सूफी काव्य : रहस्यवाद का रहस्य-गणपत तेली

हमारे धार्मिक विश्वासों, सामाजिक संस्थाओं, हमारी जीवन शैली, हमारे साहित्य, हमारी भाषाओं और कई अन्य पहलुओं पर भक्तिकाल का पूरा प्रभाव रहा है। इसने धार्मिकता को बहुरंगी बनाया और यह मानवमात्र की समानता अवधारणा का पक्षधर था- इसने जाति-प्रथा को नकारा, धर्म के बंधन तोड़े, इसने प्रेम की शिक्षा दी- ईश्वर के प्रेम की, मानवमात्र के लिए प्रेम की, जीवन के सिद्धांत के रूप में प्रेम की। वैसे तो प्रेम की अभिव्यक्ति कमोबेश भक्तिकाल के सभी कवियों के यहां मिल जाती है, लेकिन सूफियों के यहां इस प्रेम तत्त्व की प्रधानता है, इसी वजह से इन्हें प्रेममार्गी भी कहा जाता है। सूफियों के यहां प्रेम के अध्ययन में यह बात महत्त्व देकर कही जाती है कि इनका प्रेम इश्क-ए-मजाजी से इश्क-ए-हकीकी का प्रेम है, यानी इनका प्रेम लौकिक से अलौकिक की ओर जाता है। दूसरे शब्दों में, इनका यहां दिखाई देने वाले प्रेम की अभिव्यक्ति प्रतीकात्मक रूप से आत्मा-परमात्मा के बीच का प्रेम है, जिसे माधुर्य भाव की भक्ति भी कहा गया है। इस माधुर्य भाव की भक्ति का हमारी काव्य-परंपरा में महत्त्वपूर्ण स्थान है, फिर भी इस काव्य के कई ऐसे सामाजिक संदर्भ हैं, जिन्हें हम आत्मा-परमात्मा के प्रेम के नाम पर रहस्यवाद के घेरे में परिभाषित करते हैं। संत कवियों की कविताओं की भी ऐसी व्याख्याएं हुई हैं, कबीर और मीरां की भी ऐसी व्याख्याएं हुर्इं और सबसे ज्यादा सूफियों की हुई।

सूफी कवियों के यहां पर जो हमें कुछ पद हमें ऐसे मिलते हैं, जिनमें कोई प्रतीक नहीं है, बल्कि उनके सीधे-सीधे सामाजिक संदर्भ हैं, और कबीर की तरह इतने प्रखर कि आज भी कोई विरला ही ऐसा साहस कर पाए। उदाहरण के लिए पंजाबी के मशहूर सूफी कवि बुल्ले शाह ने अपनी एक कविता में कहा कि

बुल्लिया, तैनू काफर काफर आखदे

तूं आहो, आहो आख!

यानी, बुल्ले शाह, तुम्हें लोग काफिर काफिर कहते हैं, बुल्ले शाह का जवाब होता था- जाओ उन्हें कह दो, मैं हूं काफिर, मैं काफिर।

दूसरी तरफ ऐसे पद हैं, जिन्हें हम इश्क-ए-मजाजी से इश्क-ए-हकीकी की ओर अर्थ देने वाले पद समझते हैं, लेकिन उन पदों में हमें स्पष्ट रूप से लौकिक अर्थ की प्रतीति होती है। अमीरो खुसरो का एक लोकप्रिय पद दृष्टव्य है:

छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाइके

प्रेम बटी का मदवा पिलाइके

मतवाली कर लीन्ही रे मोसे नैना मिलाइके

गोरी गोरी बइयां, हरी हरी चूड़ियां

बइयां पकड़ धर लीन्ही रे मोसे नैना मिलाइके

बल बल जाऊं मैं तोरे रंगरेजवा

अपनी सी कर लीन्ही रे मोसे नैना मिलाइके

खुसरो निजाम के बल बल जाए

मोहे सुहागन कीन्ही रे मोसे नैना मिलाइके।

इस पद का साधारणतया भाष्य यही किया जाता है कि ईश्वर रूपी प्रियतम से साक्षात्कार होने के बाद बाहरी दिखावा सब छूट जाता है, और आत्मा रूपी प्रेयसी परमात्मा रूपी प्रेमी से एकाकार होती है। लेकिन इस पद को हम सांसारिक प्रेम के अर्थ में भी देख सकते हैं कि कोई महिला अपने प्रेम का वर्णन कर रही है। जब उसने अपने प्रियतम की आंखों में देखा तो वह सांसारिकता या धार्मिकता भूल गई। और इस पद में आने वाले कलाइयों-चूड़ियों का प्रसंग भी लौकिक मिलन की ओर संकेत करता है।

मिलन के प्रसंग का वर्णन करते पदों में खुसरो के यहां हमें जिस तरह मिलन के प्रसंग दिखाई देते हैं, उनसे उनके लौकिक संदर्भों की उपेक्षा करना मुश्किल हो जाता है। मसलन, इस पद में प्रेयसी की आकांक्षा देखे:

खुसरो बाजी प्रेम की मैं खेलूं पी के संग

जीत गई तो पिया मोरे हारी पी के संग।

इस पद में नायिका की आकांक्षा प्रेम की बाजी खेलने की है, प्रेम-भक्ति में यह निषेध भी नहीं है, कृष्ण और राधा प्रसंग में हम यह देख भी चुके हैं। फिर भी प्रियतम के साथ प्रेम की बाजी खेलने की आकांक्षा के लौकिक संदर्भ की अवहेलना नहीं की जा सकती। इसी तरह एक अन्य कविता में प्रेयसी अपने प्रियतम को अपनी आंखों में बुलाते हुए कहती है:

आ साजन मोरे नयनन में, सो पलक ढाप तोहे दूं

न मैं देखूं और को, न तोहे देखन दूं।

यह पद सांसारिक प्रेम की अभिव्यक्ति के अधिक करीब है, बनिस्बत भक्ति के। जिस तरह ‘श्रद्धा और भक्ति’ निबंध में रामचंद्र शुक्ल प्रेम और भक्ति/ श्रद्धा का फर्क बताते हैं, अगर उसे ध्यान में रखें, तो शायद यह पद भक्ति के दायरे में परिभाषित न किया जा सके। रीतिकाल में स्पष्ट रूप से राधा-कृष्ण के नाम पर शृंगारिक कविताएं लिखी गर्इं। उनकी कविताओं का स्पष्ट उद्देश्य ही शृंगार था, राधा-कृष्ण का तो महज नाम था। विद्यापति की पदावली के राधा-कृष्ण भी ईश्वरीय न होकर आम नायक-नायिका थे। राधा-कृष्ण के बहाने किए गए उक्त प्रेम वर्णन को हम भक्ति कविता नहीं मानते, न ही इसे रहस्यवाद मानते हैं। कहीं इसका कारण यह तो नहीं कि रीतिकाल का शृंगारिक वर्णन पुरुष दृष्टि से किया गया वर्णन है। दूसरी तरफ, सूफी कविता में स्त्री अपनी आत्माभिव्यक्ति करती है, यह अभिव्यक्ति प्रेम और प्रेम से जुड़े प्रसंगों की है। और, इन्हीं प्रसंगों में जहां आत्मा-परमात्मा के संदर्भ पर बल दिया जाता है और रहस्यवाद भी आ जाता है।

सूफियों के यहां आए इस प्रेम तत्त्व पर इतना बल दिया गया है कि हमारे सामने इनकी छवि दुनिया से निरपेक्ष प्रेम के गीत गाने वाले ऐसे फकीरों की बनती है, जिनका समाज से कोई लेना-देना न हो, जबकि सूफियों ने समाज में समन्वय पर बल दिया, कट्टरता के खिलाफ आवाज उठाई। और तो और, वे राजनीति से भी निरपेक्ष नहीं थे। उस समय के बादशाह को ताना देने का साहस भी सूफियों ने किया था- ‘वीराने में राजा बन कर बैठा है’, तो ‘हनूज दिल्ली दूरअस्त’ कहने का साहस भी सूफियों में था।

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि सूफी कविता में अभिव्यक्त संवेदना, खासकर प्रेम संवेदना को महज रहस्यवादी और आत्मा-परमात्मा के प्रेम के रूप में परिभाषित किए जाने के कारण इन कवियों के सामाजिक संदर्भ दब गए हैं। सामाजिक संदर्भों के साथ-साथ स्त्री-पुरुष के बीच के प्रेम की अभिव्यक्ति और स्त्री का प्रेम निवेदन करना वर्चस्व की संस्कृति में स्वीकार्य नहीं हो सकता है। सूफी कविता की रहस्यवादी व्याख्या पर दिया गया यह अतिरिक्त जोर उसके लौकिक संदर्भों की अवहेलना करता है।

Jansatta, 21.08.16

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