समकालीन कहानी का लोकतंत्र: गणपत तेली

‘कहानी का लोकतंत्र’ समकालीन कहानी पर युवा आलोचक पल्लव की किताब है, जिसमें उन्होंने समकालीन हिन्दी कहानी के बहाने हमारे समय की एक मुकम्मल तस्वीर प्रस्तुत की है। इस किताब में पल्लव ने समकालीन कहानी में आ रही उन सभी संवेदनाओं का अध्ययन किया है, जिससे आज की कहानी का ताना-बाना बना है। इन संवेदनाओं में सांप्रदायिकता, दलित, स्त्री आदि हाशिये के समुदायों की पीड़ा और उनके संघर्ष, लोक की चिंताएँ, गाँव, किसानी जीवन आदि सम्मिलित हैं। इन सारी संवेदनाओं को देखने के लिये आलोचक पल्लव विचारधारा की उल्लेखनीय भूमिका मानते हैं और विचारधारा के जरिये ही उन कहानियों का मूल्यांकन करते हैं। विचारधारा और स्वायत्तता की परंपरागत बहस में उनका मत विचारधारा के पक्ष में है, लेकिन उनका मानना है कि “एक अच्छी और सार्थक कहानी वही होगी जिसमें विचारधारा रचना के भीतर बिना कोलाहल के उपस्थित हो।” (पृ. १४) विचारधारा के इस समावेशी नज़रिये के कारण ही पल्लव इस बात पर बल देते हैं कि इस युग की कहानी को समझने के लिये वर्तमान सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य को समझना ज़रूरी है।

Pallav (1)प्रस्तुत पुस्तक ‘कहानी का लोकतंत्र’ तीन भागों में विभाजित है, जिनमें कहानी से संबंधित विभिन्न मुद्‍दों पर लेख हैं। पल्लव ने समकालीन सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों को अभिव्यक्‍त करने वाली कहानियों को विश्‍लेषण के लिये चुना है। उक्‍त कहानियाँ अपनी रचनाशीलता में परंपरागत कहानियों से अलग हैं। इसी तथ्य को रेखांकित करते हुए पल्लव ने लिखा है कि “किसी भी रचनाशीलता का विकास अपनी परम्परा से टकराहट और यथार्थ के नए स्वरूप को खोज कर ही हो सकता है।“ (२९) संवेदना की व्यापकता और बदलते यथार्थ की अभिव्यक्‍ति आज की कहानी को नई रचनाशीलता की ओर ले जाती है। इसी महत्त्वपूर्ण किंतु  अलक्षित रचनाशीलता की पहचान करना आलोच्य किताब का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य है।

हमारे आज के समय में सामाजिक स्तर पर बहुत से बदलाव दृष्‍टिगोचर हो रहे हैं। चूंकि समकालीन कहानीकारों की दुनिया बहुत व्यापक है, इसलिये समकालीन हिन्दी कहानी का परिदृश्य भी बहुरंगी और विविधतायुक्‍त है। एक तरफ नये कालबोध और जीवनानुभवों पर आधारित कहानियों के लिये शिल्प में नये-नये प्रयोग किये जा रहे हैं, वहीं लगातार बदल रहे दृश्यों का कहानी में अंकन कम चुनौती भरा नहीं है। पल्लव ने समकालीन कहानी के इन विविधतायुक्‍त स्वरों का विश्‍लेषण किया है। जयनंदन, कैलाश बनवासी, हरीचरन प्रकाश, बसंत त्रिपाठी, विजेन्द्र अनिल आदि कहानीकारों ने किसानों पर कहानियाँ लिखकर उनके जीवन को चित्रित किया। इन कहानियों में चित्रित किसानों की समस्याओं और उनकी आशाओं-आकांक्षाओं को विश्लेषित करते हुए पल्लव ने लिखा है कि “१९३६ में गोदान लिखे जाने को सत्तर बरस  बीत गये हैं, गोदान अप्रासंगिक हुआ और न गाय-बैल खरीदने-पालने की आस ही पूरी हो पाई। प्रेमचंद से कैलाश बनवासी तक किसान की यह दुर्दशा जारी है।” (५२) अर्थात समाज में और कहानी में दोनों जगह पर किसानी का यथार्थ आज भी मौलिक रूप से बदला नहीं है।

इसी तरह सत्यनारायण पटेल, चरणसिंह पथिक, गौरीनाथ, एस.आर. हरनोट, अभिषेक कश्यप, विजय की कहानियों में भी किसानी जीवन और बदलते गाँवों का चित्रण है। पल्लव ने सांप्रदायिकता पर कैलाश बनवासी (सूराख, रेलगाड़ी में रीछ), स्वयं प्रकाश (‘क्या तुमने कोई सरदार भिखारी देखा है’, ‘रशीद का पाजामा’, ‘पार्टीशन’) की कहानियों का विश्‍लेषण किया। दलित जीवन पर ओम प्रकाश वाल्मीकि; स्त्री जीवन पर चित्रा मुद्गल, राजी सेठ, सुधा अरोड़ा, मृदुला गर्ग, वोल्गा, इस्मत चुगताई की कहानियां तथा व्यंग्यात्मकता पर विष्णु नागर की कहानियों का विश्‍लेषण किया। लोक जीवन पर स्वयं प्रकाश, विजयदान देथा की कहानियों का विश्‍लेषण किया है। स्वयं प्रकाश और देथा दोनों ही कथाकार लोक पर पकड़ रखते हैं।

Kahani Ka Loktantra - 1साहित्य और आलोचना के लिये पल्लव के मान प्रगतिशील है। यह इस किताब से भी अभिव्यक्त होता है। गाँव-किसान पर लिखी कहानियाँ हों, या दलित-स्त्री जीवन की कहानियाँ, पल्लव ने उनमें अभिव्यक्‍त सामंती और पूंजीवादी शोषण के प्रतिरोध को रेखांकित किया है। लोककथा पर लिखी कहानियों के विश्‍लेषण से यह और स्पष्‍ट होता है। विजयदान देथा की ‘दुविधा’ (जिस पर ‘पहेली’ फिल्म बनी) पर उन्होंने एक स्वतंत्र लेख लिखकर कहानी में स्त्री के स्व की खोज और प्रतिरोध की लोकचेतना को रेखांकित किया। स्वयं प्रकाश की ‘कानदाँव’, ‘बाबूलाल तेली की नाक’, ‘जंगल का दाह’ ‘गौरी का गुस्सा’ आदि कहानियों की विशिष्‍टताओं को भी उन्होंने प्रगतिशील नजरिये से रेखांकित किया। इसी तरह से विद्यासागर नौटियाल, पकंज बिष्‍ट, विष्णु नागर, महेश कटारे, विजय, शैलेय आदि कि कहानियों का विश्‍लेषण के केन्द्र में भी प्रगतिशीलता ही है। इस विषय में लेखक का मत स्पष्‍ट है कि “वर्गभेद, जातिवाद और सांप्रदायिकता हमारी बड़ी समस्याएँ हैं और जब तक इनका हल न हो- रचनाशीलता को इनसे जूझना होगा।” (१६) यानि कि उनके लिये प्रगतिशीलता की प्राथमिक कसौटी वर्गभेद, जातिवाद और सांप्रदायिकता का विरोधी होना है, जो आज हमारे समाज के लिये आवश्यक है।

कहानी के शिल्प के प्रसंग में उन्होंने समकालीन कहानी की एक महत्त्वपूर्ण विशिष्‍टता को रेखांकित किया, और वह है- कहानी में पाठकीय भागीदारी। यह कहानी को आकर्षक बनाए रखने की बेहतर शैली है। लेखक के अनुसार, “पाठकीय भागीदारी को बढ़ाकर ही कहानी का आकर्षण बढ़ाया जाना संभव है और यही प्रविधि चाक्षुस माध्यमों के घटाटोप वातावरण में सहित्य के प्रति पाठक का जुड़ाव रख पाएंगी।” (३६) इस प्रसंग में पल्लव ने रमेश उपाध्याय, स्वयं प्रकाश, रघुनंदन त्रिवेदी, उदय प्रकाश आदि कहानीकारों की कहानियों की चर्चा की है। वस्तुत: पाठकीय भागीदारी का आह्वान कहानी के लोकतंत्र का एक प्रमाण भी है।

लेखक के अनुसार, “कहानीकार की कला, उसकी सार्थकता यही है कि वह अपने समय की सबसे बड़ी बीमारी की पहचान करे और ठीक दुखती हुई रग को पकड़ ले।” (१३१) समकालीन कहानीकारों ने हमारी समय की समस्याओं को पहचानकर उनका चित्रण किया। इसी कसौटी के आधार पर आलोचक के लिये भी सार्थक कहानी का चुनाव चुनौती है। पल्लव ने अपने चयन में कई ऐसी महत्वपूर्ण कहानियों को शामिल किया है जो चर्चित नहीं है। ‘कहानी का लोकतंत्र’ हिन्दी कहानी में आये उन सभी वर्गों के प्रतिनिधित्व को रेखांकित करती किताब है, जो किसी भी समाज का आधार है। इसी मायने में यह किताब समकालीन कहानी की लोकतांत्रिकता को रेखांकित करती है और उक्‍त लोकतंत्र का आधार प्रगतिशीलता है। साथ ही साथ, पल्लव उन प्रवृत्तियों से आगाह भी करते हैं, जो इस लोकतंत्र के लिये आशंकाजनक है। इस तरह से यह संग्रहणीय किताब कहानी तक ही सीमित नहीं होकर उस समाज का विश्‍लेषण भी है, जिसमें समकालीन हिन्दी कहानी का निर्माण होता है।

पल्लव, कहानी का लोकतंत्र, आधार प्रकाशन, पंचकूला (हरियाणा), २०११

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