दलित विमर्श के विभिन्न आयाम: सदानन्द वर्मा

समीक्षित पुस्तक: मुकेश मिरोठा, दलित विमर्श : दशा और दिशा, ए.आर.पब्लिशिंग कंपनी, दिल्ली, 2017

Sadanand Verma

सदानन्द वर्मा

डॉ. मुकेश मिरोठा की आलोचनात्मक कृति “दलित विमर्श : दशा और दिशा” दलित लेखन और आंदोलन के विभिन्न आयामों को रेखांकित करती है। गौरतलब है कि लेखक ने दलित लेखन में चली आ रही ऐतिहासिक पड़ताल के साथ-साथ दलित विमर्श की स्थिति, दलित आंदोलन, स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद दलितों की स्थिति, दलित तथा भूमंडलीकरण और सिनेमा में दलितों की स्थिति पर बात करते हुए इसके वर्तमान पहलुओं से रूबरू करवाया है। उनके इस सूक्ष्म अवलोकन के माध्यम से भारतीय दलित साहित्य के मूल को समझने और उसके वर्तमान स्थितियों को रेखांकित करने में सहायता मिलती है।

“दलित विमर्श : दशा और दिशा” के लेखक के लिए चुनौतीपूर्ण प्रश्नों को उठाना और उस पर गंभीरतापूर्वक विचार करना इस पुस्तक की सबसे बड़ी उपलब्धि है। इसमें कुल दस लेख हैं। पुस्तक का पहला लेख दलित आंदोलन के इतिहास पर केन्द्रित है, जिसमें लेखक ने दलित शब्द का अर्थ, इसके मायने, इसके स्वरूप, एवं वर्ण-व्यवस्था की उत्पति की खोज आदि का विश्लेषण तार्किक रूप से किया हैं। साथ ही, दलित चेतना के आंदोलन को जन्म देने में जिन व्यक्तियों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है, उनका और महत्त्वपूर्ण आंदोलनों का विस्तार पूर्वक वर्णन इस लेख में किया गया है।

दूसरे लेख में स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद दलितों की स्थिति पर समाजशास्त्रीय दृष्टि से विचार किया गया है। आज के समय में दलित वर्ग ने शिक्षा की तरफअपनी विशेष रुचि बढ़ाते हुए न केवल अपने आप को बदलने का प्रयास कियाहै बल्कि अपने समाज को भी एक नई दृष्टि प्रदान की हैयही कारण है किआज लोग शिक्षित होकर अपनी जाति से जुड़े कार्य छोड़ रहे हैं और सरकारी नौकरियों व प्राइवेट नौकरियों में अपनी उपस्थिति अधिकाधिक संख्या में दर्ज करवा रहे हैं। निश्चित तौर पर इस चेतना के संचार से उन लोगों में अपने अधिकार व सम्मान के अहसास होने में मदद मिली है। यह विकास गांवों की अपेक्षा शहरों में बहुत तेजी से हो रहा है, जबकि गांव की स्थिति में बदलाव अभी भी काफी मंद गति से हो रहा है। लेकिन गांव में भी दलित वर्ग के अंदर चेतना की मौजूदगी को नकारा नहीं जा सकता। जहाँ अब वह उच्च जाति के लोगों के आगे गिड़-गिड़ाते हुए या उनकी गुलामी और शोषण को भाग्यवादी मानते हुए नहीं दिखाई पड़ेगा। बल्कि वह अपने कर्म को प्रधानता देते हुए आत्मनिर्भर बनने की ओर बढ़ रहा है। निश्चित तौर पर यह बदलाव दलित समाज में आई चेतना को रेखांकित करता है।

अगले लेख में दलित विमर्श की भूमिका का विवेचन किया गया है। इस लेख में दलित विमर्श को आधुनिक संदर्भों से जोड़कर देखने का प्रयास किया गया है। इसी लेख में मुकेश मिरोठा ने दलित चेतना की निर्मिति बाबा साहब के तीन सूत्रों – ‘शिक्षित बनों, संगठित रहो और संघर्ष करो’ को आधार मानते हुए लिखा है कि

दलित साहित्य अपनी वैचारिकी के माध्यम से दलित समुदाय में चेतना जगाने का कार्य इन्हीं सूत्रों के आलोक में कर रहा है। शिक्षा रूपी मौलिक संस्कार की प्राप्ति तक अपनी भागीदारी आज दलितों में बढ़ रही है। दलित अपनी शिक्षा के प्रति जबाबदेही होने के साथ-साथ अन्य दलितों को शिक्षित बनाने में महती योगदान देकर अपने कर्तव्य का निर्वाह कर रहे हैं। निरक्षरता के अंधकार से निकलकर दलित ज्ञान रूपी किरणों की तरफ काफी तेजी से विकास कर रहे हैं। शोषण के अनेक स्तरों को सहते हुए, आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद दलितों का शिक्षा में योगदान बढ रहा है। जो दलितों में आई चेतना का एक उचित प्रकाश बिन्दु माना जा सकता है।

चौथे लेख में लेखक ने वर्तमान दलित विमर्श की दशा और दिशा का मूल्यांकन करने का प्रयास किया है। समकालीन समाज में यदि दलितों के स्थिति का अन्वेषण किया जाय तो कमोबेश उसमें परिवर्तन के बिन्दु निश्चित तौर पर दिखाई पड़ जायेंगे लेकिन स्थियां आज भी ज़्यादातर वैसे ही हैं जैसे हम दलित साहित्यकारों की रचनाओं में पढ़ते हुए पाते हैं। इसका प्रमाण हमें अपने समाज के अंदर ही देखने को मिल जाता है। आए दिन हम समाचार पत्रों व टेलीविज़न के न्यूज चैनलों पर एक ना एक अमानुषिक घटनाओं से रूबरू होते रहते हैं जो कहीं ना कहीं हमारे समाज के दोहरे चेहरे के यथार्थ रूप से परिचित कराती है। इसमें बलात्कार, जबरन मार-पीट, हत्या, लूट-खसोट, ऊंच-नीच और छूआ-छूत आदि जैसी घटनाएँ शामिल हैं। वहीं, बात जब दिशा की कि जाय तो पिछले कुछ वर्षों में इसके स्वरूप मे बदलाव निश्चित तौर देखने को मिला है लेकिन इसमें सुधार होना अभी बाकी है। दलित साहित्य की दिशा पर बात करते हुए लेखक ने अपनी चिंता व्यक्त करते हुए लिखा है कि

वर्तमान में अनेक राजनीतिक दल अस्तित्व में हैं और सभी दलित चेतना कि बात करते हैं लेकिन दलित हीत में काम करने की दृढ़ता किसी भी दल में नहीं है । स्वयं दलित वोटों की ही बात करने वाले राजनीतिक दल भी दलितों की अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतरे हैं । इन राजनीतिक दलों को दलितों की मूल समस्याओं का वास्तविक समाधान कराने पर ज़ोर देना चाहिए ताकि दलितों में राजनीतिक चेतना आए और वे देश के समग्र विकास में समुचित योगदान कर सकें।

कुछ इसी प्रकार की चिंता व्यक्त करते हुए रमणिका गुप्ता लिखती हैं,

इसमें कोई शक नहीं की सत्ता कि भागीदारी का नारा दलितों की अस्मिता बनाने में बड़ा सहायक हुआ है, लेकिन लक्ष्य ही छूट जाएगा तो क्या केवल सत्ता में आने मात्र से परिवर्तन हो जाएगा? संभवत: उससे कुछ व्यक्ति विकसित भी हो जाएँ पर पूरा समाज विकसित नहीं हो पाएगा” वह पुनः आगे लिखती हैं कि “यह शुक्र कि बात है कि इन बातों को लेकर आज का दलित साहित्यकार चिंतित है वे अब अपनी समाज की अस्मिता की फिक्र भी कर रहे हैं किन्तु संगठन और नेतृत्व का अभाव होने के कारण ही हिन्दी पट्टी में दलित राजनीति और दलित साहित्य पिछड़ रहा है। इसलिए उन्हें अपने आप को इस गुटबंदी से बचाना होगा और बचाना होगा इस ‘छपास’की भूख से। (दलित चेतना की उर्ध्वमुखी यात्रा, रमणिका गुप्ता, पृष्ठ सं.- 16)

Dr Mukesh

डॉ. मुकेश मिरोठा

अगले लेख में हिन्दी साहित्य में दलित विमर्श की उपस्थिती को लेकर चर्चा की गई है। इस लेख में दलित विमर्श के प्रारम्भिक स्वरूप पर चर्चा की गई है। इसमें गैरदलित लेखकों द्वारा लिखा गया साहित्य जिसमें प्रेमचंद, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, जगदीश गुप्त, रामकुमार वर्मा, जगदीश चंद्र, फणीश्वरनाथ रेणु, नागार्जुन, गिरिराज किशोर, अमृतलाल नागर, संजीव, शिवप्रसाद सिंह और दलित साहित्य को एक स्थायी दिशा देने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले राजेन्द्र यादव जी का नाम सराहनीय हैं। इन लोगों ने आंशिक ही सही लेकिन दलित मुद्दों पर अपनी लेखनी कर सराहनीय कार्य किया है। दूसरी ओर लेखक ने दलित लेखकों द्वारा लिखी गई साहित्यिक रचनाओं पर भी विचार किया है, जिसमें उन्होंने दलित लेखकों द्वारा किये गए संघर्षशील कार्यों का विवरण देते हुए उनके साहित्यिक लेखन पर गंभीरता पूर्वक चिंतन किया है। इसी लेख में लेखक ने स्वानुभूति और सहानुभूति जैसे बिन्दुओं पर प्रकाश डालते हुए लिखा है कि

हिन्दी साहित्य में दलित विमर्श सृजन की परंपरा में दलित साहित्यकार भी आगे आएँ हैं दलित साहित्यकारों ने उस पीड़ा को भोगा था। अतः उनका स्वानुभूत यथार्थ और भी विश्वसनीय ढंग से व्यक्त हुआ है।

निश्चित तौर पर यह कहा जा सकता है कि गैर-दलित रचनाकारों ने अपनी रचनाओं में दलितों को सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक समस्याओं से जूझते हुए चित्रित तो किया है और शोषण के उन सभी बिन्दुओं को दिखाने का प्रयास भी किया है जो समाज में दलित विचारकों के केंद्र बिन्दु के रूप में हैं, लेकिन उनकी लेखनी में सहानुभूति के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं दिखाई पड़ता। इसका यथार्थ स्वरूप दलित लेखकों की लेखनी से ही देखने को मिल पाती है क्योंकि वह उन घटनाओं का अभाष आंखों से देखकर या सुनकर नहीं करता बल्कि वह स्वयं ही उन घटनाओं को भोगने वाला भोक्ता के रूप में होता है। शायद इसी लिए पाश्चात्य विचारक इलियट ने भी लिखा है कि “कलाकार जितना उत्कृष्ट होगा, उसमें भोक्ता और स्रष्टा का अंतर उतना ही होगा लेकिन जो भोक्ता ही नहीं वह कलाकार कैसे उत्कृष्ट होगा?” इस तरह गैर दलित द्वारा लिखा गया साहित्य सहानुभूति परक,करुणा परक तो हो सकता है पर उसका भोगा हुआ यथार्थ नहीं हो सकता। (दलित यातना के कई हजार वर्षों के साथ, दुर्गा प्रसाद गुप्त, पृष्ठ सं.- 16)

आठवां लेख इस विमर्श में एक नया स्वरूप लेकर खड़ा हुआ है। इसमें भूमंडलीकरण और दलित विमर्श को केंद्र में रखते हुए उसके पारस्परिक संबन्धों का अवलोकन किया गया है। इसमें दलितों पर पड़ रहे भूमंडलीकरण के प्रभावों पर बिन्दुवार तरीके से बात करने की कोशिश की गई है। भूमंडलीकरण की ही देन है कि दलित युवक अपने पैतृक पेशों को छोड़कर स्वरोजगार एवं नवीन औद्योगिक कार्यों की ओर अग्रसर हो रहे हैं। भूमंडलीकरण के प्रभाव को देखते हुए मुकेश मिरोठा ने लिखा हैं, कि

पैतृक पेशों की अपेक्षा युवा दलित, सम्मानित एवं प्रतिष्ठित उच्च पदों की शोभा बढ़ा रहे हैं । अपनी प्रतिभा और श्रम का उचित उपयोग वह अपने सामुदायिक हितों में कर रहे  हैं।

dalit vimarsh by mukesh mirothaयह कहना गलत नहीं है कि रोजगार नियोजन, सोशल मीडिया, विज्ञान, तकनीक, इंजीनियरिंग एवं शिक्षा-स्वास्थ्य के प्रति चेतना का प्रसार भूमंडलीकरण के द्वारा संभव हो सका है। वैश्विक स्तर पर चाहे वह जापान हो, यमन हो, कोरिया हो, सोमालिया हो या अफ्रीका नीग्रो एवं अमेरिकी ब्लैक हों, आदि देशों के विभिन्न दलित समुदायों का स्वर एक है इनके आपसी दुःख-दर्द एवं आंदोलन में इनकी परस्परिक सहभागिता दिखाई दे रही है। इन सब का आपसी संबंध भी वैश्वीकारण की ही देन है।

अगला लेख न केवल दलित साहित्य में बल्कि हिन्दी साहित्य में भी विचार-विश्लेषण का विषय बन सकता है। इस लेख में लेखक ने भारतीय सिनेमा में दलितों की स्थिति की चर्चा की है। इस लेख में सिनेमा के समाजशास्त्र को भी समझने का प्रयास किया गया है। इसके अतिरिक्त इसमें लेखक ने दलितों की उपस्थिती एवं उनके ऊपर चित्रित जीवन शैली का सिनेमाई रूप भी स्पस्ट किया है। जहां हकीकत जीवन के पहलुओं का उसमें अभिनय करने वाले तथा निर्देशित करने वाले लोगों का दूर तक वास्ता नहीं होता। इस ओर चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने लिखा है कि

आज तथा कथित मुख्यधारा का सिनेमा भी सवालों के घेरे में है क्योंकि अस्पृश्य मानने की उसकी नीति एवं दलित समाज का व्यापक एवं यथार्थ चित्रण करने में की गई कंजूसी उसकीभारतीयता को कटघरे में खड़ा करती है। केवल दलित ही नहीं समाज का अन्य उपेक्षित वर्ग भी उसके फ्रेम में नहीं दिखता है। सिनेमा की चमक-दमक, आर्थिक नीति एवं विशाल व्यवसायिक ताकत के फल स्वरूप हम अपने समाज के स्वरूप को उचित रूप से वहाँ दर्शा नहीं पा रहे हैं ।

इस पुस्तक का अंतिम और भाषा की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण चिंतनयुक्त लेख दसवां लेख है। इसमें हिन्दी भाषा, साम्राज्यवादी सोच और पूंजी की सत्ता पर विश्लेषणात्मक बातों पर प्रकाश डाला गया है। भूमंडलीकरण जहां लोगों को आर्थिक रूप से मजबूत होने में सहायक रहा है वहीं लोगों की भाषीय संरचना में भी परिवर्तन किया है। इससे न केवल आमजन प्रभावित हुआ है, बल्कि समाज का स्वरूप भी बदलता हुआ दिखाई पड़ रहा है। तभी तो आज हिन्दी राष्ट्रीय या राज्यभाषा न रहकर वैश्विक स्तर की भाषा बन गई है। इसके अतिरिक्त भाषा के स्वरूप, शिक्षण संस्थानों में उसके होने वाले प्रयोग, नई शब्द रचना आदि पर गहनतापूर्वक इस लेख में विचार-विश्लेषण किया गया है। इन सभी लेखों से गुज़रने के बाद निश्चित तौर पर यह कहा जा सकता है कि मुकेश मिरोठा ने दलित साहित्य का विश्लेषण मानवीय संवेदनाओं को ध्यान में रखते हुए किया है और उनकी यह पुस्तक दलित विमर्श के विभिन्न आयामों को समग्रता से प्रस्तुत करती है।

 

मो.- 9918542556

 

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