साझी विरासत, साझी अदावत!: निरंजन सहाय

 

हिंदी – उर्दू के रोचक रिश्ते को समझने के लिहाज से एक हालिया प्रकरण का उल्लेख करना मौजू लग रहा है | राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 के बाद हिन्दी की जो किताबें एन.सी.ई.आर.टी. दिल्ली ने पूरे देश के लिए बनायी थी , उसमें अनेक बदलाव किए गए थे | अब हुआ यह है कि उन हिंदी किताबों ( स्पर्श , कृतिका , क्षितिज , अंतरा आदि ) के विविध सन्दर्भों पर खुद को राष्ट्रवादी कहने वाले हिंदूवादी संगठनों ने कड़ी आपत्ति दर्ज की है | उन अनेक सन्दर्भों में, प्रसंग के अनुरूप भाषाई सन्दर्भ का यहाँ उल्लेख ज़रूरी लग रहा है | दरअसल, एक बार फिर जब नयी शिक्षा नीति के मुहाने पर देश खड़ा है , राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आनुषंगिक संगठन `शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास’ के मुखिया दीनानाथ बतरा (पूर्व प्रमुख विद्या भारती , राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) का कहना है , हिन्दी की किताबों में शामिल उर्दू के शब्द , ग़ालिब , अक्क महादेवी , मकबूल फिदा हुसैन पर आधारित पाठ हिन्दी भाषा और हिन्दू संस्कृति पर हमला हैं | जिन उर्दू शब्दों को हटाने की वकालत की गयी है , वे हैं – बेतरतीब , ताकत , इलाका , अक्सर , ईमान , बदमाश , लुच्चे – लफंगे , जोखिम , मेहमान नवाजी , कमबख्त , उल्लू कहीं का इत्यादि | उनका यह भी कहना है कि हिंदी पाठयपुस्तकों में उन सन्दर्भों का उल्लेख ज़रूर होना चाहिए जिनसे यह पता चले कि कैसे मध्यकालीन सूफी आन्दोलनों और अमीर खुसरो ने हिन्दू – मुसलमानों के बीच दरार बढ़ाने का काम किया | [1] दरअसल, शुद्धीकरण के इस हालिया सिरे की जड़ें काफी गहरी हैं |  वीरभारत तलवार ने अपनी मशहूर पुस्तक `रस्साकशी’ के अध्याय दो `इतिहास का खलनायक और हिंदी की नयी चाल’ में दो नवजागरणकालीन नायकों राजा शिवप्रसाद `सितारेहिंद’ और भारतेंदु हरिश्चन्द्र के माध्यम से हिंदी –उर्दू के दिलचस्प रिश्ते को विश्लेषित किया है | लेकिन इस मसले को  और भी बेहतरीन ढंग से समझने के लिए इसके पूर्ववृत्त को समझना आवश्यक है |

       तकरीबन दो शताब्दियों से हिन्दुस्तान की आबोहवा में घुली हिन्दी – उर्दू की इस पूरी विरासत को एक मुहावरे के माध्यम से हम समझना चाहें तो कह सकते हैं कि, यह `साझी विरासत और साझी अदावत’ का मसला है |

सितारेहिन्द बनाम भारतेंदु का पूर्ववृत्त

(प्राच्यवादी अध्ययन , भाषाई विवाद और संस्थागत वैधता का सन्दर्भ)

                                      भारत पर अपनी हुकूमत को पुख्ता करने के सिलसिले में अंग्रेजों ने भारत की भाषाई संरचना का व्यापक अध्ययन किया | वसुधा डालमिया ने अपनी पुस्तक `हिन्दू परम्पराओं का राष्ट्रीयकरण’ (राजकमल प्रकाशन , 2016)के चौथे अध्याय `हिन्दुओं की राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी’ में विभिन्न सन्दर्भों के आधार पर यह रेखांकित किया है कि कैसे भारत में फोर्ट विलियम कालेज के माध्यम से भाषाई दो फाड़ हुआ | इसके पहले तक की भाषाई स्थिति पर वसुधा जी यूल और बर्नेल के हवाले टिपण्णी करती हैं ,` जब अठारहवीं शताब्दी के आखिर में अंग्रेजों ने बंगाल , बिहार और बाद में पश्चिमोत्तर प्रांत के नाम से जाने गए इलाकों के प्रशासन की बागडोर अपने हाथों में ली तो उन्हें वहां कुछ इसी तरह के हालात मिले | हिन्दवी न तो ख़ालिस हिन्दुओं की भाषा थी और न ही नागरी में लिखी जाती थी ; न ही वह ज़्यादा शहराती उर्दू के बरक्स खालिस तौर पर ग्रामीण समाज तक सीमित थी | कस्बों में मुसलमानों का ज़्यादा बड़ा प्रतिशत था जिसके चलते दिल्ली व लखनऊ में उर्दू के दरबारी प्रयोक्ताओं और बाद में औपनिवेशिक अधिकारियों द्वारा इसके प्रयोग से इस सामान्य निष्कर्ष को लगातार बल मिला कि भद्रभाषा मुसलमानों की ग़ैर-विभेदीकृत हिन्दवी या हिन्दुस्तानी से ही हुआ था जिसको उसके नाना संस्करणों में लगभग उपमहाद्वीप में समझा जाता था प्रारम्भिक यूरोपीय प्रेक्षक व सैलानी `इन्दोस्तान’ या `मूर्स’ के नाम से दर्ज कर चुके थे |’[2] फोर्ट विलियम कालेज की स्थापना और हिंदी – उर्दू के रिश्ते को समझने के लिहाज से युवा शोधार्थी गणपत तेली का `समकालीन भारतीय साहित्य’ में `औपनिवेशिक सत्ता की भाषा नीति और हिंदी – उर्दू विवाद’ शीर्षक शोधपत्र महत्त्वपूर्ण है | दोनों भाषाओं के बीच की खाई को संस्थागत वैधता दिलाने और बढ़ाने की प्रक्रिया पर  गणपत का मत है , `हिन्दी और उर्दू विवाद को पैदा करने में अंग्रेजी उपनिवेशवाद की केवल यह भूमिका नहीं है कि उस समय राष्ट्र या राष्ट्र – राज्य के विचार यहाँ आए और इस आधार पर यहाँ हिन्दू – मुस्लिम दोनों अमुदायों ने क्रमश: हिंदी और उर्दू खुद को राष्ट्र घोषित करने में सहारे के रूप में इस्तेमाल किया | यह तो एक प्रक्रिया में हुआ ही था , लेकिन उपनिवेशवादी ताकतों द्वारा संस्थागत रूप से हिंदी और उर्दू का विभाजन किया गया | आगे मैक्डॉनल द्वारा यह भूमिका निभाये जाने से पहले गिलक्राइस्ट ने अपने अनुमानों और पूर्वाग्रहों के आधार पर फारसीनिष्ठ भाषा की जगह संस्कृत के शब्दों से युक्त हिंदी को मान्यता दी और उधर फारसीनिष्ठ शब्दों से युक्त फारसी लिपि में उर्दू को बनाया | यह पहली बार था कि हिंदी और उर्दू को इस तरह अलग-अलग भाषाओं की तरह संस्थागत वैधता प्राप्त हुई |’[3] यह एक ऐसा विभाजन था जिसने भारत की भाषा नीति को गहरे स्तर पर प्रभावित किया | भाषा नीति , गौ रक्षा और धार्मिक प्रतीकों के  राजनैतिक उपयोग की जो बिसातें बिछाई गईं उसने दो तरह की राष्ट्रीयताओं को जन्म दिया | यह सही है कि औपनिवेशिक शासन व्यवस्था ने सुगम शासन संचालन के लिए जिन विभिन्न पक्षों , जैसे – पाठक्रम , सर्वेक्षण , गजट , जनगणना पर काम किया उनका सर्वाधिक दुखद पक्ष यह था कि उनसे परस्पर विरोधी समुदाय निर्माण को बल मिला | आशा सारंगी ने प्राच्यवादी अध्ययन संबंधी इस मुद्दे पर उल्लेखनीय शोध किया है , उनके अनुसार ,`भाषाई पहचान की राजनीति और सांस्कृतिक – राजनीतिक समुदाय के रूप में समुदाय निर्माण इन सर्वे और गणनात्मक कार्यों से बहुत प्रभावित हुईं थीं | हिंदी और उर्दू अब केवल दो अलग भाषाई शैलियाँ न रह कर हिन्दुओं और मुसलमानों की अलग पहचान वाली सामाजिक समुदाय बन चुकी थीं |’[4] अंग्रेजों ने भाषा संबंधी मुद्दे पर अपनी समझ का जब संस्थानीकरण शुरू किया तब फोर्ट विलियम कालेज की भाषा नीति निर्णायक मोड़ साबित हुई |

          अंग्रेजों ने पुरानी संयुक्त भाषा हिंदी/हिंदवी को दो अलग –अलग भाषाओं आधुनिक हिंदी और आधुनिक उर्दू की सांस्थानिक स्वीकृति दी | यहाँ यह याद रखना चाहिए कि इस विभाजन के जिम्मेदार अंग्रेज नहीं थे , पर सांस्थानिक स्वीकृति उन्होंने ज़रूर की |  इस भाषा नीति और 1800 में गठित फोर्ट विलियम कालेज की नीति पर विचार करते हुए अमृत राय ने लिखा है , ` इन भाषाओं को बांटने वाली ताकतें एक सदी से काम कर रही थीं , जब 1800 ई. में कलकत्ता में फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना हुई थी | इसलिए यह सही नहीं लगता कि अंग्रेजों ने पुरानी संयुक्त हिंदी / हिन्दवी को दो अलग – अलग भाषाओं आधुनिक हिंदी और आधुनिक उर्दू में बाँट दिया | हालांकि उनकी भूमिका थी , उनहोंने पहले से ही अस्तित्त्वमान इस विभाजन को देश में अपनी साम्राज्यवादी सत्ता के प्रबन्धन के लिए इस्तेमाल किया | उनहोंने मुसलामानों को हिन्दुओं के खिलाफ खड़ा करने की अपनी नीति के अनुरूप एक भाषा के खिलाफ दूसरी भाषा को खड़ा कर दिया और भाषा सुधार आन्दोलन की श्रृंखलाबद्ध प्रतिक्रियाओं के परिणामस्वरूप समय के साथ दोनों भाषाएँ मुस्लिम और हिन्दू खेमे में ध्रुवीकृत हो गयीं , जिसने उर्दू को साफतौर पर एक मुस्लिम पहचान दी |’ [5] इसके बाद का समय कई दृष्टियों से उल्लेखनीय बना |

               1832 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने अदालतों का स्थापना की , तब पहले से प्रचलित भाषा फारसी को अदालतों के कामकाज के लिए चुना | अंग्रजों की इस नीति का विरोध होने लगा | बाद में इस विवाद ने हिंदी – उर्दू विवाद का रुख अख्तियार कर लिया | अंग्रेजों में भी इस मुद्दे पर दो गुट बन गए | हिंदी समर्थक ग्राउस साहब और उर्दू समर्थक बीम्स साहब के बीच के वाद – विवाद का अंदाजा , 1865 से 1868 के बीच रॉयल एशियाटिक सोसायटी जनरल’ में प्रकाशित लेखों से लगाया जा सकता है | असगर वजाहत का मानना है , `इनदोनों ने लिपि और भाषा के प्रश्न को हिन्दू और मुस्लिम पुनरुथानवाद से जोड़कर देखा और उसे साम्प्रदायिक रंग दिया |’[6]धीरे – धीरे यह खाई बढ़ती | राजा शिवप्रसाद सितारेहिंद और उनके शिष्य भारतेंदु हरिश्चन्द्र के बीच का विवाद इसी वृहत्तर असहमति का हिस्सा है | आलोचक वीरभारत तलवार ने विस्तारपूर्वक इस मुद्दे पर विचार किया है, जिसपर अलग से नज़र डालने की ज़रूरत है | फिलहाल इस सन्दर्भ का नोटिस लिया जाना आवश्यक है कि भाषाई विवाद में जब वर्ष 1900 आया , तब उसने आने वाले भारत विभाजन की नियति मुक़र्रर कर दिया | आलोक राय ने का कहना एकदम सटीक है कि ,` मैकडॉनल ने आधुनिक हिंदी के उद्भव और आधुनिक भारत के इतिहास में भी बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान रखने वाला दूरगामी कदम उठाया | 18 अप्रैल 1900 को मैकडॉनल ने वह दूरगामी आदेश दिया जिसके तहत प्रान्त की अदालातों में नागरी के इस्तेमाल की अनुमति दे दी , लेकिन यह सिर्फ नागरी का एकाधिकार नहीं था , यह कील का वह भ्रामक नुकीला सिरा था , जिसके चुभाने का अंतिम परिणाम भारत विभाजन हुआ |’[7] कहना न होगा भाषाई विवाद के जिस  प्रसंग को हिन्दू – मुस्लिम अस्मिता से संबद्ध किया गया उस राजनीति का यह पटाक्षेप भारतीय उपमहाद्वीप को लहूलुहान कर गया |

राजा शिवप्रसाद सितारेहिंद बनाम भारतेंदु हरिश्चंद्र : भाषाई अस्मिता निर्माण की दिशाएँ

          प्रो.वीरभारत तलवार ने `रस्साकशी’ में हिंदी मन के निर्माण में इन दोनों शख्सियतों की मौजूदगी का अत्यंत प्रभावी आकलन किया है | आज की हिंदी के निर्माण में जिन प्रमुख शैलियों (यानी एक  वह जो आम बोलचाल की भाषा के करीब है , जिसमें जनपदीय भाषाओं , संस्कृत , अरबी – फारसी आदि के अनेक प्रचलित शब्द मिल जाते हैं और दूसरी वह जिस पर संस्कृत का आधिपत्य है ) की मौजूदगी है , उनके निर्माण के लिहाज से नवजागरण कालीन इन दो चिंतकों की केन्द्रीय भूमिका रही | तलवार जी ने रस्साकशी के दूसरे अध्याय ` इतिहास का खलनायक और हिंदी की नयी चाल’ शीर्षक अध्याय में विस्तार और गहरायी से विचार किया है | लेख के इस दूसरे खंड में तलवार जी की मान्यताओं और विश्लेषण को परखने का प्रयास किया जाएगा |

             रस्साकशी के दूसरे अध्याय की शुरुआत में तलवार जी ने दो उद्धरणों से अपनी बात की शुरुआत की है | पहला उद्धरण भारतेंदु का है , जिसमें वे कहते हैं , ` हिंदी नए चाल में ढली ,1873’ | इसके तुरत बाद तलवार जी राजा शिवप्रसाद की 1863-1864 की मशहूर इतिहास पुस्तक `इतिहासतिमिरनाशक’ के उस हिस्से को उद्धृत करते हैं , जिससे लेखक की भाषा की रंगत का अंदाजा मिलता है | यदि इन दोनों उद्धरणों को ध्यानपूर्वक देखें तो आलोचक की मान्यता से हम एक हद  तक सहमत हो जाते हैं कि भारतेंदु की मान्यता पर पुनर्विचार की ज़रूरत है | भारतेंदु के पहले उनके अग्रज और गुरु राजा शिवप्रसाद सितारेहिंद की ज़बान भारत की उस भाषिक परम्परा की सटीक अभिवयक्ति लगती है जो भारत में खासोआम तक विस्तृत थी | तलवार जी द्वारा उद्धृत सितारेहिंद की भाषा का नमूना देखिए-

           `तमाशा यह कि लिखना–पढ़ना वह कुछ नहीं जानता था | केवल नाम-भर लिख सकता था और आँख भी एक ही रखता था | एक सीतला में जाती रही | लेकिन आदमी की पहचान भगवान ने इसे ऐसी दी थी कि विक्रम भोज और अकबर के बाद शायद इसी के दरबार में नवरत्न गिने जा सकते थे |……..एक टुकड़ा बादल का नमूदार हुआ और कुछ बूंदे पानी की बरसा गया , मानो खुद आसमान महाराज के मरने से रोया |’

        अनेक तथ्यों , विश्लेषणों और सन्दर्भों के आधार पर तलवार जी हिंदी की प्रचलित अवधारणा पर पुनर्विचार की वकालत करते हैं और सितारेहिंद को खलनायक बनाने के कॉमन सेन्स को खारिज करते हैं | बकौल तलवार जी , `19 वीं सदी के दौरान हिंदी – उर्दू प्रदेश में कई मिथक बने जो 20 वीं सदी में भी जारी रहे और लोगों के सामान्य बोध का अंग बन गए | इन्हीं मिथकों में एक मिथक राजा शिवप्रसाद का खलनायकत्व है , जिसे हिंदी साहित्य का विद्यार्थी स्वयंसिद्ध तथ्य मानकर चलता है |’[8]    अपने विश्लेषण की तार्किकता का पटाक्षेप करते हुए वे डॉ.बच्चन सिंह को उद्धृत करते हैं , `आज पुनर्विचार करने पर राजा साहब की नीति ही साधु और विवेकपूर्ण प्रतीत होती है |’ कहना न होगा सितारेहिंद की भाषा शैली के प्रति तलवार जी का उत्कट विश्वास है , जिसे वे हिंदी की स्वाभाविक शैली मानते हैं | तलवार जी अपनी स्थापना के पक्ष में जिन विचार सरणियों की प्रस्तावना करते हैं , उनपर विस्तृत नज़र डालना मुनासिब होगा |

        यह इतिहास की विडम्बना ही है कि जिस व्यक्ति ने युक्तप्रान्त में शिक्षा और अदालत की भाषाई दुनिया से फारसी लिपि को अपदस्थ कर देवनागरी लिपि को स्थापित करने में केन्द्रीय भूमिका निभाई उसे ही भारतेंदु हरिशचन्द्र और उनके मंडल ने हिंदी विरोधी करार दिया | यह इतिहास का एक दुखद प्रसंग है , पर भविष्य का भाषाई संसार हिंदी के इनदोनों रूपों को अलग – अलग शैलियों के रूप में स्वीकार कर लिया |

         लम्बे समय तक दिल्ली की हुकूमत अरबी-फारसी भाषी लोगों के हाथों में रहने के कारण शासन की लिपि और भाषा इससे संबद्ध हो गयी | ठीक वैसे ही जैसे अंग्रेजों के समय यह भाषा अंग्रेजी रही |  भारतीय भाषाओं के लगातार सम्पर्क के कारण फारसी का एक नया रूप सामने आया , जिसे उर्दू कहा गया | आरम्भ में यह भाषा भारत की शास्त्रीय भाषाओं और जनपदीय भाषाओं से अपनेपन का रिश्ता बनाकर चली | बाद में यह फारसी की तरफ लगातार झुकती चली गई | ठीक वैसे ही जैसे खड़ी बोली (हिंदी) संस्कृत की ओर झुकती चली गई | एकदम शुरू में हिंदी – उर्दू  का ऐसा तीक्ष्ण भेद नहीं था जैसा कालांतर में हुआ | यह अलग बात है कि भाषा के इस सामासिक रूप के समय भाषाओं के नामकरण का दौर नहीं आया था | प्रसंगवश हिंदी के सबसे बड़े रामभक्त कवि तुलसीदास को यह कहने में गुरेज नहीं था –

रघुवर तुमको मेरी लाज ।
सदा सदा मैं शरण तिहारी,
तुम हो गरीब निवाज़

पतित उद्धारण विरद तिहारो,
शरवानन सुनी आवाज
हूँ तो पतित पुरातन कहिए,
पार उतारो जहाज

  ठीक उसी तरह ग़ज़लों के इतिहास में अपनी ज़बान को हिंदी,हिन्दवी और रेख्ता कहने वालों का एक बड़ा संसार है | असल में अपने आरंभिक दौर में भाषाओं का ऐसा तीक्ष्ण विभाजन नहीं था | इस विवाद के मूल में आर्थिक ध्रुवीकरण की अंतर्गाथा है | ध्रुवीकरण के इस इतिहास से ही हिंदी – उर्दू की विभाजन की त्रासदी का मंजर जुड़ता है | प्रो. तलवार ने आरम्भिक साझे भद्रवर्ग के दो फाड़ होने की दास्तान का प्रभावी विश्लेषण करते हुए बताया है कि कालांतर में जो लोग हिंदी – उर्दू की दूरी के हिमायती थे उनमें भी आरम्भ में साझे हित के कारण उर्दूपरस्ती का आलम था | फ्रांसिस रोबिनसन की किताब `सेपरेटिज्म एमंग इन्डियन मुस्लिम’ (विकास 1975) के हवाले से वे कहते हैं , ` इस भद्रवर्ग में सरकारी मुलाजिम और कचहरी से जुड़े शहरी मुसलमान और हिंदू , दोनों सामान रूप में शामिल थे | उनके वर्गाहित एक थे | उनकी घरेलू संस्कृति अपने – अपने धर्म के मुताबिक़ थी पर सार्वजनिक जीवन में उनका सांस्कृतिक रूप एक जैसा था – उर्दू भाषा , मुस्लिम पहनावा , कभी – कभी मुस्लिम खान – पान भी , नाच-गान और शेरो – शायरी | (हिंदी आलोचक रामचन्द्र शुक्ल के पिता चन्द्रबली शुक्ल , जो क्वींस कॉलेज में पढ़े थे और मिर्जापुर में सदर कानूनगो थे , इसी भद्रवर्ग के सदस्य थे |) हर शहर में उनकी साझी बौद्धिक संस्थाएं थीं , जैसे–बनारस इंस्टीट्यूट,गाजीपुर इंस्टीट्यूट,बलिया इंस्टीट्यूट और अलीगढ़ साईंटिफिकिट सोसायटी वगैरह | सर सैयद अहमद और राजा शिवप्रसाद , दोनों इसी उर्दूभाषी भद्रवर्ग के सदस्य थे |’[9] कहना न होगा इस समय तक विरासत में साझी भागीदारी जारी थी और साझी अदावत की सुगबुगाहट के अंखुए फूटने शुरू हुए थे | सैयद ने जब अलीगढ़ में कॉलेज खोलने का निर्णय लिया तब अनेक हिंदू जिनका रिश्ता इस एलीट तबके से था , चंदा भी दिया | खुद शिवप्रसाद जी ने एक हज़ार रुपए दिए , इस शर्त पर कि उक्त संस्थान को अलीगढ़ की बजाए प्रयाग में खोला जाय |

      1867-1868 वह उल्लेखनीय वर्ष है , जब शिवप्रसाद जी ने युक्तप्रान्त में फारसी लिपि की जगह नागरी लिपि का पक्ष लिया | मुस्लिम प्रभुत्व को यह पहली चुनौती थी | यह हिंदी संसार का विलुप्तप्राय सच है , जिसका उल्लेख करते हुए तलवार जी कहते हैं , ` इतिहासलेखन के बाद मुस्लिम प्रभुत्व के विरोध का सबसे मुख्य प्रतीक देवनागरी लिपि बनी | भारतेंदु मंडली , काशी नागरीप्रचारिणी सभा और हिंदी साहित्य सम्मेलन जैसी संस्थाओं ने नागरीलिपि के जिस आन्दोलन को आगे जारी रखा , उसके प्रवर्तक शिवप्रसाद ही थे , हालांकि इनलोगों और संस्थाओं ने शिवप्रसाद को इसका श्रेय कभी नहीं दिया |’[10] सार्वजनिक शिक्षा में हिंदी और नागरी लिपि के लक्ष्य को हासिल करने के बाद शिवप्रसाद जी का ध्यान अदालतों की भाषा पर गया | इस लिहाज से उनके द्वारा युक्तप्रान्त की सरकार को भेजे गए `मेमोरेंडम : कोर्ट करैक्टर इन द अपर प्रोविंसेज़ ऑफ इंडिया’ को हम सबसे उल्लेखनीय प्रसंग मान सकते हैं | पहली बार इसी मांगपत्र के द्वारा अदालतों की लिपि को , फारसी की जगह नागरी करने की मांग की गयी | यह ध्यान देने की बात है कि इस मेमोरेंडम में लिपि बदले की बात तो की गयी , पर भाषा पर कोई सवाल नहीं उठाया गया | इतना ही नहीं , शिवप्रसाद जी ने यह स्पष्ट राय प्रकट की कि हिंदी और उर्दू में कोई फ़र्क नहीं है | वह भाषा जिसका सिरा आम आदमी की रोज़मर्रा की ज़िन्दगी से जुड़ा है |  वे भाषा के इसी स्वरूप के लिए देवनागरी लिपि की माँग कर रहे थे | तलवार जी की टिपण्णी गौरतलब है ,`मेमोरेंडम में अदालती भाषा का सवाल नहीं उठाया गया , सिर्फ उसकी लिपि बदलने की माँग की गयी | शिवप्रसाद ने हाट – बाज़ार से लेकर घरों के जनाने तक में प्रचलित बोलचाल की मिली – जुली जुबां का ज़िक्र करते हुए दावा किया कि उसमें हिंदी और उर्दू का कोई फ़र्क नहीं है | इसी भाषा के लिए उन्होंने नागरीलिपि की माँग उठायी | सरकारी नौकरी में रहते हुए शिवप्रसाद इस मेमोरेंडम का सार्वजनिक प्रकाशन नहीं कर सकते थे | बावजूद इसके उन्होंने इसकी कई प्रतियाँ `प्राइवेट सर्कुलेशन’ के नाम पर छपवायी और पूरे प्रांत में बँटवाई |’[11] कुल मिलाकर वे एक ऐसी भाषा के समर्थक थे जिसमें किसी तरह की कट्टरता का निषेध हो |

            इस माँग की त्वरित प्रतिक्रिया यह हुई कि साझे उर्दू वर्ग की एकता में दरार पड़ी | अब साझा वर्ग दो भागों में विभक्त हो गया और हिन्दू तथा मुसलमान अपने – अपने धार्मिक आधारों पर गोलबंद होने लगे | मेमोरेंडम में मुस्लिमपूर्व इतिहास और हिंदुत्व की जड़ों पर राय जाहिर की गयी | शिवप्रसाद जी के अनुसार भारत में मुसलमानों के पहले कैथी और हिंदी लिपि ही चलती थी | बाहर से आये मुगलों ने पहले से प्रचलित लिपि को न सीखकर फारसी लिपि का चलन किया | उन्होंने ब्रिटिश शासन पर आरोप लगाया कि उसने जनता पर फारसीनिष्ठ उर्दू और फारसी लिपि को थोपा | इतना कह कर वे थमे नहीं , उन्होंने यह भी कहा कि इससे जातीयता की भावना खत्म हुई | तलवार जी ने मेमोरेंडम के उस हिस्से को इस तरह उद्धृत किया है ,` आजकल की फारसी में आधी अरबी मिली हुई है | सरकार की इस नीति को विवेकपूर्ण नहीं माना जा सकता जिसने हिंदुओ के बीच सामी तत्त्वों को खड़ा कर उन्हें अपनी आर्यभाषा से वंचित कर दिया है ; न सिर्फ आर्यभाषा से बल्कि उन सभी चीजों से आर्य हैं | क्योंकि भाषा से ही विचारों का निर्माण होता है और विचारों से प्रथाओं ता था दूसरे तौर – तरीकों का | फारसी पढ़ने से लोग फारसीदाँ बनते हैं | इससे हमारे सभी विचार दूषित हो जाते हैं और हमारी जातीयता (नेशनलटी) की भावना खत्म हो जाती है |’[12] राजा शिवप्रसाद ने अंग्रेज़ी हुकूमत से आग्रह किया कि जैसे राजकाज की भाषा में बदलाव कर फारसी भाषा को हटा दिया गया उसी तरह अब उसकी लिपि को भी हटा दिया जाय | इसके पीछे वह आकांक्षा काम कर रही थी , जिसके द्वारा सरकारी नौकरियों में फारसी – उर्दूदां की जगह हिन्दू भद्रवर्ग की संख्या बढे और नये शक्ति संतुलन की तस्वीर उभर सके |

      नागरी लिपि और हिंदी के संबंध को हिंदू जातीयता से सम्बद्ध करने का यह पहला प्रयास था | इसकी त्वरित प्रतिक्रिया यह हुई कि फारसी लिपि और उर्दू का संबंध सहज ही मुस्लिम जातीयता से जुड़ गया | इस घटना का प्रभाव यह भी हुआ कि हिंदी संसार के कॉमन सेन्स में एक ऐसी समझ का विकास हुआ जो सचेत रूप से स्वयं को फारसी – उर्दू परंपरा से अलग कर अपने अस्तित्त्व के निर्माण में लग गया | भविष्य के उन सभी आन्दोलनों का रिश्ता इस मेमोरेंडम से जुड़ा जो नागरी लिपि और हिंदी के पक्ष में गोलबंद हुआ | तलवार जी ने सटीक टिपण्णी की है ,`नागरीलिपि और हिंदी भाषा को ल्रेकर जितने भी आन्दोलन हुए – चाहे वह 1873 में भारतेंदु और दूसरे लोगों द्वारा छोटे लाट को दिया गया मेमोरियल हो या 1882 में हंटर कमीशन को भेजे गए दर्जनों मेमोरियल हों अथवा 1897 में मैडम मोहन मालवीय के नेतृत्व में काशी नागरी प्रचारिणी सभा का लेफ्टीनेंट गवर्नर मैकडॉनाल्ड को दिया गया आखिरी और निर्णायक मेमोरियल हो – इन सबमें बार – बार उन्हीं बुनियादी तर्कों को दोहराया गया या उन्हें और विस्तार दिया गया , जिन्हें सबसे पहले राजा शिवप्रसाद ने अपने मेमोरेंडम में दिया था |[13] पर यह बात याद रखनी चाहिए कि बाद के आन्दोलन और राजा शिवप्रसाद सितारेहिंद की भाषानीति में बहुत अंतर है | दरअसल शिवप्रसाद जी जनता की भाषा के पक्षधर थे , न कि फारसी की जगह संस्कृत के हिमायती | (प्रसंगवश वह भाषा जिसे प्रेमचन्द ने अपनायी थी |) आलोचक वीरभारत तलवार ने सही टिपण्णी की है , उन्होंने लिपि के आन्दोलन को प्रयासपूर्वक भाषा के आन्दोलन से अलग किया | शुद्ध हिंदी समर्थकों पर शिवप्रसाद जी के मेमोरेंडम के उस हिस्से को तलवार जी ने `रस्साकशी’ में उद्धृत किया है –

      `भाषा लोगों के फैसले से तय नहीं होती | वह स्वाभाविक , प्राकृतिक रूप से तय होती है जिसे कुछ परिस्थितियों में सुधारा और निखारा जा सकता है | लेकिन भाषा का रूप तय करना सरकार का काम नहीं | सरकार को उसे उसी रूप में लेना होगा जिस रूप में वह समाज में मौजूद है | लोगों को उसी जुबान में लिखने देना चाहिए जिसे वे अपनी बोलचाल की जुबान में समझते हैं | पांडित्य को अलग रखना चाहिए | आसान , मुहावरेदार , निखरी हुई और प्रवाहपूर्ण हिन्दुस्तानी (हिन्दुस्तान सूबे की जबान ) को बढ़ावा देना चाहिए |’[14]

      आगे चलकर बत्तीस साल बाद 1900 में युक्त प्रांत की राजभाषा के नागरी की मंजूरी दे दी गयी | यह एक ऐसा पड़ाव था जिसने हिन्दू और मुसलमान दोनों में सांस्कृतिक श्रेष्ठता की होड़ मचा दिया |

शिक्षायी हिंदी का स्वरूप और शिवप्रसाद सितारेहिंद

शिक्षायी हिंदी का स्वरूप कैसा हो , यह एक गम्भीर सवाल है जो किसी- न- किसी रूप में अब भी जारी है | नागारिलिपि के लिए संघर्ष और फारसी लिपि तथा फ़ारसी से आक्रान्त उर्दू भाषा से असहमति के बावजूद शिवप्रसाद जी एक ऐसी भाषा के हिमायती थे जो साझी संस्कृतियों से बनी थी | इतिहासतिमिर नाशक , भूगोल हस्तामलक , साहित्य की पाठयपुस्तक गुटका आदि किताबें उनकी भाषानीति का आईना है , जिनसे भाषा के प्रति उनका दृष्टिकोण जाहिर होता है | भारतेंदु हरिश्चन्द्र , बालकृष्ण भट्ट समेत  अनेक परवर्ती शोधार्थियों ने सितारेहिंद की भाषा को फारसीपरस्त और उर्दूनिष्ठ करार दिया | यह कितना सही है , इसे दो आधारों पर समझा जा सकता है – एक स्वयं शिवप्रसाद जी की भाषा के रास्ते तथा दूसरे उनके द्वारा सम्पादित हिंदी पाठ्यपुस्तक की भाषा नीति के माध्यम से | तलवार जी ने उनकी भाषा के कुछ अंशों को उद्धृत किया है , उनमें से बानगी के रूप में एक उद्धरण –

`हैदरअली से अंगरेजों का जो सुलहनामा हुआ था , उसमें शर्त थी कि बचाव के लिए दोनों एक –दूसरे की मदद करेंगे | लेकिन जब मरहठों ने हैदरअली पर चढ़ाव किया तो अंगरेजों ने उसे कुछ भी मदद न दी | इस बात की उसके जी में बड़ी लाग थी | वह सन 1870 में एक लाख फौज लेकर चढ़ आया और अंगरेजी अमलदारी में हर तरफ लूट मचा दी |’[15]कहना न होगा इस हिंदी की रवानगी , मुहावरेदानी और कहन शैली तीनों (पहले भाग का प्रकाशन 1864)लाजवाब है और भविष्य की हिंदी के लिए एक मजबूत आधार |

          उसी तरह शिवप्रसाद जी ने जो 1860 में जिस हिंदी पाठ्यपुस्तक `गुटका’ का सम्पादन किया , उसमें हिंदी की विभिन्न शैलियों को बराबर महत्त्व दिया , लल्लूलाल , और राजा लक्ष्मण सिंह की संस्कृतनिष्ठ भाषा से असहमत होते हुए भी उन्हें शामिल किया | अपने सम्पादकीय में उन्होंने बागोबहार के लेखक मीर अम्मन और प्रेमसागर के लल्लूलाल दोनों की भाषा को बनावटी और प्रदर्शनधर्मी माना |

       संस्कृतनिष्ठ हिंदी के पक्षधर वर्ग ने राजा शिवप्रसाद सितारेहिंद , अयोध्याप्रसाद खत्री और प्रेमचन्द तीनों का विरोध किया | हिंदी की अंतरवर्ती धारा को हिन्दू मनीषा से नाभिनालबद्ध करने वाली समझ ने इन तीनों का जब सामना किया तो उनकी असहज स्थितियाँ सहज ही प्रकट हो गयीं | प्रो. तलवार का विश्लेषण है ,` हिंदी के तीन प्रभावशाली और लोकप्रिय गद्यलेखक राजा शिवप्रसाद देवकीनंदन खत्री और प्रेमचन्द एक ही भाषा परम्परा में हुए | जैसे प्रेमचन्द की तारीफ रामचन्द्र शुक्ल मुश्किल से कर पाते थे, उसी तरह देवकीनंदन खत्री भी लोकप्रियता के बावजूद हिंदी आन्दोलनकारियों को अपनी भाषानीति के कारण पसंद नहीं आए | बिहार के अयोध्याप्रसाद खत्री ने ब्रजभाषा के बजाय खड़ीबोली उर्दू को खड़ीबोली हिंदी के ज़्यादा करीब बतलाते हुए उर्दूमिश्रित आसान हिंदी में कविता लिखने की मांग की तो भारतेंदु समर्थकों ने उनका विरोध किया और मज़ाक उड़ाया |’[16] विडम्बना देखिए कि जिस हिंदी की वकालत भारतेंदु और उनके समर्थक कर रहे थे , उनकी रचनाओं से ज़्यादा खत्री जी की चन्द्रकांता पढी जा रही थी | अपनी असहमति के बावजूद शुक्ल जी ने अपने इतिहास में दर्ज़ किया कि चन्द्रकान्ता और चन्द्रकान्ता सन्तति पढ़ने के लिए अनेक उर्दूदां लोगों ने हिंदी सीखी |

और अंत में  

   तलवार जी ने विस्तारपूर्वक उन कारणों की तहकीकात की है और अनेक प्रमाण दिए हैं कि कैसे शिवप्रसाद सितारेहिंद और भारतेंदु हरिश्चन्द्र के बीच दूरी बढ़ती गयी | पर एक सवाल वे भी अनुत्तरित छोड़ देते हैं कि आखिर क्यों अपने अंतिम दौर की किताबों , जैसे  – `सिक्खों का उदय और अस्त’ की भाषा उस उर्दू के करीब पहुँच गयी जो हिंदी से बहुत दूर थी | हालाँकि तलवार जी यह नोट करते हैं कि शिवप्रसाद जी की नब्बे प्रतिशत रचनाओं की भाषा वह बोलचाल की भाषा है जो खडी बोली उर्दू और खड़ी बोली हिंदी दोनों के बीच की खाई को पाटती है |

    अब जब भाषाओं के बीच जंग में वह तल्खी नहीं रही जो उस दौर में थी | आज दोनों ही शैलियाँ हिंदी में प्रचलित हैं | किसे सही कहें और किसे ग़लत अब यह दौर नहीं रहा | भारत के संविधान ने आंठवीं अनुसूची में शामिल हिंदी का कोई रूप निर्धारित नहीं किया है , जबकि राजभाषा हिंदी की चर्चा धारा 343 से धारा 351 के बीच है | यानी राजभाषा के रूप को निर्धारित किया गया है और आंठ्वीं अनुसूची में शामिल हिंदी के किसी रूप को निर्धारित न कर इस बात की जनतांत्रिक आजादी दी गयी है कि हिंदी के विविध रूप और उसकी विविध शैलियाँ सभी बराबर सम्मान की हक़दार हैं | अब यदि कोई सिरफिरा विचार शुद्धतावाद के आग्रह से इस कदर लबरेज हो जाए कि हिंदी के वर्तमान और भविष्य को केवल संस्कृत से सम्बद्ध करने की हिमायत करे तो यह स्वयं हिंदी के संसार की चौहद्दी को कम करना होगा | और ठीक यही बात उन अतिवादियों पर भी लागू होती है जो हिंदी की उस शैली से असहमत हैं जिनमें संस्कृत और जनपदीय भाषाओं से गहरे राग का भाव सक्रिय है |

 

 

[1] 24 july 2017, Bhardvaj Ashutosh , Urdu words off school text, Indian Express.

[2] 155:2016, डालमिया वसुधा , हिन्दू परम्पराओं का राष्ट्रीयकरण , राजकमल प्रकाशन , दिल्ली |

[3] 136,137 2015 , तेली गणपत , जुलाई – अगस्त , समकालीन भारतीय साहित्य , साहित्य अकादेमी , दिल्ली|

[4] 222,223:2009,Saranagi Asha,Enumeration and the Linguistic Identity Formation in Colonial North India, Studies in Histoy,http://sih.sagepub.com/content

[5] 285:1984, Ray Amrit , A House Divided: The Orign and Development of Hindi/Hindavi , Oxford University Press.

[6] 69:2008 , वजाहत असगर , हिंदी उर्दू की पड़ताल , नया पथ , अप्रैल-जून |

[7] 17:2001, Ray Alok , Hindi Nationalism, Orient Longman , Hyderabad.

[8] 53:2006,तलवार वीरभारत , रस्साकशी , सारांश प्रकाशन , दिल्ली |

[9] 55,56:2006,तलवार वीरभारत , रस्साकशी , सारांश प्रकाशन , दिल्ली |

[10] 57-58:2006,तलवार वीरभारत , रस्साकशी , सारांश प्रकाशन , दिल्ली |

[11] 62:2006,तलवार वीरभारत , रस्साकशी , सारांश प्रकाशन , दिल्ली |

[12] 63:2006,तलवार वीरभारत , रस्साकशी , सारांश प्रकाशन , दिल्ली |

[13].64-65:2006,तलवार वीरभारत , रस्साकशी , सारांश प्रकाशन , दिल्ली |

[14] .. 67-65:2006,तलवार वीरभारत , रस्साकशी , सारांश प्रकाशन , दिल्ली |

[15]. 69:2006,तलवार वीरभारत , रस्साकशी , सारांश प्रकाशन , दिल्ली |

[16] 70:2006,तलवार वीरभारत , रस्साकशी , सारांश प्रकाशन , दिल्ली |

 

(साभार- सत्राची)

 

 

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