हफ्ते की किताब: पल्लव- ‘हम न मरब’

Pallav (1)‘जिंदगी स्साली, बस,  निरंतर तलाश है। और सुख भैंचो कहीं होता ही नहीं। जिंदगी सुख के पीछे एक चूतियाचन्दन वाली दौड़ है।  ख़त्म नहीं होती क्योंकि सुख तो कभी मिलने का नहीं। अरे, जे सुख नाम की चीज़ जो कहीं होए तब तो मिले ना। समझो, सुख कहीं होता ही नहीं डॉक्टर साहब। सब दुखी हैं। और सब तरफ, बस दुःख ही दुःख है। सब दुखी हैं। कोई कम दुखी, कोई ज्यादा। और जो दुखी नहीं है,वह वास्तव में चूतिया है। चूतिया होने के कारण उसे पता ही नहीं चल पा रहा है कि वो वास्तव में दुखी है। वह अपनी मूर्खता के कारण दुःख को ही सुख समझे रहता है। …. सो दुःख तो भैया हर तरफ है। सुख की बस अफवाह है।

कभी मछरिया पकड़े हो न तालाब पे? न पकड़े होगे। पर पता तो होगा। वैसा ही है यह सुख। इसे दुःख के कांटे में लगा चारा समझ लो डॉक्टर साब।  लपकते हो ,पर दुःख के कांटे में बिंधे रह जाते हो। बस, जेई है सुख और दुःख की कहानी।’

ज्ञान चतुर्वेदी का नया उपन्यास ‘हम न मरब’ व्यंग्य की शैली में हँसते-गाते मृत्यु के बहाने जीवन की तलाश करता है। कहानी इतनी सी है कि गाँव में रहने वाले बब्बा मर गए। अब उनके अंतिम संस्कार से लगाकर अगले आठ दिन में इस घर में जो कार्य व्यापार होता है वह इस मृत्यु के बहाने जीवन के विविध रंग खोजता है। मृत्यु पर दार्शनिक-सामाजिक चिंतन करता है। बब्बा लुगासी गाँव के रहवारे थे जो बुंदेलखंड  में आता है। बुंदेलखंड की बोली का जहां-तहां प्रयोग और लोक जीवन के दैनंदिन मुहावरे मिलकर उपन्यास को पठनीय और स्मरणीय बनाते हैं। जैसा कि गाँवों में (और शहरों में भी) होता है लोग बातचीत करते हुए उसे अधिक सहज और प्रभावशाली बनाने की गरज से गालियों का इस्तेमाल करते हैं। तो यहां लुगासी में भी यह सामान्य बात है। बब्बा उपन्यास के शुरू में ही डाक्टर को कह रहे हैं – ‘सारा जीवन व्यापार बस चूतिया बनाने की तरकीबें हैं। इसे दुःख का नाम दे दो,चाहे सुख कह लो।’ हिंदी पाठक उग्र जी से काशीनाथ सिंह जी तक के बड़े कथाकारों की संगत में रहकर पर्याप्त परिपक्व हुए हैं और इस गाली गलौच से घबराकर उपन्यास फेंक नहीं देते। वे देखते हैं कि गालियों के बाद भी अंतत: उपन्यास में क्या है और जिस उपन्यास के केंद्र में बुढ़ापा और मृत्यु हो वहां तो यह सामान्य बात है। बकौल कथाकार – ‘कोई बुरा नहीं मानता था क्योंकि ग्राम लुगासी में यह सर्वमान्य था कि यदि बूढ़ा आदमी ही गाली न देगा तो फिर कौन भैंचो … देगा ?’

उपन्यास के प्रारम्भ में ज्ञान चतुर्वेदी लिखते हैं -‘उपन्यासकार,  अपने इन पात्रों को जितना जानता और समझता है उसके बूते इतना आश्वासन भर दे सकता है कि बब्बा की मौत से शुरू हुई यह कथा प्रहसन का भी आनंद देगी और शोकगीत का भी।’ प्रहसन की आड़ में शोकगीत कहना चाहिए।  ज़रा इसके पात्रों को देख लीजिए –

hum_na_marab_hbमुख्य पात्र बब्बा हैं जो ‘परम फालतू’ और अदा यह है – ‘कभी कोई  पांयलागी  करता हुआ निकला जा रहा हो तो उसे पीछे से आवाज देकर बताते थे कि भैंचो, अभी हम मरे नही हैं ; तुमारे बाप-मताई भी कभी इधर से कढ़ते थे तो बिना हमें प्रणाम करे आगे नहीं जाते थे -सो तनिक इतें भी देख लो कि चबूतरे पे तुमारे बाप के बाप बैठे  हैं और बिना पांयलागी किए कढ़बे वालों की मैयो….।’ मैयो करवाना भी माँ गाली का लुगासी संस्करण है संक्षिप्त किन्तु प्रभावी। बब्बा के बड़े बेटे हैं गप्पू जिनकी प्रशंसा में खुद बब्बा में कहा था – ‘इनकी ईमानदारी का हम का करें?चाटें,शहद लगा के ?’ गप्पू पुराने कांग्रेसी हैं -पक्के गांधीवादी और गाँव-घर में गऊ आदमी कहलाए जाने वाले। दूसरे बेटे हैं नन्ना जो गाँव के अस्पताल में वेक्सीनेटर हैं । गाँव वालों का छोटा मोटा इलाज कर लेते हैं और जिनके लिए बब्बा की सख्त हिदायत थी कि घर के किसी भी आदमी का इलाज कभी न करें। तीसरे हैं गोपी जिन्हें परिवार में पींदा कहा जाता है अर्थात … औरत के गुलाम। ये कानपुर में बैंक मुलाजिम हैं और वहीं रहते हैं। रज्जन घर और गाँव के युवा तुर्क हैं। चुप रहना उनके बस की बात नहीं। ये गप्पू जी के सुपुत्र हैं और पिता के सम्बन्ध में इनकी पीड़ा अत्यंत गहरी है – ‘आदमी को गऊ क्यों होना ? दूध आपको देना नहीं। गाभिन आप हो नहीं सकते। सींग  चलाना नहीं है। सामने हरी घास भी धरी हो तो मुंह नहीं मारना है। फिर आपके गऊ बनने का मतलब ही क्या निकलता है?… और हमारे पिताजी जैसे आदमी तो जब एक बार गऊ बनते हैं तो दिनों दिन और भी गऊ होते चले जाते हैं। दुनिया बार बार ‘ गऊ आदमी हैं’, ‘गऊ आदमी हैं’   कहकर उनकी तारीफ़ करती फिरती है। ऐसे में आदमी ठीक से न तो आदमी रह पाता है, न पूरी गऊ ही बन पाता है।’ स्त्री पात्र बहुत नहीं हैं लेकिन जो हैं वे कम भी नहीं। सबसे पहले हैं अम्मा, बब्बा की पत्नी।  सबके लाने तो बे पहले से ही मर सी चुकी हैं। उपन्यास का वाचक बताता है ‘पौंर के इस अँधेरे में अपने जीवन का अन्धेरा काट रही हैं,अम्मा। देखनेवालों ने तो शायद नोट नहीं किया हो परन्तु इन अट्ठारह वर्षों में पौंर कहीं और भी अंधियारी हो गई है। पौंर के अँधेरे में अम्मा के जीवन का अँधेरा मिल जाने से यहां अँधकार कुछ ज्यादा ही गाढ़ा हो गया लगता है।’ अम्मा तिस्क़ृत गठरी की तरह पड़ी हैं । अम्मा बोल-बतिया नहीं सकतीं लेकिन बड़ी बहू सावित्री हैं जो न सिर्फ उनकी सेवा करती हैं बल्कि उनका अनकहा भी समझ जाती हैं और अम्मा का अनकहा है ‘जमदूत अँधेरे के कारण उन्हें देख नहीं पाए और बब्बा को उठा ले गए।’ नन्ना  की पत्नी भी हैं रूदाली करने में उनकी हैसियत मिथक बन चुकी है। मृत्यु या शोक उनकी परम प्रतिभा के चरम प्रदर्शन का अवसर बनकर आते हैं। पिंदा घोषित गोपी की पत्नी रमा पढ़ी लिखी हैं और बब्बा के निधन की सूचना पर पति के साथ आई रमा के प्रसंग में लुगासी का स्त्री विमर्श प्रकट होता है  – ‘यार जे तो फैसन-पट्टी की हद्द है भैया। इधर तो ससुर मरा हुआ पड़ा है भैंचो और उधर बहू भैंचो काला चसमा लगाए डोल रही है।’ दूसरा कहता है – ‘सच्ची बात ! शरम -लाज  घोल के पी गई है।’ और सुनिए – ‘अरे हमारी औरत होती तो हम मार मार के दारी को धुनक डालते… ।’ बच्चे भी हैं किट्टू की बच्चों पर दादागिरी को लेखक फासीवादी शासन बताता है।कथा में दो पात्र और आए हैं पहले हैं रामजी चौबे -दुर्वासा की तरह प्रकट होते हैं और घर के बंटवारे में गप्पू के पक्ष में चिमटा गाड़ने का दमदार उपक्रम करते हैं। दूसरे हैं वैदेही प्रसाद – अंतिम संस्कार की विधियों के विकट ज्ञाता। ‘सभी मानते हैं कि वैदेही स्साला लाख ऐबी हो पर इस मामले में उनका ज्ञान  गजब का है। ज्ञान का तो चलो ठीक है परन्तु वैदेही इस ज्ञान को जिस तरह बघारते हैं,परेशानी उससे। मरने  वाले के घर पर वे कब्जा टाइप कर लेते हैं। एक एक संस्कार को वे इतने कड़े अनुशासन से ऐसे नियमानुसार कराते हैं कि मृतक के परिवारजनों का मन करने लगता है कि वे भी साथ साथ मर जाते तो बेहतर होता। शव यात्रा उनका वन मैन शो है। उनका अपना शो। इसमें वे खवास तो क्या, स्वयं मुर्दे तक का दखल बर्दाश्त नहीं कर सकते।’ वैदेही प्रसाद भारत के हर गाँव-शहर में हैं लेकिन कथा साहित्य में उनकी अनुपस्थिति को ज्ञान चतुर्वेदी ही भर सके हैं। ऐसे अद्भुत चरित्र न केवल उपन्यास को रंगीन बना जाते हैं अपितु जीवन के सूनेपन को भर सकने की उनकी सामर्थ्य अपूर्व आस्था जगाती है।

तो यह उपन्यास मृत्यु जैसे अप्रिय और भदेस विषय से प्रारम्भ होकर इस विस्तार तक जाता है जिसमें जीवन के तमाम छल-प्रपंच शामिल हो गए हैं। कथा वाचक कहता है -‘अपनी तरफ यह माना ही जाता है कि आदमी एक बार बूढा हो जाए तो फिर उसके पास मरने के अलावा और कुछ करने को रह ही क्या जाता है?’ व्यंग्य में की गई यह टिप्पणी गहरी है। क्यों किसी वृद्ध के अनुभव और ऊर्जा का उपयोग किसी सकारात्मक काम में नहीं हो सकता ? युवा भारत के नारे पर इठला रहे देश को समझना होगा कि एक दिन वृद्ध भारत हो जाना उसकी अनिवार्य नियति है। क्या इसके लिए कोई कार्य योजना है अथवा मृत्यु का इंतज़ार करने के सिवाय और कोई विकल्प नहीं? राम नाम सत्य का नारा लगाते समय ज्ञान चतुर्वेदी की टिप्पणी देखिये -‘साथ चल रहे लोगों ने मरी-सी आवाज़ में प्रत्युत्तर दिया, सत्य बोलो मुक्ति है। शायद थक गए हैं,सत्य के बारे में  लगा-लगाकर। इन नारों पर स्वयं उनका ही विश्वास नहीं है. पता है कि यहाँ से निबटकर जिस दुनिया में वे वापस उतरने वाले हैं, वहां दिन रात झूठ का ही खेल चलना है। सही तो यह है कि दुनिया झूठ में ही मुक्ति खोज रही है। यही असली सत्य है।’ जीते जी मुक्ति का अहसास दुर्लभ है और झूठ में डूबे रहना शाश्वत नियति। मरकर मुक्ति मिली तो किस काम की? और मरना क्या आसान है? बब्बा के घर में अम्मा हैं जो अठारह साल से मृत्यु की प्रार्थना कर रही हैं- ‘बिन्नू, इतने पुन्य नहीं किए हैं अम्मा ने।  …. अभी नहीं मरबे वाली तुमारी जे अम्मां… । … कभी मरेंगी भी कि नहीं, जे भी कहना कठिन है बिन्नू !… कारे कव्वे खा के जन्मी हैं। … ऐसे कैसे मर जेहें ?… अरे मरना ही होता तो उस दिन मर गई होतीं जब गू मूत के लिए दूसरों के सहारे हो गईं। …ऐसे नहीं मरबे वाले हम। मौत को इत्ती आसान चीज़ समझ बैठी हो का?… मरना बड़ो कठिन कारज है बिन्नू। बड़ो कठिन। जान बड़ी मुश्किल से कढ़ती है, जे बात जान लो सच्ची बताते हैं। … भाग्य वालों को ही नसीब होती है मौत। … अभागे तो यहीं धरती पे टांगें रगड़ते रह जाते हैं।’ एक नानी भी आ गई मृत्यु वाले घर में और एक बच्चे को आशीष दे  रही हैं -‘नासपीटे, … मरबे की बात न करियो रे। … मरें तुमायें दुश्मन। … तुम तो खूब जियो बेटा। जुग जुग जियो।  हमसे भी ज्यादा बुढ़ापा देखो। … गुरिया टेड़े हो जाएं, घूम जाएं, घुटने पिराएं,  सूज जाएं – जो भी  हो जाए बेटा, ज़िंदा रहबे में जो आनंद है उसका बरनन का करें हम। तुमारी उमर जैसे जैसे बढ़ेगी, तुम खुद ही जान जाओगे बेटा।’ लेखक की इस पर टिप्पणी है -‘ नानी, मौत के घर में जीवन की महिमा गा  रही है। कदाचित, मौत ही यह अवसर देती है जब आदमी को जीवन की व्यर्थता का विचार और जीवन के प्रति मोह, एक साथ उपजता है।’ मृत्यु जैसे अप्रिय और भदेस विषय पर ये दो अलग-अलग प्रसंग उपन्यास में जीवन और मृत्यु के द्वंद्व को जैसे एकाएक प्रकट कर देते हैं।  और फिर वैराग्य जैसा भाव भी यहां आया है – ‘जीता जागता मनुष्य – सत्ता के शिखर पर बैठकर इतराता मनुष्य अंतत: एक गठरी में बदल गया है – ‘कपडे में गठरी सी बाँध के,घड़े में धर दी गई हैं अस्थियां। जिसने कभी इस धरती को नापने के सपने देखे थे और कद को इतना बड़ा मानता रहा,वही शख्स कैसा एक छोटी सी पोटली में बदल जाता है? …अंतिम अवशेष भी समेटकर खाली कर जाना है यह जगह। मानो किराए का मकान रहा हो। बब्बा इसे खाली कर चले। अब कोई और यहां आएगा। उसकी चिता सजेगी। फिर किसी और की चिता। फिर किसी और की। सिलसिला चलता रहेगा।’

पेज 173 से 180 तक गोपी के चचिया ससुर का किस्सा है। वृद्धावस्था के प्रलाप सरीखा यह लंबा प्रसंग किसी लेखक की गद्य सर्जना के धैर्य का प्रमाण है। इस जोड़ की ही एक लम्बी बहस हिन्दी में याद आती है जो मनोहर श्याम जोशी कसप में दे गए हैं। वहां अमरीका से लौट आया डीडी किसी वृद्धा से मिल रहा है और वह है कि उसे पहचान नहीं पा रही -डीडी जो भी सूत्र देता है वह उनके सहारे किसी न किसी दिशा में लम्बी दूरी तक निकल जाती है लेकिन फिर भी डीडी तक नहीं पहुँच पाती। यहां वृद्ध की सहज जिज्ञासा है ‘कितें जा रये भैया ?’ सात पेज लम्बी बातचीत किंवा बहस के बाद अंत में वृद्ध पूछते हैं -‘तुम कितें जा रये ?’ क्या वृद्धावस्था निरर्थक प्रलाप है ? क्या इसमें कोई -कैसी भी संभावना शेष नहीं है? क्या अब भी हमारे समाज को ओल्ड हाउसेज के बारे में गंभीरता से नहीं सोचना चाहिए ? एक पात्र कह रहा है – ‘बुढ़ापा तो एक ऐसा श्राप है जो भगवान आपको पैदा करते टेम ही दे देता है। …लम्बी उम्र का वरदान मांगते टेम हम ही इस श्राप को बिसरा देते हैं बस। ‘ क्यों है यह श्राप ? जब अंतिम दिन तक भी जीवन का जयगान है तो बुढ़ापा अनिवार्य शोकगीत क्यों है?  यहां ज्ञान चतुर्वेदी ख्याल रखते हैं कि बहुत उदासी न हो जाए।  चूूंकि वृद्धों का मसला है तो यहां कब्ज पुराण अनिवार्य है – चिरगांव वाले फूफाजी के बहाने यह पुराण आया है। वे कहते हैं – ‘आज सुबे की टट्टी में वो बात ही नहीं है,जो होनी चाहिए।’  इसका कोई जवाब नहीं है। न व्यंग्यकार ज्ञान चतुर्वेदी के पास और न चिकित्सक ज्ञान चतुर्वेदी के पास। क्या इसे जीवन की शाश्वत कामना नहीं समझना चाहिए? स्वस्थ रहने की आकांक्षा आख़िरी क्षण तक। और हम इसी का मजाक बनाते हैं।  सही है कि प्रकृति से आप नहीं जीत सकते और शरीर की भी अपनी प्रकृति है – तो मजाक क्यों?

कुछ बातें लुगासी की। लुगासी हिन्दी के पाठकों के लिए गोदान के बेलारी, मैला आँचल के मेरीगंज, रागदरबारी के शिवपालगंज की जोड़ का गाँव है। अपनी चारित्रिक विशेषताएं लिए। ख़ास। दुर्भाग्य से इन महान भारतीय गाँवों की टक्कर में कस्बा एक ही है और वह नीलेश रघुवंशी के उपन्यास ‘एक कस्बे के नोट्स’ में आया है गंज बासौदा। तो लुगासी की विशेषताएं जानिए –

लुगासी में समय काटना ऐसा सरल काम भी नहीं। यहाँ समय काटना,गरीबी काटने जैसा ही कठिन काम है।

लुगासी में समय को काटने के तीन तरीके प्रचलित हैं -तम्बाखू मलना, बीड़ी सुलगाना और किसी भी विषय  पर कुछ ऐसी बात निकाल लेना कि जूते चाहे न भी चल पाएं परन्तु एक ठीक ठाक सी निरर्थक बहस तो खड़ी ही हो जाए।

दरअसल गाँव में बड़ी एकरसता घर कर गई थी। वे ही सुबहें। वे ही बेरोजगारी,बेकारी और बेगारी के बेगैरत दिन। लम्बे-लम्बे दिन। काटे नहीं कटने वाला समय। धूल-धक्कड़। फालतूपन। यूं ही बैठे लोग। करें क्या?

शुरुआत में ही देखिए -‘चाय छानकर कांच के गिलासों में डाली ही जा रही थी कि कोहरे के बीच से दो हलवाहे नुमा व्यक्ति धुंधले क्षितिज पर प्रकट हुए। वे कुत्तों से भी ज्यादा उत्तेजित दिख  रहे थे। उनकी चाल में  कुछ ऐसा था कि गुमटी पर खड़े लोगों को आशा बंधने लगी कि कुछ ऐसी नयी सूचना लेकर आ रहे हैं जो महत्त्वपूर्ण हो सकती है। उसी पल सबने ठान ली कि ये स्साले कैसी भी अप्रत्याशित सूचना लाए हों,हम प्रभावित नहीं होंगे। यही लुगासी का पारम्परिक तरीका है।’

पूरे उपन्यास में व्यंग्य का उजास है और यह व्यंग्य ऐसा है कि विद्रूप न होने की प्रतिज्ञा से चलता हुआ। करुणा से भरा और हँसाते हुए उदास करने वाला –

एकदम उत्सव का माहौल है। हा हा, ही ही। जाते हुओं की बतकही। चर्चाएं। गप्पें। बातें।  … इन चार दिनों में ही बब्बा बिसरा दिए गए हैं। अब वे किसी भी चर्चा के केंद्र में नहीं हैं। वास्तव में तो वे अब इसकी परिधि पर भी नहीं बचे हैं। बातों में बब्बा कहीं भी नहीं। … जिंदगी की तासीर। मौत को बड़ी तेजी से भुला देती है यह।

आदमी की गाँठ में पैसा हो तो फिर वो चाहे जित्ता जिए,सब माफ़ है। सारे मोंड़ा-मोंड़ी पीछे-पीछे बब्बा,कक्का,दद्दा कहते फिरेंगे। मूटोगे तो चुल्लू में लेने को पचासों लोग लाइन लगा के तैयार खड़े रहेंगे। धक्का-मुक्की करेंगे कि तुम  चुल्लू में ,हमारे में मूतो। लड़ेंगे कि उनके चुल्लू में  बूँदें ज़्यादा गिरा दीं आपने। आदमी का मूतना मुश्किल कर देंगे। सबको उम्मीद रहेगी कि तुमाई पेशाब का छींटा भी उनपे पड़ गया तो मरते-मरते तुम जरूर उन्हें कछु दे के ही जाओगे…। तो भैया, जेई दस्तूर है स्साली दुनिया का।

चूतड़ के नीचे इत्ता मालमत्ता धार के लियो तो संतान भैंचो अपने आप ही श्रवनकुमार हो जाती है।

ईश्वर हर बूढ़े को मारता ही है। तभी तो सब लोग ईश्वर पर आस्था रखते हैं।

सच्ची बात कहते हैं। दुनिया स्साली ऐसी ही हो गई है कि सच्ची बात को भी जब तक मजाक बना के न बोलो, लोग सुनते नहीं।

बब्बा को गुजरे चार दिन ही हुए हैं। इतने से अंतराल में ही यह घर,बब्बा के न होने की आदत डालने लगा है। घर में काम,बातें,चिंताएं और ऐसे ही अन्य मुद्दों से बब्बा का संदर्भ लगभग गायब होता जा रहा है।

और बब्बा के लिए आया यह वाक्य तो देखिए – ‘दो तीन दोना जलेबी तो फटाक देनी से खा जाते थे।’ अर्थात जीवन का उत्साह मृत्यु के दिन तक बुझता नहीं है।

Advertisements

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s