मुक्तिमार्ग की खोज में: प्रेमचन्‍द गांधी

जुगनू को दिन के वक्‍़त परखने की जिद करें

बच्‍चे हमारे अहद के चालाक हो गए

PCGANDHIपरवीन शाकिर का यह शेर हमारे दौर के बच्‍चों की जिद ही नहीं, उनकी ख्‍वाहिशों, मासूमियत भरे सवालों और जिज्ञासाओं को बहुत खूबसूरती से बयान करता है। अब इसे चाहे आप संचार माध्‍यमों का प्रभाव कहें या कि शिक्षा और वातावरण का असर, कि हमारे दौर के बच्‍चे उन बातों को जानने लगे हैं, जिन्‍हें एक जमाने में बालिग होने तक भी नहीं लोग नहीं जानते थे। युवा लेखिका उमा का पहला उपन्‍यास ‘जन्‍नत जाविदां’ ऐसे ही ज्ञानवान बच्‍चों की मासूमियत से रचा गया एक किस्‍म का कथा-कोलाज है, जिसमें दो मुख्‍य कथाओं के साथ कई उपकथाएं हमारे समय का एक विडम्‍बनात्‍मक आख्‍यान रचती चली जाती हैं। इस आख्‍यान की सबसे खूबसूरत बात यह कि मानवीय और पारिवारिक रिश्‍तों के बीच कितना कुछ समय के अनेक दबावों से घट रहा है, वह अपने समूचे परिवेश और विश्‍वसनीयता के साथ सामने आता है।

उपन्‍यास की मूल कथा चार साल के आर्य और उसकी तलाकशुदा मां श्‍यामली के बीच उन संवादों से शुरु होती है, जिसमें बच्‍चे के वही मासूम सवाल होते हैं कि मम्‍मी को दूसरी शादी करनी चाहिए कि नहीं। श्‍यामली के पति किसी अन्‍य महिला के साथ रहने लगे और कुछ सालों की कानूनी प्रक्रिया के बाद श्‍यामली और आर्य के पिता में तलाक हो गया। आर्य अब नौ साल का हो गया है, लेकिन उसकी मासूमियत में लिपटी मानसिकता से उपजे सवाल और विचार किसी जवां मर्द की तरह है। श्‍यामली सामाजिक कार्यकर्ता है और ‘अपना’ नाम के एनजीओ में काम करती है। दो कमरों के छोटे-से फ्लैट में अकेले बच्‍चे के साथ रहना और अपने काम के साथ उसकी परवरिश करना कैसे एकल स्‍त्री साधती है, श्‍यामली इसकी मिसाल है। लेकिन बच्‍चे के मासूम सवालों के जवाब जब उसके पास नहीं होते तो वह टाल देती है और बच्‍चे को लगता है कि उसके पास पापा होते तो वे जरूर जवाब देते। ऐसे ही मासूम सवालों और जिज्ञासाओं से भरी दुनिया में श्‍यामली अपने बेटे को पालती है, जिसमें उसके पुरुष मित्र भी आते हैं, जिनमें बच्‍चा अपना संभावित पापा खोजता है। प्‍यार-मोहब्‍बत और शादी जैसे सवालों के पार निकल आई श्‍यमली को आर्य के ऐसे सवाल लाजवाब कर देते हैं और वह उसे अपनी ही तरह से शिक्षित और विचारवान बनाने की कोशिश करती है। बहुत-से पाठकों को इस बच्‍चे के सवाल और जवाब कुछ अधिक ही परिपक्‍व बौद्धिकता से भरे या कि थोपे गए लग सकते हैं, लेकिन सच में देखा जाए तो परवीन शाकिर का शेर पूरी तरह लागू होता है। क्‍योंकि हम हालिया अतीत में ही देख चुके हैं कि इंटरनेट और अन्‍य माध्‍यमों के प्रसार ने बच्‍चों को एकदम से बड़ा बना दिया है।

श्‍यामली और आर्य की कथा के समांतर दूसरी कथा मोहित और माही की चलती है, जिसमें नर्सिंग होम का मालिक डॉक्‍टर मोहित अपनी पत्रकार पत्‍नी माही के साथ उस दुनिया की झलक देता है, जिसके कारण श्‍यामली को तलाक लेना पड़ा। माही के प्रवेश के साथ उपन्‍यास पत्रकारिता के उन स्‍याह-सफेद पक्षों को भी दिखाता चलता है, जिसने पत्रकारिता का स्‍वरूप आजकल तय कर दिया है। और जब माही अपने वैवाहिक जीवन में स्‍वानुभूत दरारों को अनुभव करती है तो वह छुट्टी लेकर पति का नर्सिंग होम संभालने लगती है। इसी दौर में वह श्‍यामली से मिलती है और यह मिलन ही कहानी को अपने चरम तक ले जाता है।

इस वृतांत में एक तीसरी उपकथा चित्रकार सुभाष, पत्रकार अनिल भाटिया और रंगकर्मी सुनील की दोस्‍ती की चलती है। भाटिया के अखबार में माही नौकरी करती है और भाटिया ही सुभाष को नवज्‍योत सिंह के ‘अपना’ एनजीओ में काम दिलवाता है, जहां श्‍यामली पहले से काम कर रही है। भाटिया सुनील को भी अपने अखबार में नौकरी दिला देता है। और इस तरह ये तीन कथाएं मिलकर उपन्‍यास को आगे बढ़ाती हैं, जिसमें चौथी उपकथा ‘अपना’ एनजीओ के एक ग्रामीण स्‍वास्‍थ्‍य जागरुकता के गांव में आयोजित कैम्‍प में सामने आती है। यह चौथी उपकथा ही उपन्‍यास के शीर्षक ‘जन्‍नत जाविदां’ अर्थात ‘स्‍वर्ग निरंतर’ को रूपाकार देती है। हालांकि इस मुकाम तक आते-आते उपन्‍यास किंचित फार्मूले में बंधने लगता है, जहां लगने लगता है कि अब लेखिका इसे एक हैप्‍पी एंडिंग से ही पूरा करने की कोशिश में है। लेकिन चूंकि यह उमा का पहला उपन्‍यास है, इसलिए इसकी परख इस आधार पर की जानी चाहिए कि उमा ने नया क्‍या किया है, जो इस उपन्‍यास को किसी भी मायने में महत्‍वपूर्ण बनाता है। इस दृष्टि से जब हम उपन्‍यास को देखते हैं तो कई पहलू सामने आते हैं, जिनके आधार पर इस उपन्‍यास की पड़ताल की जा सकती है।

इस उपन्‍यास का रचाव बहुत आत्‍मीयता के साथ शुरु होता है, जहां सूक्तियों की तरह कुछ वजनदार और मानीखेज़ वक्‍तव्‍य और कविता की पंक्तियां आती हैं। जैसे शुरुआत ही इन पंक्तियों से होती है,

‘दुनिया गोल है, गोल चीज़ों के छोर पकड़ में नहीं आते, पकड़ा नहीं जा सकता, किसी कहानी का सिरा…’

जिस आत्‍मीयता के साथ उपन्‍यास का रचाव शुरु होता है, वह चुटीले संवादों और आर्य के मासूम सवालों के बीच विकास पाता है। इसमें एक और महत्‍वपूर्ण बात यह कि संवेदनाओं और भावों की सघनता और उद्दाम आवेग को दर्शाने के लिए उमा ने कर्ह जगह बहुत खूबसूरत और भावप्रवण कविताओं को माध्‍यम बनाया है। ये कविताएं नहीं असल में जिंदगी के कुछ अहम हिस्‍सों और प्रवृतियों के दार्शनिक एवं काव्‍यात्‍मक प्रगीत हैं। ये उन चीजों के बयान हैं, जिन्‍हें हम आंसू, बचपन, तन्‍हाई, स्‍पर्श आदि-आदि नामों से जानते हैं। इन काव्‍यांशों में उमा का लेखक बहुत संघनित रूप में सामने आता है।

मैं उमा को एक पत्रकार से कहानीकार के रूप में सामने आई लेखिका के रूप में अधिक जानता हूं। मित्र होने के नाते बहुत-सी पारिवारिक और व्‍यक्तिगत बातें भी जानता हूं, लेकिन उपन्‍यास पर बात करते हुए मुझे लगता है कि हमें एक लेखक की रचना को हमेशा ही उसके व्‍यक्तिगत जीवन से दूर रखकर तटस्‍थता से देखना चाहिए। इसलिए मैं जो कुछ इस उपन्‍यास के बारे में कहने जा रहा हूं, उसमें व्‍यक्तिगत मित्रता या पारिवारिकता का कोई अंश नहीं है। क्‍योंकि कोई भी रचना सिर्फ आत्‍मकथा नहीं होती, वह अनुभूत और दृश्‍यमान जगत के सर्जनात्‍मक तालमेल से ही पूरी होती है। सिर्फ आत्‍मकथ्‍य कभी मुकम्मिल रचना नहीं होती। अक्‍सर हम पराए अनुभवों की पीड़ा रचते हैं, और वे ही सबसे अच्‍छी रचनाएं होती हैं। आत्‍मानुभव कब और कैसे अपने ही रचे पात्र का जीवनानुभव बन जाता है, यह हम रचनाकार नहीं जानते। जानकार पाठक या लेखक लोग अक्‍सर ऐसे में हमारी रचनाओं से हमारी ही शव परीक्षा करने लगते हैं, हम देखते आए हैं। लेकिन मेरे लिए, उमा का उपन्‍यास हमारे समय में हमारे अपने ही बनाए मूल्‍यों और खोखले आदर्शों की शवपरीक्षा है। यह अलग बात है कि कुछ मामलों में उमा अपने आदर्शवाद को नहीं छोड़ पाती, क्‍योंकि उसके लिए समाज में एक मूल्‍यवान रिश्‍तों की व्‍यवस्‍था बहुत ज़रूरी है। उसके लिए अपनी आत्‍मा की खुशी से रचे गए रिश्‍ते बेहतर हैं। लेकिन मूल्‍यवत्‍ता के उसके अपने निकष हैं। और इन निकषों में सबसे महत्‍वपूर्ण है एक स्‍त्री का आत्‍मनिर्णय।

उमा के लिए इस पूरे उपन्‍यास में यही सबसे महत्‍वपूर्ण चीज है, जिसे बार-बार हर कोण से रेखांकित किया गया है। केंद्रीय पात्र श्‍यामली न केवल अपने जीवन में आत्‍मनिर्णय के आधार पर अपनी राह चुनती है, बल्कि माही को भी वही रास्‍ता दिखाती है और आगे चलकर गांव की महिलाओं को भी। श्‍यामली के लिए जिंदगी एक खूसूरत अहसास का नाम है, जिसे अपनी शर्तों पर जीना चाहिए। विवाह में अगर प्रेम नहीं है तो वह फिर माही-मोहित के प्रेम विवाह के बावजूद विवाह नहीं रह जाता, एक बंधन बन जाता है, जिससे मुक्ति ही स्‍त्री के नए जीवन का मार्ग है।

श्‍यामली के जीवन में तलाक के बाद आने वाले पुरुषों में उसके साथ काम करने वाला विवान है, जो उससे प्रेम करता है। लेकिन श्‍यामली के मन में उसके लिए कोई उद्दीपन नहीं है, जबकि विवान कई मौकों पर अपना प्रेम प्रदर्शित करता रहता है। उमा ने श्‍यामली और माही के चरित्र में स्त्रियों में अपने ही सौंदर्य को लेकर पाई जाने वाली उस ग्रंथि को भी खंगालने की कोशिश की है, जिसमें हर स्‍त्री की कामना होती है कि वह इतनी सुंदर तो बनी रहे कि उसका अपना पुरुष भी उसे पसंद करे और अगर कुछ मौकों पर कोई अन्‍य पुरुष उनके प्रति आकर्षित होता है तो उन्‍हें लगता है कि चेहरे का नमक अभी बचा हुआ है। बाहरी सौंदर्य को लेकर, कहना चाहिए कि यह ग्रंथि पिछले कुछ वर्षों में सौंदर्य प्रसाधनों के भयावह करोबार के दौर में बहुत बढ़ी है। उमा ने कई कोणों से इसका संधान किया है।

अनिल भाटिया और माही के माध्‍यम से उमा ने पत्रकारिता की दुनिया के उन भीतरी हिस्‍सों की पड़ताल की है, जहां खबरें ईजाद की जाती हैं। सुभाष जैसे समर्थ चित्रकार के माध्‍यम से कला की दुनिया को दिखाया है और मोहित-नैनसी के रूप में अस्‍पतालों की दुनिया के भीतर का विहंगम चित्र प्रस्‍तुत किया है। विधाणी गांव की तुलसी के रूप में ग्रामीण समाज की महिलाओं की सामान्‍य समस्‍याओं से उत्‍पन्‍न होने वाली बीमारियों और उनकी भयावह स्थिति को दर्शाया है। इस चित्रण की खास बात यह कि उमा ने इन सबकी वास्‍तविकताओं के साथ इनकी उदृदेश्‍यपरकता को भी सामने रखा है। जहां चित्रकला और पत्रकारिता भी सामाजिक विकास की प्रक्रिया का अंग बन जाते हैं। सुभाष जैसे चित्रकार के लिए श्‍यामली एक जीवित पेंटिंग ही नहीं बन जाती, बल्कि एनजीओ के प्रोजेक्‍ट से जुड़ने पर उसकी कला को एक नया आयाम भी मिल जाता है।

उदारीकरण के पिछले 25 वर्षों में भारत में बहुत से बदलाव आर्थिक ही नहीं सामाजिक और सांस्‍कृतिक स्‍तर पर आए हैं। इन बदलावों से समाज में संबंध भी बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। इस हद तक कि बच्‍चे भी अब समझने लगे हैं कि स्‍त्री-पुरुष संबंध कैसे होते हैं और कैसे होने चाहिए। इसलिए नौ साल का आर्य जब बहुत मासूमियत के साथ अपने स्‍कूल के बच्‍चों की बात शेयर करता है तो लगता है कि दुनिया कहां से कहां पहुंच गई है। लेकिन कई जगह लगता है कि लेखिका ने जबरदस्‍ती आर्य के मासूम सवालों को बड़ा बनाने की कोशिश की है। हालांकि बाद में श्‍यामली बेटे के सवालों को जस्टिफाई करने के लिए दूसरी बातें बनाती है, लेकिन यह सवाल तो बाकी रह ही जाता है कि नौ साल के बच्‍चे में किसी सहपाठी बच्‍चे द्वारा गर्ल फ्रेण्‍ड के साथ होटल में रात बिताने का खयाल भी कैसे आया होगा। आर्य के कई सवाल ऐसे हैं, जो शायद नौ साल के बच्‍चे से आप तब तक अपेक्षा नहीं कर सकते जब तक कि आप परवीन शाकिर का शेर जेहन में नहीं रखें।

उमा ने सुभाष, भाटिया, सुनील, विवान और आदित्‍य के रूप में पुरुष मानसिकता को पकड़ने की कोशिश की है। लेकिन सुभाष, भाटिया और सुनील की तिकड़ी जिस तरह हर बार मिलने पर शराब पार्टी और महिलाओं को लेकर टिप्‍पणियां करती है, वह अधूरा सच है। सभी पुरुष इस मानसिकता के नहीं होते कि हर बार मिलने पर पोर्न सिनेमा या महिलाओं को लेकर अश्‍लील टीका-टिपपणी ही करते रहें और वह भी तब, जब वे प्रतिष्ठित पत्रकार, रंगकर्मी और चित्रकार हों। उम्र के जिस दौर में ये पुरुष पात्र हैं, वहां कॉलेज वाले छात्रों की मानसिकता वाले संवाद कुछ अतिरेकी लगते हैं। संभव है कि लेखिका ने अपने चरित्रों को बिंदास दिखाने के लिए ऐसा किया हो, लेकिन ये संवाद अगर किसी अन्‍य आयुवर्ग के पुरुष पात्र के होते तो उचित लगते। सभी पुरुष क्‍लीवेज और कमर का आकार नहीं देखते, यह एक किस्‍म की कुंठित मानसिकता है, जो प्राय: ऐसे पुरुषों में पाई जाती है, जिन्‍हें महिला मित्रों का अभाव रहता है। रंगकर्मी सुनील के मुंह से ऐसी बातें अधिक कही गई हैं, जबकि रंगकर्मी और वो भी निर्देशक हो तो ऐसी मानसिकता नहीं रखता। क्‍योंकि उसे तो बहुत सारी लड़कियों और महिलाओं के साथ काम करना होता है, जहां आपसी विश्‍वास और सुरक्षा की गारंटी ही महिला कलाकारों के लिए महत्‍वपूर्ण होती है।

उपन्‍यास का शीर्षक जिस जन्‍नत की राह ले जाता है, वह और गांव के लोगों के साझा प्रयासों का रास्‍ता है। ग्रामीण समाज में शिक्षा और स्‍वास्‍थ्‍य के प्रति चेतना मोबाइल और संचार क्रांति के दौर से काफी पहले आ चुकी है। और अगर जयपुर जैसे शहर से एक घण्‍टे की दूरी का गांव हो तो वहां पहले ही बहुत से बदलाव हो चुके होंगे। लेकिन मां-बेटे के संवाद और मोहित-माही के दांपत्‍य में आई दरार को किसी मुकाम पर ले जाना तो था ही, इसलिए श्‍यामली का प्रोजेक्‍ट एक बायस बनता है, जिसमें सारे पात्र एक-एक कर मिलते चले जाते हैं। अब इस कोलाज से जो बना वह जिस जन्‍नत का रास्‍ता दिखाता है, वह चित्रकार सुभाष और श्‍यामली के बीच पनपे प्रेम पर और गांव में शुरु हुए एनजीओ के प्रोजेक्‍ट पर जाकर खत्‍म होता है। सवाल यह कि क्‍या ग्रामीण विकास का मार्ग इतना सहज है कि एक एनजीओ से ही जन्‍नती दरवाजा खुल जाएगा, नहीं यह एक शुरुआत भर है। इसलिए उमा का यह पहला उपन्‍यास भी हमारे समय में आपसी संबंधों में उभरते तनाव, संत्रास और अपने आत्‍मनिर्णय से स्‍वयं के मुक्तिमार्ग की खोज का रास्‍ता नहीं दिखाता, बस इशारा कर देता है कि इन राहों में से क्‍या चुनना है।

 

जन्‍नत जाविदां (उपन्‍यास)

लेखिका : उमा

भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्‍ली

मूल्‍य : रु.260

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