यह अच्छे-बुरे लोकतंत्र का समय है: प्रो. मैनेजर पाण्डेय

[हिंदी के प्रसिद्ध आलोचक और विचारक प्रो. मैनेजर पाण्डेय पिछले वर्ष पचहत्तर वर्ष के हो गये। अपने जीवन की इस लंबी अवधि में वे भारत समेत पूरी दुनिया में हो रहे परिवर्तनों के साक्षी रहे हैं। खासकर, साहित्य और विचारधारा में हो रही तब्दीलियों को उन्होंने करीब से देखा और महसूस किया है। इन तमाम पक्षों को समझने के लिए उनके पचहत्तरवें जन्मदिन के अवसर पर समाज वैज्ञानिक प्रो. मणीन्द्रनाथ ठाकुर, चर्चित लेखक प्रो. देवेन्द्र चौबे और कवि एवं फारसी के विद्वान प्रो. अखलाक आहन ने उनसे खास बातचीत की। इस बातचीत में गणपत तेली और मीनाक्षी भी शामिल रहे। यह लंबी बातचीत अगस्त 2016 में की गई थी।]

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प्रो. मैनेजर पाण्डेय

प्रो. पाण्डेय, आपसे बातचीत की शुरुआत हम लोग एक अहं मुद्दे से करना चाहते हैं। हम सब जानते हैं कि आप सिर्फ साहित्य में नहीं हैं, इसलिए एक चिंतक के रूप में आपकी जिन विषयों पर पकड़ है, उन पर हम बात करना चाहते हैं। पहली बात तो यही कि आज के समय में मार्क्सवाद को आप किस रूप में देखते हैं। आम तौर पर राजनीतिक पार्टियों की हालत देखकर ऐसा लगता है कि भारत में मार्क्सवादी राजनीति खत्म हो रही है। जो पार्टियाँ हैं भी, वे परंपराओं में फँसी हुई हैं। पारिस्थितिकि, तकनीक, संस्कृति और धर्म के मुद्दे पर मार्क्सवाद का पुराना हस्तक्षेप अप्रासंगिक लगता है, खासकर भारत के संदर्भ में। आप इस पर क्या सोचते हैं?

 

सोवियत संघ के विघटन और वहाँ की समाजवादी व्यवस्था के अंत के बाद प्राय: दुनिया में यह कहा जाने लगा कि मार्क्सवाद का ही अंत हो गया है। इस संदर्भ में मैं तीन बाते कहना चाहता हूँ। मार्क्सवाद बुनियादी तौर पर समाज को समझने का एक सिद्धांत है, दूसरे स्तर पर वह समाज को बदलने का सिद्धांत है, तीसरे स्तर पर वह केवल समाज ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण संसार (प्रकृति, संस्कृति और समाज सहित) को देखने का सिद्धांत और दृष्टिकोण है। सोवियत संघ में समाजवादी व्यवस्था के विध्वंस के बाद पूँजीवाद के विजयी उन्माद से उसकी विचारधारा के रूप में आधुनिकतावाद के तरह-तरह के सिद्धांत भी सामने आए। उसी में तीन बातों की विभिन्न संदर्भों में चर्चा होने लगी. एक, उत्तर; दूसरा, अंत और तीसरा, मौत अर्थात इतिहास का अंत। समाजवादी व्यवस्था के विनाश के बाद फाकोयामा ने ‘एन्ड ऑफ हिस्ट्री’ की घोषणा यह मानकर की कि अब समाजवाद का कोई भविष्य नहीं है। यहाँ इतिहास के अंत से उनका मतलब पूरे समाज के इतिहास का अंत नहीं था। समाजवाद के अंत को ही उन्होंने इतिहास का अंत बताया। लेकिन संसार के समस्त सिद्धांतकारों की प्रवृत्ति प्रभाव को ज्यादा व्यापक बनाने के लिए छोटी बात को बड़ी बात बनाकर कहना सुविधापरक लगता है। फाकोयामा को भी ज्ञात था कि न इतिहास चिंतन का अंत हुआ है, न समाज के इतिहास का। समाजवाद का अंत दिखाई दे रहा है। इसके साथ ही पूँजीवाद के भविष्य को ही उन्होंने मानव समाज का भविष्य घोषित कर दिया। इस प्रसंग में मुझे सात्र का कथन याद आता है, उन्होंने कहीं लिखा था. ‘जब तक दुनिया में पूँजीवाद है, तब तक मार्क्सवाद और समाजवाद दोनों की जरूरत बनी रहेगी’। बल्कि उन्होंने तो यह भी कहा कि जब यथार्थ ही मार्क्सवादी या समाजवादी हो गया हो, तो मैं उसका समर्थन नहीं करूंगा तो किसका करूंगा। इसलिए पूँजीवाद में मनुष्य के शोषण, दमन, दुर्गति और पराधीनता का विरोध करने के लिए मार्क्सवादी होने की आवश्यकता नहीं है, केवल मानवीय होना काफी है लेकिन मार्क्सवाद इससे जुड़ता है। इसलिए मैं तो यह नहीं मानता कि समाजवाद का अंत हो गया है या मार्क्सवाद का अंत हो गया है। दूसरी बात, मार्क्सवाद के सामने यह संकट भीषण जरूर है पर ऐसा नहीं है कि मार्क्सवाद या समाजवाद के सामने इससे पहले संकट आए ही नहीं हो। आपको याद होगा सन् 1871 में पेरिस कम्यून बना था, फिर उसका अंत हो गया। वह पहली समाजवादी क्रांति या व्यवस्था थी, जो अल्पकालिक थी और जिसका अंत हुआ। एक संकट यह भी था। इस बार जो सोवियत संघ में जो हुआ और उसके कुछ दिनों बाद चीन में भी व्यवस्था का परिवर्तन हुआ। अब यह नहीं मानता कि चीन में कोई समाजवादी व्यवस्था है केवल वामपंथी पार्टी का शासन है जो किसी पार्टी का शासन हो सकता है। चीन में भी पूँजीवाद की ही पुनःस्थापना हुई है। तो यह समस्या और संकट तो है।

आप मार्क्सवाद को मूलतः मानवतावाद की तरह देखते हैं। मानवतावाद का बहुत बड़ा फलक है, इसमें गाँधी, अंबेडकर, मार्क्स सभी आ जाते हैं लेकिन गाँधी और मार्क्स को क्या एक साथ रखा जा सकता है?

मैं जिस मार्क्सवाद की भारत में कल्पना करता हूँ, उसमें गाँधी और अंबेडकर दोनों के विचारों का समावेश चाहता हूँ, और आवश्यक मानता हूँ। भारत की कम्युनिस्ट पार्टियों और वामपंथी आंदोलन की दुर्गति का एक कारण यह भी है कि उन्होंने न गाँधी से कुछ सीखा, न अंबेडकर से।  गांधी की सफलता का कारण भारतीय स्वाधीनता आंदोलन केवल राजनीतिक दृष्टिकोण के कारण नहीं है। गाँधी के आंदोलन का एक बड़ा पक्ष था- सामाजिक आंदोलन। भारत की कम्युनिस्ट पार्टी ने सामाजिक समस्याओं की चिंता कभी नहीं की, बल्कि दूसरों ने गांधी के सामाजिक आंदोलन और दृष्टिकोण से कुछ सीखाए पर हिंदुस्तान के मार्क्सवादियों ने कुछ नहीं सीखा, वे केवल एक दिशा- राजनैतिक आंदोलन एवं राजनैतिक दिशा- को ही महत्त्वपूर्ण मानते रहे। यदि सामाजिक आंदोलन को भी महत्त्वपूर्ण मानते तो वे कुछ और व्यापक हुए होते। मार्क्स ने 1871 के पेरिस कम्यून की असफलता के बाद का कहा था- ‘क्रांति केवल एक पार्टी नहीं कर सकती बल्कि पूरा राष्ट्र क्रांति करता है।’ जबकि हमारे यहाँ वामपंथी आंदोलन का मतलब कम्युनिस्ट पार्टी का आंदोलन हो गया जबकि मार्क्स ने कहा था कि क्रांति पूरा राष्ट्र करता है। वामपंथी आंदोलन का दायित्व था कि पूरे राष्ट्र को उसके लिए तैयार करे। राष्ट्र को तैयार करने के लिए भारत में राजनीति के साथ-साथ सामाजिक समस्याओं को लेना बहुत जरूरी थाए जो कि भारत की कम्युनिस्ट पार्टियों ने नहीं लिया। इस प्रसंग में अंबेडकर को इसलिए शामिल करना आवश्यक है क्योंकि अंबेडकर ने भारत के दलितों के विषय में बहुत ज़रूरी और बुनियादी सवाल उठाए। अंबेडकर मूलतः फ्रांसीसी राज्य क्रांति के तीनों नारों- स्वतंत्रता, समता और भाईचारे- को कई बार अपने लेखन में दोहराते हैं। ये तीनों नारें ऐसे हैं कि एक के बिना दूसरा हो ही नहीं सकता। अर्थात, स्वतंत्रता न हो, तो समता का कोई अर्थ नहीं है और समता जिनके बीच नहीं होगी, उनके बीच भाईचारा कैसे संभव है! अभिप्राय यह है जो भारत के दलित समुदाय की समस्याओं पर भारत के वामपंथियों ने उस समय गंभीरता से ध्यान नहीं दिया। जुलाई 1947 श्रीपाद अमृत डांगे अज़ादी के संदर्भ में सलाह करने सोवियत संघ गए थे। वहाँ के नेता जादानोव ने उनसे बातचीत में कहा था कि, ‘हमें लगता है कि जाति व्यवस्था के अवशेषों को समाप्त किए बिना समाजवाद की दिशा में आगे बढ़ना असंभव है क्योंकि जाति व्यवस्था मजदूरों को वर्गीय आधार पर संगठित होने में बाधक है। वह जातीय भावनाएँ जगाती है। हम समझते है कि यह जाति व्यवस्था भारतीय समाज का सबसे प्रतिक्रियावादी पक्ष है और भारतीय कम्युनिस्टों के सामने सबसे बड़ी कठिनाई।’ लेकिन सन् 1947 से लेकर लगभग 1987 तक किसी भारत की वामपंथी पार्टी ने इस समस्या पर विचार नहीं किया, जिसकी ओर अंबेडकर पूरे भारत का ध्यान आकर्षित कर रहे थे। इसलिए मेरी समझ यह है कि भारत में वामपंथ या समाजवाद दिशा में आगे बढ़ने के लिए वर्ग के साथ-साथ वर्ण के सवाल रखना, समझना और उसके विरुद्ध विचार और व्यवहार में संघर्ष करना अत्यंत आवश्यक है। जाति व्यवस्था के अंत के बिना भारत में समाजवाद तो नहीं ही आएगा, लोकतंत्र बच पाएगा या नहीं इसमें मुझे संदेह होता है क्योंकि जातिव्यवस्था बुनियादी तौर पर लोकतंत्र विरोधी व्यवस्था है। जाति व्यवस्था का स्थायीभाव भेदभाव है। इसलिए भारतीय वामपंथ को गाँधी और अंबेडकर से सीखने की आवश्यकता है।

यहाँ तीन सवाल सामने आते हैं: एक, गाँधी से मूलतः क्या सीखने की जरूरत है क्योंकि लोग कहते हैं कि गाँधी ने वर्णव्यवस्था का समर्थन किया। दूसरा, गाँधी के पूरे राजनैतिक मॉडल में आध्यात्मिकता की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। धर्म को जिस प्रकार से मार्क्सवाद समझता है उस तरह से गाँधी नहीं समझते! तीसरी समस्या यह है कि मार्क्सवाद एक वस्तुनिष्ठ विश्लेषण है और गाँधीवाद आत्मनिष्ठ विश्लेषण है। इन मुद्दों के संदर्भ में यह संवाद कैसे स्थापित किया जा सकता है?

आप गांधी के कमजोर पक्षों को सामने रखकर मार्क्सवाद से उसका सामना कराना चाहते हैं। आपके सवाल के आखिरी हिस्से से ही मैं शुरू करना चाहता हूँ। मार्क्सवाद निश्चित रूप से वस्तुनिष्ठ विश्लेषण समाज का करता है लेकिन समाज में व्यक्ति भी होते हैं और समाज को बदलने के लिए बदलने का सपना देखना जरूरी है। समस्त संसार के क्रांतिकारी जो समाजवाद से जुड़े हुए थे, वे स्वप्नदर्शी भी थे। यह शुद्ध आत्मनिष्ठ या वैयक्तिगत मामला है। उसके बिना दूसरों के लिए अपनी शहादत देने की तैयार व्यक्तिगत स्तर पर ही होती है तभी वह सामाजिक-राजनीति स्तर पर भी होती है। ऐसा नहीं है कि समाजवाद में आत्मनिष्ठता की संभावना ही नहीं है। जो समाजवाद की धारणा स्टालिन के बाद और भारत में है उसमें जरूर इसकी गुंजाइश मुझे नहीं दिखती। मैं इसको कोई आदर्श भी नहीं मानता। मैं भारत की वामपंथी पार्टियों और समाजवादी धारणा को अपर्याप्त समझता हूँ। दूसरा, वर्णव्यवस्था का गाँधी ने समर्थन किया था, जाति व्यवस्था का नहीं। गांधी ने कहा था कि मैं थोड़ी-थोड़ी रहस्यवादी बाते करता हूँ इसलिए मेरी बातें लोगों की समझ में नहीं आती हैं। मैं गांधी को समझने की कोशिश कर रहा हूँ, डिफेंड नहीं कर रहा हूँ। गाँधी का वर्णव्यवस्था से अभिप्राय वैदिक वर्णव्यवस्था से है जिसमें वर्ण परिवर्तन संभव है पर जाति व्यवस्था में जाति परिवर्तन संभव नहीं है। इस प्रसंग में आप अंबेडकर को याद करिए। जाति व्यवस्था और वर्णव्यवस्था के मामले में अंबेडकर गांधी के पूर्ण विरोधी थे। इसलिए जाति व्यवस्था या दलितो के प्रसंग में अंबेडकर के दृष्टिकोण और समाज सुधार के प्रसंग में गाँधी के दृष्टिकोण- इन दोनों को मिलाने की आवश्यकता है। गांधी की कमजोरियों और अंबेडकर की कमजोरियों को लेने की ज़रूरत नहीं है।

अंबेडकर जाति तमाम तरह की परम्पराओं को खत्म करने बात करते हैं और अंत में बौद्ध धर्म की ओर उनका झुकाव हो जाता हैए वे बौद्ध धर्म अपना लेते, जबकि मार्क्स और गाँधी कभी ऐसा नहीं कर सकते थेए तो ऐसे में उनमें संवाद की संभावना कैसे बनती है?

अब आप अंबेडकर की कमजोरी को सामने ला रहे हैं, उनकी अच्छाई की तरफ देखिए। अंबेडकर से जाति के अंत प्रसंग को लीजिए, बौद्ध धर्म में परिवर्तन को छोड़ दीजिए क्योंकि जाति व्यवस्था के खत्म हो जाने पर उसकी जरूरत ही नहीं पड़ेगी। अंबेडकर की मूल चिंता जाति व्यवस्था के अंत की थी। चूँकि बौद्धों ने कोई जातिगत भेदभाव रखने की कोशिश नहीं की इसलिए अंबेडकर बौद्ध धर्म की ओर जाने की बात करते हैं। जाति-व्यवस्था जब खत्म हो जाएगी तो किसी के आने-जाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी। इसलिए अंबेडकर से उनके शक्तिशाली पक्ष को लेने की आवश्यकता है और गाँधी से भी। न संपूर्ण गाँधी को लेने की ज़रूरत है और न संपूर्ण अंबेडकर को…..

और न संपूर्ण मार्क्स को?

नहीं, नहीं, मार्क्स से ही जोड़ने की जरूरत है, तो मार्क्स को लेने की ज़रूरत क्यों नहीं है। इसमें यदि आपको कोई समस्या दिखाई दे रही है, तो बताइये।

गाँधी कहते थे कि हमें धर्म के साथ संवाद की जरूरत हैए उसमें परिवर्तन की जरूरत है। वे कहते हैं परेशानी यह नहीं है कि लोग धर्म का अनुसरण कर रहे हैंए परेशानी यह है कि लोग अधार्मिक हो जा रहे हैं।  उनके अनुसार आधुनिकता ने जिस तरह लोगों के अंदर से संवेदना खत्म कर दी हैए उसको हमें धर्म से पुनर्निर्मित करना है। अंबेडकर भी ष्रीलिजन ऑफ रुलष् और ष्रीलिजन ऑफ प्रिंसिपलष् कहते हैं। रीलिजन को पुनर्निर्मित करे ष्रीलिजन ऑफ प्रिंसिपलष् के साथ और रुल्स के खत्म कर दे। या जब वे मार्क्स और बुद्ध की तुलना करते है तो कहते हैं कि बुद्ध मार्क्स से एक कदम आगे हैं क्योंकि मार्क्स आर्थिक.सामाजिक समानता की बात करते हैं। बुद्ध उससे ऊपर जाकर एक आध्यात्मिकता की बात करते हैं। गाँधी और अंबेडकर में हम देखते हैं कि मुक्तिकामी धर्म की भी कल्पना है।

मैं आपको बीच रोक रहा हूँ, लेकिन मार्क्स के धर्मसंबंधी विचारों को भी ठीक से समझा नहीं गया। मार्क्स ने कहा था कि धार्मिक पीड़ा की एक तरफ वास्तविक पीड़ा की अभिव्यक्ति है, तो दूसरी तरफ उस पीड़ा के खिलाफ विद्रोह भी। धर्म पीड़ितों की आह, ह्रदयहीन दुनिया का ह्रदय और आत्मारहित परिस्थितियों की आत्मा है। उसी विश्लेषण के अंत में वे कहते हैं कि धर्म अफीम है। मार्क्स ऐसा इसलिए कहते हैं कि धर्म का उपयोग गरीबों को गरीबी भुलाने के लिए किया जाता है। मतलब हिंदुओं में इस जनम में सेवा करो, तो अगला जनम तुम्हारा सुधर जाएगा। मतलब दलितों के लिए जो कहा जाता है कि इस जनम में जूता-लात खाओ, अगला जनम सुधर जाएगा, यह अफीम हुआ कि नहीं हुआ! दूसरा, तुलसी दास ने कहा था- कादर मन का एक आधारा, देव देव आलसी पुकारा अर्थात कर्मठ व्यक्ति ईश्वर को उतना याद नहीं करता, जितना आलसी, अकर्मण्य या फिर गरीब व्यक्ति करता है। गांधी से जुड़ी एक घटना है- 1934 बिहार में बड़ा भीषण भूकंप आया था, आधा बिहार तबाह हो गया, नेपाल तक इसका असर गया था। गांधी ने कहा था कि यह हमारे पापों का परिणाम है। वो पाप कहते थे छुआछुत को, उनका दृष्टिकोण था कि यही कह कर छुआछुत मिटाएँ। उद्देश्य उनका ठीक था लेकिन जो कहा, वह अवैज्ञानिक और दिन-दुनिया से परे था। इसका जवाब दो बार लंबी टिप्पणी लिखकर प्रेमचंद ने दिया था। उन्होंने कहा कि पाप होने से भूकंप आता नहीं है, इसका एक विज्ञान है। धरती के नीचे होने वाले परिवर्तनों के कारण भूकंप आता है, पाप होने के कारण नहीं। दूसरा, तिरुहत में उस समय बहुत से मंदिर नष्ट हो गए थे और नेपाल में एक भी नहीं ध्वस्त नहीं हुआ। प्रेमचंद ने निष्कर्ष निकाला कि पराधीन देश के देवता स्वाधीन देश के देवताओं से बहुत कमजोर होते हैं, इसलिए भारत के देवता अपना घर नहीं बचा सके और नेपाल के देवताओं ने बचा लिया। प्रेमचंद को मौका मिल गया स्वाधीनता की समस्या को ले आने का। मार्क्स ने कहा था कि धर्म से संघर्ष करने के जगह लोगों को समझाने की ज़रूरत है कि वास्तविक समस्याओं का हल इससे नहीं होगा। इसलिए धर्म में केवल आत्मनिष्ठता नहीं होती, इसमें बहुत-सी वस्तुनिष्ठता भी होती है। एक महापुरुष हैं आसाराम बापू जो पिछले दो-ढाई साल से जोधपुर जेल में हैं, कितनी आत्मनिष्ठता है इसमें और कितनी वस्तुनिष्ठता इससे आप सोच लीजिए। इसलिए धर्म का मामला केवल आत्मनिष्ठ नहीं होता। हाँ, सारे धर्मों की विशेषता है कि उनमें सिद्धांत के रूप बहुत अच्छी-अच्छी बातें कही जाती हैं। बाइबिल में बहुत अच्छी-अच्छी बातें कहीं जाती है, दूसरी जगहों पर भी है लेकिन वो धर्म के नाम पर गरीबी को गौरांवित करते हैं, उसको मार्क्सवाद स्वीकार नहीं करता है। संतोष ही धर्म है! उसी संतोष से रोटी मिल जाएगी!

कई विद्वानों का कहना है कि हम समय के अंत में पहुँच रहे हैं अर्थात आधुनिकता का जो फ्रेमवर्क बना था, वो अब लगभग खत्म हो रहा है और कुछ नई अवधारणाएँ आने वाली हैं। क्या ये सोवियत संघ के विघटन के बाद ऑक्युपाई वाल स्ट्रीट जैसे आंदोलन क्या किसी नई परिघटना की ओर संकेत कर रहे हैं?

देखिए मैं इन विचारकों के रहस्यवाद पर बात नहीं करूंगा। अकबर इलाहाबादी का एक शेर है- अपना कहा आप जाने या खुदा जाने। आजकल संरचनावाद, उत्तर संरचनावाद और उत्तर आधुनिकतावाद ने जो विचार की भाषा पैदा की है वैसी भाषा भारत में तब थी जब सिद्ध और नाथ कविता लिखते थे जिसको एक आचार्य ने संधा भाषा कहा। मतलब लगभग वहीं कि कुछ समझ में आए, कुछ ना आए। मैं व्यावहारिक बात करूंगा। ऑक्युपाई वाल स्ट्रीट वाला ठोस मामला है, इसको ध्यान में रखें। मतलब यह है कि समाज पूँजीवाद के वर्तमान से पीड़ित है। परिवर्तन की बैचेनी उसके मन में है इसलिए ‘1 प्रतिशत बनाम 99 प्रतिशत’ वाल स्ट्रीट का नारा था। एक प्रतिशत लोगों ने दुनिया की सारी संपत्ति पर कब्जा कर रखा है और बाकी लोग मर रहे हैं- इसी का विरोध था। वह एक तरह से परिवर्तन की आकांक्षा की अभिव्यक्ति थी। उसके अलावा स्पेन, इस्राइल, यूनान आदि में भी यह हुआ। गरीब का दुख तब अधिक बढ़ जाता, तब एक व्यक्ति देखता है कि हमें रोटी भी नहीं मिल रही है और अमुक का कुत्ता पूड़ी खा रहा था। यही ऑक्युपाई वाल स्ट्रीट में था। आपको याद होगा कि समस्त यूरोप में पूँजीवाद के विजय के उन्माद के बीच आऑस्ट्रेरिटी मेजर्स के तहत लोक कल्याणकारी कार्यक्रम समाप्त कर दिए गए। भारत में भी यह साफ दिखाई दे रहा है कि पूँजीपतियों के अरबों के कर और ऋण माफ किए जा रहे हैं और किसान 1.2 लाख कर्ज के लिए आत्महत्या कर रहे हैं। तो परिवर्तन की बेचैनी पूरी दुनिया में हैं और पूँजीवाद के अतिवाद से सारी दुनिया परेशान है। मैं इसका यह अर्थ लेता हूँ, झिझेक की तरह टाइम बदल गया या आधुनिकता खत्म हो गई नहीं। उत्तर आधुनिकतावाद आधुनिकता का विस्तार है। उत्तर आधुनिकतावादी अपने को चाहे जितना क्रांतिकारी समझे, ये सभी समस्याएँ आधुनिकता में विश्लेषित होती रहीं हैं। कुछ नारे नए हैं- उत्तर, अंत और मौत। सोवियत संघ के विघटन के पहले डेनियल बेल ने ‘एण्ड ऑफ आइडियोलोजी’ नामक ग्रंथ लिखा। यह पूँजीवाद के लिए समाजवाद के विरुद्ध एटम बम था। समाजवादी विचारधारा का अंत हो गया लेकिन उत्तर आधुनिकता विचारधारा नहीं है क्या! इसलिए एन्ड ऑफ आइडियोलोजी का मतलब  समाजवादी विचारधारा का अंत है, विचारधारा का अंत नहीं।

prof-mainejar-panday12017 में रूस की अक्टूबर क्रांति के सौ वर्ष पूरे हो रहे हैं। पिछले सौ सालों में इस सफरनामे का मूल्यांकन आप कैसे करेंगे? भविष्य में मार्क्सवाद का स्वरूप कैसा होगा?

क्रांति के सौ साल का महत्त्व यह है कि उसने सारी दुनिया को शिक्षा दी कि समाज बदल सकता है और मजदूरों-किसानों की दशा सुधारी जा सकती है। अब सुधार की प्रक्रिया में वहाँ विनाश भी हुआ, जिसका सब गुणगान करते हैं किंतु सुधार का गुणगान कोई नहीं करता। दुनिया भर से सोवियत संघ जाने वाले विचारकों-लेखकों ने बेहतरी के बारे में लिखा है। रवीन्द्रनाथ टैगोर समाजवादी नहीं थे लेकिन उन्होंने वहाँ से अपने पत्रों से पता चलता है कि सोवियत रूस में साधारण लोगों की बेहतरी के जो काम हुए थे, उससे टैगोर बहुत प्रभावित थे। सोवियत क्रांति से दो बातें जुड़ी थी. एक, समाज का परिवर्तन संभव है; और दूसरा, जन साधारण की बेहतरी हो सकती है, अगर समाजवाद ठीक से लागू हो तो, जो कि मार्क्स का यूटोपिया था। इसमें मार्क्स की दो ही बातें मूल हैं- एक, वर्गों का अंत होना चाहिए, इसमें सर्वहारा वर्ग का अंत भी शामिल है, केवल पूंजीपति वर्ग का नहीं। दो, राज्य दमनकारी तंत्र नहीं होगा लेकिन सोवियत रूस में इसका ठीक उल्टा हो गया। भारत में एक वामपंथी लेखक हैं- परेश चट्टोपाध्याय, वे मानते ही नहीं कि सोवियत संघ का समाज मार्क्स के अनुसार समाज नहीं था। प्रो. रणधीर सिंह ने भी कहा कि हमें मार्क्स की ओर लौटना होगा। मार्क्स यूनानी मिथक प्रोविथियस को संत और शहीद दोनों मानते हैं, मार्क्स पर एक पत्रिका ने उन्हें प्रोविथियस की तरह ही दिखाया। दरअसल, मार्क्स समस्त कठिनाईयाँ सह कर अपना चिंतन, विचार और संघर्ष जारी रखे हुए थे। सारी समस्या यह है कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टियों के नेता स्वयं मार्क्स के जीवनानुभव कठिनाई, पीड़ा, यातना आदि से सीखने को तैयार नहीं है।

समय बदलने की बात इस संदर्भ में की जा रही है कि जो मीमांसा आधुनिकता के साथ आई थी, उसमें मस्तिष्क और शरीर में एक द्वैत पैदा किया गया, जिसे काटेजन ड्यूलिज्म कहते है, जिससे पूरा विज्ञान विकसित हो पाया या न्यूट्रोनियन फिजिक्स ने कहा कि शरीर एक मशीन है और उसके कारण राज्य की परिकल्पना बनी। हॉब्स, लॉक भी उसे मशीन की तरह देखने लगे। समाज को समझने के इस समस्त दृष्टिकोण से दया, करुणा जैसी चीजों को बाहर निकाल दिया। गाँधी, अंबेडकर इसे रिक्लेम करने की कोशिश करते हैं और मार्क्स का भी जो अलगाव का अध्ययन है, वह इसे रिक्लेम करने की कोशिश करता है लेकिन उस समय अवधि की मुख्यधारा के चिंतन से समाज की समस्या आदि से इन चीजों को बाहर रखा गया। इसलिए समय बदलने की बात करने वाले लोग कह रहे हैं कि अब उस द्वैत से बाहर जाने की ज़रूरत है। बुद्धि-शरीर की ड्यूलिटी जिस विज्ञान मींमासा ने पैदा किया था उस ज्ञान मीमासा का अंत हो गया है। और, कॉन्टीनेन्टल फिलोसोफर्स हार्ट, नीत्से आदि ने जो कहाए अब लोगों का ध्यान उस पर जा रहा है। जैसे स्त्रीवादी विचारधारा भी संवेदनाओं और भावनाओं को मानव स्वभाव का हिस्सा मानती है कि यदि हम रीजनिंग (तार्किकता) के आधार पर समाज को समझने की कोशिश करेंगे तो हमारी समझ अधूरी रहेगी। यह एक दृष्टिकोण में परिवर्तन हो रहा हैए जिसका प्रभाव साहित्य या समाजशास्त्र में देखने को मिलता है….

मैं तो ठीक इसका उल्टा कहता हूँ कि साहित्य पर इनका प्रभाव पड़ने के बदले, साहित्य उन लोगों पर प्रभाव डाल रहा है। एक और महत्त्वपूर्ण बात यह है कि पश्चिम में जब आधुनिकतावाद उभार पर था, तब वहाँ सभी वैज्ञानिकों और सिद्धांतकारों के साथ-साथ साहित्य और साहित्यकार था। समस्त स्वच्छंदतावादी आंदोलन उसी समय का है। जर्मनी में थोड़ा पहले शुरू हुआ, अंग्रेजी में थोड़ा बाद में आया लेकिन आधुनिकतावाद को स्थापित करने वाले दौर में ही शैली, कीट्स, वर्ड्सवर्थ आदि थे, जो सब भावनाओं को ही महत्त्व दे रहे थे। वैज्ञानिक विवेक को महत्त्व दे रहे थे। माना दार्शनिक भी दे रहे थे किंतु साहित्यकार तब भी संवेदनाओं और भावनाओं को महत्त्व देते थे। उदाहरण के लिए शैली ने मजदूरों को ललकारते हुए एक कविता लिखी थी कि- ये (पूंजीपति) मुट्ठी भर हैं और तुम असंख्य हो। अपनी ताकत को समझो। ये भावना ही है, विवेक नहीं। ये विवेक और भावना का द्वंद्व एक तरह से विज्ञान बनाम साहित्य का द्वंद्व है। ये कोई नया नहीं है, हमेशा से हैं। ग्राम्शी ने कहा था कि सभी व्यक्ति बौद्धिक हैं। अब जो हल चलाता है, वह बुद्धि नहीं रखेगा तो खेत में चलाने की बजाय पैर में चला लेगा। इसलिए सामान्य मनुष्य भी विवेक का उपयोग करता है। इसलिए विवेक और भावना मनुष्य की बुनियाद प्रवृत्तियाँ है, कोई उससे कभी भी मुक्त नहीं रहा है। होता क्या है, जो लोग जिस सोच को स्थापित करना चाहते हैं, उसी को ब्रह्म की तरह भारतीय दर्शन के सर्वव्यापक घोषित कर देंगे और दूसरे को खारिज कर देंगे। उत्तर आधुनिकतावाद द्वारा विवेक को खारिज करने का क्या परिणाम हुआ, मैंने बहुत पहले एक लेख लिखा था- ‘उत्तर आधुनिक समय में मध्ययुगीनता की वापसी’।  मनुष्य के जीने-काम करने के लिए कुछ भी दो ही होते हैं। विवेक नहीं होगा तो आस्था होगी। आस्था के कारण ही आप देखिए कि पूरी दुनिया में आस्थावाद की बाढ़ आई हुई है। इसी आस्थावाद से तरह-तरह की कट्टरता बढ़ रही है।

वर्तमान में चल रहे सामाजिक-राजनीतिक आंदोलनों को आप कैसे विश्लेषित करते हैं?

सभी को मालूम है कि इस देश में अब तक साढ़े तीन लाख से ज्यादा किसानों ने आत्महत्या की। हिंदुस्तान के इतिहास में अब से पहले यह कभी नहीं हुआ। यहाँ तक कि अंग्रेजी राज के जमाने में भी नहीं हुआ जबकि उस काल में करोड़ों लोग मरते थे। लेकिन मजबूरी में मौत होना और आत्महत्या करने में बुनियादी फर्क है। मुझे नहीं पता कि दुनिया के किसी देश में साढ़े तीन लाख लोगों ने आत्महत्या की हो लेकिन हिंदुस्तान की तथाकथित वामपंथी पार्टियों ने किसानों का कोई बड़ा आंदोलन पिछले 20 वर्षों में नहीं किया। हिंदुस्तान के वामपंथी पार्टियों की सबसे बड़ी दुर्गति दो कारणों से है। एक, प्राय: उनका जन आंदोलनों से दूर रहना और दूसरा, किसी और के आंदोलन का समर्थन प्राय: नहीं करना। जैसे आदिवासियों के विस्थापन के मुद्दे पर मेधा पाटकर का आंदोलन हिंदुस्तान का बहुत महत्त्वपूर्ण आंदोलन है, उसका समर्थन ये कम्युनिस्ट पार्टियाँ नहीं करती और स्वयं भी आंदोलन नहीं करती। ऐसे में, विनाश नहीं तो विकास कहाँ से होगा? इसलिए आंदोलन तरह-तरह के नहीं हो रहे हैं, बहुत सीमित है। सबको मालूम है पर्यावरण के विनाश में सबसे बड़ी भूमिका पूँजीवाद की है लेकिन चूँकि प्रत्येक पार्टी में पूँजीवाद को स्वीकार कर लिया गया है इसलिए पर्यावरण विनाश के खिलाफ आवाज़ उठाने को सरकार और राजनीतिक दल विकास विरोधी कहते हैं। मुझे नागार्जुन की एक कविता याद आ रही है- तुम पानी में आग लगाओ, नदियाँ बदला ले ही लेंगी। उत्तराखंड में यहीं सब हुआ। इसलिए पूँजीवादी विकास के नाम पर जो विनाश की प्रक्रिया है, उस पर भी समाजवादियों को ध्यान देना चाहिए। अब स्त्रियों की स्वाधीनता का सवाल भी लीजिए। भारत में अभी यह कुल मिलाकर मध्य शहरी पढ़ी-लिखी औरतों का मामला बनकर रह गया है। महादेवी वर्मा ने सन् 1935 के आसपास ‘चाँद’ पत्रिका में कुछ लेख लिखे थे, जो सन् 1942 में ‘श्रृंखला की कड़ियाँ’ नामक शीर्षक पुस्तक में संकलित हैं। इसमें उन्होंने गाँव की स्त्रियों, किसान-मजदूर औरतों की समस्याओं पर भी ध्यान दिया। लेकिन कोई स्त्रीवादी उन पर खास ध्यान नहीं देते हैं। यह कौन-सा स्त्री-विमर्श है जिसमें अकेले स्वतंत्रता मिलनी चाहिए? आंदोलन जब इतने व्यक्तिपरक होंगे तो उन्हें आंदोलन नहीं कहा जाएगा। आंदोलन का होने का मतलब ही है सामाजिक होना और वह जितना व्यापक होगा उतना ही प्रभावशाली होगा। यह बात पर्यावरण, जल संरक्षण, स्त्री-विमर्श आदि समस्त आंदोलनों पर लागू होती है।

मध्यकालीन भारत, ईरान और मध्य-एशिया में सूफी और भक्ति आंदोलन के उदय के पीछे क्या कारण देखते हैं?

इसके मुख्यतः तीन कारण मुझे दिखाई पड़ते हैं। संसार भर का सूफी काव्य (बाहरी और हिंदुस्तानी) स्थानीय भाषाओं में लिखा गया। हिंदी के सूफी कवियों ने अधिकांशतः अवधी में लिखा। मुल्ला दाऊद से शुरू करके जायसी, कुतुबन, मंझन आदि सभी अवधी के कवि थे या ब्रज भाषा के। तो एक यह स्थानीयता। दूसरा, इस्लाम में मुल्ला-मौलवियों के जोर से जो कट्टरता थी, वे उससे समाज को मुक्त करके प्रेम के रास्ते पर ले चलने का दर्शन है- सूफी दर्शन। उनका कहना है- इश्क-ए-मज़ाज़ी से इश्क-ए-हकीकी की ओर जाना। तीसरा, उनका ईश्वर किसी से कोई भेदभाव नहीं करता था। जो प्रेम के मार्ग में आए, वही सूफी है और वही मनुष्य है। जायसी की पंक्ति है कि ‘मानुष प्रेम भयऊँ बैकुण्ठी, नहि त काह छार एक मुठी’ अर्थात मनुष्य प्रेम के कारण स्वर्गीय बनता है, नहीं तो एक मुट्ठी राख के सिवाय क्या है वह। इस तरह से सूफी काव्य और उनका दर्शन परम मानवतावादी दर्शन है। उसमें सभी का स्वागत है, उसमें हिंदु-मुस्लिम इस्लाम की जकड़बंदी नहीं है। सूफियों में अनेक शहीद हुए। उसके प्रमाण इतिहास में मौजूद है। इसीलिए चूँकि कृष्णभक्ति में प्रेम का महत्त्व बहुत है, अनेक मुसलमान कवि केवल कृष्णभक्ति में ही आए।

दाराशिकोह में आपकी रूचि कैसी पैदा हुई?

बहुत पहले लाहौर से छपने वाली एक उर्दू की पत्रिका में प्रेमचंद की कहानी ‘दारा का दरबार’ पढ़ी। प्रेमचंद के संग्रहों में यह कहानी नहीं है। ‘दारा के दरबार’ में हिंदू, ईसाई सभी अलग-अलग मजहबों के लोग मिलकर आपस में जीवन, धर्म आदि समस्याओं पर बहस कर रहे थे। यह कहानी पढ़कर लगा कि दारा यदि प्रेमचंद को प्रभावित कर सकता है तो उसके बारे में खोजबीन करनी चाहिए। इसके बाद सन् 1943 में रामविलास शर्मा ने दाराशिकोह पर लंबी कविता इसी शीर्षक से लिखी। चूँकि प्रेमचंद के समाज और दृष्टि को अधिक प्रमाणित माना जाता है, इसलिए यह प्रमाणित हुआ कि दारा केवल उदार दृष्टिकोण का राजकुमार नहीं था, बल्कि सोचने-विचारने वाला एक आदमी था, तो उसमें मेरी दिलचस्पी जगी। मेरी रामविलास जी की कविता पढ़ी, जिसमें लगभग संक्षेप उनका जीवन, औरंगजेब की लड़ाई में उसकी पराजय और दिल्ली में बीमार, बुढ़ी, गंदी हाथिनी पर घुमाना, अपमानित करना और हत्या करवाना सब इसी में है। इससे मुझे लगा कि दारा पुराने यूनानी अर्थ में महान त्रासदी का उदात्त नायक है। मेरी दिलचस्पी के मूल स्रोत ये दोनों हैं। इसके बाद मैंने दारा शिकोह को पढ़ना शुरू किया। मुझे मालूम हुआ कि उसने एक किताब फारसी में लिखी ‘मजमा-उल-बहर्यान’, मैंने इसका अंग्रेजी अनुवाद पढ़ा, जिसे मैं एशियाटिक सोसाइटी कलकत्ते से ले आया था। इसकी भूमिका से दारा शिकोह की अन्य रचनाओं के विषय में थोड़ी बहुत जानकारी प्राप्त हुई। इतिहास में दारा शिकोह पर पहला कार्य बंगाल के यदुनाथ सरकार के शिष्य कालिकारंजन कानूनगो ने किया। इस किताब को मैं बीएचयू से लाया, जिससे बुनियादी जानकारी मिली। विक्रमजीत हसरत की लिखी दारा पर लिखी किताब भी महत्वपूर्ण है।

दारा शिकोह पहला व्यक्ति नहीं था, जो साझी संस्कृति पर काम कर रहा था, बल्कि यह एक परंपरा थी जिसमें अमीर खुसरो, अकबर, जहांगीर आदि आते हैं। इस संदर्भ में, दारा शिकोह के बौद्धिक योगदान का मूल्यांकन आप कैसे करते हैं?

देखिए अकबर से लेकर बहादूर शाह जफर तक जितने मुगल बादशाह हुए हैं, सब ब्रजभाषा में कविता लिखते थे। मैं उन कविताओं की किताब (‘मुगल बादशाहों की हिन्दी कविता’) तैयार कर रहा हूँ। अकबर के जमाने जितने मुगल शहजादे-शहजादियाँ थीं, उनको चार भाषाओं में शिक्षा दी जाती थी. पहली मुगलों की मातृभाषा तुर्की, दूसरी धर्म की भाषा अरबी, तीसरी ज्ञान और राजकाज की भाषा फारसी और चौथी स्थानीय भाषा ब्रज। दारा शिकोह भी फारसी और ब्रज दोनों में कविता लिखता था। सबसे बड़ा काम उसने यह किया कि 52 उपनिषदों का उसने फारसी में अनुवाद किया था, जिससे इनका लैटिन और फ्रांसीसी में अनुवाद हुआ। इसी से यूरोप को उपनिषदों का ज्ञान हुआ। ऑक्टिवियो पाज ने ‘इन दी लाइट ऑफ इंडिया’ में यह हवाला दिया किया दारा शिकोह के अनुवाद के अनुवाद से ही यूरोप में उपनिषदों के दर्शन का ज्ञान हुआ। इसलिए मैं दारा शिकोह को भारतीय दर्शन और संस्कृत को पश्चिम में पहुँचाने वाला राजदूत मानता हूँ । वह स्वयं कादरी समुदाय का सूफी भी था। बहुत बड़ा बौद्धिक काम है उसका।

दारा शिकोह ने फारसी में प्रथम महत्त्वपूर्ण पुस्तक लिखी जिसका शीर्षक ‘समुद्रों का संगम’ हैं, उसका मूल विचार यह है कि इस्लाम और हिंदू धर्म दोनों समुद्र हैं, इन दोनों के बीच संगम होना चाहिए। दो साल बाद उसने इस पुस्तक का संस्कृत में ‘समुद्र संगम’ शीर्षक से अनुवाद किया। दारा के गुरू पंडितराज जगन्नाथ थे, जो संस्कृत के महान विद्वान थे और काव्यशास्त्र के आखिरी आचार्य माने जाते हैं। उनके गुरू कविन्द्राचार्य भी शाहजहाँ के दरबार में रहे थे। मूल बात यह है कि आप ने जो नाम लियेए उनमें से कोई अपने काम से शहीद नहीं हुआ, शहीद सिर्फ दारा हुआ। औरंगजेब जब गद्दी पर बैठ चुका था, तब दारा धोखे से पकड़ा गया। औरंगजेब दुविधा में था कि दारा को मारे या न मारे, तो उसके सलाहाकारों और रोशनआराँ ने कहा कि इसे जीवित छॊड़ोगे तो गद्दी पर नहीं रह पाओगे। तो दारा को मारने के बहाने के रूप में मुल्लाओं ने इस किताब को पेश किया कि यह किताब इस्लाम के बराबर हिंदू धर्म मानती है इसलिए यह कूफ्र है। इसी आधार पर दारा की मौत का फतवा जारी किया गया। यह सब काम करते समय दारा शिकोह इसके खतरे जानता था।

आप साहित्य को कैसे परिभाषित करेंगे?

साहित्य शब्द और संसार के बीच विभिन्न तरह के संबंधों की अभिव्यक्ति है। साहित्य की जो एक हजार परिभाषाएँ अच्छी-बुरी दी गई हैं, मैं उनके बारे में बात नहीं कर रहा हूँ। मैं जितना समझ रहा हूँ उसके बारे में बात कर रहा हूँ कि साहित्य शब्द और संसार के बीच मुख्य रूप तीन प्रकार के संबंधों की अभिव्यक्ति हैं. भावात्मक, बौद्धिक और कल्पना जन्य संबंध । मूलतः यही साहित्य है। अर्थ यह है कि शब्द के बिना साहित्य संभव नहीं है। शब्द को विस्तृत कीजिए तो भाषा है। भाषा के बिना साहित्य संभव नहीं है लेकिन संसार से संबंध के बिना भाषा और शब्द का भी कोई अर्थ नहीं है। मेरे हिसाब से शब्द का अर्थ से, अर्थ का संवेदना से, संवेदना का अनुभव से, अनुभव का यथार्थ से और यथार्थ का ऐतिहासिक परिस्थितियों से जो संबंध होता है, उसी से भाषा का स्वरूप निर्मित होता है और साहित्य में इन सब चीजों की अभिव्यक्ति होती है। दूसरी बात मैं यह कहना चाहता हूँ कि साहित्य मूलतः मनुष्य की स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति है और उसमें स्वतंत्रता के साथ या पक्ष में खड़ा होने की प्रवृत्ति भी है। कोई व्यक्ति जब साहित्य लिखता है तो उसकी सार्थकता इसी बात में है कि जो वह चाहता है, वो लिखता है। मैं इसे संस्कृत के मुहावरे से जोड़ता हूँ कि जो कविता का संसार है, उसका रचियता कवि होता है। उसी को प्रजापति कहा गया है। इस कवि शब्द का सारे संसार की अधिकांश भाषाओं में अर्थ है- सृष्टा अर्थात निर्माता। संभवतः इसीलिए ईश्वर को अनेक नामों में से एक नाम कवि भी है। साहित्य संक्षेप में यही है। इसको विस्तार से कहे तो शब्द का अर्थ से, अर्थ का संवेदना से, संवेदना का अनुभव से, अनुभव का यथार्थ से और यथार्थ का ऐतिहासिक परिस्थितियों से जो संबंध बनता है, उसी से साहित्य का स्वरूप निर्मित होता है। इन सब चीजों के बदलने का यह परिणाम होता है कि स्वयं साहित्य बदलता रहता है। सब परिवर्तनशील है अर्थात संवेदना परिवर्तनशील है, अनुभव परिवर्तनशील होने से, अनुभव परिवर्तनशील है यथार्थ से और यथार्थ परिवर्तनशील है ऐतिहासिक संदर्भों के परिवर्तनशील होने से। इसलिए प्राचीन काल से लेकर आज के समय तक साहित्य का स्वरूप बदला रहता है। आखिरी बात मैंने जो कही उसको ध्यान में रखिए कि साहित्य मनुष्य की स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति है क्योंकि स्वतंत्रता के बिना सृजन संभव नहीं है। साथ ही वह स्वतंत्रता के पक्ष में, स्वतंत्रता के साथ साहित्य खड़ा भी होता है। ये सारे साहित्य की ये बुनियादी विशेषताएँ हैं।

साहित्य के स्वरूप के बदलाव में समाज की क्या भूमिका होती है?

मैंने साहित्य को जो स्वभाव बताया है, वह छोटे पैमाने पर भी हो सकता है। अर्थात एक प्रगीत में भी हो सकता है, वहीं बड़े पैमाने पर एक महाकाव्य में भी हो सकता है। जो बड़े पैमाने पर होगा वही काव्य होगा, बड़ी शायरी होगी। मान लीजिए आपके साहित्य की जितनी हमें जानकारी है तो शेर कहना एक सीमा में अपनी बात कहना है लेकिन शाहनामा लिखना बहुत बड़े पैमाने का मामला है। शाहनामा महान रचना होगी और एक कोई स्वतंत्र रूप से गजल कहता है, रूबाई कहता है, उसके हिस्से के रूप में चमकदार शेर कहता है तो महत्त्वपूर्ण होने के बावजूद वो शाहनामा का सामना नहीं कर सकते हैं। पर एक ओर बात का ध्यान रखिए साहित्य की दुनिया और रूप बहुत सारे कारणों से बदलते रहे हैं। प्राचीन काल में सारी दुनिया में महाकाव्य लिखे गए। स्वयं भारत में रविन्द्रनाथ टैगोर कम से कम दो को सच्चे अर्थों में महाकाव्य मानते थे- एक, रामायण और दूसरा, महाभारत। बाकि कालिदास महाकवि है, उसका महाकाव्य कहा जा सकता है, और सूर, तुलसी को तो छोड़ ही दीजिए। वास्तव में, महाकाव्य या किसी भी साहित्य रूप का एक वैचारिक आधार भी होता है। धीरे-धीरे समय और इतिहास बदलने के साथ वो वैचारिक आधार समाप्त हो जाता है, तो उसको बाद के दिनों में लिखना संभव ही नहीं हैं। साफ तौर कहूँ सारे संसार के प्राचीन साहित्य और मध्यकाल के साहित्य में दैवीय हस्तक्षेप आवश्यक होता है। उसके बिना न रामायण लिखा जा सकता था, न महाभारत। मार्क्स ने लिखा है कि जैसे यूनानी महाकाव्य होमर के ‘एलियड’ और ‘यूडिस’ का आधार यूनानी मिथक वाला है और भारत में रामायण और महाभारत का आधार भारतीय मिथक है। अब मध्यकाल के बाद इन मिथकों की सार्थकता, अस्तित्व सब समाप्त हो गया। जब आधुनिक काल में तीन चीजों का तक एक साथ विकास हुआ अर्थात तकनीक, विचारधारा और सामाजिक संरचना का बदलाव, तो इससे महाकाव्य की संभावना ही खत्म हो गई है। वैचारिकी बदलने से व्यक्ति महत्त्वपूर्ण हो गया। समस्त दुनिया में उपन्यास के लिए माना जाता है कि जिस देश और समाज में स्त्री स्वतंत्र नहीं होंगी, वहाँ उपन्यास का विकास ही नहीं हो सकता। वैसा ही हुआ भी, फ्रांस की तुलना में उपन्यास का विकास इंग्लैंड में पहले हुआ, फ्रांस में बाद में। भारत में भी यही स्थिति दिखाई देती है। दूसरा, सामन्तवाद के खत्म होने के बाद और पूँजीवाद के आने के बाद व्यक्तिवाद भी साथ-साथ आया। जाहिर है व्यक्ति महत्त्वपूर्ण हुआ। उपन्यास के पात्र देशकालबद्ध होते हैं। वे मिथकों और पुरानी कहानियों की तरह हवाई नहीं होते जैसे कि वे कभी भी हो सकते हैं और कहीं भी हो सकते हैं। गोदान के होरी का देशकाल आप उसके जीवन और संघर्ष को देखकर बता सकते हैं। संभव ही नहीं है कि अकबर के जमाने में होरी हो। होरी केवल ब्रिटिश राज में और सामन्ती जमींदारी आधार की दुनिया में ही हो सकता है। भारतीय समाज की संरचना की अलग विशेषताएँ हैं जिसमें जाति एक महा समस्या है, गोदान में भी है। प्रेमचंद सबको तोड़ रहे थे। गोदान में एक दलित स्त्री से एक पंडित का प्रेम करवाना केवल प्रेमचंद के यहाँ संभव था। महाकाव्य, गीत और कथा कहानी- ये समस्त दुनिया के तीन प्राचीनतम साहित्य रूप है। बाद के दिनों में जब गद्य, विशेषकर उपन्यास आया तो वहाँ तकनीक की भूमिका महत्त्वपूर्ण हो गई अर्थात उपन्यास मौखिक नहीं हो सकता। साहित्य की संस्कृति की भी तीन अवस्थाएँ है। शुरू में दुनिया भर का साहित्य मौखिक था, क्योंकि जब लिपि का ही विकास नहीं हुआ था तो लिखा कैसे जाता? लिपि का विकास बहुत बाद में समस्त दुनिया में बारी-बारी से हुआ। एक गीत जिसे कवि रचता था और सौ-दौ सौ-हजार लोगों को सुनाता था उसी में कुछ लोगों को याद भी रह जाता था उसी आधार पर कवि और कविता को स्मृति में लोग रखते थे। इसीलिए प्राचीन भारतीय साहित्य में दो शब्द है श्रुति और स्मृति। ये दोनों वास्तव में लिपि के अभाव से पैदा हुआ शब्द है। इसलिए वेदों को श्रुति कहा जाता है। याद करके ही लोग उनका पाठ करते थे। बाद के दिनों में जब लिखित हुआ, साहित्य-संस्कृति की दूसरी अवस्था आई तो दुनिया के सब देशों में नहीं, परंतु भारत में एक विचित्रता है। भारत को पं जवाहरलाल नेहरू से लेकर समस्त लोग कहते है कि भारत विविधताओं का देश है। मैं कहता हूँ भारत विचित्रताओं का देश है। भारत में लेखन की संस्कृति आई, तो कविता, नाटक लिखे जाने लगे। किंतु यह भी उसके साथ आया कि कौन इसको पढ़ सकता है और कौन नहीं पढ़ सकता है। अर्थात विधि निषेध भी लागू हो गया-दलित नहीं पढ़ सकते, स्त्रियाँ नहीं पढ़ सकती। तकनीक के विकास ने यह सब बदल दिया। उदाहरण के तौर पर किताब छपी चाहे वो ऋग्वेद ही क्यों न हो। किताब खरीदने के लिए आप दुकान पर गए। दुकानदार ये नहीं पूछेगा कि आप पंडित है कि दलित है। शायद किसी को यह पूछने की जरूरत तो न हो कि आप पुरुष हो कि स्त्री, वो तो स्वतः दिख ही जाएगा। वह केवल एक बात पूछेगा कि इसकी कीमत पाँच सौ, हजार या सौ रूपया है! वो आपने दिए और आप किताब ले आए। मन करे तो बस में पढ़ो, ट्रेन में पढ़ों, नहा-धो के पढ़ने की कोई शर्त नहीं है। इस तरह से तकनीक ने साहित्य की संस्कृति में लोकतंत्र लाने का काम किया।

आप किस रचना और रचनाकार को महान मानते हैं?

संस्कृत में दो महान काव्य वाल्मीकि और व्यास के हैं। इसके बाद दो और महान रचनाकार और कवि हैं- कालिदास और भवभूति। मध्यकाल में तीन-चार बड़े कवि हैं कबीरदास, सूरदास, जायसी और तुलसीदास जिन्होंने साहित्य की दिशा बदल दी। । थोड़ा पीछे जाए तो विद्यापति। ये मध्यकाल के बड़े कवि हैं। आधुनिक काल के हिंदी के प्रसंग में अनेक दृष्टियों से दिशा देने और बनाने की दृष्टि से कवि उतने नहीं है। बड़े नाटकार हैं- भारतेंदु हरिश्चंद्र। फिर छायावाद के दो कवि- प्रसाद और निराला। गद्य में जाए तो प्रेमचंद। थोड़ा आगे आए तो प्रगतिशील आंदोलन के दौर के दो बड़े कवि- नागार्जुन और मुक्तिबोध। उसके बाद के कवियों में असंख्य और अनेक है। स्त्रियों में मध्यकाल में केवल एक है मीराबाई और आधुनिक काल में अनेक महत्त्वपूर्ण है। मेरे लिए महादेवी वर्मा गद्य लेखिका के रूप में ज्यादा महत्त्वपूर्ण है यद्यपि वह छायावाद की कवियों में मानी जाती है। उन्होंने स्त्रियों की दशा-दुर्दशा के बारे में जो निबन्ध ‘श्रृंखला की कड़ियाँ’ में लिखे गए हैं, वैसी किताब भारत में लिखी ही नहीं गई। मैं तो महादेवी वर्मा को फेमिनिस्ट फिलोसोफर मानता हूँ। जिस पर एकदम किसी ने ध्यान नहीं दिया, हिंदी में भी बहुत पहले नहीं दिया गया। मैंने एक लेख लिखा था, उससे पहले थोड़ी बातें कभी अमृतराय ने लिखी थी। हिंदी के बहुत-सी स्त्रीवादी उस किताब को नहीं जानते। मैंने बहुत को सीमोन द बोउवार पढ़ने से पहले महादेवी वर्मा को पढ़ने की सलाह दी ताकि हिंदुस्तान की स्त्रियों की दशा का बोध हो सके। सीमोन द बोउवार की किताब ‘द सेकंड सेक्स’ फ्रेंच में सन् 1949 में लिखी गई। यह अंग्रेजी में सन् 1953 में आई। महादेवी जी की ‘श्रृंखला की कड़ियाँ’ के निबंध सन् 1935 में लिखे गए और सन् 1942 में तो किताब छप गई थी। पंरतु अपने यहाँ की प्रवृत्ति है कि बिना जाने-सुने ही लोग पश्चिम के लेखकों को ज्यादा महत्त्वपूर्ण मानते हैं, अपने यहाँ के लोगों को नहीं।

क्या आपको लगता है कि साहित्य और समाज का संबंध तकनीक के परिवर्तन से है या फिर और कारण है? आज के समय में साहित्य और समाज का संबंध काफी बदलता जा रहा है और ऐसा लग रहा है कि समाज पर साहित्य का प्रभाव घटता जा रहा है? आज हम न पहले की तरह किताबें देखते हैंए न पढ़ने की वैसी संस्कृति है?

देखिए, पहली बात, पहले ज्ञान और मनोरंजन दोनों का एक मात्र साधन साहित्य था। आजकल जितने बड़े पैमाने पर टेलीविजन और कंप्यूटर के माध्यम से नेट और सोशल नेटवर्किंग आ गया है कि लोगों को इन से ही फुर्सत नहीं है साहित्य की ओर जाने की। दूसरी बात, साहित्य, टेलीविजन, सोशल मीड्या, ब्लॉग आदि सब का एक बुनियादी फर्क है। साहित्य की ओर जाने के लिए थोड़ी तैयारी की जरूरत होती है अर्थात यदि साहित्य से कुछ आप पाना चाहते हो तो साहित्य भाषा का ज्ञान, बुद्धि, कल्पना इन सबकी माँग करता है। टेलीविजन में इनमें से किसी चीज की जरूरत नहीं है। निहायत ही मूर्खतापूर्ण सीरियल लोग देखते हैं। कई लोग देखकर खीजते भी है, पर कथा में आमंत्रित करने की एक अद्भुत क्षमता होती है, इसलिए देखते भी हैं और उसपे खीजते भी हैं- क्या बकवास बना रखा है? तीसरी बात, फेसबुक, ब्लॉग में लिखने की कोई जिम्मदारी नहीं है, साहित्य इसकी छूट नहीं देता है। आपको अमुक की कविता पसंद नहीं है, तो साहित्य चुनाव की सुविधा यह देता है। उनकी पसंद नहीं है, अन्य की पढ़ो, उनकी नहीं तो उनकी पढ़ों। परंतु यह नहीं कि लिखा है, उसमें स्वतंत्रता तो अर्थ लगाओ गुलामी आप। यह नहीं चल सकता, ये भाषा की प्रकृति नहीं है। इसमें साहित्य बनता-बिगड़ता है। चूँकि मनोरंजन और ज्ञान दोनों के सस्ते, सतही साधन सुलभ है, इसलिए श्रम, कल्पना और बुद्धि के साधन से साहित्य और कला की ओर जाने की लोगों की प्रवृत्ति भी नहीं है, दिलचस्पी भी नहीं है और फुर्सत भी नहीं है। इसलिए साहित्य का प्रभाव कम हुआ। साथ ही, हाल के वर्षों में साहित्य की भाषा और बनावट ऐसी हो रही है कि बहुतों की समझ में ही नहीं आती। जैसे निराला ने बहुत जटिल कविताएँ भी लिखी है और बहुत सरल भी लिखी है। आप ‘राम की शक्तिपूजा’ नहीं पढ़ सकते तो ‘तोड़ती पत्थर’ और ‘भिक्षुक’ तो पढ़ सकते हैं। यहाँ तो कवियों के पास वो गुंजाइश भी नहीं है। एक तरह की भाषा और जिसका लगभग रूप ये बन गया है कि अकबर इलाबादी जो शेर मैंने उद्धृत किया है कि- ‘उनका कहा वो आप समझे या खुदा समझे’। तो लोग काहे पढ़े और क्यों पढ़े? यह कुल मिलाकर अच्छे-बुरे लोकतंत्र का समय है। लोगों का लोकतंत्र अभी ऐसा है कि नहीं समझ में आता है तो क्यों पढ़े? क्रीम, बाम लगाकर कोई साहित्य नहीं पढ़ता। इस साहित्य की हैसियत घटने के एक नहीं अनेक कारण है। इसके बावजूद ऐसा नहीं है कि सब वीरान हो गया है। नागार्जुन की कविताएँ आंदोलन में सुनाई जाती हैं। कभी-कभी ये होता है कि अकाल में दूब पर लोगों का ध्यान नहीं जाता है। अकाल के बावजूद दूब पैदा होती है और बढ़ती रहती है परंतु लोग तो आम और पीपल का पेड़ देखेंगे कि सूखा में सूख गया इसलिए पेड़ ही अब नहीं, थोड़ा नीचे भी देखो। अर्थात यह है कि अब भी हिंदी में ऐसे कवि है जिनकी कविता में लोकतंत्र है और भाषा और रचाव में भी लोकतंत्र है। जैसे हम लोगों के परिचित कवि हैं, मदन कश्यप। मदन कश्यप की कविता में लोकतंत्र हैं। मैं उसे लोकतंत्र कहने के बदले जनतंत्र कहना पसंद करूँगा क्योंकि इस समय लोकतंत्र शब्द से मुझे बहुत चिढ़ और चिंता होती है क्योंकि लोक का विरोधी केवल परलोक होता है। लोक में मजदूर, किसान हैं, तो बिड़ला जी आदि भी लोक में ही हैं। इसलिए मैं लोकतंत्र नहीं ‘जनतंत्र’ कहता हूँ। जन का विरोधी बहुत लोग है इसके लिए परलोक जाने की जरूरत नहीं है। कविता में जनतंत्र तीन रूपों में होता है। एक, भीतर अंतर्वस्तु के रूप में जन हों, उसकी वास्तविकताएँ हों, उसकी दुविधाएँ हों और कभी-कभी उसकी सुविधाएँ भी हों। दूसरा, यह कि वह रचाव भाषा के स्तर पर साधारण पढ़े-लिखे लोगों की समझ में आने लायक हो क्योंकि आजकल कविता तो मौखिक रही नहीं, पढ़ी ही जा सकती है। उसके लिए एम.ए./ पीएच.डी. करने की जरूरत नहीं है। इसलिए मैं यह कह रहा हूँ कि कविता में जनतंत्र इन तीनों कारणों से होता है। माने उसमें जन हो, भाषा में सहजता-सुबोधता हो और रचाव या उसकी संरचना में जटिलता न हो। कुछ लोग कहते हैं कि जीवन ही जटिल है, तो कबीर, सूर या प्रेमचंद के जमाने क्या जीवन जटिल नहीं था! आज से तो ज्यादा ही जटिल था। पर वे हर बात को सरल-सुबोध तरीके से कहते थे। आज सहज-सुबोध की वह प्रवृत्ति ही गायब हो गई है। इसलिए साहित्य की समाज में पहुँच और हैसियत दोनों घटने के बहुत सारे कारण हैं।

क्या भी एक कारण है कि साहित्यकार समाज से हटकर विश्वविद्यालयों में रहने लगे हैं?

देखिए, यह सीमित रूप में है। बहुत सारे साहित्यकार हैं, जो विश्वविद्यालयों में नहीं रहते। अब विश्वविद्यालयों में छात्र-छात्राएँ थोड़े बहुत हो भी लेकिन अध्यापक बहुत कम साहित्यकार रह गए हैं। एक-आध थे, जैसे जेएनयू में केदारनाथ थे। मात्र आलोचना लिखना साहित्यकार होना नहीं है। साहित्यकार होने के लिए थोड़ा सर्जक होना चाहिए। कोई कविता, कहानी, उपन्यास लिखे, तो उसे सही अर्थों में हम साहित्यकार कहेंगे। आलोचना लिखना अध्यापकों की मजबूरी है क्योंकि उसमें प्रमोशन का एक तत्त्व जुड़ा है। किंतु लड़के-लड़कियों में आपको ऐसे मिल जाएँगे कि कुछ कविताएँ लिखते हैं, कुछ कहानियाँ भी लिखते हैं। अब आगे एक और स्थिति हो गई है कि युवा पीढ़ी के जीवन का लक्ष्य बदल गया है। पहले के जमाने में सार्थक जीवन को लोग ज्यादा महत्त्वपूर्ण मानते थे, आज के जमाने में सफल जीवन को ज्यादा महत्त्व देते हैं। सार्थकता हमेशा जीवन की सामाजिक होती है, सफलता हमेशा व्यक्तिगत होती है। ऐसे में कविता, कहानीए उपन्यास लिखने के लिए आपको अपने से बाहर जाना होगा, दस-दो सौ-दो लाख व्यक्तियों के भाव, विचार, अनुभव, तबाही, बर्बादी किसी से आपका लगाव-जुड़ाव, संवेदना ही नहीं होगी तो क्या कविता, कहानी उपन्यास लिखोगे? तब केवल प्रत्येक व्यक्ति जवानी में प्रेम की कविता लिखता है और बुढ़ापे में बैराग की। वो कविता नहीं होती है, वो उम्र की मजबूरी होती है।

पहले के जमाने में आप जिसके विशेषज्ञ है, उस भाषा में भी याद कीजिए यानी फारसी, उर्दू, हिंदी में पहले जमाने में साहित्य के व्होल टाईमर (पूर्णकालिक लेखक) हुआ करते थे। सूर, तुलसी, कबीर केवल कविता करते थे। आधुनिक काल में भी निराला, प्रसाद, प्रसाद, पंत, नागार्जुन, शमशेर, त्रिलोचन, नागर जी केवल साहित्य में व्होल टाईमर थे। आजकल लोग साहित्य को पार्ट टाईम जॉब समझते हैं। ऐसा लगाव उनका साहित्य में नहीं है, वैसा लगाव जैसा प्रेमचंद का था। प्रेमचंद अपने साहित्य को जीवन-मरण की चीज समझते थे। इसलिए उन्होंने महान साहित्य लिखा। पार्ट टाईम में न उतनी गहराई होगी, न गंभीरता होगी। उतने बड़े पैमाने पर उस तरह का साहित्य नहीं आ रहा। परंतु दुनिया में संघर्षशील समाज और देश है जैसे लैटिन अमेरिकाए 20वीं सदी का अधिकांश महान साहित्य वही लिखा गया। अफ्रीका अब संघर्षशील समाज और देश है। अमेरिका और यूरोप तो लूटेरे हैं।

साहित्य में बुनियादी तत्त्व शब्द है और शब्द समाज से आता है। हमारे यहाँ बड़े कवि हुए हैं, जैसे फारसी-उर्दू में इकबाल का नाम ले सकते हैं। हिंदी में प्रसाद-निराला हैं, बांग्ला में टैगोर हैं। ये हमारी ज्ञान परंपरा से पूरी तरह वाकिफ है। जैसे इकबाल फारसी-उर्दू के हैं लेकिन वो संस्कृत भी उन्होंने पढ़ी। हमारे पुराने ट्रेडिशन को भी बहुत नजदीकी से जानते थे। प्रसाद स्वयं फारसी भी जानते थे और वे भी हमारी एक पूरी ट्रेडिशन था। टैगोर इससे भलीभांति वाकिफ हैं। अब हमारा आजादी के बाद का जनरेशन साहित्यकारों का या पढ़े-लिखे लोगों का इस ट्रेडिशन से कटा हुआ नजर आता है। ऐसा नहीं है कि उनमें सृजनात्मक क्षमता नहीं हैं लेकिन परंपरा से कटने का जो नुकसान है, हो सकता है, उस वजह से महान साहित्य की संभावनाएँ कम हो गई हों?

आपकी बात में दम है। देखिए, बड़ी रचना परंपरा के ब्यौत और समकालीन संवेदना के टकराव से बड़ी रचना पैदा होती है। परंपरा भाषा की भी होती है, ज्ञान की भी होती है, संवेदना की भी होती है और समकालीनता की भी। इन सबमें जब टकराव होता है और रचनाकार चुनाव करता है, तभी वह नया और महत्त्वपूर्ण रचना रच सकता है। अब तो स्थिति यह है कि जो पुराने से जुड़े हुए हैं, भारत में संस्कृत जानने वाले लोग समकालीनता को नहीं जानते। समकालीन न समय को जानते है, न समाज ठीक से जानते हैं, न संवेदना जानते हैं, न सोच को जानते हैं। उनके लिए बाबा नाम केवलम- वही जपेंगे। इसके विपरीत दूसरी पीढ़ी का पुराने से कुछ लेना-देना नहीं है। वह नहीं जानती कि कालिदादस ने क्या लिखा है? और कालिदास की शंकुतला में ऐसा क्या है जिसको पढ़कर गेटे मुग्ध हो गए? इसलिए परंपरा और समकालीनता के बीच एक विभाजन पैदा हो गया है। इससे जाहिर है कि रचनाशीलता भी प्रभावित हो रही है।

यह विभाजन क्यों हुआ? क्या इसकी वजह उपनिवेशवाद है?

एक बड़ा कारण उपनिवेशवादी प्रभाव ही है। उपनिवेशवादी हस्तक्षेप की वजह से परंपरा और समकालीनता यह विभाजन पैदा हो गया। एक बौद्ध लेखक अश्वघोष ने जाति-व्यवस्था के खिलाफ ‘वज्रसूची’ नाम का बहुत महान ग्रंथ लिखा। मराठी, बांग्ला में यह पहले अनूदित हो गया, हिंदी में बहुत बाद में इसका अनुवाद हुआ, जबकि वे कनिष्क के जमाने के थे। इसे हमारे बुद्धिजीवी भूल गए, याद रह गया कि जाति-व्यवस्था के बारे में पश्चिम के किस लेखक ने क्या लिखा है। यह उपनिवेशवाद का ही प्रभाव है।

भारतीय बुद्धिजीवियों की क्या त्रासदी है? जैसे राजीव भार्गव, आशीष नंदी, पार्थ चटर्जी जैसे विद्वान पश्चिम की आलोचना करते हैं और एक दूरी तक जाते हैं, फिर वापस लौट जाते हैं। उससे आगे आलोचना करके कोई एक ऐसा विऔपनिवेशिक परिदृश्य हमारे लिए नहीं देते हैं जिससे हम पश्चिम को समझ सकें। यह मैंने (प्रो. ठाकुर) आशीष नंदी से पूछा तो उन्होंने कहा कि ‘हमें डर लगता है’….

किस बात से? कि बुलाएंगे नहीं वहाँ? यहीं न होगा।

मैंने यही बात राजीव भार्गव से पूछी कि आपने अपनी महत्वपूर्ण पहली किताब में यह सवाल उठाया कि मनुष्य बहुआयामी है, जबकि पश्चिम में किसी एक आयाम को लेकर पूरा दर्शन रचा गया। तो इससे आगे की आपकी दूसरी किताब कहाँ है! उन्होंने कहा कि मुझे कॉन्फिडेंस नहीं था लिखने का। तो यहाँ जो साहस की कमी है, जिसे मैं समझता हूँ बौद्धिक जगत में पश्चिम के स्वामी-सेवक जैसे संबंध को समझने के लिए आवश्यक है। हमारे लिए स्वामी को समझना ज़रूरी है, स्वामी हमें समझे इसकी हमें जरूरत नहीं है और हम बार-बार स्वामी से मान्यता पाने के लिए बेचैन हैं।

भारत को उपदेश देने वाले बहुत सारे बुद्धिजीवी हैं जैसे गायत्री चक्रवर्ती, होमी भाभा, दीपेश चक्रवर्ती आदि हैं, कुछ और बंगाली भी हैं, जो उत्तर-औपनिवेशिक विमर्श करते हैं, उनको मैं एनआरआईआई कहता हूँ अर्थात नॉन रेजिडेंट इंडियन इंटेलेक्चुअल्स। वे रहते अमेरिका में हैं, वहीं के अनुसार सोचते हैं, लिखते हैं, बोलते हैं और भारत वालों को उपदेश देते हैं। इस तथाकथित उत्तर-औपनिवेशिक विमर्श के नाम से ही मुझे चिढ़ है क्योंकि उत्तर-औपनिवेशिकता से जो अर्थ निकलना चाहिएए वह निकलता नहीं है। इसका अर्थ हुआ कि अब दुनिया में कहीं उपनिवेशवाद जैसा कुछ नहीं है। भारत इसको जानता है, पाकिस्तान इसको जानता है कि उपनिवेशवाद कितना उनकी हर चीज पर हावी है और बढ़ रहा है, फर्क केवल यह है कि पहले यूरोप का होता था, अब अमेरिका का होता है। एक किताब आई है पिछले दिनों विवेक छिब्बर की, उसमें उन बुद्धिजीवियों की ऐसी तेजतर्रार कुट्टमस की है कि मुझे उनकी किताब बहुत पसंद आई। वे भारतीय ज्ञान का जो थोड़ा छौंक लगाते हैं, वह केवल साख पैदा करने के लिए है।

आप 75 वर्ष के होने को जा रहे हैं। एक साहित्यिक आलोचक और मार्क्सवादी विचारक के रूप अपनी जीवन यात्रा को कैसे देखते हैं?

मेरी जीवन यात्रा एक त्रासदी के बाद दूसरी त्रासदी से उबरने में अपनी सारी क्षमता लगाने की रही है। मैं वो सारी कथा कहकर आप सब को दुखी नहीं करना चाहता। मैंने लिखने-पढ़ने की बहुत पहले योजना बनाई थी कि एक नागार्जुन पर किताब लिखूँ। जिस वर्ष मैंने उसके लगभग सौ रफ पेज लिखे, अचानक मेरे पिताजी नहर में डूबकर मर गए। इस घटना की मुझे उस दिन सूचना मिली जिस दिन इंदिरा गाँधी की हत्या हुई थी। उस दिन हम लोग गोष्ठी में गए हुए थे, शहर में हिंसक घटनाएँ होने लगी थी। शाम में तार से पता चला कि मेरे पिताजी गुज़र गए लेकिन उसी दिन सिक्ख विरोधी दंगे भी शुरू हो गए। दिल्ली के हालात भी भयावह थे। घर जा नहीं पा रहा था। मैं तीन दिन आग पर बैठा रहा। हवाई जहाज से भी नहीं जा पा रहा है, वहाँ भी आंशिक कर्फ्यू था। तीसरे चौथे दिन एक विद्यार्थी विजय शंकर चौधरी ने हिम्मत कर मुझे ट्रेन में बिठाया। घर जाने पर सब पता चला। यह सब इतना तनावपूर्ण था कि जब मैं लौटकर आया तो मुझे डायबिटिज हो गई। उसके बाद बाबा नागार्जुन की वह किताब जब भी मैं खोलता था, तो सारा दृश्य मेरे ऊपर हावी होने लगता। मैंने आज तक वह किताब नहीं लिखी। एक मेरे जीवन का दुख वह है। अब भविष्य में थोड़ी फुर्सत होने के बाद दाराशिकोह पर किताब लिखने की योजना है। उसके बाद नागार्जुन पर अगर सबकुछ ठीक रहा। इसलिए जो अधूरे काम लेखन के प्रसंग में जीवन में रह गए, वही मेरा दुख है। दूसरा दुख यह है कि हम लोग जैसा समाज के बारे में सोचते थे, जो उम्मीद करते थे, जिसके लिए लिखते-पढ़ते रहे, उसकी अब सब संभावनाएँ ही खत्म होती दिखाई दे रही है। इस प्रसंग में मुझे मुक्तिबोध की एक कविता याद आती है- ‘अब तक क्या किया-जीवन क्या जिया’ वही दशा दिखाई दे रही है। इसका दुख है कि व्यक्तिगत त्रासदी और सामाजिक-राजनीतिक त्रासदी का कुल मिलाकर दिमाग पर असर है, पर फिर भी उसको किनारे करके कुछ करता रहता हूँ। कुछ लोगों को पसंद भी आता है। संतोष का यही कारण है।

(इस बातचीत का अधिकांश हिस्सा ‘जेएनयू परिसर’ और ‘पल-प्रतिपल’ में प्रकाशित हुआ है)

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