उमर ख़ालिद, मेरा बेटा: प्रो. अपूर्वानंद

***Translated from Apoorvanand Anand‘s ‘Umar Khalid, my son’: The Indian Express: February 23, 2016. (http://indianexpress.com/…/opin…/columns/umar-khalid-my-son/#)*** Translation: Kumar Unnayan

उमर ख़ालिद, मेरा बेटा
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apoorvanand~~क्योंकि विद्रोही होना मानवता का नवीकरण और उसे अभिपुष्ट करना है~~

“उमर मेरा बेटा है”, मैं ऐसा कहना चाहता हूँ। मैं कभी उस से मिला नहीं और न ही उसे जानता हूँ। पर फिर भी उसे अपने बेटे की तरह मान लेना चाहता हूँ। मेरा कोई बेटा नहीं है।

केवल एक बेटी है, जो तेज़ी से उस उम्र की ओर बढ़ रही है जहाँ जवाँ मन अपने अनुसार सोचने के काबिल बनने लगते हैं। उमर ख़ालिद उस उम्र से आगे बढ़ चुका है। वह एक आज़ाद और स्वायत्त मन है। एक ऐसा दिल है जो संसार के दबे कुचलों के लिए धड़कता है, और उनके साथ होने वाली बेइंसाफी और अन्याय के खिलाफ आक्रोश से प्रज्वलित है।

उमर वो बेटा है जिस पर हर माँ-बाप को नाज़ होना चाहिए और उसकी ख़्वाहिश भी। क्योंकि वो वह है जो असहमत होता है, अपने वालिदैन के ख़िलाफ़ जाने का जज़्बा रखता है, धर्म, समाज या परिवार की बनाई पहचानों के पिंजरों को तोड़ सकता है- और मानवता के लिए उन सीमाओं को लाँघता है जिन से बाकी लोग ख़ौफ़ खाते हैं।

क्योंकि अगर उमर जैसा नहीं, तो फिर युवा कैसा हो ? वो मुल्क कितना अभागा होगा जिसमें केवल आज्ञापालक और परंपरावादी युवा ही हों- युवा जो सिर्फ अच्छी प्लेसमेंट और तनख़्वाह की होड़ लगायें और ऐसे तंत्र के पहिये के दांत भर बन कर रह जाएँ जो मुट्ठी भर लोगों के लाभ के लिए बाकी मानवता को कुचलता रहे।

यह वही खेप है जिसने सुविधा के लिए अपनी आत्मा विनिमय कर दी है और जो अपनी देशभक्ति को फेसबुक और ट्विटर पर रेवड़ियों की तरह गिरा रही है। यह भीड़ उमर से ख़ार खाई बैठी है क्योंकि उसने उनके साथ जुड़ने से इनकार कर दिया। मुझे गलत मत समझिएगा। मैं उसे उसकी राजनीति या विचारधारा के लिए नहीं चाहता। वह मुझसे ज़बरदस्त मतभेद रखेगा, मेरे संशोधित विचारों पर तंज कसेगा और लोकतंत्र पर मेरे उदारवाद का मज़ाक उड़ाएगा। मैंने सुना है की वो कड़ा माओवादी है। मैं ठहरा कुजात वामपंथी। एक ऐसी संसदीय पार्टी का पूर्व कार्ड धारक जो उसकी नज़रों में केवल नाम की वामपंथी है। मैं उसे उसके जीवंत विद्रोह के लिए चुनुँगा। विद्रोह करना अपनी मानवता की अभिपुष्टि करना है। लेकिन साथ ही एक विद्रोही मानवता का नवीकरण भी करता है। उसे जंग लगने से बचाता है।

अल्बर्ट कामू ने कहा है : “विद्रोही क्या होता है ? जो न कहता है पर उसके इनकार का अर्थ परित्याग नहीं होता। वो वह भी है, जो विद्रोह के पहले संकेत के पल से हाँ कहता है।” एक विद्रोही निजी वंचन की पीड़ा लिए नहीं जीता; वह आक्रोशित होता है पर द्वेषपूर्ण नहीं। द्वेष से ईर्ष्या उपजती है- किसी ऐसी चीज़ के लिए ईर्ष्या जो उसे लगे औरों के पास है, पर उस के पास नहीं। ईर्ष्या और द्वेष एक विद्रोही के मनोभाव नहीं होते- वह स्थान पीड़ा और संघर्ष का है। एक विद्रोही ख़ुद को ‘अन्य’ (अदर्स ) से जोड़ने का सामर्थ्य रखता है, उनकी पीड़ा से विचलित होता है और उनके लिए संघर्षरत रहता है । वह अश्रुओं की नदी में तैरने से नहीं घबराता। वो द्वेषपूर्ण नहीं होता क्योंकि उसमें स्वार्थ भी नहीं होता। निजी वंचन की मनोभावना उसकी प्रेरणा नहीं होती ।

उमर नाम से उमर है पर वह एक मुसलमान नहीं है। उसके पिता और परिवार मुसलमान हैं। उसके पिता एक ज़माने में सिमी (स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवेमेंट ऑफ़ इंडिया) के सदस्य हुआ करते थे। पर उमर ने अपने पिता से अलग राह चुनी। ऐसी राजनीति उसके लिए नहीं है जो केवल मुसलामानों के बारे में सोचे। परिवार से उलट जाते हुए वह एक नास्तिक और कड़ा माओवादी बना। दलितों के अधिकारों और जेंडर से जुड़े सवालों के प्रति अपने दल की असंवेदनशीलता के चलते उसने वहाँ से भी इस्तीफ़ा दिया । वह ऐसा इंसान प्रतीत होता है जो निरंतर वाम की ओर जा रहा है । फ़िर वाम एक पकड़ में न आने वाला विचार और अप्राप्य छोर है। उमर इस विचार की तलाश में है । मैं उसे रोकूँगा नहीं क्योंकि शायद उसकी तलाश हमें कुछ नया, कुछ ऐसा दे सकती है जिसकी रचना हम अभी तक नहीं कर पाये हैं। यह ख़ोज हमारे लिए इसीलिए अहम है क्योंकि यह इतिहास की तमाम मुनाफ़ाखोर खोजों की तरह बाध्य और जकड़ी हुई नहीं है।

 

 

एक विद्रोही की “हाँ” का सूत्र प्यार में होता है। प्यार उनके लिए जिन्हें वह निजी रूप से नहीं जानता ,जो सताए हुए हैं और जिन पर इतिहास मेहरबान नहीं रहा है। कामू ने इसे निराला प्रेम कहा है। इसमें गुणा-भाव, जोड़-घटा नहीं होता। बेसोचा-समझा प्यार। ऐसे प्यार से लबरेज़ विद्रोही अपने भविष्य की परवाह नहीं करता। दार्शनिक कहते हैं की केवल मानव ही भविष्य के सपने देख सकता है। पर एक विद्रोही अपने भविष्य के लिए नहीं जीता। वह अपना सब कुछ आज में झोंक देता है, जिंदा लोगों की खातिर। कामू विद्रोह पर अपने निबंध के अंत में कहते हैं की हम वर्तमान को सब कुछ दे कर ही भविष्य के प्रति “असली उदारता” दिखा सकते हैं।

उमर एक महफूज़ भविष्य बसा सकता था। यह कह सकता था की ऐसा उसने अपनी राजनीति की बेहतर सेवा की खातिर किया है। लेकिन उसने ज़ोखिम को चुना।

उमर ख़ुद को सीमाओं से मुक्त इंसान के रूप में देखता है। वह राष्ट्रीयता या कौमियत का बंदी नहीं बना रहना चाहता। वह मुझे रेचल कोरी, अमरीका की उस जवान लड़की की याद दिलाता है, जो अपने घर कोलंबिया से कोसों दूर एक फिलीस्तीनी मकान को ढहने से बचाने के लिए इज़रायली टैंक के सामने जा खड़ी हुई थी। यह उसके राष्ट्र के हितों के खिलाफ था और उसने इसकी कीमत अपनी जान देकर चुकाई। इज़रायली टैंक ने अपने मैत्री राष्ट्र के एक नागरिक को नहीं बख़्शा । भले ही हमें उनसे डर लगता हो, पर अपने नीरस राष्ट्रीय अस्तित्व को निखारने के लिए हमें कई उमर और कोरी चाहियें।

उमर जेएनयू में अपने दोस्तों के बीच लौट आया है। आप साफ़ और ऊँची तरह उसे सुन सकते हैं। वह कायर नहीं है। इतना निडर है कि इस क्रुद्ध राष्ट्र का सामना कर रहा है। सवाल यह है कि क्या हम उसकी आँखों में आँखें डाल कर देख सकते हैं? हम जिन्होंने पिछले 10 दिनों में साईबर दुनिया में उसे गालियाँ खाते और दण्डित होते देखा है? ऐसा कैसे हो सकता है की हम क़ाज़ी नज़रुल इस्लाम की “बिद्रोही” गाएँ और उमर से बचते रहें? उमर, कन्हैया और उनके तमाम साथी जिन्हें भारतीय राष्ट्रवाद के जीवित रहने के लिए अपने ख़ून से कीमत चुकानी पड़ेगी। अगर हम सही मायनों में अपना मकसद पाना चाहते हैं तो हमें उन्हें अपना मानना होगा।

जो मुल्क अपने उमर और कन्हैया के साथ खड़ा न हो सके, उनसे मिलने वाली चुनौतियों को असहनीय माने और सवालों के बदले उन्हें सज़ा दे, वह गहरे संकट में है।

हमारे उमर भेंट ना चढ़ें। हम उन्हें अपने से दूर न जाने दें।

आयें, हम अपने बच्चों की हत्या ना करें।

(अनुवाद: कुमार उन्नयन)

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