नयी चुनौतियां साहित्य को सार्थक दिशा देती हैं: असग़र वजाहत

DSCN4250असग़र वजाहत हिन्दी के जाने माने लेखक हैं। अनेक महत्त्वपूर्ण उपन्यासों और नाटकों के रचनाकार असग़र मूलत: किस्सागो हैं। बीते दिनों उनका आख्यान बाक़र गंज के सैयदबेहद प्रसिद्ध हुआ। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम ए, पीएच डी और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली से पोस्ट डॉक्टोरल रिसर्च करने के बाद वे 1971 से जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में अध्यापक हो गए थे। लघुकथा शैली में गुरु चेला संवादजैसी चर्चित कहानियां लिखने के साथ उन्होंने सामाजिक विषयों पर भी निरंतर कलम चलाई है। वे अच्छे चित्रकार भी हैं और उन चित्रों की अनेक प्रदर्शनियां हो चुकी हैं। इधर सेवामुक्त होकर वे यात्रा आख्यान लिखने तथा विधाओं में नए नए प्रयोगों में जुटे हैं। प्रस्तुत है उनसे गणपत तेली की बातचीत – 

आज के हालात में लेखक का काम क्या कठिन हो गया है ?

देखिए लेखक के ऊपर जब कुछ पाबंदिया लगती हैं या लेखक समझता है कि वह दबाव में है तब वह दूसरे रास्ते निकालने की कोशिश करता है। इमरजेंसी के दौर में यह बिल्कुल साफ था कि स्वतंत्र अभिव्यक्ति बहुत खतरनाक साबित हो सकती है। इसलिए कुछ लेखक बिल्कुल खामोश हो गए थे। लेकिन कुछ व्यंग्य, प्रतीक, बिम्ब बनाकर अपनी बात कह रहे थे। मतलब ‘राजा का बाजा’ बजा रहे थे। आज की स्थितियों में भी कुछ चुनौतियां हैं और सचेत होने की आवश्यकता है। नयी चुनौतियां साहित्य को सार्थक दिशा भी दे देती हैं।

FB_IMG_1495253764625अभी बनास जनका आप पर केंद्रित एक विशेषांक प्रकाशित हुआ है। इस संबंध में आप क्या कहना चाहेंगे?

सबसे पहले तो मैं ‘बनास जन के संपादक की मेहनत और लगन की प्रशंसा करना चाहूंगा। मैं जानता हूं कि इस प्रकार के प्रकाशन कितना कठिन काम होते हैं। पल्लव जी ने जब यह प्रस्ताव मेरे सामने रखा था तब मुझे लगा था कि शायद मुझे इंकार कर देना चाहिए और मैंने इनकार किया भी था क्योंकि इस तरह के ग्रंथ कुछ प्रशस्ति गान से बन जाते हैं। लेकिन पल्लव जी ने वायदा किया था कि ऐसा नहीं होगा। और मुझे लगता है कि ऐसा नहीं है। अब पाठक ही बताएंगे कि कैसा बन पड़ा है।

आप तुलसीदास पर एक नाटक लिख रहे थे उसका क्या हुआ?

तुलसीदास के नाटक का एक ड्राफ्ट पूरा हो चुका है लेकिन अब मैंने उसके पूरे प्रारूप हो बदल दिया है ।

नाटक का प्रारूप क्यों बदल दिया या क्यों बदलना पड़ा?

पहले मैंने सोचा था की नाटक छोटा होगा। पृष्ठभूमि बहुत अधिक नहीं होगी। नाटक बहुत कसा हुआ और सीधे मुद्दों पर आ जाएगा और लगभग एक घंटे में समाप्त हो जाएगा। लेकिन फिर लगा कि इतने बड़े विषय पर बड़ा नाटक होना चाहिए। इसलिए नाटक की पूरी परिकल्पना को बदलना पड़ा।

यात्राओं पर आपने अनेक किताबें लिखीं हैं। इस तरफ रुझान कैसे हुआ?

यात्राओं के शौक के बारें में मै आपको बता नहीं सकता क्योंकि मैं जानता ही नहीं कि ये शौक कैसे लगा। बचपन में जब ट्रेन या बस देखता था तो एक जिज्ञासा रहती थी जानने की। फिर वामपंथी रुझान और लेखन,  नौकरी … तो ये सब छूट गया फिर जब समय मिला तो सोचा अपने पुराने शौक को पूरा किया जाए। मैं हर जगह गया। कई जगह तो खतरा उठा कर गया जैसे लद्दाख, जहाँ लोगों ने कहा कि आप इस उम्र में यहाँ अकेले क्यों आ गये ? ऊपर ऑक्सीजन की कमी से नाक से खून भी आ गया। पर अब आ गया तो आ गया। मुझे लगता है कि मैं खुद को एजुकेट करने के लिए यात्रा करता हूँ और लिखने को कुछ तथ्य तो तुरंत लिख लेता हूँ पर पूरा उसे बाद में ही नोट्स तथा कुछ लोगों की मदद ले कर करता हूँ।

आजकल आप फेसबुक पर कहानियां लिख रहे हैं इसका क्या औचित्य है? कहानियां तो साहित्यिक पत्रिकाओं में छपती और पढ़ी जाती हैं। फेसबुक पर न तो कहानी के पाठक हैं और न कहानी के आलोचक हैं, ऐसी स्थिति में आप फ़ेसबुक पर क्यों कहानियां लिख रहे हैं?

बहुत दिलचस्प सवाल पूछा है आपने। दरअसल लेखक की सबसे बड़ी चिंता यह होती है कि वह अपने लिखे पर प्रतिक्रिया चाहता है। फ़ेसबुक एक ऐसा मंच है जहां आपको आम पाठक की प्रतिक्रिया तुरंत मिल जाती है। फेसबुक पर पढ़ने वालों की संख्या मेरे ख्याल से साहित्यिक पत्रिकाओं को पढ़ने वालों से अधिक है। इसलिए बड़ा पाठक समुदाय मिलता है। एक बात और यह है कि कहानियां जिन मुद्दों की बात करती हैं वे आज के ज्वलंत मुद्दे हैं। कहानियों पर जो प्रतिक्रियाएं आती हैं उससे यह भी पता चलता है कि उन मुद्दों पर लोग क्या सोच रहे हैं।

(राजस्थान पत्रिका, 1 जून 2017)

 

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