2015: हिन्दी साहित्य- गणपत तेली

साहित्यिक प्रवृत्तियों के लिहाज से किसी एक वर्ष विशेष में प्रकाशित और चर्चित हुई कृतियों का महत्व यह होता है कि उससे लेखन-पठन के नए रुझान समझे जा सकते हैं। हालांकि किन्हीं प्रवृत्तियों के प्रचलन को समझ पाने के लिए एक साल की अवधि बहुत कम समय होता है, फिर भी पिछले साल में हुई साहित्यिक गतिविधियों के पुनरावलोकन से कुछ ऐसे संकेत हमें अवश्य मिलते हैं, जो इन प्रवृत्तियों को पहचानने में हमारी मदद करते हैं। संभवत: इसी उद्देश्य से साल के अंत में साहित्य का लेखा-जोखा प्रस्तुत किया जाता है। यदि हम अपने पब्लिक स्फीयर की बात करें तो इस साल साहित्य और साहित्यकारों को सबसे ज़्यादा स्थान ‘पुरस्कार-वापसी’ के कारण मिला। हिन्दी के चर्चित रचनाकार उदय प्रकाश द्वारा साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने के बाद भारतीय भाषाओं के कई लेखकों ने समाज में बढ़ती असहिष्णुता के प्रतिरोध स्वरूप अपने पुरस्कार लौटाए जिनमें अशोक वाजपेयी, काशी नाथ सिंह सहित कई रचनाकार शामिल हैं।

nilkantkasafarपुरस्कार लौटाने वाले इन रचनाकारों के बरक्स इस साल रामदरश मिश्र को इस साल साहित्य अकादमी सम्मान प्राप्त हुआ। भारतीय ज्ञानपीठ का प्रतिष्ठित मूर्तिदेवी पुरस्कार विश्वनाथ त्रिपाठी की किताब ‘व्योमकेश दरवेश’ के लिए प्रदान किया गया। प्रो. माधव हाड़ा को उनकी पुस्तक ‘सीढ़िया चढ़ता मीडिया’ के लिए घासीराम वर्मा सम्मान मिला। जीतेन्द्र गुप्ता को उनकी पुस्तक ‘भारतीय इतिहास बोध का संघर्ष और हिन्दी प्रदेश’ में औपनिवेशिक ज्ञान-मीमांसा के बरक्स हिन्दी पब्लिक पब्लिक स्फीयर में हो रही बहसों के वस्तुनिष्ठ विश्लेषण के लिए देवी शंकर अवस्थी सम्मान प्राप्त हुआ। इसी साल तुलसी राम, गोपाल राय, वीरेन डंगवाल, कृष्णदत्त पालीवाल, विजय मोहन सिंह, महीप सिंह, कैलाश वाजपेयी, जगदीश चतुर्वेदी जैसे लेखक इस दुनिया से विदा हुए।

हिन्दी जगत में वर्ष 2015 में आलोचना की किताबें प्रमुखता से आईं। इस वर्ष प्रकाशित हुई कई आलोचनात्मक कृतियों ने हिन्दी साहित्य के अध्ययन-अध्यापन को नए आयाम देने का प्रयास किया है। नित्यानंद तिवारी की पुस्तक ‘मध्यकालीन साहित्य: पुनरावलोकन’ और माधव हाड़ा की पुस्तक ‘पचरंग चोला पहन सखी री: मीरा का जीवन और समाज’ पुस्तकों ने मध्यकालीन साहित्य को पुनर्रेखांकित किया है। माधव हाड़ा की पुस्तक मीरा के बारे में प्रचलित मिथकों को अपने वस्तुनिष्ठ विश्लेषण के माध्यम से पड़ताल करती है। बजरंग बिहारी तिवारी की पुस्तक ‘भारतीय दलित साहित्य: आंदोलन और चिंता’ ने दलित साहित्य को भारतीय साहित्य के परिप्रेक्ष्य रखने का प्रयास करती है, तो मैनेजर पाण्डेय की ‘साहित्य और दलित दृष्टि’ और बजरंग बिहारी तिवारी की ही ‘जाति और जनतंत्र’ तथा ‘दलित साहित्य: एक अंतर्यात्रा’ किताबें जाति और दलित साहित्य के स्वरूप को विश्लेषित करती हैं।

pachrangइनके साथ ही, धनंजय वर्मा की ‘आधुनिक कवि विमर्श’, रोहिणी अग्रवाल की ‘हिन्दी उपन्यास का स्त्री पाठ’, पी.एन. सिंह की ‘नामवर: संदर्भ और विमर्श’, कृष्णमोहन की ‘आईनाखाना’, बली सिंह की ‘उत्तर-आधुनिकता और समकालीन हिंदी आलोचना’, मृत्युंजय की ‘हिन्दी आलोचना में कैनन निर्माण की प्रक्रिया’, पल्लव द्वारा संपादित ‘अस्सी का काशी’, दिलीप शाक्य की ‘कविता की समझ’ आदि की किताबें इस वर्ष आलोचना के क्षेत्र में चर्चित रहीं। साहित्य भंडार, इलाहाबाद से आई चार आलोचना पुस्तकों उपन्यास का अन्त नहीं हुआ है (विश्वनाथ त्रिपाठी), यथार्थ और कथार्थ (राजेन्द्र कुमार), रचना का सामाजिक पाठ (पंकज पराशर), कहानी की उपस्थिति(जय प्रकाश) को मुख्यत: कथा आलोचना के लिए देर तक पढा जाएगा। इस साल कुछ महत्वपूर्ण लेखकों की रचनावलियाँ और संचयन भी प्रकाशित हुए, जिनमें देवशंकर नवीन द्वारा संपादित ‘राजकमल चौधरी रचनावली’, राजेश जोशी द्वारा संपादित ‘मुक्तिबोध संचयन’ और लीलाधर मंडलोई द्वारा संपादित ‘केदारनाथ सिंह संचयन’, समीर कुमार पाठक द्वारा संपादित ‘बालकृष्ण भट्ट समग्र’ महत्वपूर्ण हैं।

इस साल प्रकाशित महत्वपूर्ण उपन्यासों में भारतीय किसानों की दुर्दशा और आत्महत्याओं पर केन्द्रित संजीव का उपन्यास ‘फांस’, बदलते ग्रामीण जीवन के संघर्षशील स्त्री चरित्रों पर केन्द्रित सत्यनारायण पटेल का ‘गाँव भीतर गाँव’, सांस्कृतिक संक्रमण पर आधारित अलका सरावगी का ‘जानकीदास तेजपाल मेंशन’, दरशथ मांझी के जीवन पर आधारित निलय उपाध्याय का ‘पहाड़’, झारखंड आंदोलन पर केन्द्रित राकेश कुमार सिंह का ‘महाअरण्य मे गिद्ध’ शामिल हैं। सुशीला टाकभौरे का ‘तुम्हें बदलना ही होगा’, उषा किरण खान का ‘अगनहिंडोला’, कृष्णा अग्निहोत्री का ‘प्रशस्तेकर्माणि’, मनोज रूपड़ा का ‘काले अध्याय’, प्रदीप सौरभ का ‘और सिर्फ तितली’, रवीन्द्र वर्मा का ‘घास का पुल’, अल्पना मिश्र का ‘अन्हियारे तलछट में चमका’ राजकुमार राकेश का ‘कंदील’ आदि इस वर्ष के प्रशंसनीय उपन्यास रहे। भारतीय समाज के विभिन्न संस्तरों की पड़ताल करते ये उपन्यास जहाँ एक तरफ मानवीयता के पक्ष में आवाज़ उठाते हैं, वहीं दूसरी तरफ शिल्प के माध्यम से औपन्यासिकता को भी नए आयाम देने का प्रयास करते हैं।

jeetendra guptaइस साल कहानी की समृद्ध होती दुनिया में आमद बदस्तूर जारी रही। वरिष्ठ कथाकार के दो कहानी संकलन- ‘छोटू उस्ताद’ और ‘नीलकांत का सफर’ इस वर्ष प्रकाशित हुए। ‘नीलकांत का सफर’ प्रतिनिधि संकलन है, तो ‘छोटू उस्ताद’ स्वयं प्रकाश की छोटी कहानियों का संकलन। ये कहानियाँ लोक व्यवहारों की पहचान करती हुई भारतीय समाज के यथार्थ की परते खोलती हैं। इसी तरह दूधनाथ सिंह के कहानी संग्रह ‘जलमुर्गियों के शिकार’ की कहानियों ने हमारे सामाजिक जीवन के यथार्थ को अभिव्यक्ति दी। इसी साल प्रकाशित ‘असगर वजाहत की चुनिंदा कहानियाँ’ (संपादक-पल्लव), संजीव के संग्रह ‘गैरइरादतन हत्या’, कैलाश बनवासी के ‘प्रकोप तथा अन्य कहानियां’, गीता श्री के संग्रह ‘स्वप्न, साजिश और स्त्री’, पत्रकार-कथाकार प्रियदर्शन के संग्रह ‘बारिश, धुआ और दोस्त’, ह्रदयेश के संग्रह ‘कथा एक नामी घराने’ और ‘ह्रदयेश: कथा पंचक’, हरि भटनागर के संग्रह ‘मेरी चुनिंदा कहानियाँ’, ऋषिकेश सुलभ के संग्रह ‘हलंत’, संजय कुंदन के ‘श्यामलाल का अकेलापन’, गीता श्री के ‘स्वप्न और साजिश’, विवेक मिश्र के ‘ए गंगा तुम बहती हो क्यूं’, सुधा अरोड़ा की ‘बुत जब बोलते हैं’, अवधेश प्रीत की ‘चांद के पार चाभी’ आदि कहानी संग्रहों ने पाठकों को आकृष्ट किया।

इस वर्ष में प्रकाशित हुए कविता-संग्रहों में कुँवर नारायण की किताब ‘कुमारजीव’, चंद्रकांत देवताले की ‘खुद पर निगरानी’, राजेश जोशी की ‘जिद’, मदन कश्यप की ‘अपना ही देश’, अनामिका की ‘टोकरी में दिगंत’ किताबें इस वर्ष के महत्वपूर्ण काव्य संकलन हैं। वरिष्ठ कवि नंद चतुर्वेदी के निधन के बाद इस वर्ष उनका अंतिम कविता संग्रह ‘आशा बलवती है राजन’ प्रकाशित हुआ। नंद किशोर आचार्य के ‘आकाश भटका हुआ’, गोविंद प्रसाद के ‘वर्तमान की धूल’, दिविक रमेश के ‘माँ गाँव में हैं’, अंबिका दत्त के ‘कुछ भी स्थगित नहीं’, हेमलता महिश्वर के ‘नील, नीले रंग के’, रजत रानी मीनू के ‘पिता भी तो होते हैं माँ’, सदानंद शाही के ‘सुख एक बासी चीज है’, सदाशिव श्रोत्रिय के ‘बावन कविताएं’, अम्बिका दत्त के ‘कुछ भी स्थगित नहीं, पंकज चतुर्वेदी के ‘रक्तचाप और अन्य कविताएँ’, वर्तिका नंदा के ‘रानिया सब जानती हैं’, बाबुशा कोहली के ‘प्रेम गिलहरी दिल अखरोट’ दिलीप शाक्य के ‘कविता में उगी दूब’ आदि संग्रहों की कविताएँ भी चर्चित रहीं।

shyamlalkaakelapanगद्य की अन्य विधाओं की बात करें तो ओम प्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा ‘जूठन भाग दो’, एक ऐसी महत्वपूर्ण कृति हैं, जो चर्चित नहीं हो सकी। इस कृति में वाल्मीकि जी ‘जूठन’ के बाद के अनुभवों को दर्ज़ किया। आत्मकथाओं में इस वर्ष निर्मला जैन की ‘जमाने में हम’, रमणिका गुप्ता की ‘आपहुदरी’, विश्वनाथ प्रसाद तिवारी की ‘अस्ति और भवति’ आदि चर्चित रहीं। विश्वनाथ त्रिपाठी की हजारी प्रसाद द्विवेदी पर केन्द्रित संस्मरणात्मक किताब ‘गुरुजी की खेती-बारी’ भी इस साल चर्चित हुई। ‘मेरे साक्षात्कार’ शृंखला में मन्नू भंडारी, उद्भ्रांत और स्वयं प्रकाश (संपादक-रेणु व्यास) के साक्षात्कार संकलन इस वर्ष प्रकाशित हुए। लीलाधर मंडलोई की ‘दिनन दिनन के फेर’, अजित कुमार की ‘सात छायावादोत्तर कवि’, निदा नवाज का ‘सिसकियां लेता स्वर्ग’, सूर्यबाला की ‘अलविदा अन्ना’ आदि रचनाओं ने भी हिंदी के पाठकों के बीच अपनी पहचान बनाई। कथाकार असग़र वजाहत की ‘सफ़ाई गन्दा काम है’ और प्रेमपाल शर्मा के ‘हिन्दी क्षेत्र : जड़ता की जड़ें’ इस साल की श्रेष्ठ निबन्ध पुस्तकें कहीं जा सकती हैं।

इस वर्ष में पुस्तकों की योजनाओं में कई नए प्रयोग भी सामने आए। असग़र वजाहत की किताब ‘बाकरगंज के सैय्यद’ ने रोचक शैली में इतिहास को खंगाला। प्रभात रंजन की ‘कोठागोई’ भी इसी तरह की पुस्तक है, जो संकटग्रस्त संगीत और इसके कद्रदानों को की व्यथा-कथा दर्ज़ करती है। इस वर्ष के प्रारंभ में माइक्रो फिक्शन के रूप में आई लप्रेक शृंखला की किताबों की चर्चा रही, जिनमें रवीश कुमार की ‘इश्क में शहर होना’ लोकप्रिय भी हुई। इस किताब ने हिंदी साहित्य के परंपरागत पाठकों के बाहर भी अपनी पहुँच बनाई। इसी तरह से नीलिमा चौहान और अशोक कुमार पाण्डे द्वारा संपादित विद्रोही प्रेमियों के आत्मकथ्य ‘बेदाद-ए-इश्क, रुदाद-ए-शादी’ भी हिंदी पाठकों के सामने नई रचनाशीलता के साथ प्रेम कहानियों को प्रस्तुत करती है।

 इस साल की प्रकाशित कृतियों में जहाँ एक ओर पुस्तक-योजना में नवाचार दिखाई दिए, वहीं परंपरागत ढ़ांचे में भी पठनीय और संग्रहणीय पुस्तकें प्रकाशित हुई। नवाचारों को मिले प्रोत्साहन से यह स्पष्ट होता है कि आने वाले वर्षों में हिन्दी लेखन में नए प्रयोग होते रहेंगे। संवेदना पक्ष की बात करें तो, समाज में बढ़ती असहिष्णुता के मुद्दे पर जैसी प्रतिक्रिया हुई, उससे स्पष्ट है कि हिन्दी साहित्य में प्रगतिशील और लोकतांत्रिक मूल्यों के पक्षधर लेखन की रवायत मजबूत होती जाएगी।

(देशबंधु, 10 जनवरी, 2015)

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