हफ्ते की किताब: पल्लव- ‘पाकिस्तान का मतलब क्या?’

pallav16असग़र वजाहत को अपनी पीढ़ी का सबसे प्रयोगशील कथाकार कहा जाये तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। कोई लेखक अपनी विचारधारा से समझौता किये बगैर किस तरह अपनेलेखन में लगातार सार्थक प्रयोग कर सकता है इसके लिए वजाहत के लेखन को देखना चाहिए।  उनका तीसरा यात्रा आख्यान ‘पाकिस्तान का मतलब क्या?’ पढ़ना इसलिएअद्भुत अनुभव नहीं है कि वह हमें पाकिस्तान के जन जीवन की हार्दिक झलक देता है अपितु एक कलाकृति के रूप में भी यह उल्लेखनीय रचना है। वजाहत साहब अपनीयात्राओं को सोशल टूरिज्म की संज्ञा देने का आग्रह करते हैं और इस किताब को पढ़ते हुए इस आग्रह का मर्म समझ में आता है।

पाकिस्तान भारतवासियों के लिए एक साथ क्रोध,दया और उपहास का विषय रहा है जिसे भुनाने में हमारी फिल्मों ने कोई कसार नहीं छोड़ी। फिर भी यह देखा जा सकता हैकि पकिस्तान हमाए लिए एक दिलचस्पी का विषय है।  अफ़सोस यह कि तमाम दिलचस्पी के बावजूद हम पाकिस्तान के बारे में बहुत निथरी हुई जानकारियां रखते हैं। मसलन बगैर जांच-पड़ताल किये मान लेते हैं कि वहाँ भयानक गरीबी है, वहाँ भयानक मज़हबी जुनून है और वे अच्छे लोग नहीं हैं क्योंकि हमारी ज्यादातर मुसीबतें उनकेकारण हैं। यह तस्वीर कैसे बनी और इस तस्वीर के बन जाने से किसे लाभ हुआ, इस पर विचार शायद कभी नहीं हुआ। दोनों देशों ने यह भी नहीं समझा कि दोस्त या दुश्मनबदले जा सकते हैं पड़ौसी नहीं। न यह समझा कि अगर दोनों में गर्मजोशी होती तो क्या क्या लाभ दोनों को हुए होते।

असग़र वजाहत साहब महान शायर फैज़ अहमद फैज़ की जन्मशताब्दी के अवसर पर भारत से गए एक प्रतिनिधि मंडल के सदस्य थे।  उन्होंने इस दौरान वहाँ हुए आयोजनों मेंभाग लिया और जब वह प्रतिनिधि मंडल भारत लौट आया तब भी वे वहीं रुके रहे और पाकिस्तान को देखते-समझते रहे। उन्हें पाकिस्तान के तीन शहरों लाहौर,कराची औरमुल्तान जाने का वीज़ा मिला था। वे इन तीनों शहरों में जाते हैं और यहाँ के जन जीवन के कुछ सच्चे और यादगार चित्र पाठकों को देते हैं। एक किस्सागो यात्रा आख्यान को भीजिस ढंग से प्रारम्भ करता है वह कम नहीं। इस आख्यान का पहला पैरा बताता है कि 1955 के आसपास उनके पड़ौस का कोई खानदान पाकिस्तान जा रहा था और ‘ऐसाग़मगीन माहौल था कि दिल बैठा जाता था।’ फिर वे अपने वसी मामू का ज़िक्र करते हैं जो पाकिस्तान ‘सिधार’ गए थे और भरी दोपहर जिनकी चिठ्ठियाँ आते ही सब उठ बैठतेथे। यह था पाकिस्तान से असग़र वजाहत का रिश्ता लेकिन जब वे पाकिस्तान गए तो उसके पीछे वसी मामू के परिवार से मिलने की लालसा या आकांक्षा नहीं थी क्योंकि वसी मामू का परिवार वहां से भी काफ़ी पहले हिजरत कर चुका था ।

बहरहाल पाकिस्तान में पहुँचते ही उनका पहला इम्प्रेशन है-‘मैंने धर्म का जितना सार्वजनिक प्रदर्शन पाकिस्तान में देखा वैसा इस्लामी गणराज्य ईरान में भी नहीं देखा था। जैसेही आप सीमा पार करते हैं,पाकिस्तान के प्रवेश द्वार पर ‘बिस्मिल्लाहे रहमान रहीम’ लिखा दिखाई पड़ता है। उसके बाद जैसे-जैसे लाहौर के नजदीक पहुँचते हैं वैसे चौराहोंपर,इमारतों के ऊपर,घरों के ऊपर,दुकानों के अंदर और बाहर,छतों पर,पेड़ों के तनों पर,पार्कों और मैदानों में,बागों और फुलवारियों में हर जगह अल्लाह,कलमा या कुरआन कीआयतें लिखी दिखाई देती हैं।’ इसका कारण पूछने पर मिला उत्तर यह है-‘पाकिस्तान में धर्म और राजनीति एकदूसरे में इतना घुल-मिल गए हैं कि कहाँ से क्या शुरू होता हैऔर क्या कहाँ ख़त्म होता है,यह बताना मुश्किल है।’ हम जानते हैं कि पाकिस्तान की इस अतिशय धार्मिकता ने कैसा उन्माद पैदा किया है और इस उन्माद से वहां के समाज को कितना अधिक नुकसान उठाना पड़ रहा है ।

फिर आगे एक स्थान पर उनकी टिप्पणी है-‘आतंकवाद और धर्मान्धता की जड़ है अज्ञान और शोषण। लेकिन मूल मुद्दों के प्रति ध्यान कौन देता है क्योंकि हमारे सत्ताधारियों के लिए अज्ञान और शोषण ही ‘जीवन रेखा’ है।’ आमतौर पर सारी सरकारें जनता के नाम पर भले-बुरे काम करती हैं । असग़र वजाहत इसलिए मौका मिलते ही सीधे जनता से पूछ लेते हैं कि जनता क्या चाहती है ? जब वे लोगों से पूछते हैं तो आमतौर पर मिलने वाला जवाब है- बस जी हम लोग तो अमन चाहते हैं।’ कोई फिर आगे पूछता है -‘अच्छा जी……ऐसा है……यह तो कहते हैं……हिंदुस्तान पाकिस्तान को मिटा देना चाहता है।’ अब वजाहत साहब का जवाब देखिये-‘अजी हिंदुस्तान में ख़ुद ही इतने मसले हैं कि वह किसीऔर को मिटाने के बारे में क्या सोचेगा।’ भला इससे ज्यादा सही बात क्या हो सकती है?

हिंदुस्तान- पाकिस्तान में बँटवारा हो गया हो लेकिन आज भी मिट्टी का मोह दोनों देशवासियों को खींचता है।  किताब में एक जगह आये प्रसंग में वजाहत को अमृतसर में हुआ वाक्या याद आता है जहां किन्हीं जसवंत सिंह की बूढ़ी माँ ने रोते रोते  कहा था – ‘मैनूँ  को इक बार लाहौर दिखा दो….इक बार…।’ यह विचारणीय बिंदु है कि दोनों देशों में जारी संवादहीनता और जमी बर्फ टूटे।  असग़र वजाहत लिखते हैं – ‘दोनों देशों की आंतरिक सुरक्षा को पूरी तरह मजबूत बनाये रखते हुए भी भारत-पाक की वीज़ा नीति अधिकमानवीय हो सकती है।  सौ तरह से वीज़ा की समस्या पर सोचा जा सकता है। एक दिन का वीज़ा,ग्रुप वीज़ा, संरक्षण में यात्रा, सिक्युरिटी के साथ वीज़ा आदि कई उपाय हैं,लेकिन दोनों सरकारों में कुछ ऐसे तत्त्व हैं जो अपने या अपने समूह के लाभ के लिए दुश्मनी बनाए रखना चाहते हैं। दुश्मनी रहेगी तो हथियार खरीदे जाएँगे। हथियार खरीदेजाएँगे तो अरबों रुपया कमीशन मिलेगा। सेना का महत्त्व बना रहेगा। दोनों देशों में ऐसी तमाम लॉबी है जो सुरक्षा के नाम पर वीज़ा नीति में ढील नहीं देना चाहती। अगर कड़ेवीज़ा नियमों से ही सुरक्षा सम्भव होती तो भारत-पाक में न तो बम विस्फोट होते और न आतंकी हमले होते।’ आखिर मनुष्य से बड़ा कौनसा सत्य है?

पाकिस्तान में वे ट्रेन का सफ़र करने का इरादा करते हैं। क्यों? सुनिये-‘इसलिए कि सब मना करते हैं कि पाकिस्तान में ट्रेन से सफ़र नहीं करना चाहिए।’ और यह है सच्चे मुसाफिरकी पहचान की वह ठीक ऐसा काम करे। असग़र वजाहत ट्रेन में यात्रा करते हैं और यह यात्रा किसी अनोखे अनुभव से कम नहीं है।इस रेल यात्रा में वजाहत ने अपनी मुसाफिरी के सच्चे आनंद का वर्णन किया है-‘ख्याल आया अकेला हूँ। रात का दस बजा है। अगर दो आदमी एक छोटा-सा चाकू लेकर कूचे  में आ जाएँ तो मुझे अपना पर्सऔर मोबाइल देना पडेगा। तब न तो मैं किसी को कांटेक्ट कर पाउँगा और न कहीं जा सकूंगा। इस इमरजेंसी से निपटने के लिए मैंने कुछ जरूरी फोन नंबर एक अलग कागज़ पर नोट किये कुछ पैसे इधर-उधर सामान   में डाल   पर्स   को  हल्का किया। पासपोर्ट सामान में रखा और लुटने के लिए तैयार होकर बैठ गया।’ यह है यात्रा का आनंद। जीवन को समझने की अद्भुत ललक।  काश राहुल होते और अपनी किताब ‘घुमक्कड़ शास्त्र’ को इस यात्रा में घटित होते देखते।

पाकिस्तान में असग़र वजाहत मुल्तान जाते हैं जिसे पीरों,सूफ़ियों और भिखारियों का शहर कहा जाता है। यहाँ असग़र वजाहत फ़ारसी का एक शेर सुनाते हैं-

चहार चीज़,अस्त तोहफ़-ए-मुल्तान

गारद,गरमा,गदा व गोरिस्तान।

अर्थात मुल्तान का उपहार चार चीज़ें हैं- धूल,गर्मी,फ़क़ीर और क़ब्रिस्तान। आश्चर्य नहीं अगर यहाँ भोपाल की चार चीज़ें -‘ज़र्दा,गर्दा, पर्दा और नामर्दा’ या बनारस की पहचान -‘राँड,साँड सीढ़ी,संन्यासी- इनसे बचे तो सेवे काशी’ याद आ जाएँ। याद आनी ही चाहिए क्योंकि मुल्तान और बनारस या मुल्तान और भोपाल में सदियों पुराना रिश्ता है। असग़रवजाहत की यात्रा फिर इन शहरों में पुल बना रही है तो इसके कितने बड़े मायने होते हैं। यूरोप केंद्रित मानसिकता एशिया के हमारे सबसे नदीकी और पड़ोसी देशों से कितनी दूरी बढ़ा दी है।फिर आगे भी वे मुल्तान पर एक और शेर सुनाते हैं-

मुल्तान मा बा जन्नत आला बराबर अस्त

आहिस्ता पा बा-नाह के मालिक सज्दा मी कुनद।

अर्थात मुल्तान उच्च स्तरीय स्वर्ग के बराबर है,आहिस्ता चलो कि फ़रिश्ते यहाँ सज्दा करते हैं। मुल्तान में वे रुक-ने-आलम का मक़बरा देखने जाते हैं,जिसके बारे में उनका कहनाहै-‘रुक-ने-आलम का मक़बरा पूर्व मुगल काल का ताजमहल कहा जाए तो बेजा न होगा। जिस तरह ताजमहल की सुंदरता का वर्णन नहीं किया जा सकता,उसी तरह रुक-ने-आलम के मक़बरे का ज़िक्र हमेशा अधूरा रहेगा।’ रुक-ने-आलम मुल्तानके आध्यात्मिक पुरुषों में अग्रणी बहाउद्दीन ज़करिया के पोते थे जिनका सम्बन्ध सुहरावर्दी सूफी सिलसिलेसे था। यह भी सच्चे यात्री की पहचान है कि असग़र साहब मुल्तान गए। क्योंकि उनके अमरीकावासी कहानीकार मित्र उमेश अग्निहोत्री ने उन्हें बताया था उनकी पत्नी पुष्पा जीके नाना कभी मुल्तान में रहा करते थे-लाला कुँवरभान। और बस उन्होंने इरादा पक्का किया -‘मेरे ख़याल से पुरानी यादों से… अच्छी हों या बुरी हों…..सामना करने से हिम्मतआती है।’

ऐसा नहीं है यात्री अपने भलेपन में वहाँ की बुराइयों से आँखें मूंदे चल रहा है। असग़र वजाहत ने पाकिस्तान के कुख्यात ब्लैसफेमी क़ानून की खासी चर्चा की है जिसके अनुसार’अगर किसी ग़ैर मुस्लिम के बारे में दो मुसलमान  दे दें कि आदमी/औरत ने ऐसा कुछ कहा,लिखा,बोला है जिससे पैगम्बर मुहम्मद साहब का अपमान होता है,तो धार्मिकअदालत आरोपी को फांसी की सजा देगी।’ आगे उन्होंने लिखा है-‘दो लोग-पूरे देश में दो लोगों का मिलना कितना आसान होगा जो यह कह सकें कि मैंने तौहीने रिसालत की है।बस इतना काफी है फिर हत्या कर दी जाएगी। भारत में अगर मैं हाशिमपुरा,अहमदाबाद में होता तो हत्या कर दी जाती क्योंकि मैं मुसलमान हूँ।’ ऐसे ही एक जगह वे बताते हैं-‘पाकिस्तान में हिन्दुओं और ईसाइयों ने अपने पहले नाम (फर्स्ट नेम) ऐसे रखे हुए हैं जिससे उनके धर्म का पता नहीं चलता।’ कहना न होगा कि यह हर एक जिम्मेदार लेखक काकर्त्तव्य है कि वह मनुष्य विरोधी किसी भी कार्रवाई का प्रतिकार करे। यही नहीं वे बराबर कोशिश करते हैं कि वहाँ के अल्पसंख्यकों का जीवन करीब से देखें-जानें।  समझने की बात है कि लोकतंत्र की सफलता-सार्थकता इसी बात में होती है कि आप अकेले आदमी की आवाज़ सुनने और उसे सम्मान देने का धैर्य रखें। मुल्तान भ्रमण के दौरान उनके मनमें एक जगह अंग्रेजों के प्रति सम्मान उमड़ता है-‘मुल्तान का रेलवे स्टेशन देखकर यह लगा कि अंग्रेजों के मन में स्थानीय आर्ट,कल्चर और दस्तकारी के लिए सम्मान था। मुल्तानके सुन्दर रेलवे स्टेशन की सजावट के लिए टायल्स का इस्तेमाल किया गया है।’

वे अपनी बात को प्रभावी बनाने के लिए और इतिहास सम्बन्धी कोई गड़बड़ न रह जाए या भरम की गुंजाइश न रह जाए इसके लिए कई बार महत्त्वपूर्ण इतिहासकारों की बातोंका सहारा लेते हैं और पाठक को यह जानकारी सचमुच आरोपित या अनावश्यक नहीं लगती। उदाहरण के लिए पेज 53 पर वे पाकिस्तान के निर्माण में लगी शक्तियों पर बातकरते हैं और बताते हैं कि वस्तुत: पाकिस्तान के निर्माण से किन शक्तियों ने अपने लाभ का सपना देखा था। वे इसके लिए भारत विभाजन,सिंध के मोहाजिर कौमी मूवमेंट औरपाकिस्तानी सेना के अतीत के पन्ने उलटते हैं, बिलोचिस्तान का वर्त्तमान अखबारों के मार्फ़त दिखाते हैं और पाठक को पानी तरफ से किसी ख़ास निष्कर्ष पर लाने के स्थान परनिर्णय लेने के लिए छोड़ देते हैं। लेकिन काम की बात सुन लेना चाहिए और वह लम्बी-चौड़ी नहीं है-‘पाकिस्तान का सपना मुख्यत: उत्तर प्रदेश और दिल्ली के संभ्रांतमुसलामानों का सपना था जो अपने लिए एक सेफ हैवन (सुरक्षित स्वर्ग) बनाना चाहते थे,जहां उर्दू भाषा की केंद्रीय स्थिति हो, कुलीन मुस्लिम कल्चर के साथ आधुनिक सुविधाएंहों और अपने से अधिक सक्षम हिन्दू कुलीन वर्ग से कोई प्रतियोगिता न हो।’

कराची में वे पाठकों को एक अद्भुत शख्सियत रफीक अहमद ‘नक्श’ साहब से मिलवाते हैं जो हिंदी सीख गए हैं,कभी कभी मिल जाने पर हंस पढ़ते हैं और यही नहीं उसमें पसंदआ गई कहानी का उर्दू अनुवाद भी कर देते हैं। फिर बकौल असग़र साहब ‘लगा वे किताबें ही ओढ़ते हैं, बिछाते हैं,पहनते हैं। पहला कमरा और दूसरा और तीसरा और चौथा औरस्ट्डी और किचन और बरामदे,सब कुछ किताबों से भरा हुआ है।’ कराची में ही एक जगह उन्हें एक मोची साहब मिले, सड़क पर बैठे हुए। लम्बे तगड़े,गोर चिट्टे,खशखशी दाढ़ी रखे, शलवार कमीज पहने,बिलकुल सीधे तने बैठे एक पठान थे। उनके दिमाग में ‘अपने यहाँ के’ मोची की जो तस्वीर थी वह गिरकर टुकड़े-टुकड़े हो गयी। उन्होंने बातचीतका सिलसिला चलाया लेकिन पठान मोची साहब ने कोई दिलचस्पी नहीं ली।  आखिर में पालिश-पैसे के बाद असग़र साहब ने हिम्मत कर उनकी एक तस्वीर खींचने कीअनुमति माँगी तो उन्होंने इंकार कर दिया। देखिये-‘अब मैं क्या कर सकता था। चाहता तो मैं ये था कि उन्हें बताऊँ कि पठान मोची महोदय आप इस्लाम की उस उज्ज्वलपरम्परा का प्रतीक हैं जो जातिवाद को अस्वीकार करती है। आप डिगनिटी ऑफ लेबर का प्रतीक हैं। मैं चाहता हूँ कि अपने देश को आपकी तस्वीर दिखाऊँ और पूछूँ कि आपवहाँ क्यों नहीं हैं?’

लाहौर का उनका एक अनुभव बड़ा मजेदार है। वे लिखते हैं -‘गाड़ियों के विचित्र, दहला देने वाले हॉर्न सुनकर मैं ‘कन्विन्स’ हो गया हूँ कि और किसी क्षेत्र में पाकिस्तान ने भारतसे अधिक तरक्की की हो या न की हो, हॉर्न बनाने के मैदान में बाज़ी मार ली है।….सड़क पर दूसरे किस्म के हॉर्न भी सुनने को मिलते थे और लाहौरियों का ही कलेजा है जोइनकी आवाज़ से फट नहीं जाता।’ लाहौर की मक्का कॉलोनी और मदीना कॉलोनी देखकर असग़र साहब को दिल्ली के पांडव नगर या अर्जुन नगर की याद आती है और उनकेमन में बात आती है-‘यह भी सोचने वाली बात है कि ग़रीब लोगों की बस्तियों के नाम धार्मिक स्थलों या पौराणिक पात्रोंके नामों पर क्यों होते हैं?’

पाकिस्तान के आर्थिक मोर्चे पर बदहाली के बावज़ूद उन्होंने मामूली लोगों के जीवन को जिस तुलनात्मक निगाह से देखा वह ध्यान देने योग्य है – ‘वैसे भी पूरे पाकिस्तान में मैंनेवैसी भुखमरी वाली निर्धनता नहीं देखी जो हमारे यहाँ बहुत स्पष्ट दिखाई देती है। ग़रीब लोग तो नज़र आते हैं लेकिन भारत जैसी ग़रीबी-असहनीय,बर्बर,अमानवीय,वीभत्ग़रीबी नहीं दिखाई देती।’ पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था चौपट हो चुकी है,लोग टैक्स नहीं देते और अमरीकी मदद से काम चल रहा है।’ वजाहत लिखते हैं-‘कराची में एक मित्र नेबताया था कि लोग यहाँ बैंक से मोटी रकम कर्ज़ लेते हैं और बैंक कर्ज़ माफ़ कर देते हैं। वैसे तो यह भारत में भी खूब होता है। लेकिन यहाँ यह सुविधा उद्योग और व्यापार जगतको ही हासिल है,जबकि पाकिस्तान में यह ‘सेवा’ उच्च-मध्य और मध्यवर्ग तक पहुँच  गयी है।’

यह किताब हमारे सबसे करीबी पड़ौसी के घर का हाल ही नहीं बताती अपितु अपने बारे में भी नई निगाह से विचार का  देती है।  सोशल टूरिस्ट होने का मतलब यह नहीं कि लेखक हमेशा जीवन के कठोर और कटु सत्यों को ही खोजता रहे।  वहाँ की प्राकृतिक सुंदरता और सामान्यता के वैभव को भी वे देखते-बताते हैं। लोगों से खूब बातें करते हैं। हमारे भीतर बना दी गई धारणाओं को तोड़ते हुए बताते हैं- ‘मुझे हर जगह आमतौर पर अच्छे लोग ही मिले। या आप ये भी कह सकते हैं कि मैंने अच्छे ही लोगों को तलाशकिया।’ पाकिस्तान के मशहूर शाइर हबीब जालिब ने अपनी एक कविता में पाकिस्तान का मतलब बताया है। यह मतलब किसी भी सरहद के पार जाकर प्यार का पैगाम देने वाला है। कम से कम यह किताब इसी पैगाम की पुष्टि है।

 

पाकिस्तान का मतलब क्या ?

असग़र वजाहत का यात्रा वृत्तांत

भारतीय ज्ञानपीठ

120 /-

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