर्य दिखा | वह अवाक होकर उस सौन्दर्य को देखता रह गया | जब वह चौके में गया तब वहाँ दिन की थाली में रात की लिट्टी के साथ दमकती हुई हरी मिर्च दिखायी दी और उसे लगा जीवन में जैसेफिर से स्वाद आ गया हो | महत्त्वपूर्ण यह है कि जिस समाज में दैवीय चमत्कार में ही हर मर्ज की दवा ढ़ूंढ़ी जाती हो, उस समाज में दैनिक जीवन के जद्दोजहद के बीच उम्मीद का नज़र आना कवि के नज़रिए का साक्ष्य है | कविता का समापन देखिए –

`वह कचहरी गया

वहाँ उसके/सामने रखा गया

एक सादा कागज़

कहा गया – `यहाँ….यहाँ…

एक दस्तख़त करो’

उसने इनकार किया

और उसे लगा

वह दस गुना

बीस गुना

सौ गुना और ज़िंदा हो गया !’

विकास के समकालीन फलसफे के सबसे आसान शिकार आदिवासी हैं | भूमंडलीकरण ने उनपर ज़ुल्मों में खासी बढ़ोत्तरी की |उपभोक्तावाद और विश्व बाज़ार की अंधी लिप्साओं के बीच आदिवासी | विकास और विस्थापन का अंतहीन रास्ता| जहां विकास की गाथा हमेशा प्रभुवर्ग और उस वृत्त में शामिल सिपहसलारों के लिए है तो , उसी तरह विस्थापन की अंधी सुरंग में हमेशा धकेले जाने के लिए भी विवश समूह भी पूर्वनियोजित यानी आदिवासी और किसान हैं| इस संग्रह में विकास के इस चमकते फलसफे की मुखालफत करते आदिवासियों  पर भी रचना है | एक कविता का शीर्षक है – ` बाज़ार में आदिवासी’ | कविदृष्टि की अचूक पहुँच  देखिए , केदार जी कहते हैं /भरे बाज़ार में /वह तीर की तरह आया /और सारी चीजों पर /एक तेज़ हिकारत की नज़र फेंकता हुआ /बिक्री और खरीद के बीच के /पतले सुराख से /गेहूँअन की तरह अदृश्य हो गया /एक सुच्चा /खरा/ठनकता हुआ जिस्म |’

कमाल यह है कि कविता केवल इस दृश्य बिम्ब की रचना कर खामोश नहीं हो जाती है| संभ्यता विकास की प्रचलित गाथा के पास इसे समझने और प्रकट करने के लिए किसी तरीके काना होना भयानक है | पर कवि की प्रतिबद्धता सजग है | उन्हें मालूम है कविता को किसके साथ खडा होना है, बकौल कवि ,

`कहते हैं वह ठनक अबूझमाड़ में

रात – बिरात

सुनाई पड़ती है

मिला कोई गायक

तो एक दिन पूछूँगा

संगीत की भाषा में

क्या कहते हैं इस ठनक को ?’

कविता के अपने पक्ष चुनने की यह यात्रा अनेक दृष्टियों से उल्लेखनीय है | केदार जी ने  हिन्दी कविता की जनपक्षधरता के विस्तार में अपनी भूमिका तय की| खतरनाक दौर होना जितना बुरा है , उससे कहीं ज़्यादा बुरा है खतरनाक दौर रहते हुए चुप रहना | चुप्पी होना किसी समाज के दम तोड़ने का प्रतीक है | किसान – आदिवासी पर लिखी कविताओं का सिरा उस चुप्पी को बेनकाब करेने से जुड़ता है , जिसकी परिणति किसानों, मज़दूरों और आदिवासियों के मौजूदा मंजर से है | केदार जी न सिर्फ इस चुप्पी को ताड़ा, बल्कि इस चुप्पी को तोड़ते हरसंभव प्रयत्न को ज़िन्दा होने का सबूत माना-

`मैंने एक बुजुर्ग से सुना था

 कि चुप्पियाँ जब भी बढ़ती हैं

अँधेरे में नदी की तरह

चुप हो जाता है एक पूरा समाज

एक जीता – जागता राष्ट्र

भूल जाता है अपनी भाषा

और एक फूल के खिलने से भी

दरक जाते हैं पहाड़

ऐसे में मित्रो ,

अगर बोलता है एक कुत्ता

बोलने दे उसे

वह वहाँबोल रहा है

जहाँ कोई नहीं बोल रहा |

केदार जी की बिम्ब धर्मिता बेहद सटीक है, उदाहरण के लिए इस कविता में फूल के खिलने और पहाड़ के दरकने का बिम्ब या चुप्पी में कुत्ते के  भौंकने का बिम्ब| फूल का खिलना यथास्थितिवाद के पहाड़ को दरका देता है, उसी तरह कुत्ता समाज के प्रहरी के रूप में याद तो किया ही जाता है, भारतीय परंपरा में वह धर्म का प्रतीक भी है| केदार जी ने अपनी शर्तों के साथ जिस काव्य विवेक को सिरजा उस लोक का मर्म कला और विचार का ऐसा दुर्लभ और विस्मयकारी रूप से अपनत्व भरा संयोग है जो आज़ादी के बाद के काव्य संसार में अपने ढंग की अकेली दुनिया है | उनका न होना आधुनिक हिंदी काव्य संसार की ऐसी क्षति है , जिसकी भरपाई सम्भव नहीं |

(dr.niranjan.sahay@gmail.com)

(साभार: फिलहाल)

 

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