‘हम भी मुँह में ज़बान रखते हैं…’ : निरंजन सहाय

Niranjan Sahayभारत में जेंडर के बारे में नये तरीक़े से सोच-विचार की प्रक्रिया बहुत पुरानी नहीं है । लेकिन उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध के दशकों से ही आधुनिक संदर्भों में स्त्रियों की मौजूदगियों को पहचानने और स्थापित करने की मुहिम शुरू हो चुकी थी । आम तौर पर लंबे समय तक सत्ता पर काबिज रहने वाले मुस्लिम आभिजात्य की आधी आबादी के बारे में हमारी समझ इस कदर सतही रही कि हम लगभग यह मान बैठे कि यह तबका पर्दानशीं और खुद के दायरे तक ही महदूद रहा । यह भी कि इन औरतों की सबसे बड़ी कोशिश यही होती थी कि मर्दों की नुमाइंदगी में फ़ना हो जाने को ही जीवन की सबसे बड़ी हकीक़त मानें । लेकिन अस्ंवेदनशील शासन और सामाजिक  व्यवस्था के पैरोकारों और् वर्चस्ववादी समूहों की असलियत को पहचानने , बेनकाब करने और भविष्य की स्त्री भूमिकाओं को रेखांकित करने में मुसलमान महिलाओं की भूमिकाओं का एक शानदार सिलसिला भी रहा है । निरंतर ने इस सिलसिले को बखूबी पहचाना और अपने शोधपरक अभियानों के द्वारा तस्वीर के उस पहलू को प्रकट किया जो अबतक लोगों की नज़र में ओझल ही थी | संस्था ने अपने शोधपरक निष्कर्षों को जिस किताब के अंतर्गत शामिल किया है वह हाल ही  में ` कलामे निस्वाँ ‘ नाम से प्रकाशित हुई है | कलाम यानी कथन और निस्वां (निसवा) का मतलब है – महिलाएँ | अन्य शब्दों में कहें तो महिलाओं के कथन | शोध और संकलन हुमा खान का है , सम्पादन पूर्वा भारद्वाज ने किया है |

ऐसा नहीं है कि महिलाओं की दुनिया में अपनी आवाज़ को प्रकट करने का सिलसिला नहीं रहा | पर यह भी सही है की स्त्री विमर्श की रोशनी में नए तरीक़े से उन आवाज़ों को फिर से पहचानने की कोशिशों ने समझ के अनेक गवाक्षों को समकालीन सामाजिक – सांस्कृतिक , शिक्षायी और सियासी मंजरो के आलोक में प्रकट किया |  कलामे निस्वाँ के विभिन्न संदर्भ हैं , जिन्हें चार मुख्य शीर्षकों में विभाजित किया गया है – दुनिया जहान , हाल हवाल , तर्ज़े तालीम , सरगर्मियाँ | इन शीर्षकों को अनेक उपशीर्षकों में भी विभाजित किया गया है | जिनपर संदर्भानुसार विस्तृत चर्चा की जाएगी | किताब के आरम्भ में अपनी बात के माध्यम से पुस्तक की ज़रूरत , दृष्टिबिन्दु सिद्धांत और अन्य सन्दर्भों का विश्लेषण किया गया है | प्रायः हिंदी पुस्तक संसार में किताबों के दृष्टिबिन्दु सिद्धांतों की चर्चा नही की जाती , चलन इस तरह का है कि लेखों / अध्यायों के विवरण , धन्यवाद अदायगी की रस्म से प्रस्तावना का काम सम्पन्न कर दिया जाता है | पर कलामे निस्वाँ इस अर्थ में अलग और विशिष्ट है | किताब की यह मान्यता है कि सृजन और अभिव्यक्ति की हर कोशिश गहरे अर्थ में राजनीतिक होती है | वर्ग की अवधारणा ने समझ और विश्लेषण के वितान का विस्तार किया, पर नारीवादी सिद्धान्तकारों ने इस समझ को और आगे बढ़ाया , सम्पादक ने फ्रांचेस्का ऑर्सीनी के हवाले बेहद माकूल टिप्पणी की है , `जेंडर भी सामाजिक विभेद का एक प्रकार है और यह अधीनता और हाशियाकरण की ओर ले जाता है | वे लोग जो व्यवस्था के भीतर हाशिए पर हैं ( यानी औरतें ) उनके पास जेंडर की संरचनाओं की ज़्यादा और मजबूत और पूर्ण समझ हो सकती है |’ आगे सम्पादक ने किताब के दृष्टिबिन्दु सिद्धांत को और भी स्पष्ट किया है ,` नारीवादी दृष्टिबिन्दु सिद्धांत कहता है कि अन्य उत्पीड़ित समुहों की तरह औरतों की सामाजिक अवस्थिति न सिर्फ औरतों के खुद के ज्ञान के स्रोत हैं , बल्कि वो अवस्थति बाक़ी प्रकृति और सामाजिक संबंधों के ज्ञान का स्रोत भी हैं | इसका यह मतलब हरगिज नहीं कि औरतों के अनुभवों या उनकी ज़िदगियों का सारत्त्वीकरण कर दिया जाए | उनमें विविधता है जो कलामे निस्वाँ की रचनाओं से भी सामने आती है | ‘ जाहिर सी बात है कि दृष्टिबिन्दु सिद्धांत के निर्धारण के समय ही सम्पादक ख़ास तौर पर सचेत हैं कि सरलीकरण के फौरी आकर्षणों से बचते हुए  स्वरों की विविधता का विशेष ध्यान रखा जाय | अपनी बात में हिंदी–उर्दू के परस्पर विरोध की उस भूमिका को रेखांकित किया गया है , जिसके चलते हिंदी , उर्दू जनक्षेत्रों का निर्माण 1873से 1900  के बीच विशेष रूप से हुआ था | यह वही दौर है , जिस समय संयुक्त प्रांत और बिहार में  सरकारी काम काज की भाषा के रूप में उर्दू , हिंदी में किसको स्वीकृति मिले इस बात पर घमासान मचा हुआ था | हिंदी जनक्षेत्र का निर्माण और विकास कैसे हुआ इस पर अनेक शोधपरक काम हुए , लेकिन उर्दू जनक्षेत्र पर फ़िलहाल कोई किताब उपलब्ध नहीं है |   किताब एक महत्त्वपूर्ण तथ्य की ओर हमारा ध्यान आकर्षित कराती है , वह यह कि , 20 वीं सदी की शुरुआत के साथ राष्ट्रवादी आन्दोलन और सुधारवादी एजेंडा ने जिस तरह हिंदी पत्रकारिता को प्रभावित किया था वैसे ही उर्दू पत्रकारिता को भी किया था | पर उर्दू जनक्षेत्र की निजी विशेषताएँ भी थीं | अपनी बात शीर्षक भूमिका में उन स्त्री केन्द्रित उर्दू पत्र–पत्रिकाओं पर एक मुकम्मल नज़र डालने की कोशिश भी हुई है , जो 1822 से 1906 के बीच छपीं | उन पत्रिकाओं में कुछ मुद्दे सामान रूप से मौजूद थे , मसलन – औरतों के अधिकार , औरत – मर्द के बीच बराबरी का मसला , सामाजिक – राजनीतिक मुद्दों पर औरतों की राय आदि | उर्दू की इन पत्र – पत्रिकाओं में जो ख़ास बात हिंदी पत्र – पत्रिकाओं से मिलती जुलती  थी , वह थी पितृसत्तात्मक ढाँचे के अनुरूप औरतों को ढालने की मजबूत कोशिश |

kalame niswan`अपनी बात का एक उल्लेखनीय पहलू है उर्दू लेखन संसार में औरतों की शिक्षा से जुड़े मसलों का विश्लेषण, उपशीर्षक है तरबियत , यानी शिक्षा–दीक्षा | औपनिवेशिक सरकार, राष्ट्र की उभरती अवधारणा, आधुनिकता की माँग – ये औरतों की शिक्षा से जुड़े कुछ अहम् मसले थे | औरतों की तालीम के मुद्दे पर काम करने वाले लोग दोनों तरह के थे – आधुनिक ख़याल वाले भी और पारम्परिक भी | उस दौर में वे यथास्थितिवादी जिनका उत्पादन पर नियंत्रण था , उनके द्वारा उन किताबों को जाहिरन ज़्यादा पसंद किया गया और अधिकाधिक प्रकाशनों द्वारा आगे बढ़ाया गया  जिनमें धार्मिक और सामाजिक ढाँचे को चुनौती नहीं दी गयी थी | उदाहरण के लिए `बहिश्ती जेवर’ ( मौलाना अशरफ अली थानवी , 1905 ) , बकौल मुबारक अली इसकी रचना का उद्देश्य था औरतें इसे पढ़कर आसानी से पुरुषों की श्रेष्ठता स्वीकार करा लें | ऐसी किताबें आसानी से पाठ्यपुस्तकों का हिस्सा भी बन जातीं थीं | उस दौर की वे किताबें , जिहोंने तालीमे निस्वाँ यानी शिक्षायी संवाद का माहौल तैयार किया उनमें – ` इंशाए हादिउन निसा’ ( औरतों के चिट्ठी लिखने के तरीके 1875 ) , ` लुगतउन निसा’ ( बेगमाती ज़बान का संकलन 1907 ) | इस लिहाज से कुछ पत्रिकाएँ भी उल्लेखनीय थीं , मसलन – `रिसालाए बाग़े निस्वाँ’ ( हैदराबाद ) ,` क़िताबे निस्वाँ ‘, ` हिसाबे निस्वाँ `,` अदबे निस्वाँ ‘ आदि | पर अभी भी औरतों को केंद्र में रखकर लिखी जा रही रचनाओं में औरतों की आवाज़ों का शामिल होना बाक़ी था | इस दौर में इस लिहाज से कुछ घटनाओं ने फिज़ा बदलने का काम किया | 19 अक्तूबर 1906 ई. को वाहिद जहां बेगम की निगरानी में शेख़ अब्दुल्ला ने अलीगढ़ में जनाना मदरसा शुरू किया | उसी तरह 1908 में भोपाल की बेगम सुल्तान जहाँ बेगम ने ऑल इंडिया एजुकेशनल कान्फ्रेंस से भोपाल  में लड़कियों के स्कूल की पाठचर्या और पाठ्यपुस्तकें बनाने की पेशकश की थी | उस समय की कुछ दिग्गज मुस्लिम महिलाओं ने हवा के रुख को बदलने में महती भूमिका निभाई , इनमें रुकैया सख़ावत हुसैन , सुगरा हुमायूँ मिर्ज़ा , नज़र सज्जाद हैदर , रशीद जहाँ , इस्मत चुगताई आदि का नाम ख़ास तौर पर उल्लेखनीय है |

दीगर यह है कि फिज़ा में एक बदलाव की बयार थी जिसका लक्ष्य था तालीम की राह चलकर आज़ादी के सूरज की तपिश को महसूस करना | इन आज़ाद ख़याल औरतों के हौसले जितने ऊँचे थे , मर्दवादी व्यवस्था की बंदिशें भी उतनी ही तंग थीं | यह मुश्किल और चुनौतीपूर्ण था कि औरतों के उन स्वरों को संकलित किया जाय , जो औरतों द्वारा औरतों को केंद्र बना कर लिखे गए | बकौल संपादक ` कलामे निस्वाँ ‘ में ` तहजीबे निस्वाँ ‘,` इस्मत ‘, ` आवाज़े निस्वाँ ‘ , ‘ पयामे उम्मीद ‘ और ` उस्तानी ‘ से लिए गए मज़मून हैं | इन सबा पत्रिकाओं में सिर्फ औरतों के मजमून नहीं छपते थे , मगर हमने  कलामे निस्वाँ में सिर्फ औरतों के लिखे हुए को ही शामिल किया है | हम उनके दृष्टिबिंदु को , उनके खयालात को सामने लाना चाहती थी जिन्होंने कभी रोशनी देखी थी , पर अब उनपर गर्द पड़ गयी है | ‘ गर्द को हटाकर जो रोशनी के कतरे देखे गए बरास्ते कलामे निस्वाँ उसे समझना दिलचस्प और विचारोत्तेजक अनुभव है |

किताब का पहला हिस्सा दुनिया जहान उन स्त्रियों की अभिव्यक्तियों  पर आधारित है , जिन्होंने देश – विदेश के बारे में अपने अनुभवों को साझा किया है | इसी खंड के दूसरे भाग शख्सियत में हुस्न आरा बेगम , आराम जान बेगम , मलिका बोडसिया , रानी मीराँ बाई , ताराबाई जैसी महिलाओं के अविस्मरणीय योगदान की चर्चा है | हाल हवाल के भी दो हिस्से हैं – रहन सहन और रस्मो रिवाज | इस खंड का दूसरा हिस्सा ख़ास तौर पर उल्लेखनीय है | महिलाओं की ज़िन्दगी पर लेखिकाओं की नज़र सूक्ष्म ब्योरों को भी दर्ज करती है | किताब का दावा है कि पत्रिकाओं में शामिल मजहबी लेखों को छोड़ दिया गया है | ( पृष्ठ xx ) यह सही भी है , लेकिन जैसे हिंदी के पुनर्जागरण में प्रतिक्रियावादी स्वरों का भी असर था , वैसे ही उर्दू का संसार भी था | अच्छा होता यदि उन जटिलताओं को भी उभारा जाता | मसलन ` ज़नाना लिबास ‘  शीर्षक लेख ( मीम. फे. बेगम ) इस स्थापना के साथ आगे बढ़ता है की लिबास का रिश्ता जलवायु से होता है –` हर कौम अपना तर्जे मुआशरत अपने आराम और आसाइश से कायम कराती है जिसमें आबो हवा और मक़ामी असबाब का बहुत ज़्यादा लिहाज़ किया जाता है | ‘ पर लेख तालीमयाफ्ता बहनों के नए तौर तरीकों के पहनावे पर अफसोस जाहिर करता है और गुजारिश करता है कि ` मेरा ख़िताब सिर्फ मुसलमान बहनों से है और चुँकि इस सवाल को एक महदूद फिरके से ताल्लुक है , इसलिए मैं सवाल करती हूँ कि बहनों अगर हम तुम अपना अरबी लिबास इख्तियार करें तो क्या ख़राबी है | ‘ 1910 ई. में ज़ेहरा द्वारा लिखित ` आपबीती ‘ बेमेल विवाह के अस्वीकार के साहस का आह्वान कराती है , इस लिहाज से यह बयान तरक्कीपसंद है , जो उस दौर में आमतौर पर नज़र नहीं आती , ` बहनों ! जब कभी तुम्हारी मर्ज़ी के खिलाफ कोई शादी तजवीज़ हो फौरन इनकार कर दो | इसकी कतई परवाह न करो कि माँ – बाप हमारे ख़ुश होंगे या नाख़ुश | ‘ खाप पंचायतों के दौर में यकीन नहीं होता कि जीवन के बारे में ऐसी स्वाधीन राय की चिनगारी सौ साल पहले ही भड़क चुकी थी |

‘तर्जे तालीम ‘ किताब का उल्लेखनीय अंश है | इस अंश पर तफ्शीश से बात करने की ज़रूरत है | इस अंश के तीन हिस्से हैं – निसाब व इदारे , बहस व मुबाहसा , और हासिल जमा | ` मिस्री युनिवर्सिटी का शोबए तालिमे निस्वाँ ‘ ( सैयदा मुसा नाबविया , 1911 ) औरतों – मर्दों की बराबरी के बारे में साफ राय जाहिर करती है , लेख की स्थापना है कि जो कौम बराबरी के इस फलसफे को नहीं मानती उसे गुलाम तक बनना पड़ता है , ` हिन्दुओं ने औरतों को गुलाम बनाने में हद से ज़्यादा मुबालगा किया | उनकी वहशियाना रस्मों में से एक रस्म ये भी थी की जब शौहर मारा जाए तो औरत भी उसके साथ जल जाए | इससे मालूम होता है कि हिन्दुओं का ये एतेक़ाद था कि औरत सिर्फ इसलिए पैदा की गई है की वो अपने शौहर की लौंडी बनी रहे | और जब वो मर गया तो उसकी ज़िन्दगी की ज़रूरत ही नहीं | …… बड़े – बड़े लोग अपनी बीवियों को जुए में हार जाते थे गोया मिस्ले माल उनको भी बाज़ी में लगा देते थे | इसका नतीजा ये हुआ की हिन्दू हमेशा अजनबी कौमों के ग़ुलाम बने रहे | ‘ यह लेख उन आवाजों से जिरह करता है जो यह मानती है की औरतों  और शिक्षा का कोई रिश्ता नहीं , ` जो लोग कहते हैं कि क्यों औरतों को आला तालीम दी जाए , क्या वो क़ाज़ी व मुफ्तीं बनेंगी ? उनसे कह दो की इल्म ही तमाम खूबियों की जड़ है | इंसान बिला तालीम के इंसान नहीँ बन सकता | ‘ इतना ही नहीं लेखिका स्वनिर्णय के पक्ष में अपनी राय जाहिर करती हैं ,` इल्म तुम्हारे दिमाग को रौशन कर देगा और तुम्हें खुद ब खुद मालूम हो जाएगा कि आइन्दा तुम्हें क्या करना चाहिए | ‘ तालीम के मुताल्लिक चंद नुकत ‘ ( अहलिया सैय्यद हुमायूँ मिर्ज़ा , 1919 ) लेख में तालीम से जुड़े कई पहलुओं ( मसलन – तालीम क्या है , तालीम कब शुरू करनी चाहिए , किस तरह करनी चाहिए ) की चर्चा है | ` प्राइमरी तालीम ‘ ( मिसेज बरलास , 1935 ) में जापान की उस प्राइमरी तालीम का वर्णन है , जिसमें रोज़मर्रा की ज़िन्दगी से जुड़े मसलों , मसलन व्यक्तिगत , सार्वजनिक सफाई आदि का ज़िक्र है | इसी खंड में ` बहस मुबाहसा ‘ के अंतर्गत शामिल लेखों में विभिन्न सामाजिक – सांस्कृतिक और शिक्षायी मसलों का वर्णन है , जिनका उद्देश्य है बदलाव की आवाजों की हिमायत करना | ` पर्दा और तालीम ‘ ( तहज़िबुन्निसा बी.ए. 1935 ) लेख यह बहस करती है कि जो लोग औरतों को परदे का हवाला देकर तालीम से वंचित रखना चाहते हैं , वे लोग दरअसल जाहिल हैं , चाहे वे मज़हबी रंग में ही क्यों न रंगे हों | ऐसे ख़याल रखने वाले पर लेखिका की राय है , ` वो हमेशा अपनी मुश्किलात के लिए इन जाहिल मौलवियों के पास जाते हैं जिनको वो हर इल्म में उम्र भर सिखा – पढ़ा सकते हैं | ‘ ‘ हासिल जमा ‘ खंड में अंग्रेजी तालीम , स्त्री – अधिकारों जैसे संवेदनशील मुद्दों पर साहसपूर्वक बहस की गई है | तालीम से हासिल रोशनी कैसे तमाम मुश्किलातों से निजात दिलाती है , इससे जुड़े अनेक मसलों पर विचार किया गया है |

`सरगर्मियाँ ‘ सियासत से जुड़ी औरतों और अन्य सियासी मसलों पर औरतों के विचार को मजबूती से प्रकट करता है | इसे दो हिस्सों में बाँटा गया है – तहरीक और फिक्रो नज़र | इस हिस्से में हिन्दुस्तान की तत्कालीन स्थिति , इंग्लैंड की औरतों के आँदोलन जैसे नए मसलों पर गंभीरतापूर्वक विचार किये गये हैं |

‘कलामे निस्वाँ’ एक ज़रुरी किताब है | पहली बात तो यह कि यह अपने ढंग का अकेला ऐसा संकलन है , जिसमें स्त्रियों की उन आवाजों को संकलित किया गया है जिनका फैलाव आधी सदी ( 1900 से 1951 ) से भी ज़्यादा है |  दूसरी बात यह कि इन आवाजों में विविधताएँ हैं | तीसरी बात यह कि पूरी किताब की आतंरिक लय में दो आवाजें शुरू से आखीर तक शामिल है –  इल्म (शिक्षा) और जदीदियत (आधुनिकता) का नज़रिया| किताब की प्रस्तुति आकर्षक है|

किताब – कलामे निस्वाँ
संपादन – पूर्वा भारद्वाज
संकलन – हुमा खान
प्रकाशन – निरंतर, दिल्ली, 2013

dr.niranjan.sahay@gmail.com

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