उत्पीड़न का विकल्प-जन प्रतिबद्ध सृजन: निरंजन सहाय

क्या ज्ञान कि कोई प्रक्रिया अराजनीतिक हो सकती है ? बदलाव के आदर्श और व्यवहारवाद के नज़रिए में तनाव या द्वन्द्व की क्या कोई भूमिका होती है ? धर्म के रूपक कैसे पुरुष वर्चस्व और सत्ता की तरफदारी में अपनी सारी मेधा का उपयोग करते हैं ?  क्या समाज में सक्रिय कोई भी नज़रिया एक राजनीतिक दृष्टिकोण का प्रतिफल नहीं होता ? वे समूह जिन्हें ज्ञान की दुनिया ने अपना न बनाया क्या उनके लिए क्या व्यवस्था ने वही परिस्थितियाँ मुहैया करायी गयीं , जिन्हें वर्चस्ववादी समूहों को दिया गया ? नैतिक आदर्श की रूपक कथाएँ या धार्मिक आदर्श की कथाएँ कैसे वर्चस्ववादी समूह के हितों की रक्षा करती हैं ? इतना ही नहीं वे वंचित समूहों के दुर्दिन के लिए प्रारब्ध के ढोल पीट उनकी स्थिति को जायज ठहराने का प्रयास नहीं करती ? ऐसे तमाम मुद्दों के आलोक में मशहूर शिक्षाशास्त्री पाउले फ्रेरे की पुस्तक ‘ उम्मीदों का शिक्षाशास्त्र ’ पढ़ना एक विचारोत्तेजक और स्फूर्तिदायक अनुभव है । यह कहना अतिशयोक्ति न होगा कि फ्रेरे की यह किताब लगातार मूल्यांकन और सार्थक रणनीतिक बदलाव का एक ऐसा जादुई दृष्टिकोण है , जिनके बल पर बेहतर समाज का सपना संभव होता है । वे अपने नज़रिए के सिलसिले में न केवल खासे चौकन्ने हैं , बल्कि वे यह कहने में गुरेज नहीं करते कि उनके वे प्रतिपक्षी जो उनकी पक्षधरता को राजनीतिक रणनीति का हिस्सा घोषित कर उन्हें शिक्षाशास्त्री मानने के लिए ही तैयार नहीं , वे भी एक विशेष तरह की राजनीति की ही वकालत कर रहे हैं । बकौल फ्रेरे , ‘ वे यह भूल गये कि ‘ अति राजनीतिक ’ बताकर मुझे शिक्षाविद की बिरादरी से बाहर करने के प्रयास में वे उतने ही राजनीतिक हो रहे थे  जितना कि मैं । अलबत्ते हम विरोधी खेमों में ज़रूर थे । ‘ निष्पक्ष ’ वे नहीं थे और न कभी हो सकते थे । ’ कहना न होगा जिनके लिए शिक्षा का मतलब अक्षरों का निष्प्राण साक्षात्कार भर नहीं है , बल्कि सभ्यता – संस्कृति समीक्षा है , उनके लिए फ्रेरे के शिक्षायी चिंतन का विशेष महत्व है ।

Paulo_Freireफ्रेरे भूमिका में बताते हैं कि उन्होंने इस किताब में अपनी  पूर्वरचना ‘ उत्पीड़ितो का शिक्षाशास्त्र ’ का अवलोकन किया है । पर सवाल यह कि उक्त रचना का पुनरवालोकन क्यों ? दरअसल फ्रेरे उन बेहद दुर्लभ शिक्षाशात्रियों में शामिल किए जा सकते हैं , जिन्होंने अपनी हर विचार यात्रा का गंभीर पुनरवालोकन किया और फिर उनके आलोक में अपनी समझ को पुनर्नवता के वैभव से समृद्ध किया । इस लिहाज से उनकी पुस्तक ‘ उम्मीदों का शिक्षाशास्त्र ’ वह नायाब रचना है , जिसके माध्यम से हम एक मुकम्मल बुद्धिजीवी के रूप में उनके रूपांतरण की प्रक्रिया को बखूबी समझ सकते हैं । बकौल फ्रेरे , ‘ अब मैं इस किताब के बारे बताऊँगा कि इसे लिखते – लिखते कैसे मैं सीखता रहा और कि मैं सचमुच , इस शिक्षाशास्त्र की चर्चा शुरू करते हुए मैं इस किताब को लिखना सीक रहा था ।  ’ इस किताब के अध्यायों के बारे में बात करने के पहले दो पदों की चर्चा करना ज़रूरी है – ‘ व्यवहारवादी विमर्श ’ और ‘ आशा ’ । दरअसल फ्रेरे की चिंतन के केन्द्र में इन दोनों पदों की मौजूदगी है । दोनों पद दो विपरीत ध्रु्वांतों पर मौजूद है । प्राक्कथन की शुरुआत में ही फ्रेरे की दिलचस्प घोषणा है – ‘ चारों तरफ से हमें एक व्यवहारवादी विमर्श ने घेर रखा है , वास्तविकता को बदलना नहीं उसके अनुरूप ढलना ही जिसका मूलमंत्र है । सपने और यूटोपिया यहाँ के लिए न सिर्फ बेकार बल्कि राह का रोड़ा माने जाते हैं । ’ जाहिर है फ्रेरे ऐसे व्यवहारवाद के प्रति खासे चौकन्ने हैं । इसी सिलसिले में वे ‘ आशा ’ का ज़िक्र करते हैं , अनुवादक ने इसके लिए ‘ उम्मीद ’ शब्द का प्रयोग किया है । फ्रेरे उम्मीद या आशा को एक अस्तित्त्वमूलक आवशयकता घोषित करते हुए हमें आगाह करते हैं ‘ आशाविहीनता अगर कार्यक्रम ही बन जाए तो वह हमें लकवा मार देती है , हमारी गतिशीलता खा जाती है । हम नियतिवाद का शिकार हो जाते हैं और अपने भीतर से वह ताकत जुटाना हमारे लिए असंभव हो जाता है जिसके बिना दुनिया की पुनर्रचना की भीषण लड़ाई छेड़ना नामुमकिन है । ’ जाहिर है इन दोनों पदों के इर्द – गिर्द किताब की विचारयात्रा परवान चढ़ती है ।

जब आदमी अपने अस्तित्त्व को स्वीकारता है तभी आशा का जन्म होता है । इसे और गहरायी से समझें । जैसे यदि उत्पीड़ित अपने अस्तित्त्व को स्वीकार करता है , तभी उसमें आशा की परिकल्पना पनपती है और वह अपने इर्द – गिर्द की हकीक़तों से रू-ब-रू होता है । फिर उसमें बदलाव की आशा का जन्म होता है । दूसरी तरफ़ व्यवहारवादी समझ इंसान को एक मशीन के रूप में देखती है । एक ऐसा मशीन जो न तो निर्णय ले सकता है और न ही जिसमें संवेदना होती है । कहना न होगा फ्रेरे इसे सपने और यूटोपिया के लिए सबसे बड़े बाधक के रूप में देखते हैं । ज्ञानमीमांसीय व्याख्या यानी ‘ यही क्यों ’ , ‘ ऐसा ही क्यों ’ को व्यवहारवाद हतोत्साहित करता है । फ्रेरे शिक्षक और शिक्षा की दुनिया से ताल्लुक रखने वाले लोगों लोगों के इसके लिए आह्वान करते हैं कि वे किसी विचार के नेपथ्य और उपयोगितावादी नज़रिए को बेनकाब करें । इसके बिना शिक्षा की बात अधूरी है । ‘ आशावान होना फ्रेरे के दर्शन की आत्मा है । फ्रेरे यह बखूबी बताते हैं कि कैसे धर्म की परिकल्पना जो व्यवहारवादी दर्शन का एक मजबूत उदाहरण है आदमी को नियतिवादी बनाता है । जबकि आशा अस्तित्त्व की लड़ाई में बुनियादी भूमिका निभाती है ।

नियतिवाद का कमाल यह है कि उत्पीड़ित अपने भीतर ही उत्पीड़क को देखने लगता है । फ्रेरे किसान समूह विशेष रूप से ब्राजील के किसान समूहों से हुए विभिन्न संवादों का ज़िक्र करते हैं । वे पाते हैं कि किसानी जीवन से जुड़ी बहुत सी बातें वे नहीं जानते हैं , तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि फ्रेरे के ज्ञान संसार से किसान भी परिचित नहीं ।  वे महसूस करते हैं कि वे जानते हैं इसलिए कि उन्हें ज्ञानार्जन अवसर मिले , किसान नहीं जानते इस्लिए कि उन्हें ज्ञानार्जन अवसर नहीं मिले । इस संदर्भ की व्याख्या के बाद वे यह समझ – समझा पाने में समर्थ होते हैं कि ‘ ईश्वर इन सब बातों का कारण नहीं है । ’ फ्रेरे की स्वीकारोक्ति देखिए , ‘नहीं ईश्वर इन सब बातों का कारण नहीं । वह मालिक का काम है ’ जीवन में शायद पहली बार ये किसान जुड़ाव के उस बंधन से बाहर आने की कोशिश कर रहे थे जिसे मैंने उत्पीड़ितो का शिक्षाशास्त्र  में उत्पीड़ित का उत्पीड़क के साथ ‘ जुड़ाव का बंधन ’ कहा है । आज वे उत्पीड़क के साथ अपने उस रिश्ते पीछे हटने की कोशिश कर रहे थे औएर जैसा कहना फैनन पसंद करते वे उत्पीड़क को अपने से ‘ बाहर ’ चिह्नित कर रहे थे । ’ कहना ना होगा फ्रेरे ज्ञान को समाज व्यवस्था से नाभिनालबद्ध मानते हैं । दूसरे अध्याय में ‘ उत्पीड़ितों का शिक्षाशास्त्र ’ का पुनरवालोकन है । जिसमें उस पर प्रतिबंध , राजतंत्र के भय , छपने के बाद पढ़ने की क्रिया और पठन के आलोक में उभरे लैंगिकता के सवाल और इन मुद्दों पर फ्रेरे के बदलने की प्रक्रिया की ईमानदार छानबीन है । भाषायी विन्यास बरतने के दौरान लैंगिक आग्रहों पर उनकी टिप्पणी गौ़रतलब है , ‘ किसी भी अधिनायकवादी विमर्श की पराजय की तरह लैंगिक विमर्श की पराजय भी हमसे यह माँग करती है , बल्कि यह अनिवार्यता हम पर थोपती है , कि नए , जनवादी और भेदभाव , विरोधी विमर्श को चलाने के साथ – साथ हम अपने आप को जनवादी आचरण में भी उतारें । ’ फ्रेरे इस अर्थ में अन्य शिक्षाशास्त्रियों से अलग हैं कि उन्होंने अपने अध्ययन – लेखन को उत्पीड़ितों ( जिनमें स्त्रियाँ भी शामिल है ) , से साझा किया और उनके आलोक में खुद को बदला । कहना न होगा पाठ यह संदेश देता है संभव है कि आप किसी एक पक्ष पर बेहद प्रगतिशील हों , आलोचनात्मक हों , लेकिन दूसरे पक्ष पर संकीर्णता , रूढ़िवादी हो सकते हैं । लिहाजा मनुष्य को खुद की छानबीन बार – बार करनी चाहिए ।

Utpidito_ka_shikshashastraशिक्षा का चरित्र कैसा हो ? उसका कार्य व्यापार चाहे कितना ही तटस्थ क्यों न लगे दरअसल वह एक राजनैतिक कार्यवाही है । वे ज्ञान के सृजन और उसके अधिकार के मुद्दे पर बेहद गंभीर गंभीर और संवेदनशील नज़रिए से बात करते हैं । ज्ञान का सृजन उनके लिए कोई अमूर्त आध्यात्मिक अवधारणा नहीं है । वह ठोस वास्तविकताओं से लबरेज है जो जीवन की ज़रूरतों , संघर्षों और वर्गवादी समाज में अपने नज़रिए के स्टैण्ड लेने की वकालत करता है । फ्रेरे शिक्षकों और विद्यार्थियों में इस समझ को विकसित करने की वकालत करते हैं , जिसकी बुनियादी चिंता यह हो कि वे समझ पाएँ कि ज्ञान कैसे काम करता है , किन लोगों के लिए सक्रिय होता है और कहाँ उस प्रक्रिया में आलोचनात्मक हस्तक्षेप कर उसे रूपांतरित करने की ज़रूरत है । इसी मुद्दे का विस्तार वे पाठ्यचर्या जैसे संवेदनशील मसले तक करते हैं और कहते हैं , ‘ हम एक बार फिर यही दोहराना चाहते हैं कि पाठवस्तु के बगैर कोई शैक्षिक व्यवहार इतिहास में कभी नहीं देखा गया । यह सवाल विचारधाराओं का रंग लिए एक राजनीतिक सवाल है । बुनियादी सवाल यह है कि कौन पाठवस्तु को चुनता है और किन लोगों और चीज़ों की तरफ से चुनावकर्ता को शिक्षित किया जाता है ? ’ वे अध्ययन में यह मुदा भी शामिल करते हैं कि सवाल यह भी है कि कक्षा में पाठ के साथ शिक्षक का बर्ताव क्या है । पाठ निर्माण और उदेश्य के विश्लेषण की समग्र प्रक्रिया को नज़रअंदाज़ कर शिक्षक द्वारा पाठ की सही यात्रा संभव नहीं । इस मुद्दे पर वामपंथ और दक्षिणपंथ दोनों सरलीकृत निष्कर्ष से संचालित हो अधिनायकवादी रवैया अख्तियार करते हैं । ‘ उत्पीड़ितों का शिक्षाशास्त्र ’ की रचना के दौरान उन्हें अनेक अनुभव ऐसे हुए जिनके बल पर वे कथा रूपक या मिथकों का जनवादी विश्लेषण कर सकने में सफल हुए । असल में व्यवहारवाद हमेशा उन नये विमर्शों को खारिज करता है जिससे स्थापित व्यवस्था डगमगाती है । इस सिलसिले में स्विस स्कूलों में पढ़ाई जाने वाली कथाओं का उन्होंने भाष्य किया और उनमें छुपे अन्तर्निहित संदेशों का औचित्य निरूपण किया । मज़दूरों द्वारा सुनायी गयी एक ऐसी कहानी ,जिसमें चरित्र के रूप में पापा , मम्मी सुअर के साथ तीन नन्हें बच्चे शामिल थे । उनमें सबसे छोटा बच्चा हमेशा जिज्ञासाओं के अनुरूप सक्रिय रहता और हमेशा नयी चीज़ को आजमाने की फिराक मे रहता था । अपनी इन आदतों के चलते वह एक दिन भारी मुसीबतों में पड़ गया । वह बुरी हालत में घायल होकर घर पहुँचा । पिता जैसे इस पल का इंतज़ार कर ही रहे थे । उन्होंने व्यवहारकुशलता का परिचय देते हुए कहा ‘ अगर हम बदलने के फेर में पड़ेंगे तो बुरी तरह चोटिल होने का खतरा झेलेंगे । ’ फ्रेरे की टिप्पणी मूल्यवान है , ‘ ऐसे ही पंगु बनाने वाले सुझावों , पालतू बनाने वाले कार्यक्रमों के खिलाफ़ स्पेन के मज़दूरों का चुनौती और सवाल करने वाला स्कूल खड़ा किया जा रहा था । ’ उन्होंने पीड़ितों को वैचारिक बिरादरी का हिस्सा बनाया । पाठ की पुनर्रचना और शिक्षा की बदली अवधारणा के बल पर फ्रेरे ने वह कर दिखाया जिसे उस दौर में लोग व्यवहारवाद के उलट और कोरा आदर्शवाद कह कर खारिज कर रहे थे ।

pohope.jpgउन्होंने विभिन्न यूरोपीय देशों और लातिन अमरीकी देशों की यत्राओं के दौरान अनेक समूहों से न सिर्फ अपने अनुभव साझा किए , बल्कि अनेक बार उनके आलोक में खुद को जाँचा – परखा भी । इस सिलसिले में उन्हें राजनैतिक सत्ता , व्यवस्था की संरचनागत विशेषता , बदलाव के लिए सक्रिय समूह आदि से जुड़े अनेक ज़मीनी हकीक़त हासिल हुए । फ्रेरे ने उन्हें बेहद प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया है , जिनमें कुछ का उल्लेख मौजू होगा –

  • भेदभाव चाहे वह प्रत्यक्ष और जाहिरा तौर पर खटकनेवाला वाला हो या फिर अप्रत्यक्ष या पाखंड की परतों में छुपा हो, वह उतना ही आहत करता है और अनैतिक होता है । और उसके खिलाफ़ विद्रोह करना मेरी आदतों में बचपन से ही शामिल रहा है । अतीत में मेरी नज़र जितनी दूर जा सकती है मैंने लगभग स्वभाववश अपने को नस्लीय भेदभाव के हर अक्षर , कारनामे , प्रतीक और ग़रीबों के खिलाफ प्रतिक्रिया करते पाया है , गरीबों के प्रति किए गये भेदभाव के ख़िलाफ पाया है जिन्हें फिर बाद में मैंने वर्गीय भेदभाव के रूप में परिभाषित किया है । जेनेवा या युनाइटेड स्टेट्स में प्रवास के दौरान दक्षिण अफ्रीकी , काले या गोरे लोगों से मैंने नस्लभेद की जिन कृत्यों की प्रामाणिक कथा सुनी उनसे हमेशा सदमा लगा है । इस वक्त उन्हें याद करते हुए भी मैं उसी सदमे का अनुभव कर रहा हूँ । नस्लवाद की हकीक़त इतनी बर्बर है कि भावना का ज़रा सा भी जज़्बा जिस आवाज में होगा वह काँपते हुए यह चीख़ उठेगी : भयावह ।
  • दरअसल , उपनिवेशीकृत लोग और उपनिवेशीकृत देश तबतक अपनी मुक्ति को पक्का नहीं बना सकते , तबतक अपनी सांस्कृतिक पहचान को हासिल करने या फिर से हासिल करने में कामयाब नहीं हो सकते , जब तक कि वे अपनी भाषा और विमर्श का उत्तरदायित्त्व खुद अपने हाठ्ज में नकर लें और बदले में वह भी उन्हें न अपना ले ।
  • कोई सांस्कृतिक बहुलता स्वतःस्फूर्तता में जन्म नहीं लेती । हरेक सांस्कृतिक बहुलता को ज़रूरी तौर पर रचना पड़ता है । राजनीतिक तौर पर उत्पादित करना पड़ता है । ठोस इतिहास में , अपने भाग्य पर पसीना बहाते हुए , आगे बढ़ाने के लिए उस पर मशक्कत करनी पड़ती है ।
  • यह ज़रूरी है कि हम उन समाजों की दहलीज लांघकर आगे बढ़ें जिनके ढांचे ऐसी विचारधारा पैदा करते हैं जो खुद उन्हीं ढांचों द्वारा पैदा किए गए संकटों और असफलताओं का ठीकरा समाज के असफल लोगों के माथे पर फोड़ती है ।
  • सबसे बदतर प्रतिक्रिया तो वह सदाचार वाली खामोशी होती है जो मतभेदों को छिपाती है । अच्छा तो यह हुआ कि विभिन्न समूहों ने , बल्कि , ज़्यादातर ने , अपनी प्रतिक्रिया सामने रखी , भले ही वे तथ्यों और समस्याओं पर मेरे नज़रिए के खिलाफ़ खड़ी होने वाली थी ।
  • अपने होने पर , अपने लिखने पर प्रतिबंध झेलने वाले हैती के जनवर्गों ने मानो अपने प्रतिवाद , अपनी आलोचना और अपनी घोषणा के विमर्श को कला के जरिए अभिव्यक्त कर दिया हो , जो विमर्श का एकमात्र ऐसा तरीका था जिसकी वहाँ उन्हें अनुमति हासिल थी ।
  • इतिहास किसी दुःसाहसी की उदात्त इच्छा के आगे न तो समर्पित होता है और न ही उसके सामने एक पालतू की तरह दुम हिलाता है ।

शिक्षक , विद्यार्थी , सेना के जनरल ,  विरोधी राय प्रकट करने वाली संस्कृतियाँ ( मसलन ब्राजील और पुर्तगाल की पारंपरिक शिक्षा संस्कृतियाँ )  आदि समूहों से फ्रेरे ने अपनी मशहूर किताब ‘ उत्पीड़ितों का शिक्षाशास्त्र ’ के सिलसिले में बात की और एक ऐसे बेहतरीन शिक्षाशास्त्री के रूप में वे हमारे सामने आये , जो परिस्थितियों की जटिलता को न सिर्फ बेहतरीन ढंग से समझता है , बल्कि उनके आलोक में खुद की स्थापनाओं का सम्यक मूल्यांकन भी करता है । किताब के अंतिम चरण में पाओले फ्रेरे ने बदलाव के स्वप्न के साकार होने की स्थिति , प्रक्रिया और भविष्य की रणनीतियों पर विचार किया है , वे यहाँ तक पहुँचकर रुक नहीं जाते , बल्कि शिक्षाकर्मियों को आगाह भी करते हैं कि लक्ष्य पा लेना अंत नहीं है , बल्कि उस प्रक्रिया को जारी रखना अस्तित्त्वगत ज़रूरत है । मौजू होगा उनके कथन के रास्ते इस पूरे मसले को समझें – ‘ लड़ाई जीतना एक प्रक्रिया है और उसके बारे में यह कभी नहीं कहा जा सकता , ‘ हम जीत गए , अध्याय ख़तम । ’ जिस वक्त यह क्षण कालातीत बना दिया जाता है , क्रांति को लकवा मार जाता है । ’ कहना न होगा फ्रेरे मनुष्यता के पक्ष में शिक्षा की अंतहीन लड़ाई के प्रतिबद्ध योद्धा के रूप में अपनी मौजूदगी बखूबी पहचानते हैं ।

सैनिक तानाशाही के दौर में फ्रेरे पंद्रह वर्ष तक ब्राजील से निर्वासन का दारुण दुःख झेलने के लिए विवश हुए । इस दरमियान उन्होंने उत्पीड़ितों के हक में एक स्फूर्तिदायक शैक्षिक दर्शन को सिरजा । उनकी सहयोगी एना मारिया एराउजो फ्रेरे अपने विचार को उनके पाठ से इस रूप में बावस्ता पाती हैं , जिसकी दिशा यह त्रिभुज व्यक्त करता है – प्रतिबंध , मुक्ति और आशा । बकौल एना मारिया एराउजो फ्रेरे , ‘ पाओलो फ्रेरे की देह पर प्रतिबंध ( उनके विचारों के साथ- साथ ) ब्राजील में जिस पर पंद्रह बरस की लंबी अवधि तक प्रतिबंध लगा रहा । उन अपर और अनेक दूसरे ब्राजीलियों पर लादे गये प्रतिबंध और पाबंदिया – एक विरोधाभासी प्रतिक्रिया के बतौर जो उन्हें उत्पीड़ितों का शिक्षाशास्त्र लिखने की ओर ले गयी । उस किताब के जन्म की तरफ जो ब्राजील में सदियों से पुनरुत्पादित होते रहने वाले प्रतिबंध के रूपों को ख़ारिज करती है और व्यक्तियों की मुक्ति की संभावना को खारिज करती है । ’  कहना न होगा फ्रेरे की किताब ‘ उम्मीदों का शिक्षाशास्त्र ’ इसी त्रिभुज की व्यवहारिक सच को दुर्दम्य जिजीविषा के साथ बयान करती है ।

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