‘छबीला रंगबाज़ का शहर’ और अन्य कहानियाँ: गणपत तेली

‘छबीला रंगबाज़ का शहर’ प्रवीण कुमार का पहला कहानी संग्रह है| इस संग्रह में चार कहानियां सम्मिलित हैं- ‘छबीला रंगबाज़ का शहर’, ‘लादेन ओझा की हसरतें’, ‘नया ज़फरानामा’ और ‘चिलैक्स! लीलाधारी’| इस संग्रह की कहानियां मुफ्फसिल समाज की कहानियां हैं| ‘छबीला रंगबाज़ का शहर’ और ‘लादेन ओझा की हसरतें’ तो स्पष्ट रूप से मुफ्फसिल का जीवन पेश करती हैं, वहीं ‘नया ज़फरनामा’ और ‘चिलैक्स! लीलाधारी’ दिल्ली की कहानियां है लेकिन इनमें भी कहानीकार का मन नागर जीवन की तरफ उन्मुख नहीं है बल्कि वह अपने मिज़ाज के अनुरूप मुफ्फसिल जीवन खोज लेता है| मुफ्फसिल का सामान्य अर्थ है ऐसी जगह जो गाँव या शहर के के बीच में हो, क़स्बा शहर की तरफ झुका होता है| यहाँ के जीवन का मुख्य आधार मध्यमवर्ग और निम्न मध्यमवर्ग होता है, जहाँ एक तरफ नौकरीपेशा या पेशेवर लोग होते हैं, तो दूसरी तरफ अन्योन्याश्रित कामगार लोग भी होते हैं| इसी आर्थिक आधार से मुफ्फसिल समाज की संरचना बनती है, जो इस संग्रह की कहानियों में चित्रित हुई है।

शीर्षक कहानी ‘छबीला रंगबाज़ का शहर’ संग्रह की सबसे लम्बी कहानी है| यह कहानी रेलवे स्टेशन से शुरू होकर रेलवे स्टेशन पर ख़त्म होती है| कहानीकार ने अपने इस शहर विशेष को पहिये से जोड़ कर रखा है| चाहे वह रेल का हो या साइकिल का| कहानी में भी कहानीकार प्राय: साईकिल रिक्शा के पहिये से शहर की गति का संकेत देता है| यह सच भी है कि किसी भी शहर की गति वहां के सार्वजनिक यातायात के साधनों से परिलक्षित होती है| यह कथाकार का एक महत्वपूर्ण अवलोकन है| उदहारण के लिए ऋषभ और अरूप का रिक्शा देखिये, “उनका रिक्शा हिचकोले खाता हुआ मेन मार्केट की तरफ़ बढ़ रहा था| रिक्शे वाले ने अगले पहिए में घुँघरू बाँध दिए थे| ऋषभ ko लगा की उसकी खनखन छनछन में तन्वी की आवाज़ खनखना रही है (25)|” तन्वी से लगाव के कारण उसे पहिये से आ रही आवाज़ में भी तन्वी की आवाज़ सुनाई दे रही है, लेकिन इसके बाद जब अरूप ऋषभ kको तन्वी के मोह से बाहर ले आता है तो रिक्शा कुछ और संकेत करता है, “शहर की चाल की तरह लुंजपुंज रिक्शा एक बार फिर चल पड़ा| इस रिक्शे के पहिए में घुँघरू नहीं जड़े थे| उनके चलन में ‘किर्रर्र-किर्रर्र’ की पीड़ादाई आवाज़ निकल रही थी (26)|” यह पीड़ा अरूप के मन की पीड़ा थी|

इस लम्बी कहानी का फलक बहुत विस्तृत है| कहानीकार ने अपनी प्रतिभा के जरिये बहुत-सी वास्तविक घटनाओं को कथावस्तु में आसानी से शामिल कर लिया| उदाहरण के लिए बिहार की जातिगत हिंसाओं के प्रसंग, कुंवर सिंह आदि के ऐतिहासिक प्रसंग, हिन्दी साहित्य के अनेक प्रसंग, टीवी चैनल के प्रसंग, शहर में हथियारों का प्रसंग आदि लक्षित किए जा सकते हैं| ये सभी प्रसंग निश्चित ही कहानी को गति देते हैं| चूंकि यह कहानी किसी चरित्र पर केन्द्रित न होकर शहर केन्द्रित है, इसलिए उक्त प्रसंग शहर के चरित्र को निर्मित करते हैं|

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यदि पात्रों की बात करें तो,  यह कहानी कई पात्रों की कहानी है| अरूप और ऋषभ कहानी के केंद्र में हैं, लेकिन कई बार कहानी इनसे दूर भी चली जाती है| छबीला के कथानक में प्रवेश के बाद तो अंतिम हिस्से को छोड़ दें, तो वही इस कहानी के केंद्र में रहता है| हालाँकि कहानी के शीर्षक से जुड़े पात्र का कथानक में देर से प्रवेश होना पाठक को कुछ पृष्ठों तक ‘गोदो के इंतज़ार में’ वाला आस्वाद भी दे देता है| फिर भी, यदि समग्र रूप से देंखें तो यह कहानी किसी पात्र की कहानी न होकर एक मुफ्फसिल शहर की कहानी है| इस लिहाज से इसे काशीनाथ सिंह की कृति ‘काशी का अस्सी’ की कोटि में रखकर देखा जा सकता है| अकारण नहीं है कि काशीनाथ सिंह ने इसकी सराहना करते हुए लिखा है कि “दूसरे शहर झख मारे बिहार के, इस अलबेले छबीला रंगबाज़ के शहर के आगे| इसे लम्बी कहानी कहूँ या लघु उपन्यास- जितना ही जबरदस्त है, उतना ही मस्त|” लेकिन ‘शहर’ शहर की कहानी छबीला के चरित्र के ज़मने तक रहती है, जब कहानी छबीला के आस-पास केन्द्रित होने लगती है, तब ‘शहर’ कहानी के हाशिये पर जाने लगता है|

इस कहानी में लेखक ने मुफ्फसिल समाज के व्यवहार को पकड़ने की अच्छी कोशिश की है| पत्रकार के रूप में अरूप का व्यवहार हो या, पुलिस, प्रिंसिपल, छोटे शहर में उग आए मीडिया चैनलों, रिक्शा चालकों, बाबाओं, चाय वालों, आम लोगों आदि के व्यवहार को कहानीकार ने कुशलता से पकड़ा है|

संग्रह की दूसरी कहानी ‘लादेन ओझा की हसरतें’ सटीक तरीके से मिले-झूले समाज में नए आ रहे भेदों की पहचान करती है| जहां लादेन और उसके मित्र इक़बाल की आपसी प्रेमपूर्ण लड़ाई एक स्वस्थ समाज को दर्शाती है| लादेन और इक़बाल की माँ की बातचीत इस कहानी को मार्मिकता के चरम पर ले जाती है, जहाँ परिवार के सदस्यों जैसी आत्मीयता है, एक-दूसरे की चिंता है और आपसी विश्वास है| यह कहानी समाज में मौजूद भेद को रेखांकित करती है और वह भेद है- ग्रामीण और शहरी| शहर पूरी तरह गाँव पर निर्भर है, लेकिन उसके बावजूद भी शहरी लोग ग्रामीण लोगों के प्रति हिकारत और नफ़रत का भाव रखते हैं|

ओसामा बिन लादेन के मारे जाने की ख़बर छपने से पहले तक यह भेद ही प्रमुख रहता है, लेकिन लादेन के मारे जाने के दिन एक और नफ़रत उस नफ़रत में जुड़ जाती है, और वह है- सांप्रदायिकता भेद की नफ़रत| महत्वपूर्ण यह भी है कि यह नफ़रत पहले से मौजूद नफ़रत के बल पर ही पनपती है अर्थात गाँव में नहीं, बल्कि शहर में, जहाँ पहले से गाँव वालो से नफ़रत की जाती है, वहीं पर यह नफरत भी पैर पसारती है| लादेन के मारे जाने की ख़बर का प्रभाव गाँव और शहर दोनों में अलग-अलग प्रभाव डालती है- जहां गाँव में लादेन के मारे जाने को लादेन ओझा का मारा जाना समझ कर चाची बदहवास होकर मातम करने लगती हैं, वहीं शहर में लोग मुसलमानों को शंका की नज़र से देखा जाने लगता हैं| कथाकार के शब्दों में, “हिंसा शहर में बिल्कुल नहीं दिखी| पर आँखों में उसकी परछाई; अब दिखी कि तब (114)|”

संग्रह की तीसरी कहानी ‘नया जफरनामा’ ‘लादेन ओझा की हसरतें के विस्तार के रूप में दिखाई पड़ती है| दोनों कहानियों में सामाजिक वर्ग एक जैसे हैं| बस फर्क यह है कि ‘नया जफरनामा’ के दोनों वर्ग शहर के ही दायरे में रहने वाले हैं; अर्थात दिल्ली में, लेकिन ये दो अलग-अलग दिल्लियाँ हैं| जफ़र की कहानी उस सामाजिक वर्ग की कहानी है, जिसके लोगों को आसानी से उच्च वर्ग और राजनेता लोग बहला लेते हैं और उनका इस्तेमाल करते हैं| जफ़र और उसकी बस्ती के लोगों कोko नेता और एनजीओ के लोग अपने जाल में ऐसा उलझाते हैं कि उससे निकलने का प्रयास करने पर वे अगले जाल में फँस जाते हैं| लादेन ओझा की हसरतें की तरह ही इस कहानी में भी लेखक ने वर्गों की पहचान करने का प्रयास किया है|

rangbazzसंग्रह की आख़िरी कहानी ‘चिलैक्स! लीलाधारी’ लीलाधारी की कहानी है, यह कहानी अन्य कहानियों से इस रूप में अलग है कि इसके केंद्र में कहानी का नायक है| संग्रह की यही कहानी पात्र या चरित्र की कहानी है, अन्यथा अन्य कहानियों के केंद्र में पात्र भले हो, लेकिन वे परिवेश की कहानियाँ बन जाती हैं| लीलाधारी के बचपन से लेकर युवावस्था तक की घटनाओं को कहानीकार ने कथा में पिरोने का प्रयास किया है| उसमें उनके जीवन के कई प्रसंग आते हैं, फ्लेशबैक में ग्रामीण जीवन का वर्णन भी आता है| ग्रामीण जीवन का वह वर्णन लीलाधारी के चरित्र को और दृढ़ बनाता है| यह कहानी बाकी तीनों कहानियों से इसीलिए अलग भी हो जाती है|

इस संग्रह की कहानियों में लेखक की जन पक्षधरता स्पष्ट है| वे गरीबों और छले गए लोगों के पक्ष में खड़े होते हैं, यह छल चाहे व्यवस्था का हो या लोगों का| छबीला में जहाँ वे छबीला को रंगबाज़ के रूप में कुख्यात करने की साजिश को बेनकाब करते हैं, तो वहीं यह भी स्पष्ट करते हैं छबीला से पहला अपराध मजबूरी में होता है| इसी तरह लादेन और उसके मित्र की कहानी में गाँव के लोगों के साथ उनकी सहानुभूति रहती हैं| शहर की नफ़रत वाली दुनिया उन्हें रास नहीं आती है| इस कहानी में लादेन और इक़बाल की माँ के रिश्ते को रेखांकित कर न केवल सांप्रदायिक सद्भाव के पक्ष में खड़े होते हैं, बल्कि मानवीय संबधों को मानवता की उच्च भूमि पर प्रतिष्ठापित करते हैं| गौरतलब है कि ऐसा करने वाले उनके पात्र गाँव के सामान्य लोग हैं (जिनकी अपनी कमियां भी हैं), न कि तथाकथित नगरीय सभ्यता के लोग|

‘नया जफ़रनामा’ कहानी में भी लेखक की यह पक्षधरता स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं, जहाँ दयनीयता के गर्क में पड़े जफ़र की और बार-बार लेखक की सहानुभूतियुक्त नज़र पहुँचती हैं| जफ़र की बस्ती के लोगों की समस्याओं, उनकी बेबसी पर लेखक की लेखनी जमती हैं और अकारण नहीं हैं कि बस्ती के बाहरी पात्रों पर शुरुआत में ही शंका होने लगती है| यहाँ यह कहानी थोड़ी-बहुत फोर्मूले पर भी चली जाती है| हालांकि अंतिम कहानी ‘चिलैक्स! लीलाधारी’ वैयक्तिकता प्रधान होने के कारण सामाजिक पक्ष प्रखर नहीं हो पता है लेकिन इश्वरी सिंह की सामाजिक संरचना से बाहर विद्रोह कर अपना व्यक्तित्व निर्मित करने वाले लीलाधारी का चरित्र निर्माण कर कहानीकार अपनी सामाजिक पक्षधरता ही स्पष्ट कर रहा है| कहानीकार की इस सामाजिक चेतना में उसकी राजनीतिक चेतना की भी भूमिका है| कहानीकार अपनी राजनीतिक चेतना के कारण ही उस खेल को समझ पाता है, जिसमें छबीला का शहर जल जाता है, लादेन के दोस्त पिटे जाते हैं या जफ़र की बस्ती हलकान होती है|

‘छबीला रंगबाज का शहर’ का लोकार्पण

यदि इन कहानियों के शिल्प की बात की जाए, तो चारों कहानियों के शिल्प का आस्वाद एक जैसा नहीं है| ‘छबीला रंगबाज़ का शहर’ कहानी के तत्वों का अतिक्रमण करती हैं| अन्य तीनों कहानियां शैली में बहुत अलग तरह की नहीं हैं| पात्रों पर नज़र डाले तो ये चारों कहानियां अपने पात्रों का निर्माण करती हैं, लेकिन ‘छबीला रंगबाज़ का शहर’ के छबीला का चरित्र ही ठीक से निर्मित नहीं हो पाता है| उसका चरित्र अधिकांशत: पत्रकार के वक्तव्यों से स्पष्ट होता है| वह ‘छबीला रंगबाज़ का शहर’ से ज्यादा ‘पत्रकार अरूप का शहर’ लगता है, जबकि कहानी का प्रारंभ और अंत ऋषभ के साथ होता है|

यदि कहानियों के शीर्षक की बात करें तो इस संग्रह की अन्य कहानियों के शीर्षक भी कहानी का पूर्ण प्रतिनिधित्व नहीं कर पाते हैं| लादेन ओझा की हसरतें तो हैं, लेकिन वे हसरतें कहानी के पूरे फलक तक नहीं पहुँच पाती हैं| जफरनाम महज जफरनामा नहीं है, बल्कि वह जफ़र का बस्तीनामा है| लीलाधारी का चरित्र भी लीलाधारी की बजाय बागी अधिक होता है| कहानी के शीर्षकों से यह लगता है कि ये कहानियों छबीला, लादेन ओझा, जफ़र और लीलाधारी की कहानियां है, लेकिन ‘चिलैक्स! लीलाधारी’ के अतिरिक्त अन्य कहानियां लोगों की कहानियां न होकर परिवेश की कहानियां हैं| उनके शीर्षक वैयक्तिकता की ओर संकेत करते हैं लेकिन कहानियां वैयक्तिक न होकर सामाजिक हैं|

इन कहानियों में लेखक की सर्वाधिक प्रतिभा संवाद-योजना में दिखाई देती हैं| संवाद इतने मजबूत हैं कि कई स्थलों पर अनायास ही नाटकीय तत्वों का प्रवेश हो जाता है| पात्रानुरूप संवाद रचने में कहानीकार ने कुशलता अर्जित की है| साथ ही, ध्वनियों और लहजों को पकड़ने का प्रयास भी जहाँ-जहां कहानीकार ने किया है, उसमें प्राय: सफलता पाई है| प्रवीण कुमार का यह पहला-कहानी संग्रह है और इस संग्रह में वे जिस तेवर के साथ कहानियां लेकर आए हैं, उससे हिन्दी कहानी की दुनिया में उनकी ठोस उपस्थिति दर्ज हुई है| मुफ्फसिल समाज के यथार्थ को जानने-समझाने के लिए ये कहानियां महत्वपूर्ण औजार साबित होंगी|

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