अभिव्यक्ति की आज़ादी और संवादहीनता: मणीन्द्रनाथ ठाकुर

Prof. Manindra Thakurजवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के हालिया घटनाक्रम में जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार की गिरफ्तारी हमारी प्रशासनिक व्यवस्था के ऐतबार से एक चौंकानेवाली घटना है. हर विश्वविद्यालय में उसकी अपनी एक प्रशासनिक इकाई (प्रॉक्टोरियल बोर्ड) होती है, जो उसके परिसर में घटनेवाली घटनाओं का संज्ञान लेती रहती है.

परिसर के भीतर घटनेवाली हर घटना पर वह मीटिंग बुलाती है, सभी सदस्यों के सामूहिक सहमति के साथ अपने स्वविवेक से फैसले लेती है और तब तक वह सरकार या पुलिस को खबर नहीं करती है, जब तक कि कोई गंभीर आपराधिक घटना न घट जाये. इस ऐतबार से जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष की गिरफ्तारी उचित नहीं जान पड़ती. पुलिस को अगर गिरफ्तार ही करना था, तो उन लोगों को करती, जो देश-विरोधी नारे लगा रहे थे. नारा लगाते लड़कों का जो वीडियो सामने आया है, उसमें तो सबके चेहरे स्पष्ट हैं, पुलिस को चाहिए था कि पहले उन्हें गिरफ्तार करती.

यहां छात्रसंघ अध्यक्ष को गिरफ्तार करने का सीधा मतलब यह कि सरकार यह संकेत देना चाहती है कि आपके अध्यक्ष को हमने गिरफ्तार कर लिया, क्योंकि इसके पीछे का कारण यह है कि पिछले दो-ढाई महीने से सरकार की छात्र-विरोधी नीतियों को लेकर तमाम छात्र यूजीसी के खिलाफ धरने दे रहे हैं, आंदोलन कर रहे हैं.

जहां से मैं देख रहा हूं, मुझे लगता है कि यह कदम सरकार के लिए खतरनाक साबित हो सकता है. जेएनयू का हालिया घटनाक्रम में सिर्फ अभिव्यक्ति की आजादी का मसला नहीं है, बल्कि संवादहीनता का मसला है, सरकार की छात्र-विरोधी नीतियों का मसला है. विश्वविद्यालय एक बड़ा संवादस्थल है, जहां विभिन्न धर्म-जाति, विभिन्न वर्ग-संप्रदाय, अमीर-गरीब आदि तबके के युवा पढ़ने आते हैं. विभिन्नताओं से भरे हमारे देश का जो मॉडल है, वही जेएनयू का मॉडल है, जिसमें असहमति का सम्मान किया जाता है. अगर किसी छात्र को अपनी कोई बात या कोई असहमति जतानी हो, तो वह अपने विश्वविद्यालय परिसर में ही जतायेगा.

लेकिन, प्रशासन या सरकार उनसे संवाद करने के बजाय सीधे अभिव्यक्ति की आजादी के साथ खिलवाड़ का मामला बता कर मासूमों पर पुलिसिया कार्रवाइयां करती है. यह किसी भी लोकतांत्रिक देश के एक प्रतिष्ठित उच्च शिक्षण संस्थान के लिए उचित नहीं है. भारत का अकेला ऐसा विश्वविद्यालय है जेएनयू, जिसने अपनी स्थापना (1969) के बाद से भारत सरकार के लिए एक से बढ़ कर एक ब्यूरोक्रेट पैदा किया है. जेएनयू एक बाउंड्रीवाॅल के अंदर है.

jnu1अगर उसमें लोग आपस में अपनी असहमतियों को जाहिर करते रहते हैं, तो इससे सरकार को कोई फर्क नहीं पड़नेवाला है. मसलन, बहुत से कश्मीरी छात्र भी पढ़ते हैं और वे आजाद कश्मीर को लेकर ऐसे सवाल उठाते हैं कि अगर वह मीडिया में जाये, तो हंगामा हो जाये. लेकिन जेएनयू प्रोफेसर और छात्र उन सवालों का नरमी से तार्किक जवाब देते हैं. उनके सवालों पर अगर हम उन्हें देशद्रोही कहने लगें, तो फिर एक विश्वविद्यालय होने का कोई मतलब ही नहीं रह जाता. विश्वविद्यालय संवाद का खुला मंच है.

सरकार को चाहिए कि संवाद के इस खुले मंच का इस्तेमाल करे, उनके संवाद के जरिये निकलनेवाले जनहित के जरूरी सवालों पर विचार कर लोगों तक ऐसी नीतियों तक पहुंचाये, ताकि लोगों में सरकार की दूरदृष्टि का भान हो सके. अगर सरकार संवाद को ही बंद कर देगी, तो फिर बचा ही क्या रह जायेगा? इस तरह तो वह पूरे देश को दुश्मन की तरह देखेगी कि जो भी असहमति होगी, उस पर विचार करने के बजाय वह कार्रवाई करेगी.

सरकार को चाहिए कि वह विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों को अपना दुश्मन नहीं बनाये. जेएनयू जैसे कुछ विश्वविद्यालयों को छोड़ दें, तो सारे विश्वविद्यालय पंगू हो गये हैं. शिक्षा नीति को लेकर हमारी सरकार जो कर रही है, इससे तो यही लगता है कि सरकार की आर्थिक नीति अब फेल हो रही है. इसलिए वह कुछ ऐसे मामलों को उठाती रहना चाहती है, जिससे सरकार की तरफ से लोगों का ध्यान भटक जाये. मौजूदा सरकार को इससे बचना चाहिए, क्योंकि यह दौर तकनीक और सोशल मीडिया का दौर है, लोग कहीं न कहीं से सच को बाहर निकाल ही लायेंगे.

अब भी कुछ नहीं बिगड़ा है. सरकार को चाहिए कि जेएनयू अध्यक्ष को रिहा कर छात्रों से बातचीत करे कि आखिर वे चाहते क्या हैं. जेएनयू घटनाक्रम को लेकर सरकार की तरफ से होनेवाली संवादहीनता एक बड़ी वजह है, जिसके कारण सरकार छात्रों के मनोभावों और समस्याओं को समझ नहीं पाती और सीधा पुलिस-प्रशासन का सहारा लेकर उन पर लाठी-डंडे चलवाती है. जाहिर है, इस सरकारी हिंसा से छात्रों में गुस्सा फूटता है और नादानी में उनसे कुछ गलतियां हो जाती हैं.

जेएनयू एक मात्र जगह है, जहां पर न्याय को लेकर लोगों में एक प्रकार की आस्था है. वहां 70 प्रतिशत छात्र गरीब घरों से आते हैं. गरीबी को लेकर जो सोच जेएनयू के छात्रों में है, अगर उनसे सरकार संवाद करती, तो मैं समझता हूं कि देश में गरीबी को लेकर अच्छी नीतियां बनतीं. देश को क्या जरूरत है और लोगों को क्या जरूरत है, इस बात की जानकारी या तो मीडिया से पहुंचती है या फिर खुद सरकार जनता से संवाद करे.

फिलहाल हमारे बड़े लोकतंत्र में नेताओं के लिए जनता से सीधा संवाद असंभव सा होने लगा है. जहां कहीं भी अगर संवाद की गुंजाइश शेष है, सरकार वहां पर भी सख्ती करने लगेगी, तो फिर इससे सबसे ज्यादा नुकसान देश के लोकतांत्रिक ढांचे को होगा और छोटी-छोटी बात पर लोगों को देशद्रोही करार दिया जाने लगेगा. यह एक नये तरह के खतरे का संकेत भी है, इसलिए सरकार को समझदारी दिखानी चाहिए.

(प्रभात खबर, 16.02.16)

Advertisements

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s