हमारी साझी संस्कृति का ताना-बाना: भीष्म साहनी

(पी.सी जोशी स्मृति व्याख्यान, 1999)

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Source: Outlook India

एक ऐसे व्यक्ति की स्मृति में आयोजित इस व्याख्यान श्रृंखला में आमन्त्रण पाकर मैं स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर रहा हूँ, जिसने हमारे राष्ट्रीय जीवन के राजनीतिक और सांस्कृतिक दोनों क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। चौथे दशक के प्रारंभिक वर्षों में ही श्री पी.सी. जोशी एक जाना-माना नाम हो गया था। उनके राजनीतिक योगदान के अलावा, मेरे लिए वे उन्हीं दिनों स्थापित एक सांस्कृतिक संगठन इप्टा (इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन) के संस्थापक के रूप में भी महत्त्व रखते हैं, जो जल्दी ही एक शक्तिशाली और देशव्यापी आंदोलन में रूपांतरित हो गया और बड़ी संख्या में सामाजिक सरोकार रखने वाले संस्कृतिकर्मी इससे जुड़ने लगे। इप्टा का पहला मंचन मैंने बंगाल के अकाल के काले दिनों के दौरान देखा था, जब कलकत्ता के पांच-छ रंगकर्मियों के छोटे-से समूह ने मेरे शहर रावलपिंडी में बंगाल के अकाल की भयंकर और रोंगटे खड़े करने वाली सच्चाई बयान करने वाला एक नाटक किया था। अपनी प्रकृति में वह एक नुक्कड़ नाटक ही था, लेकिन अपनी प्रस्तुति में वह इतना यथार्थपरक और मार्मिक था कि नाटक की समाप्ति के बाद जब कलाकार चंदा इकट्ठा करने के लिए दर्शकों के बीच गये तो मेरे आगे बैठी एक युवा महिला ने अपनी सोने की कान बालियाँ निकाल कर उन्हें दे दीं। आज भी जब कभी मैं उस प्रदर्शन को याद करता हूं, तो मैं अपने अंतस की गहराइयों में उतर जाता हूँ। जल्द ही, इप्टा पूरे देश भर में सक्रिय दिखाई देने लगा। इसकी संगीत, नृत्य और नाटक मंडलियाँ हिन्दुस्तान के हर प्रांत में मंचन करने लगी। मेरे भाई बलराज साहनी चौथे दशक के बीच में इंग्लैण्ड से वापस आते ही, जहाँ वे युद्ध के दौरान बीबीसी में उद्घोषक का काम कर रहे थे, इप्टा की गतिविधियों में जीजान से लग गए। कुछ ही दिनों में मैंने भी अपने आप को इसकी गतिविधियों के बीच में पाया।

उन चुनौतीपूर्ण व्यस्तताओं से भरे दिनों में ही मैं श्री पी.सी. जोशी से पहली बार मिला। जब मेरे भाई (बलराज साहनी) ने मुझे उनसे मिलाया तो मैं चकित रह गया। मैंने अपने सामने एक बेतरतीब से इंसान को पाया- घुटनों से नीचे तक आता बरमूढ़ा, पैरों में पुराने चप्पल, तम्बाकू खाते हुए। मैंने अपने आप से कहा, निश्चित तौर पर ये पी.सी. जोशी नहीं हो सकते, जिनका नाम हर किसी की जबान पर था। लेकिन जब उन्होंने अपनी आंखों में प्यारी चमक और दीप्त मुस्कान के साथ अपना हाथ मेरे कंधे पर रखा, जो मेरा शक दूर हो गया।

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हिन्दुस्तानी ड्रामा ग्रुप, जिसका जल्दी ही मैं सक्रिय सदस्य बन गया था, बम्बई के अलग-अलग हिस्सों में अपने नाटकों का मंचन करता था, बन पड़ा तो किसी मंच पर, नहीं तो गलियों में ही। सांप्रदायिक तनाव उन दिनों बढ़ रहा था, और मुझे याद है कि दो बार कलाकारों पर अंधेरी गलियों से पत्थर फैंके गए थे। जैसा कि मुझे बताया गया था, इप्टा के कलाकारों के लिए यह कोई नई बात नहीं थी। ऐसी घटनाएँ उनके साथ अक्सर होती रहती थीं, लेकिन अपने उद्देश्य के प्रति पूरी तरह समर्पित इप्टा के कलाकार निर्भीकता से इनका सामना करते थे।

P C Joshi

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मैं इप्टा की बात इसलिए नहीं कर रहा हूँ कि यह पी.सी. जोशी के मस्तिष्क की उपज था और केवल इसलिए भी नहीं कि यह उनका एक अद्वितीय योगदान था, बल्कि इसलिए भी कि यह हमारी सांस्कृतिक विरासत की कुछ आधारभूत और मौलिक विशेषताओं को अभिव्यक्त करता था। इप्टा ने रंगशालाओं की चारदीवारी को तोड़कर सीधे जनता के बीच अपनी पहुंच बनाई। यह जनता की भाषा बोलता था। यह एक तरफ क्षेत्र विशेष में प्रचंलित परंपरागत लोक रूपों- चाहे ‘नौटंकी’ हो या ‘पावडा’ से अपना शिल्प ग्रहण करता था, तो दूसरी तरफ इसके मंचन समकालीन अर्थ भी अभिव्यक्त करते थे। यह समाज के सामने मुँह बाये खड़े मुद्दें उठाता था। यह भविष्योन्मुख और सृजनात्मक था। और सबसे महत्त्वपूर्ण, यह आज़ादी, सेक्युलर मूल्यों, समानता और सामाजिक न्याय की विचारधारा से संबद्ध था। इसमें देशभर की सभी भाषाओं और संस्कृतियों के समूह समानता और आपसी सम्मान के साथ भाग लेते थे।

हम जिस समाज में रहते हैं, उसके साथ इप्टा की अवधारणा बहुत मेल खाती है। हम एक बहुभाषी, बहु-धर्मी, बहु जाति समाज है। हम सब लोग एक ऐसे देश में रहते हैं, जहाँ बहुत-सी भाषाएँ बोली जाती हैं, अलग-अलग धर्म और विश्वास के लोग साथ-साथ रहते हैं और एक-दूसरे से संवाद करते हैं। यह हमारे समाज की विशेषता है और यह सदियों पुरानी है। सदियों से लोगों ने ही ऐसे नज़रिये वाले समाज का विकास किया और साझे मूल्यों, साझी भाषाओं और यहाँ तक कि साझी परंपराओं को बनाया, जो हमारे जीवन पर सर्वव्यापी प्रभाव डालती रही है।

लेकिन हमारे इतिहास में समय-समय पर, खासकर पिछले कुछ दशकों में, मतभेदों को उकसाने, लोगों के बीच भेद बढ़ाने और नफरत तथा अविश्वास के बीज बोने के सायास प्रयास किए जा रहे हैं। नतीजतन, आज की विभाजनकारी शक्तियों का बोलबाला है।

मेरी जवानी के दिन मुझे याद है, जब बहुत सहिष्णुता और सद्भावना थी और हम अपेक्षाकृत राहतभरे माहौल में रहते थे। मेरे पिताजी आर्य समाजी भक्त और हिन्दी तथा संस्कृत के पक्के समर्थक थे, लेकिन अपना सारा पत्र व्यवहार उर्दू में करते थे। उनके पत्र, यहाँ तक कि उनके बेटों को भी, उर्दू में लिखे थे। हमारे घर पर एक ‘आर्य गज़ट’ नाम का साप्ताहिक अखबार आता था, जिसमें हिन्दी और संस्कृत की पढ़ाई का खूब आह्वान किया जाता था, लेकिन वह अखबार उर्दू भाषा में छपता था। मुझे याद है कि अपने हिन्दी और संस्कृत प्रेम के बावजूद भी मेरे पिताजी ने एक बार बहुत गंभीरता से मुझे सलाह दी थी कि यदि मुझे फारसी पढ़ने का मौका मिले, तो मुझे ज़रूर पढ़नी चाहिए। उन्होंने स्वयं भी फारसी पढ़ी थी और वे फारसी कविता के बहुत बड़े प्रेमी थे, वे अक्सर शेख सादी के ‘गुलिस्तां’ और ‘बोस्तां’ के पद सुनाया करते थे।

माहौल यह था कि हम लोग हमारी मातृभाषा पंजाबी में बात करते थे, एक पंडित जी हमें घर पर हिन्दी और संस्कृत पढ़ाने आते थे, स्कूल में शिक्षा का माध्यम उर्दू थी और बाद में उच्च शिक्षा में अंग्रेजी। किसी व्यक्ति के शुरुआती दिन कई भाषाओं के संपर्क में बीतते हैं, तो वह उन में से प्रत्येक को पसंद करने लगता है। यह स्वाभाविक है। हम हिन्दुस्तानियों में से अधिकांश बहुभाषी माहौल में रहते हैं और अपनी दिनचर्या में हम कई भाषाओं का इस्तेमाल करने में पूर्णत: सहज महसूस करते हैं। स्वभाव से ही भाषा ऐसा माध्यम है, जो लोगों को करीब लाता है। यह एकता बढ़ाने का काम करती है, यह मानसिक अवरोधों को मिटाती है और एकता एवं सांस्कृतिक समावेशीकरण की शक्तिशाली माध्यम है। हम खुशनसीब है कि हम भारत जैसे बहुभाषी देश में सांस लेते हैं, जो अपने आप में ही व्यापक समझदारी बढ़ाता है। इसलिए लोगों को भाषिक आधार पर बांटने का कोई भी प्रयास इस बहुभाषी वातावरण को नष्ट करेगा।

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Source: Outlook India

इसी तरह से, धार्मिक मामलों में भी तब अधिक सहिष्णुता और सरोकार थे तथा हम अधिक आज़ादी के माहौल में रहते थे। मेरी माताजी आर्य समाज के साप्ताहिक अनुष्ठानों में जाने के साथ ही अक्सर गुरुद्वारा भी जाती थीं। रोज ही दोपहर को मेरी माँ घर से निकल जाती थी और बाद में हमें पता चलता था कि वे कहीं किसी साधु या किसी ओर के प्रवचन सुनने गई थीं। वे खुद भी नहीं जानती थीं कि वे किस मत या धर्म से हैं! वे कहती थीं, “बेटा, उनके मुंह से अच्छे वचन निकलते हैं”, “उनको सुनना मुझे अच्छा लगता है”। और हम सभी जानते हैं कि आज भी हज़ारों लोग अपने धर्म की सीमाएँ लांघकर, पीर की दरगाहों या किसी पवित्र व्यक्ति को पूजने के लिए जाते हैं। आज भी दिल्ली में ऐसा ही एक मंदिर साई बाबा का है, जो जन्म से मुस्लिम थे। मेरी युवावस्था के दिनों में भी विज्ञानांनंद नाम के एक सन्यासी मेरे घर नियमित आया करते थे, वे भी जन्म से मुस्लिम थे। भारत-विभाजन के बाद कभी-कभी वे पाकिस्तान में रहने वाले अपने बड़े भाई से मिलने पाकिस्तान जाते थे।

लेकिन जैसा कि मैंने बताया उन पुराने दिनों में, तब तक नजरिया संकीर्ण नहीं हुआ था, आदान-प्रदान की संस्कृति व्यापक थी और माहौल में तनाव नहीं था। जैसे-जैसे समय बीतता गया, संकीर्ण और विभाजनकारी नजरिये को सायास बढ़ावा दिया गया और विभाजनकारी प्रवृतियां विकराल रूप में सामने आने लगीं।

1957 में, मैं अनुवादक के रूप में काम करने के लिए मॉस्को गया था। उस समय तक भारत में भाषिक तानाशाही अपना सर उठा चुकी थी और यत्र-तत्र तनाव दिखने लगा था। मुझे मॉस्को का एक प्रसंग याद है। मैं विज़ा लेने के लिए फ्रांस के दूतावास गया था। मैं वहां की लॉबी में बैठा था, तभी मुझे वहां एक और भारतीय अपनी बारी का इंतज़ार करते मिलें। वे दक्षिण भारतीय थे, जल्दी ही हम लोग खुशी से बतियाने लगे। लेकिन जब मैंने उन्हें यह बताया कि मैं हिन्दी में कहानियाँ वगैरह लिखता हूँ और मैं मॉस्को में किताबों का हिन्दी अनुवाद करने के लिए आया हूँ, तो उनकी मुझमें कोई रुचि नहीं रही और मुझसे अपना मुँह फेर लिया। ये वह ज़माना था, जब एक तमिल भाषी ने हिन्दी थोपने के विरोध में खुद को आग लगा ली थी। कुछ वर्षों बाद इसी तरह का अनुभव मुझे भारत में भी हुआ। मैं रेल से स्थानीय हिन्दी विद्यार्थियों के एक कैम्प में भाग लेने के लिए विशाखापटनम जा रहा था। उसी बोगी में, उसी इलाके में रहने वाले एक सज्जन, जो सरकारी अधिकारी थे, यात्रा कर रहे थे। जब मैंने उन्हें अपनी यात्रा के उद्देश्य के बारे में बताया, तो उन्होंने मुँह बनाते हुए कहा कि “आप हमारे लोगों को हिन्दी पढ़ाने के लिए इतने दूर से आये हैं? आपके पास कुछ और बेहतर करने के लिए नहीं है क्या?” और उसी तरह से ठंडा और रुखा व्यवहार करने लगे।

और, लखनऊ में मुझे इससे भी तल्ख अनुभव का सामना करना पड़ा। कुछ वर्ष पहले मैं वहाँ एक छोटा-सा पुरस्कार लेने गया था। उस समय उत्तर प्रदेश के विद्यालयों में उर्दू को दूसरी भाषा बनाने का उपक्रम चल रहा था। पुरस्कार समिति के दफ्तर में मैंने सुना कि कोई गुस्से से बोल रहा था कि “उर्दू को मान्यता देने का मतलब देश का दूसरा विभाजन है, दूसरा पाकिस्तान बनने वाला है।” देखिये, किस तरह का संकीर्ण नजरिया हो गया है। न केवल किसी एक भाषा का अन्य भाषाओं पर आधिपत्य स्थापित करने की कोशिशें की गई हैं, बल्कि भाषाओं को धार्मिक समुदायों के साथ जोड़कर न केवल हानि पहुंचाई गई, बल्कि अब भी पहुंचाई जा रही है। यहां तक कि कुछ ही महीनों पहले दिल्ली में हुए उर्दू प्रचार-प्रसार के सेमिनार में वक्ता-दर-वक्ता इस बात पर बल देते रहे कि मुस्लिम अल्पसंख्यकों की भाषा के रूप में उर्दू को इसका अपेक्षित स्थान मिलना चाहिए। मैं उर्दू को इसके अपेक्षित स्थान देने के मत का स्वागत करता हूँ, लेकिन इसे अल्पसंख्यकों की भाषा कहने का विरोध करता हूँ।

2015-08-10 10.17.24उर्दू किसी एक धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय की भाषा नहीं है। यह महान भारतीय भाषाओं में से एक है और दूसरी किसी भी भाषा की तरह हमारी संपन्न सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न हिस्सा है। यह हमारे इतिहास द्वारा हमें दिया हुआ एक बेशकीमती तोहफा है। इसने हमें विश्वस्तरीय साहित्य दिया है, जिसकी हम कद्र करते हैं। इस भाषा में जितना साहित्य मुसलमानों ने लिखा, उतना ही गैर-मुसलमानों ने भी लिखा है। इसी तरह से हिन्दी में साहित्य गैर हिन्दू लोगों ने भी लिखा है और आज भी लिख रहे हैं। प्रेमचन्द ने हिन्दी और उर्दू दोनों ही भाषाओं में बेहतरीन साहित्य लिखा और उर्दू कथा की तरह ही हिन्दी उपन्यास के वे जनक माने जाते हैं। रघुपति सहाय फिराक़ उर्दू के प्रसिद्ध शायरों में शुमार किए जाते हैं। और अनगिनत मुस्लिम लेखक हिन्दी में साहित्य रचकर इसे संपन्न बना रहे हैं। कुछ वर्षों पहले हम सबने टीवी पर ‘महाभारत’ देखा था, इसके सभी संवाद स्वर्गीय राही मासूम रज़ा ने लिखे थे, जो जन्म और विश्वास से मुसलमान थे लेकिन हिन्दी के एक महान लेखक थे। जब किसी ने उनसे पूछा कि मुसलमान होने के बावजूद भी महाभारत के इतने अदभुत संवाद उन्होंने कैसे लिख लिए, तो उनका सीधा सा जवाब था, “किसी भी अन्य व्यक्ति की तरह यह मेरी भी सांस्कृतिक विरासत है।”

कुछ वर्षों पहले मैंने उड़िसा के एक कस्बे में भगवान विष्णु के अवतारों को प्रदर्शित करने वाला एक नृत्य देखा। कई घंटे लंबे उस नृत्य के दौरान एक युवा गायक ने कई गंभीर पद गाये थे। बाद में, जब मुझे उससे मिलवाया गया, तब मुझे पता चला कि वह गायक मुसलमान था। यदि आपने कभी मेरे उपन्यास ‘तमस’ का टीवी रूपांतरण देखा हो तो आपने ध्यान दिया होगा कि जब दंगे भड़क गए थे और आगजनी हो रही थी, तब मुसलमान गायकों का एक छोटा-सा समूह गुरुद्वारे के अंदर जाना चाहता है, लेकिन उन्हें गुरुद्वारे के दरवाज़े बंद मिलते हैं। उनका दिमाग काम करना बंद कर देता है और वे नहीं जानते कि कहाँ जाया जाय। वे गुरुद्वारों में गाने वाले परंपरागत मुस्लिम गायक हैं, लेकिन सांप्रदायिक नफरत की भड़की आग में उनके लिए गुरुद्वारों के दरवाज़े बंद हो गए।

माहौल अब बहुत बिगड़ गया है।

हमारी संपन्न सांस्कृतिक विरासत के रूप हमें केवल भाषा ही नहीं मिली, बल्कि कई मूल्य भी मिलें हैं। संपन्न सांस्कृतिक विरासत के मूल्य हमें हमारे अतीत से मिले हैं और वे हमारे जीवन को भरोसा देते हैं। हमारे इतिहास में एक ऐसा काल था, मेरे हिसाब से वह स्वर्ण काल था, जब भक्त, सूफी और संत कवियों की शिक्षाओं एवं विश्वासों से सभी स्तरों पर लोगों के बीच आपसी संवाद था, जिसने एक शक्तिशाली आंदोलन का रूप ले लिया। मेरे खयाल से यह एक सांस्कृतिक पुनरुत्थान और इस साझी संस्कृति के रूप लेने का काल था। इसका हमारे धार्मिक विश्वासों पर, सामाजिक संस्थाओं, हमारी जीवन शैली, हमारे साहित्य, हमारी भाषाओं और कई अन्य पहलुओं पर इसका पूरा प्रभाव रहा है। हमारे देश के विचारों के इतिहास में यह एक क्रांतिकारी काल था और इसने धार्मिकता को बहुरंगी बनाया। एक सर्वव्यापी ईश्वर में अपने विश्वास से प्रारंभ होकर यह मानव मात्र की समानता अवधारणा का पक्षधर था। इसने जाति-प्रथा को नकारा, इसने प्रेम की शिक्षा दी- ईश्वर के प्रेम की, मानव मात्र के लिए प्रेम की, जीवन के सिद्धांत के रूप में प्रेम की।

यकीनन, हमारे देश का इतिहास ऐसा ही रहा है कि शुरुआत से ही दूर और नजदीक से व्यापारी, मुसाफिर, आक्रमणकारी, फकीर आदि आते रह हैं और उनमें से बहुतों ने हिन्दुस्तान को अपना घर बनाना तय किया और समय के साथ-साथ उन्होंने अपनी पहचान को भारत की जनता की पहचान के साथ मिला लिया। लेकिन मध्ययुग का भक्तिकाल अद्वितीय था। उसमें एक विशेष समझ के साथ शक्तिशाली सांस्कृतिक पुनरुत्थान हुआ, जिसने जाति और धर्म के बंधन तोड़ दिये और साझी विरासत की परंपरा स्थापित की।

कबीर कहते हैं कि

एक रूप सन माहीं

एक ही त्वचा रुधित पुनि एक ही

विप्र शुद्र के माहीं।

और

एक निरंजन अल्लाह मेरा

हिंदू तुर्क दुही नहीं मेरा

मुझे पूरे भारत में तीन सौ वर्षों तक अस्तित्वमान रहे इस शक्तिशाली आंदोलन के स्वरूप और योगदान के बारे में ज्यादा कुछ नहीं कहना है। कबीर, नानक, रैदास और कई अन्य कवियों के पद आज भी करोड़ों लोगों की जबान पर है। यह गौरतलब है कि गुरुनानक ने अपने पट शिष्य के रूप में एक मुस्लिम व्यक्ति मर्दाना की नियुक्ति की थी। हमारे संत कवि नीची कही जाने वाली जातियों में पैदा हुए थे- कबीर जुलाहे थे, रैदास चमार थे आदि, आदि, लेकिन उनमें पुरातनपंथ को चुनौती देने का साहस था- हिन्दू और मुलसमानों दोनों के पुरातनपंथ को। और साहस था, तमाम तरह के जाति भेद के विरोध का और मानव मात्र की समानता का। एक बौद्धिक आन्दोलन भी उस समय उठ रहा था। यह हिन्दू धर्मग्रंथों के उत्साही प्रशंसक दारा शिकोह का समय था, जिसने कुछ उपनिषदों और अन्य ग्रंथों का अनुवाद किया था और हिन्दू एवं मुसलमान धर्म ग्रंथों में ईश्वर की धारणा की समानता पर बल देते हुए एक प्रसिद्ध ग्रंथ ‘मजमौल बहरैन’ (दो समुद्रों का मिलन) लिखा। दारा शिकोह कहा करता था कि ‘मैं उपनिषदों को एकेश्वरवाद का भण्डार मानता हूँ।’ विडंबना ही है कि यही वह किताब थी, जिसके बिना पर उसके भाई औरंगजेब ने उसे फांसी दे दी। यह सांस्कृतिक साझेपन का काल था, जो एक ईश्वर की धारणा और मानव मात्र की समानता से प्रेरित था।

पंजाब के मशहूर सूफी कवि बुल्ले शाह ने अपनी एक कविता में कहा कि

बुल्लिया, तैनू काफ़र काफ़र आखदे

तूं आहो, आहो आख!

बुल्ले शाह, तुम्हें लोग काफिर काफिर कहते हैं, बुल्ले शाह का जवाब होता था- जाओ उन्हें कह दो, मैं हूँ काफिर, मैं काफिर।

ऐसे पदों में गंभीरता और मानवीय संवेदनशीलता है, जो उस समय के सांस्कृतिक सांझेपन की उत्कंठ आकांक्षा की स्पष्ट अभिव्यक्ति का प्रमाण है। कबीर उस युग के महान लोगों में से एक थे। साहसी और निर्भीक, उन्होंने अपने सरोकारों के लिए साहसपूर्वक पुरातनपंथ को उसके गढ़ बनारस में ही चुनौती पेश की। कभी-कभी मुझे ऐसा लगता है कि उनके जन्म के बारे में अनिश्चितता में कुछ प्रतीकात्मकता भी है कि वे जन्म से हिन्दू थे या मुसलमान। इसके पीछे की समझ यह होनी चाहिए कि उन्हें हिन्दू और मुसलमान के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, कि हिन्दू और मुसलमान के रूप में उनकी पहचान अपरिभाषित रहनी चाहिए। इसलिए, उनके जन्म का मुद्दा पृष्ठभूमि में चला गया और हिन्दू और मुसलमान दोनों समुदाय के लोगों ने उनकी शिक्षाओं को उत्साह के साथ अपनाया।

ऐसा क्यों हुआ कि हमारे इतिहास का यह पन्ना आवश्यकता से बहुत कम रेखांकित किया गया? इन संतों को आध्यात्मिक (पारलौकिक) कवियों के रूप में पेश किये जाने के प्रयास अवश्य हुए हैं लेकिन उनकी कविता के सामाजिक पक्ष को जान बूझकर नज़रअंदाज किया गया और दबाया गया। उन्हें सिर्फ ईश्वर के साथ एकाकार होने का आकांक्षी बताया गया।

लेकिन कबीर जब यह कहते है, तो पता चलता हैं कि वे यथार्थ और लौकिकता से जुड़े थे-

कबिरा खड़ा बाज़ार में

लिये लुकाठी हाथ

जो घर फूंके आपनो

चले हमारे साथ!

मेरे खयाल से यही वह काल था, जिसने हमारी साझी संस्कृति का ताना-बाना निर्मित किया। विचारों और विश्वासों की तरह ही सामाजिक स्तर पर हुए व्यापक संवाद के माध्यम से इसने हमें उदार, सहिष्णु, लोकतांत्रिक नज़रिया दिया, जो सभी सह-जीवों के लिए प्यार और सहधर्मिता की भावना से ओतप्रोत था। इसी सर्वव्यापी प्रभाव के आलोक में हमारे लोग सदियों से शांतिपूर्ण पड़ॊसी के रूप में रह रहे थे। यही वह काल था जिसने हमें आज की भाषाएँ और कालजयी साहित्य का भंडार प्रदान किया। समृद्ध, बहुलतावादी संस्कृति के इस काल से ही हम आज संकीर्ण मानसिकता और पुरातनपंथ के खिलाफ लड़ने की प्रेरणा पाते हैं।

यह लड़ाई एक लंबी लड़ाई है। संत कवियों और सूफियो और उनके शिष्यों ने अपने समय में भी यह लड़ाई लड़ी थी। दारा शिकोह ने विश्वासों के इस साझेपन के समर्थन में अपनी आवाज उठाई थी तो औरंगजेब ने उस आवाज को खामोश कर दिया था। लेकिन महत्त्वपूर्ण बात यह है कि ऐसी कई दमनात्मक कार्यवाहियों के बाद भी यह साझी संस्कृति आज जीवित है और हमारे देश के करोड़ों लोग इसमें अपना विश्वास रखते हैं। यह उनकी मानसिकता का अभिन्न हिस्सा बन गई है।

हम सब जानते हैं कि समय-समय पर संकीर्ण हित, पुरातनपंथ और सत्ताधारी वर्गों ने इस बहुलतावादी संस्कृति को बर्बाद करने और समुदायों के बीच झगड़ा फैलाने एवं उनके बीच विवाद तथा नफरत के बीज बोने की कोशिशे करती रही हैं। अंग्रेज शासकों की नीतियों का यह अभिन्न अंग था। एक ब्रिटिश वायसराय लॉर्ड हार्डिंग्स ने 1926 में सर हारकॉर्ट बटलर को साफ-साफ लिखा था कि

“जब भारत में धार्मिक शांति का दिन आ जाएगा, हमारे यहां से जाने की संभावनाएँ अधिक हो जाएंगी।”  

साम्राज्यवादी शासन ने विभाजन निर्मित ही नहीं किया, बल्कि अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए विभाजन का दोहन करने में उनका महत्वपूर्ण हाथ था। और, हमारे ही सामने आज़ादी से पहले हमने देखा कि इसने कैसे विभाजन की लपटें फैल गई थी।

जब मेरे कस्बे रावलपिंडी में पहली बार सांप्रदायिक दंगे भड़काए गए थे, उस समय मैं छोटा था, ग्यारह साल का। यह 1926 की बात है। और यह महज संयोग नहीं है कि लॉर्ड हार्डिंग्स का ऊपर वाला पत्र भी 1926 का ही है। मेरे कस्बे की अनाज मंडी में आग लगा दी गई थी और उस भयावह रात में उसकी ऊंची-ऊंची लपटों से आकाश लाल-पीला हो गया था। मेरे लिए वह डरावना और अजीब दृश्य था। बाद में मुझे पता चला कि 1922 से 1927 के वर्षों में देश के विभिन्न हिस्सों में बहुत से सांप्रदायिक दंगे हुए। वे दंगे महात्मा गांधी जी के नेतृत्व में चलाए गए पहले असहयोग आंदोलन को तोड़ने के लिए सुनियोजित रूप से करवाए गये थे। हम सब जानते है कि जब-जब अंग्रेज विरोधी संघर्ष मजबूत हुआ, इसे खून से रंग दिया गया। क्या कोई 1946 के कलकत्ता जनसंहार को भूल सकता है या इसके ठीक बाद आजादी की पूर्व संध्या पर हुए नौआखाली जनसंहार को? यह सिलसिला 1947 की विभीषिका और देश के विभाजन तक चलता रहा।

आजादी से पहले और बाद में विभाजनकारी ताकतों द्वारा दिए गए इन कई झटकों के बावजूद भी हमारी आधारभूत लोकतांत्रिकता, इसकी बहुलता, सांप्रदायिक सद्भाव और शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की आकांक्षाएं खत्म नहीं हुई और विरोध तथा घृणा में नहीं बदली।

मैं एक छोटा सा उदाहरण देना चाहूंगा। जब देश का विभाजन हुआ था, तब लाखों लोग विस्थापित होकर बेघर शरणार्थी हो गए। वे घाव अभी तक भरे नहीं गए थे लेकिन मोटा-मोटी लोगों ने सरहद के पार के लोगों के लिए नफरत की आग को हवा नहीं दी। उन्हें विभाजन का केवल दुख था। गौरतलब है कि विभाजन के विषय पर बेहद मानवीय और संवेदनशील साहित्य पंजाबियों द्वारा ही लिखा गया, जो विभाजन के भुक्तभोगी थे; चाहे सरहद के इस पार अमृता प्रीतम हों या उस पार सआदत हसन मन्टो। यह साफतौर पर बताता है कि उस जनसंहार के बीच भी हमारी साझी संस्कृति के मानवीय मूल्यों में उनका विश्वास डगमगाया नहीं था। यही हमारी सद्भावनाओं का खजाना है, जो आज भी आम लोगों के दिलों में संचित है।

लेकिन आज निश्चित ही यह मुश्किल में है। इस सद्भावना को मिटाने के दुष्प्रयास किये जा रहे हैं। आए दिन कुछ ऐसा घटता है जो पूरे देश को हिला देता है, चाहे वह बाबरी मस्जिद गिराने की घटना हो या आस्ट्रेलिया के पादरी और उसके दो बच्चों को जिंदा जलाने की या मुस्लिम धर्मावलंबियों की हत्या की घटना हो या पाकिस्तान की गुप्तचर एजेंसी आईएसाआई समर्थित आंतकवादी समूहों द्वारा निर्दोष लोगों की हत्या की घटना हो या फिर सरहद पार से अब ज्यादा सुनाई देने वाली ज़िहाद की पुकार हो।

यह चुनौती भरा, चेतावनी का समय है। हमारा सांस्कृतिक परिदृश्य अब तक तुलनात्मक रूप से संकीर्ण सांप्रदायिक नज़रिए मुक्त था और जिसमें हमारे लेखक, कलाकार, पत्रकार आदि अब तक उदार और सहिष्णु माहौल में काम करते आये हैं। यह माहौल भी अब सांप्रदायिकता के ज़हर की चपेट में आ गया है। वरना, एम.एफ. हुसैन के कद का कलाकार क्यों उत्पीड़ित होता? एक समय के हमारे सर्वाधिक सम्मानित और वरिष्ठ फिल्म कलाकार दिलीप कुमार क्यों अपमानित होते? हाल ही में लखनऊ में सहमत के कार्यकर्ताओं पर हमला हुआ है। ऐसे कृत्यों द्वारा हम हमारे सांस्कृतिक जीवन की क्या छवि प्रस्तुत करने जा रहे है?

प्रेमचंदबड़ी भयावह स्थिति है, फिर भी मुझे विश्वास है कि देश की जड़ों में बैठी लोकतांत्रिकता को खत्म करना इतना आसान नहीं है। कोई भी दंगा तभी होता है, जब उसे करवाया जाता है। केवल बाहरी भड़काऊ उकसावे के कारण ही सांप्रदायिक दरार पैदा होती है। यहां तक कि पाकिस्तान के साथ हमारे संबंधों में जनता के स्तर पर सद्भावना की कमी नहीं है। साथ ही, इस समय में जब दूरियाँ कम हो रही है और तकनीक लोगों को करीब ला रही है, तो लोगों के बीच दूरियाँ बढ़ाना और अलगाव पैदा करना प्रतिगामी है, घड़ी को उल्टा घुमाने की तरह।

ऐसे समय में मेरा ध्यान अवश्यंभावी रूप से संस्कृतिकर्मियों की ओर तथा सांस्कृतिक संगठनों की प्रेरणास्पद भूमिका, जो इप्टा ने निभाई थी, की ओर जाता है। प्रेमचंद ने एक बार लिखा था कि संस्कृतिकर्मी राजनीति के पीछे चलने वाले लोग नहीं है, बल्कि समाज को रोशनी दिखाने वाले लोग है। मुझे विश्वास है कि वे मौके पर अभिव्यक्ति के तमाम रास्ते अपनाते हुए उठ खड़े होंगे और सेकुलर भारत की शक्तियों को मजबूत करने में अपनी महत्ती भूमिका निभाएंगे। सेकुलरवाद को बचाना भारत को बचाना है।

(अनुवाद: गणपत तेली| ganpat.ac@gmail.com)

(बनास जन के विशेषांक: शताब्दी स्मरण: भीष्म साहनी में प्रकाशित)

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