‘दुनिया को बदलने की ताकत हमेशा युवा कंधों पर ही हुआ करती है’: जयनंदन

जयनंदन का हाल ही में प्रकाशित उपन्यास ‘विघटन’ युवाओं के संघर्ष की कहानी है| युवा अपनी नई सोच और दृष्टिकोण से एक नए समाज का निर्माण कर सकते हैं लेकिन इसके लिए यह आवश्यक है कि उनमें योग्यता, कुशलता और सही निर्णय लेने की क्षमता हों| आज के युवाओ पर केन्द्रित यह उपन्यास इन्हीं ज्वलंत मुद्दों को उठाता है| कई पुरस्कारों से सम्मानित जयनंदन का यह चौथा उपन्यास है| वे कहानियां और नाटक भी लिखते हैं| प्रस्तुत है, ‘विघटन’ उपन्यास के सन्दर्भ में युवाओं के मुद्दों पर गणपत तेली की उनसे बातचीत-  

 

Jaynandanयुवाओं पर उपन्यास लिखने का विचार कैसे आया?

मेरे छोटे बेटे शाश्वत नंदन ने बिट्स पिलानी से इंजीनियरिंग करने के बाद एक्सएलआरआई से एमबीए किया। वह हमेशा बातचीत में कहा करता था कि पढ़-लिखकर हुनरमंद बने युवाओं को रोजगार के लिए सरकार का मुखापेक्षी होने से काम नहीं चलेगा। सरकारी नौकरी की एक सीमा है, लेकिन खुद से रोजगार करने की कोई सीमा नहीं है। आज उबर तथा ओला कंपनी के पास अपनी एक भी कार नहीं है, लेकिन वह विश्व की सबसे बड़ी कार सर्विस देने वाली कंपनी है। यही बात अमेजन, फिलिपकार्ट, जस्ट डायल, ओएलएक्स, पेटीयम जैसी कंपनियों पर भी लागू होती है। सिर्फ खोजी दिमाग के इंवेंटिव आइडिया से ये कंपनियां आज अरबों-खरबों में खेल रही हैं। इन दृष्टांतों को देखते हुए मुझे भी लगा कि युवाओं के लिए कुछ ऐसा लिखना चाहिए जो उन्हें आगे का रास्ता सुझा सके। दुनिया को बदलने या आगे ले चलने की ताकत हमेशा युवा कंधों पर ही हुआ करती है।

क्या देश में सबसे ज्यादा भटकाव और अनिश्चितता की स्थिति में युवा ही गुजर रहे हैं?

अनिश्चितता और भटकाव की स्थिति उन्हीं युवाओं के लिए सच है, जिनके पास कोई दक्षता नहीं है, सिर्फ एकेडमिक डिग्रियां हैं। जाहिर है ऐसे लोग एक अदद नौकरी की आस में टकटकी लगाये बैठे हुए हैं। आज प्राइवेट कंपनियों में या फिर सरकारी संस्थानों में नौकरियों की संख्या रोज ब रोज घटायी जा रही है और जॉब आउटसोर्स किये जा रहे है। आउटसोर्सिंग के जॉब लेने वाले युवा अच्छा खासा उपार्जन कर रहे हैं और वे स्वतंत्र हैं, किसी के अधीन रहने की जरूरत नहीं है। आज देखा जा रहा है कि सरकारें नौकरी देने की बजाय स्वरोजगार के अवसर देकर उन्हें प्रेरित करना चाह रही है।

लेकिन यह माना जाता है कि युवा लोग साहित्य नहीं पढ़ते।

कुछ हद तक यह सच है। अपना कैरियर बनाने के फेर में उनके पास इतनी मोहलत नहीं है कि वे साहित्य के लिए वक्त निकालें। साहित्य की पहुंच कॉलेज के हिन्दी पढ़ने वाले विद्यार्थियों और पढ़ाने वाले प्राध्यापकों तक ज्यादा है। लेकिन इसी प्रसंग में यह विरोधाभास भी उजागर होता है कि साहित्य अगर पढ़ा नहीं जा रहा तो हर वर्ष दर्जनों नये प्रकाशक और पत्रिकायें कैसे और क्यों अवतरित हो जा रही हैं। तात्पर्य यह कि पढ़ रहे हैं युवा भी। भले ही कम पढ़ रहे हैं और ऐसे लोगों की संख्या कम है। फेसबुक, सिनेमा, सीरियल और व्हाट्स अप में साहित्य के बदले हुए रूप को तो वे पढ़ ही रहे हैं।

vightanयुवाओं को अपराध के रास्ते से रोकने के लिए क्या करें?

अपराध का रास्ता वैसे युवा ही अख्तियार करते हैं जिन्हें आजीविका चलाने का कोई साधन उपलब्ध नहीं हो पाता। जो कोशिश करते-करते निराश, हताश और पराजित हो जाते हैं। इसके लिए शिक्षा के पैटर्न में भारी बदलाव की जरूरत है। दूसरी वजह है पूंजी का चंद लोगों के पास असीमित जमाव का होना। सरकार को एक सीमा निर्धारित करना चाहिए कि एक व्यक्ति के पास अधिकतम कितना धन हो।

हिंदी में इस विषय पर कम उपन्यास आए हैं। आपने यह विषय चुना तो इसके लिए प्रेरक तत्त्व क्या थे?

इस उपन्यास के प्रेरक तत्त्व सच पूछिए तो मेरे छोटे बेटे शाश्वत नंदन के विचार हैं, जिसे वह अक्सर मेरे साथ साझा किया करता है। दूसरा प्रेरणा स्रोत सामाजिक सेवाओं के लिए समर्पित स्वर्गीय सीताराम शास्त्री थे। उनके नाम पर दिल्ली में इस वर्ष किसी साहित्यकार को सम्मानित भी किया गया। वे अत्यंत परिपक्व और मंजे हुए उच्च दर्जे के बौद्धिक कार्यकर्ता थे। उनसे मेरा अक्सर संवाद होता था, जिसमें गरीब और मुख्य धारा से पिछड़े आदिवासियों के बीच काम करने का अपना अनुभव सुनाते रहते थे। एक और सामाजिक व मानवाधिकार कार्यकता श्री जवाहर लाल शर्मा हैं जो तीसरा वोटिंग राइट देने (नगर निगम गठित करने) तथा कई अन्य विभिन्न मुद्दों को लेकर आज भी टाटा स्टील और सरकार से अनेक मुकदमे लड़ रहे हैं।

आपके प्रान्त में आदिवासी युवा माओवाद से प्रभावित हो रहे हैं। इस पर आप क्या कहना चाहेंगे?

जब तक सुदूर गांवों-देहातों में विकास की हवा नहीं बहेगी और आदिवासी युवाओं को उनकी क्षमता के अनुकूल रोजगार के अवसर उपलब्ध नहीं कराये जायेंगे, यह रास्ता उन्हें आकर्षित करता रहेगा। सरकार और पुलिस को अपने काम करने के तरीके में बदलाव लाना होगा। दमन का रास्ता कभी असंतोष को कम नहीं कर सकता। जल, जंगल और जमीन से उन्हें बेदखल करेंगे तो उनका धैर्य संयमित नहीं रह सकेगा।

नए पाठकों के लिए संदेश?

संदेश यही हो सकता है कि साहित्य से वे खुद को विमुख न करें। साहित्य आपमें मनुष्यता, विवेक और धैर्य की बुनियाद को मजबूत करता है। भोजन, वस्त्र, आवास की तरह साहित्य भी एक जरूरी अवयव है जो आपके दिमाग को खुराक देता है संयमित और व्यवहार कुशल बनाये रखने के लिए। आज देखा जा रहा है कि मामूली से अपराध के लिए अथवा अपराधी होने की आशंका के तहत सैकड़ों लोग एक निरीह आदमी पर टूट पड़ते हैं और मारते-मारते नृशंसता से उसकी हत्या कर देते हैं। निश्चय ही ऐसा कारनामा वही व्यक्ति कर सकता है जो साहित्य से दूरी बनाया हुआ है।

(राजस्थान पत्रिका, 15.06.2017)

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