हफ्ते की किताब: पल्लव- ‘किस्सा कोताह’

pallav16अगर काशी का अस्सी, बना रहे बनारस और बहती गंगा जैसी किताबें न होती तो क्या हम बनारस को जान पाते? हम यानी वह पाठक समाज जो बनारस नहीं गया है,बनारस में नहीं रहता। कवि राजेश जोशी ने अभी एक किताब लिखी है – ‘किस्सा कोताह’, और यहाँ भोपाल जिस तरह किताब में आया है उसे देख-पढ़कर आपको भोपाल में बसने का मन करने लगे …हाय हम भोपाल में क्यों नहीं हुए। इसका मतलब यह है कि उस स्थान के बारे में लेखक ने जिस तरह लिखा है वह सचमुच अनूठा और मर्मस्पर्शी है। राजेश जोशी की यह किताब उनके बचपन से जवानी के बीच आये स्थानों पर लिखी गई है और यह न शहरनामा है न आत्मकथा। संस्मरण और रिपोर्ताज बिल्कुल भी नहीं। किताब के पहले ही पेज पर वे स्वयं साफ़ करते हैं-‘यह उपन्यास नहीं है। आत्मकथा नहीं है। शहरगाथा नहीं है और कोरी गप्प भी नहीं है। लेकिन यह इन्हीं तमाम चीज़ों की गपड़तान से बनी एक किताब है।’  यहाँ जोशी अपने लिए एक प्रविधि का चयन करते हैं ठीक कुरु कुरु स्वाहा वाले जोशी जी की तरह। यहाँ एक मैं यानी वाचक यानी राजेश जोशी हैं और दूसरा है गप्पी। ये दोनों मिलकर पाठकों से बातें करते हैं और बातों बातों  में डेढ़ सौ से ज्यादा पृष्ठ बीत जाते हैं तब आप चौंक जाते हैं अरे किताब कैसे खत्म हो गई? लेकिन यह खाली बीत जाना नहीं है हाथ में बहुत कुछ रह जाता है जिसे आप अपनी स्थायी पूंजी समझिये।

किताब की शुरुआत में राजेश जोशी ने क़िस्सों के बारे में एक भरतवाक्य लिखा है – ‘क़िस्सों का नगर क़िस्सों ने रचा है, उसमें आना है तो तथ्यों को ढूँढने की जिद छोड़कर आओ।’ ऐसा ही है किताब की शुरुआत गप्पी के बचपन से हुई है। नरसिंहगढ़ से, जो गप्पी की ननिहाल था। यहाँ किला है, राजा-रानी हैं और लोग बाग़ भी। अनेक बातें-किस्से आते हैं लेकिन आप इनकी तारीखें नहीं ढूंढ सकते। तारीखों में अगर इनको ढूँढा जा सकता होता तो भला इन्हें आने के लिए गप्पी की शरण ही क्यों लेनी होती? गप्पी की आदत है कि वे गप्पें मारते मारते अचानक बीच में ऐसी बातें कह देंगे कि आप सोचते रह जाएँ। देखिए तो – ‘सबको अपना बचपन याद आता है। उम्र बढ़ने के साथ-साथ तो और भी ज्यादा। उनको भी जिनके बचपन में सुख के क्षण नहीं थे या बहुत कम थे। समय बीत जाने के बाद सबसे बुरे दिनों का अनुभव हर व्यक्ति के सबसे मजेदार किस्से की तरह सुनाता है।’ गप्पी के बचपन का ऐसा वर्णन है कि आपका भी मन नरसिंहगढ़ में जा बसने का होता है। फिर जब गप्पी की माँ पीहर से अपने ससुराल भोपाल आईं तब गप्पी को भोपाल देखने का अवसर मिला और यह वह शहर था जिसे गप्पी का शहर होना था। अपने ख़ास रंग वाला भोपाल,अपने ख़ास ढंग वाला भोपाल।

गप्पी इस भोपाल की सैर कराते हैं, यहाँ की असली विभूतियों से आपकी भेंट करवाते हैं और आपको समझ में आने लगता है कि क्यों एक बनारस ही नहीं इस कायनात में। कुछ वाक्य देखिये-

‘सड़कें नवाबों के लिए छोड़ दी हैं लेकिन गलियों के नाम में नवाबों और बेगमों को घुसने की इजाज़त नहीं।’

‘गप्प जब तक अविश्वसनीय न हो तब तक भोपालियों को मजा नहीं आता।’

‘भोपाल की चार चीज़ें मशहूर थीं-ज़र्दा,गर्दा, पर्दा और नामर्दा।’

kissakotahऐसे ही भोपाल की भाषा पर खासा विवेचन है – ‘भोपाल की भाषा में कई तरह की मिलावट थी। उसमें बुन्देली,मालवी,उर्दू और गालियाँ, सबकी जगह पहले से ही तय थी। यहाँ की उर्दू थोड़ी अलग थी। भोपालियों का मानना था कि लखनऊ की उर्दू जनानी उर्दू है और भोपाल की मरदाना उर्दू। ..कई शब्द भोपाली के अपने थे और उन्हें बोलने के अंदाज भी उसके अपने थे। शब्द के बीच में आने वाले (ह) का यहाँ लोप हो जाता था। भोपाल का मामला बिहार से एकदम उलटा था। पहले या पाहिले बोलना हो तो बोला जाएगा पेले। ऐ और औ की मात्रा बोलना भोपालियों के खाते में नहीं आया था। मात्राएँ लगाने और बोलने में  हम काफ़ी किफ़ायती थे। पैसे को पेसे और कैसे को केसे बोला जाता।’ भोपाल की यह भाषा भाषा विज्ञान की दृष्टि से कुछ महत्त्वपूर्ण हो न हो इस लिहाज से महत्त्वपूर्ण है कि यह भोपालियों की आजाद खयाली और अपने ढंग से जीने-बोलने के अंदाज का परिचय देती है। कहना न होगा कि इस भूमंडलीकरण द्वारा बनाए जा रहे विश्व गाँव से भोपाल और बनारस जैसी जगहों का रिश्ता कैसा हो सकता है? इसे स्थानिकता का प्रतिरोध समझना चाहिए जो अपने ढंग का होने की जिद में अड़ा रहने की हिम्मत रखता है। मजे की बात देखिये कि किताब भी ठीक इसी जगह भोपाल के अनूठे शायर ढेंढ़स भोपाली का जिक्र करती है। उनका एक फड़कता हुआ शेर-

शाहने सलफ़ करते थे बरतरफ़ी बहाली

तखफ़ीफ़ यह किस भोसड़ीवाले ने निकाली।

हुआ यूं था कि नवाब साहब के जमाने में शाइर साहब को एक नौकरी दी गई थी जिसमें उन्हें महीने में केवल एक दिन जाना होता था तनख्वाह लेने। कोई नया अधिकारी आया और उनकी बर्खास्तगी का आदेश निकल गया तो ढेंढ़स भोपाली साहब ने आदेश के ठीक पीछे यह शेर लिखकर कागज लौटा दिया। कागज़ होते होते नवाब साहब तक पहुंचा और ढेंढ़स भोपाली साहब फिर बहाल हो गए।

तो क्या बनारस और भोपाल जैसे हमारे शहर असल में निकम्मों-नालायकों के कारण बर्बाद हुए? हमारा देश (अगर वह देश था ) मध्यकाल और उसके बाद ऐसे ही अकर्मण्य लोगों के कारण यूरोप से मार खा गया और हम गुलाम हुए? शायद नहीं, सामंती युग में मनोरंजन के साधनों के अभाव में समाज में ऐसे चरित्रों के होने-रहने की गुंजाइश थी। ‘किस्सा कोताह’ इस शहर के अनूठेपन के चित्र ही नहीं बताती अपितु अपने ढंग की देशज आधुनिकता भी यहाँ विद्यमान है और यह अंग्रेजों के आगमन से ही नहीं आई है बल्कि ठेठ इसे देखा-खोजा जा सकता है। भोपाल जिन दिनों आजादी के बाद विलीनीकरण आन्दोलन से गुजर रहा था और वहां पहली विधानसभा बनी, तब एक किसान खुशाल कीर ने नई विधानसभा का दृश्य देखकर दोहा कहा –

पाँच पंच कुर्सी पर बैठे, फट्टन पर पच्चीस 

राजकरनकोएककमीश्नरझकमारनकोतीस 

(फट्टन=टाटपट्टी)

किस्सों के बीच बीच में गप्पी ने कई दिलचस्प चरित्रों से मिलवाया है। खुद गप्पी के दादाजी को ही देख लीजिये, जिन्हें घर में बा साहब कहा जाता था। ये ऐसे बा साहब हैं जो ‘खाना खाने से पहले हर पूरी को तौल-तौलकर देखते’ क्योंकि किसी हकीम ने बता दिया था कि आप बराबर वजन की रोटियाँ या पूरियाँ खाया करो। अनोखी बात यह होती है कि इन्हें एकाएक भान हो जाता है कि प्रेमनारायण जी नहीं रहे ..और घंटे भर में सचमुच तार भी मिल जाता है। यह गप्पी की उड़ान है या जादुई  यथार्थ। जो भी है, पाठक किताब मे रम जाता है। यह पाठकों को बहलाने का नुस्खा नहीं है अपितु जीवन के ठेठ बीहड से आई सचाई है। एक जगह प्रसंगवश आया है –  ‘उड़ना गप्पी का प्रिय शब्द था। उसे उड़ने वाली हर चीज़ पसंद थी। परिंदे हों, पतंग हों या उड़ने वाले गुब्बारे या कोई मजेदार सी अफवाह।‘ असल में एक बन्द समाज में ही उड़ने के मार्ग खोजे जाते हैं। इस बन्द और तंग समाज का यह चित्र भी देखिये- ‘इतना परदा था कि गप्पी की माँ ने अपने ही घर का बरामदा अठारह,उन्नीस बरस बाद तब देखा था जब बाबा का निधन हो गया। गप्पी की माँ जब नरसिंहगढ़ से भोपाल आतीं तो हाथ भर का घूंघट किये रहतीं, उस पर एक चादर और ओढ़ना होती थी। जो ताँगा बस स्टेंड से उन्हें लेने जाता उसमें चारों तरफ परदे लगे रहते। जब ताँगा घर के दरवाजे पर आता तो दो नौकर ताँगे से घर के दरवाजे तक दोनों तरफ चादर का परदा तानकर खड़े होते। माँ उसमें से निकल कर ऊपर चली जातीं। ‘यह है जीवन। आप जिसमें इतना रस ले रहे थे उस सुंदर के भीतर क यह असुंदर राजेश जोशी छिपाते नहीं । और तभी जाने क्यों ऐसे अंश पढते हुए आपको मनोहर श्याम जोशी का उपन्यास कसप याद आ सकता है। शायद इसका कारण भाषा हो। शायद किस्सागोई हो। शायद जीवन में इतना रस लेने की शक्ति दोनों को यादगार बनाती हो। शायद वर्णन की अद्भुत क्षमता ऐसा करती हो। पता नहीं …या सारी ही बातें सच हों शायद।

कोई शहर हो जिसमें तरह तरह से जीवन खिलता दीख रहा हो और ऐसा कि पाठक का मन करे कि मैं यहीं क्यों न हुआ? अगर वहां पागल न हो तो वह शहर शहर नहीं हो सकता। यहाँ भी एक से एक प्यारे पागल हैं, उनकी सनकें हैं और उनकी चिढावनियां भी हैं। इन पागलों से आपको मिलवाने के बाद राजेश जोशी लिखते हैं- ‘बाजार के पागलपन ने असल पागलों की सारी जगहों को हथिया लिया है। यह पागलपन उस पागलपन से ज्यादा खतरनाक है . ….सामान्य लोग इतने यांत्रिक नहीं हुए थे कि पागलों को शहर से बाहर निकालने की मांग करने लगें। पागल, लोगों की फुर्सत के पलों का मनोरंजन थे। इस मनोरंजन से पागलों और शहर के बीच एक रिश्ता बना रहता था। मजे लेने में थोड़ी हिंसा थी, पर जैसे ही इस हिंसा का प्रतिशत गड़बड़ाता तो लोगों के मन में एक अपराधबोध कुलबुलाने लगता और वह पागलों के लिए कुछ न कुछ करने को दौड़ पड़ते। भोपाल में भोला बाबा जैसे पागल हैं तो मामा भिंड़ी, दादा तामलोट, दादा खैरियत, अंडे चोर और नेहरूजी की अम्मा -पागलपन व्यावहारिकता का प्रत्याख्यान है।‘

किताब में राजेश जोशी आपको बार बार हंसाते हैं, गुदगुदाते हैं और फ़िर छोड देते हैं और आप सोचते रह जाते हैं कि ये चाहते क्या हैं भला? देखिये तो-

‘निक्कर के नीचे चड्डी पहनने का चौंचला तब नहीं था। मुझे रोना आ रहा था और मैं रो नहीं सकता था।’

‘कोष्ठक को भाषा का कान मान लें तो मैं उस कहावत को कान में सुना सकता हूँ। दद्दा मियाँ का लौड़ा, चाँद मियाँ की गाँड और पुनिया नाइन का भोसड़ा।’

क्यों कहना पडा भाई कान में? जब भोपाली सबके सामने कहते हैं, बनारसी सबके सामने हर हर महादेव का  असल जयकारा लगाते ही हैं तब हम हिन्दी के पाठक क्यों कोष्ठकों में बंद हैं? यह किताब और और कारणों के साथ इस लिहाज से भी यादगार है कि यह आपको कोष्ठकों के बाहर निकालती है। काश हमारे देश के कोनों कोनों में फ़ैले ऐसे शहरों कस्बों पर ऐसी दिलचस्प किताबें आ सकें ताकि हम कोष्ठकों में कैद ही न रह जायें।

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