कश्मीरनामा: … और बहने लगता है इतिहास- गणपत तेली

हिन्दी क्षेत्र के पब्लिक स्फीयर में शायद ही कोई ऐसा अवसर आता होगा, जब कश्मीर का जिक्र नहीं आता हो। चाहे देशभक्ति की बात हो, धर्म-सांप्रदायिकता की बात हो, या राजनीति की- कश्मीर के ज़िक्र के बिना कोई चर्चा पूरी नहीं होती है। लेकिन हमारी इन चर्चाओं में कश्मीर की उपस्थिति जितनी उग्र होती है, उतनी ही कम कश्मीर के इतिहास और वर्तमान की जानकारी होती है। उनकी जानकारी के आधार विचारधारा या पार्टी विशेष की प्रचार-सामग्री, अखबार-टीवी द्वारा प्रस्तुत असमग्र और वस्तुनिष्ठता से रहित सामग्री या फिर स्टीयरोटाइप्स या अफवाहें होती हैं। कश्मीर पर गर्व करने और ‘भारतमाता का मुकुट’ मानने वाले लोगों के लिए कश्मीर भावुक राष्ट्रवाद का एक अहम कारक तो है लेकिन वे कश्मीर के सामाजिक ताने-बाने, संवैधानिक पेचीदगियों, अंतर्राष्ट्रीय प्रोटोकॉल और राजनीतिक जटिलताओं की परवाह भी नहीं करते। हिन्दी भाषियों के लिए एक मुश्किल यह भी आती है कि उनके पास इन सब मुद्दों की जानकारी पाने के लिए सामग्री का अभाव भी रहता है। अंग्रेजी में कश्मीर के प्रसंग पर कई किताबें लिखी गई है लेकिन हिन्दी में लोकप्रिय हुई नेताओं और राजनयिकों की अनुदित किताबें से ही कश्मीर की जानकारियाँ मिल पाती है।

अशोक कुमार पाण्डेय की सद्य-प्रकाशित पुस्तक ‘कश्मीरनामा’ इस ऐतिहासिक कमी को पूरा करती है। किताब के बारे में इसके बेककवर पर जाने-माने फिल्मकार और लेखक संजय काक की टिप्पणी इसका सही मूल्यांकन करती है। उन्होंने लिखा कि, “कश्मीर के अतीत और वर्तमान की समझ को लेकर हमारे चारों ओर जो खौफ़नाक चुप्पी पसरी है उसे तोड़ने की कोशिश करती इस पथप्रदर्शक किताब के महत्त्व को कम करके नहीं आँका जा सकता। इस तरह के कदमों से कश्मीर को अख़बारों और टेलीविज़न की सुर्खियों के शिकंजे से बचाया जा सकता है, और ये एक शुरुआती संवाद का रूप भी ले सकते हैं जिससे लोग यह विचार कर सकें कि कश्मीर से भारत को आख़िर क्या मिला है। और, भारत ने कश्मीर में क्या किया है।” यह किताब राजतरंगिणी के हवाले से प्राचीन कालीन इतिहास से प्रारंभ होकर वर्तमान मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती तक विस्तृत है। इस पुस्तक के व्यापक कैनवास में पूर्व-प्रामाणिक इतिहास, अशोक से कनिष्क (बौद्ध धर्मावलंबी राजा), मिहिरकुल से अवंतिवर्मन (शैव धर्मावलंबी राजा), रिंचन का इस्लाम अपनाना (कश्मीर में इस्लाम का आगमन), इस्लाम का विस्तार, सूफीमत और ऋषि परंपरा, चक राजवंश, शिया-सुन्नी संघर्ष, कश्मीर में मुगल शासन, अफगान शासन, सिख शासन, कश्मीर में अंग्रेजों का हस्तक्षेप और डोगरा शासन, शेख अब्दुला का उदय, आंदोलन का दौर और मुस्लिम कॉन्फ्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेस, सांप्रदायिकता और आज़ादी का प्रश्न, ‘नया कश्मीर’ का यूटोपिया, कश्मीर छोड़ो आंदोलन, भारत विभाजन के दौर में कश्मीर का सवाल, कबाइली हमला और कश्मीर के भारत विलय, धारा 370, संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर मसला, नेहरू युग में कश्मीर का प्रश्न, शेख और नेहरू के संबंद्ध, शेख की गिरफ़्तारी-रिहाई, फारुक अब्दुला और उमर अब्दुला, मुफ़्ती मुहम्मद सईद और महबूबा मुफ़्ती, कश्मीर में चुनाव, नब्बे का आतंक का दौर और वर्तमान निरंतरता और बदलाव के साथ-साथ अलग-अलग दौर में प्रशासनिक व्यवस्था, सामाजिक स्थिति और महिलाओं की स्थिति का वर्णन शामिल है। गौरतलब बात यह भी है कि इस किताब में एक अध्याय पाक अधिकृत कश्मीर पर भी है, जो वहाँ की हकीकत को प्रस्तुत करता है।

Kashmir

निश्चित ही, लंबी कालावधि को अपने कलेवर में समेटती यह किताब हिंदी में पहली बार कश्मीर को समग्रता से प्रस्तुत करती है। इस समग्रता को निभाने की चुनौती को लेखक ने बखूबी निभाया है। लंबे इतिहास को समेटती हुई इस किताब में लेखक का मन आधुनिक युग में आकर रमता है, खासतौर से शेख अब्दुला के उदय के साथ। इससे पहले के इतिहास को भी वे रुचि के साथ प्रस्तुत करते हैं लेकिन अग्रेजों द्वारा डोगरा को कश्मीर सौंपने (बेचने) और शेख अब्दुला के कश्मीर में उदय को वे आधुनिक कश्मीर के प्रस्थान बिंदु के रूप में रेखांकित करते हैं। यह किताब बताती है कि आधुनिक युग का कश्मीर शेख अब्दुला का कश्मीर है, उनके बाद भी वहाँ की राजनीति में उनके द्वारा लाए उनके बेटे फारुक अब्दुला और पोते उमर अब्दुला राजनीति करते हैं। आधुनिक कश्मीर की पूरी राजनीति में एक तरफ शेख और उनके बाद उनके बेटे-पोते टिके हुए रहते हैं, तो दूसरी तरफ किरदार बदलते रहते हैं; पहले डोगरा राजा हरिसिंह, फिर कर्ण सिंह, गुलाम नबी आज़ाद, मुफ़्ती परिवार, बख्शी गुलाम मोहम्मद, गुलाम मोहम्मद सादिक, हुर्रियत नेताओं, जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट आदि शेख परिवार के समानांतर कश्मीर की राजनीति में मौजूद रहते हैं।

यह किताब कश्मीर से जुड़े कई स्टीयरोटाइप्स का खंडन करती है। जाहिर-सी बात है कि वे अवधारणाएँ किसी खास प्रचार-तंत्र की उपज होने के कारण लोकप्रिय हुई। इनमें से सबसे महत्वपूर्ण अवधारणा कश्मीर के बारे में नेहरू और पटेल की नीतियों को लेकर हैं। आज के प्रचार तंत्र में मौजूद अवधारणा कश्मीर समस्या के लिए नेहरू को खलनायक मानती हैं और पटेल को नायक। यह किताब यह स्पष्ट करती हैं कि जनसंख्या बाहुल्य और भौगोलिक अवस्थिति के कारण पटेल कश्मीर को भारत के साथ लाने के लिए इच्छुक नहीं थे, जूनागढ़ और हैदराबाद के तर्क से वे तार्किक भी थे। जबकि नेहरू के लिए यह अपने पूर्वजों के जन्म स्थान के लगाव से भी ज्यादा मुसलमान बहुसंख्या वाले कश्मीर का भारत में शामिल होना सेकुलर भारत का नक्शा बनाने में अहम भूमिका रखने वाला कारक था। इसलिए नेहरू ने इसमें दिलचस्पी ली और शेख से उनकी पुरानी मित्रता उनके काम भी आई। इस तरह की कई मिथ्या अवधारणाएं यह किताब खंडित करती है।

लेखक ने इस किताब के लिए गहन शोध किया है और किताब में आवश्यक संदर्भ दिए गए हैं। विषयानुरूप इस किताब में आवश्यक ब्यौरे भी हैं, जो किताब की दलीलों के प्रमाण के लिए आवश्यक भी हैं। ऐसे कई प्रसंग हैं, जहाँ अशोक कुमार पाण्डेय ने अपनी साहित्यिक रुचि से प्रसंगों को रोचक बना दिया है। कबाइली हमले के दौर का वर्णन करते समय लेखक चित्रात्मकता हो जाता है, नेहरू और शेख के आपसी संबंधों पर लेखक की आत्मीयता झलक जाती है, कश्मीर की साझी विरासत और आज के बर्बादी वाले हालात पर उनकी चिंता स्पष्ट रूप से लेखनी में आ जाती है। उनके लिए यह निरा इतिहास न होकर सरोकार का लेखन है। इन सब के बावजूद इस किताब में लेखक वस्तुनिष्ठता से परे नहीं जाता है। वे नेहरू, शेख अब्दुल्ला, पटेल इंदिरा गांधी, हरि सिंह, कर्ण सिंह आदि का वर्णन करते समय उनकी खूबियों और कमियों दोनों को वस्तुनिष्ठ तरीके से रखते हैं। यही बात भारत और पाकिस्तान के अन्य नेताओं के वर्णन भी लागू होती है। यह अवश्य है कि विस्तार के भय से छोटे रखे गए कई प्रसंग और विस्तार की मांग करते हैं, उदाहरण के लिए मनमोहन सिंह और परवेज़ मुशर्रफ का प्रसंग, आफ्स्पा की भूमिका, दिलीप पडगाँवकर के नेतृत्व वाले वार्ताकार समूह के प्रयास, कर्णसिंह का कांग्रेस में स्थान आदि। साथ ही, कहीं-कहीं संपादन की चूक भी दिखाई पड़ती हैं।

लेखक ने इस किताब में कश्मीर में 1947 से मौजूद आज़ादी के प्रश्न को भी विस्तार से देखा है। वे भारत विलय और पाकिस्तान के प्रयासों के साथ-साथ कश्मीरियों के आत्मनिर्णय के संघर्ष को भी रेखांकित किया है। जब कश्मीर का भारत में विलय हुआ उस समय कई लोग आज़ाद राज्य के रूप में कश्मीर देखना चाहते थे, इन समूहों को पाकिस्तान ने प्रश्रय दिया। परिणामत: धीरे-धीरे आज़ादी की आवाज़े पाकिस्तान परस्त होती गई। लेखक यह बात नोट करता है, आज कश्मीर में उठ रही भारत विरोधी आवाज़े स्वायत्त और स्वतंत्र कश्मीर का कोई स्वप्न नहीं प्रस्तुत करती है (जैसा कि शेख का ‘नया कश्मीर’ था), बल्कि शरियाई कानून की बात करती हैं। लेखक का यह मत सही है कि यह यह कश्मीरियत की रवायत के अनुकूल नहीं हैं।

विस्तार से कश्मीर के इतिहास और वर्तमान पर लिखने के बाद लेखक इस महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि सेना और हिंसा के माध्यम से कश्मीर समस्या को सुलझाया नहीं जा सकता है। लेखक का यह भी मानना है कि भारत-पाक के बीच सौहार्द्रपूर्ण संबंधों के बिना यह संभव नहीं है। चूंकि इस राजनीतिक समस्या में धर्म, संस्कृति, अर्थव्यवस्था आदि कई तत्त्व मिल गए हैं इसलिए कश्मीर के लिए सबसे ज्यादा आवश्यक लेखक यह मानते हैं कि वहाँ के हिंदुओं, मुसलमानों का आपसी और देश के अन्य लोगों के साथ संपर्क और संवाद बढ़े। यह महत्त्वपूर्ण भी हैं, क्योंकि 1947 से अब तक इसे सैन्य तरीकों से हल करने की कोशिश अधिक की गईं- भारत, पाकिस्तान और कश्मीर में मौजूद अलगाववादियों ने भी; लेकिन सैन्य तरीकें अब चूक गए हैं, कश्मीरियत को शायद ये रास नहीं आते!

यह किताब हिंदी क्षेत्र में कश्मीर पर सुसूचित चर्चाओं की उम्मीद जगाती है।

अशोक कुमार पाण्डेय, ‘कश्मीरनामा’, राजपाल, दिल्ली, 2017, मूल्य 625   

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