मुनि जिनविजय का अवदान अविस्मरणीय – प्रो हाड़ा

बनास जन व साहित्य अकादेमी के मोनोग्राफ  का लोकार्पण

चित्तौड़गढ़ 11 जून । विडम्बना हैै कि देश विदेश में भारतीय ज्ञान को पुनर्स्थापित करने वाले पद्म श्री मुनि जिनविजय की स्मृतियों को हम सहजता से सहेज नहीं पाए। गुजरात और महाराष्ट्र की धरती के बाद जन्मभूमि राजस्थान को कर्मस्थली बनाने वाले मुनि जी की परम्परा को पोषित करने वाले युवाओं की पीढ़ी को हमें आगे लाना होगा।  मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो माधव हाड़ा ने संभावना संस्थान द्वारा विजन कालेज में मुनि जिनविजय जी के साहित्यिक अवदान पर आयोजित संगोष्ठी में उक्त बात कंही । प्रो हाड़ा ने कहा कि मुनि जी आजीवन विद्यार्थी भाव से शिक्षा ग्रहण करते रहे। दो सौ से अधिक प्राचीन ग्रंथों का अनुसंधान-पाठालोचन, अनेक संस्थाओं का निर्माण और स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रहे मुनि जिनविजय का स्मरण हमारी देशज परंपरा को समृद्ध करता है। हमारी स्मृति और संस्कार में हमारा जातीय साहित्य नहीं है। मुनि जिनविजय का सबसे महत्त्वपूर्ण अवदान यह है कि वे यूरोपीय समझ के समानांतर भारतीय ज्ञान और परंपरा की पुनर्प्रतिष्ठित करते हैं।
आयोजन में साहित्य अकादेमी, भारत सरकार की प्रतिष्ठित श्रृंखला में प्रो हाड़ा द्वारा मुनि जी पर लिखित मोनोग्राफ तथा मुनि जी पर केंद्रित साहित्यिक पत्रिका बनास जन के विशेषांक का लोकार्पण भी किया गया। आयोजन में दिल्ली से आए बनास जन के संपादक डॉ पल्लव ने हिंदी साहित्य के इतिहास के पुनर्लेखन में मुनि जी के कार्यों के महत्त्व का प्रतिपादन किया।  डॉ पल्लव ने कहा कि उनके नानाजी स्वतंत्रता सेनानी रामचन्द्र नन्दवाना मुनि जी के निकट संपर्क रहे थे। संगोष्ठी में आकाशवाणी के कार्यक्रम अधिकारी लक्ष्मण व्यास ने प्रो. हाड़ा तथा डॉ. पल्लव के साथ संवाद करते हुए मुनि जी के व्यक्तित्व और कृतित्व के अनेक पहलुओं का उद्घाटन किया। राजस्थान विश्वविद्यालय में सहायक आचार्य डॉ रेणु व्यास ने भारतीय ज्ञान पर यूरोपीय समझ के हावी होने की प्रवृत्ति पर चर्चा करते हुए मुनि जी की आत्मकथा को हिंदी गद्य की अनुपम कृति बताया। परिसंवाद में एडवोकेट भंवरलाल शिशोदिया, सर्वोदय साधना संघ के नवरतन पटवारी, आलोचक सत्यनारायण व्यास तथा कवि रमेश मयंक ने भागीदारी की। संभावना के अध्यक्ष डॉ. के सी शर्मा ने कहा कि नगर में आयोजित होने वाली साहित्यिक सँगोष्ठियां हमें देशज संस्कृति के निकट ले जाती हैं। इससे पहले संभावना के संयोजक डॉ कनक जैन ने मुनि जी पर प्रकाशित मोनोग्राफ और बनास जन के विशेषांक का परिचय दिया। आयोजन में श्रमिक नेता घनश्याम सिंह राणावत, गीतकार रमेश शर्मा, डॉ. राजेश चैधरी, डॉ. अखिलेश चाष्टा, मुन्नालाल डाकोत, बाबू खां मंसूरी, डॉ. साधना मण्डलोई, गोपाल जाट, पूर्णिमा चारण,विकास अग्रवाल, पवन पटवारी, कृष्ण कांत दशोरा, डॉ दीप्ति रस्तोगी सहित पत्रकार, साहित्य प्रेमी और युवा उपस्थित थे

एकीकरण से लेकर बुद्ध महावीर के जन्म निर्धारण में योगदान

संगोष्ठी के दौरान खुली परिचर्चा में प्रो. हाड़ा ने मुनि जी के अवविस्मरिणय योगदान को रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि महात्मा बुद्ध और महावीर स्वामी के जन्म निर्धारण के लिए मुनि जी के अध्ययन और अन्वेषण का सहारा लिया गया। राजस्थान के एककीकरण के समय माउंट आबू के संदर्भ में तथ्य संकलन समिति के अध्यक्ष रहते हुए मुनि जी ने प्रमाणों के आधार पर साबित किया की माउंट आबू पर राजस्थाना का अधिकार बनता है। इसी आधार पर गुजरात से माउंट आबू राजस्थान में मिला ।

पाठ्यक्रम का हिस्सा बनें मुनि जी

खुली परिचर्चा में कई साहित्यिक विद्याार्थियों की जिज्ञासा थी कि विभिन्न भूमिकाओं में मुनि जी ने प्राचीन साहित्य को संचित और विश्लेषित करने में अपना पूरा जीवन लगा दिया फिर भी साहित्य के विद्यार्थी व्यापक रूप  में  मुनि जी के योगदान को पाठ्यक्रम में क्यो नहीं पढ़ पाते? इस पर प्रो. हाड़ा ने कहा कि पाठ्यक्रम का अंग बनने की योग्यता रखने क वाबजूद भी पाठ्यक्रम में शामिल होने की जटिल और सैद्धांतिक प्रक्रिया होने से यह संभव नहीं हो पा रहा है। चित्तौड़गढ़ में स्थित सर्वोदय साधना संघ इस दिशा में सार्थक प्रयास कर शोधार्थियों के लिए मुनि जी साहित्यिक सामग्री को सहजता से उपलब्ध करवा सकता है।

प्रस्तुति- विकास अग्रवाल /डाॅ. कनक जैन- 9414374339/9413641775

Banaas Jan 393, Kanishka Appartment C & D Block Shalimar Bagh Delhi- 110088 Phone- 011-27498876

 

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