मीरां के जीवन और समाज की पड़ताल: गणपत तेली

भक्तिकालीन कविता में मीरा का नाम एक लोकप्रिय कवि के रूप में हमारे सामने आता है, लेकिन मीरा को सही परिप्रेक्ष्य में समझने की कोशिशें बहुत कम हुई है। साहित्य के इतिहास ग्रंथों में तो मीरा को कोई विशेष स्थान नहीं मिला लेकिन पिछले कुछ वर्षों में अकादमिक दुनिया में मीरा पर केन्द्रित कुछ महत्वपूर्ण गतिविधियां हुईं, इन्हीं में माधव हाड़ा की किताब पचरंग चोला पहर सखी री   का आगमन उल्लेखनीय है। यह किताब छह अध्यायों में विभाजित है, जिनमें मीरा के जीवन, समाज और कविता से संबंधित विभिन्न पहलुओं का विश्लेषण किया गया है।

मीरा अपने समाज और परिवेश में एक अद्वितीय व्यक्तित्व थीं, इसलिए उनका यथार्थ जीवन दबा रह गया और चमत्कारपूर्ण किस्से-कहानियाँ (जहर का प्याला, साँप आदि के प्रसंग) चल पड़े। माधव हाड़ा ने लिखा है कि “मीरां का ज्ञात और प्रचारित जीवन गढ़ा हुआ है। गढ़ने का यह काम शताब्दियों तक निरंतर कई लोगों ने कई तरह से किया है और यह आज भी जारी है। मीरां के अपने जीवनकाल में ही यह काम शुरू हो गया था। उसके साहस और स्वेच्छाचार के इर्द-गिर्द लोक ने कई कहानियां गढ़ डाली थीं। बाद में धार्मिक आख्यानकारों ने अपने ढंग से इन कहानियों को नया रूप देकर लिपिबद्ध कर दिया।” आरंभिक दिनों की कहानियों और आख्यानों में मीरा के जीवन के यथार्थ और सच्चाई के संकेत मिलते थे लेकिन धीरे-धीरे ये संकेत भी नहीं रह गए।

pachrangमीरा की कविता के जरिए भी मीरा के जीवन को खोजने के बहुत प्रयास हुए हैं, लेकिन उनके भी विविध पक्ष  हैं। अलग-अलग लोगों ने उसे अपने अनुसार परिभाषित किया। विद्वानों का एक वर्ग उन्हें भक्त कवि के रूप में देखता है, भक्ति के भी अलग-अलग वर्ग उन्हें अपनी-अपनी शाखाओं में परिभाषित करते हैं, तो आधुनिक स्त्री विमर्श की दृष्टि से मीरा का अध्ययन करने वाले मीरा को पितृसत्तात्मक समाज के प्रति विद्रोह करने वाली स्त्री के रूप में उसे रेखांकित करते हैं। माधव हाड़ा आलोचकों की इस प्रवृत्ति के बारे में लिखते हैं कि “मीरां की कविता इतनी विविध, सामवेशी और लचीली है कि उनको उसमें जैसा वे चाहते थे सब मिल गया। उन्होंने जब उसको सगुण कहना चाहा तो उनको उसमें सगुण के लक्षण मिल गए और जब वे जब शास्त्र के तयशुदा नाप-जोख लेकर माधुर्य खोजने निकले तो उनको उसमें माधुर्य के लक्षण मिल गए। यही नहीं, निर्गुण खोजने वालों को भी मीरां ने निराश नहीं किया। बारीकी से खोजबीन करने वालों ने उसमें योग की गूढ़ और रूढ़ शब्दावली भी ढूंढ निकाली।” यह तो बात हुई भक्ति की, दूसरी तरफ, हाल के वर्षों में मीरा के जीवन के विद्रोही पक्ष को रेखांकित करती स्त्री विमर्शकारी दृष्टि के बारे में भी लेखक का यही मानना है। उन्होंने लिखा है कि ‘मीरां की हाशिए की असाधारण स्त्री छवि गढने वाले विमर्शकारों की अपेक्षाएं अलग थीं। उनकी कसौटी पर खरा उतरने के लिए जरूरी था कि मीरां वंचित-उत्पीड़ित, दीन-हीन और असहाय हो और साथ में उसका समाज ठहरा हुआ हो। उन्होंने मीरां की कविता से चुन-चुन कर ऐसे अंश निकाले जो उनकी इन ज़रूरतों को पूरा करते हैं। उन्होंने इनके आधार पर मीरां को प्रताड़ित, हीन-दीन और असहाय स्त्री ठहरा दिया। उन्होंने खींच-खांचकर मीरां की नाराजगी और असंतोष को पितृसत्ता से उसकी असहमति बना दिया।” इस तरह से मीरा के जीवन के बारे हमारे सामने अलग-अलग तरह की सामग्री आती है। लेखक ने विभिन्न ग्रंथों के विवरणों के जरिए मीरा के जीवन के बारे में वस्तुनिष्ठ सामग्री रखने का प्रयास किया है। माधव हाड़ा ने उचित ही लिखा है– “वह मीरां, जिसे हम आज जानते हैं, अपनी असल मीरां से बहुत दूर आ गई है। यह दूरी बनाने और बढ़ाने का काम मीरां के अपने समय से ही हो रहा है। असल मीरां अभी भी लोक, इतिहास, आलोचना, धार्मिक आख्यान और आलोचना-विमर्श में है, लेकिन वह इन सब में कट-छंट और बंट गई है।” यह बात गौरतलब है कि व्यक्ति में अपनी स्वतंत्रता और असंतोष की अभिव्यक्ति एक स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है, जो अनिवार्यत: प्रतिरोध नहीं हो सकती है। लेखक का आशय यही है।

राजस्थान (या भारत) में आधुनिक युग तक इतिहास लेखन की कोई व्यवस्थित और वैज्ञानिक परिपाटी नहीं थी, इसलिए जब अंग्रेज कर्नल जेम्स टॉड ने राजस्थान के इतिहास में रुचि लेकर एनल्स एंड एन्टीक्विटिज ऑफ राजस्थान नामक ग्रंथ लिखा तो, वे राजस्थान के इतिहास के पिता कहलाए। उस समय टॉड साब के नाम से प्रसिद्ध कर्नल राजस्थान के इतिहास के साथ जूनूनी हो गए थे, लेकिन वे उतने कम समय में स्थानीय जीवन को ठीक से समझ नहीं पाए और अपनी शासकीय दृष्टि तो उनकी थी ही, लिहाजा उन्होंने राजस्थान के इतिहास के विविध प्रसंगों को दर्ज़ करने में कई चूकें कीं। फिर भी, इतिहास लेखन के पहले प्रयास और अंग्रेजी में होने के कारण यह किताब आज भी स्थापित है। मीरा की छवि बनाने में तो टॉड की भूमिका है, साथ ही टॉड उस समय के समाज की भी एक छवि बनाते हैं। वे इसे (व्यापक अर्थों में) अपरिवर्तनशील समाज बताते हैं, जबकि यह एक सार्वभौमिक सच्चाई है कि समाज गतिशील होता है (चाहे कितना ही धीमा), जड़ नहीं। इसी तरह से स्त्री विमर्श से संबंधित आख्यानों में यह समाज सामंती जकड़न और पुरुषसत्तावादी के रूप में चित्रित किया गया है। माधव हाड़ा के अनुसार यह नज़रिया शास्त्रों के आधार पर निर्मित है, न कि लोक व्यवहारों पर। वे लिखते हैं कि “मीरां की व्यापक लोक स्वीकृति और मान्यता ही इस बात का पर्याप्त सबूत है कि यह समाज अन्याय के प्रतिकार का सम्मान भी करता था और इस प्रतिकार के लिए जरूरी खाद-पानी भी मुहैया करवाता था। मीरां को अन्याय के प्रतिकार और अपनी शर्तों पर जीवन यापन का साहस और सुविधाएं इस समाज ने ही दी थी।” और ”यह सम्मान और स्वीकृति इतनी व्यापक और गहरी थी कि इस समाज में मीरां का नाम जेनेरिक संज्ञा में बदल गया।” लेखक का यह सवाल वाजिब है कि ”अपनी शर्तों पर अपना जीवन गढ़ने वाली मीरां को इस तरह सिर-आंखों पर उठा कर चलने वाला समाज ठहरा हुआ और ठंडा कैसे हो सकता है?” समाज का यह अंतर्द्वंद्व हमें भक्ति के क्षेत्र में भी दिखाई देता है।

madhav sirमध्यकालीन सांप्रदायिक भक्ति के कुछ सांस्थानिक रूपों के चरित्र-आख्यान मीरा को स्वीकृति और सम्मान देने में अंतर्संघर्ष और दुविधा के शिकार रहे हैं। इस संबंध में कहीं-कहीं उनमें विरोध का स्वर भी है। सत्रहवीं सदी में ही मीरां धर्माख्यानों में पूरी तरह भक्त के रूप में प्रतिष्ठापित हुई। गौरतलब है कि हमारी भक्ति कविता के कवि भक्ति के मुहावरें में अपने जीवन और समाज का यथार्थ बयान करते थे। मीरा की कविता के संबंध में भी यह बात लागू होती है। माधव हाड़ा इसे स्पष्ट करते हुए लिखते हैं कि “मध्यकालीन सामंती व्यवस्था और पितृसत्तात्मक विधि-निषेधों के अधीन अपने लैंगिक नियमन और दमन के विरुद्ध मीरां के आजीवन संघर्ष में भक्ति की भूमिका एक युक्ति या हथियार से ज्यादा नहीं है। विडंबना यह है कि उसकी निर्मित और प्रचारित पहचान में स्त्री मनुष्य के रूप किया गया उसका यह संघर्ष तो हमेशा हाशिए पर रहा है और इसमें बतौर हथियार के रूप में काम में ली गई भक्ति सर्वोपरि हो गई है।“ माधव हाड़ाका यह निष्कर्ष ही वह प्रस्थान बिंदु है, जहाँ से मीरा का स्त्री विमर्श की दृष्टि से अध्ययन प्रारंभ होता है। लेकिन लेखक की यह मान्यता उनका अंतर्विरोध नहीं है, बल्कि प्रतिरोध को परिभाषित करने का चयन है, वे इसे हाशिए का प्रतिरोध नहीं मानते हुए लिखते हैं कि ‘मीरां संत-भक्त से पहले एक स्त्री है, जो अन्याय और दमन के प्रतिरोध में खड़ी है। उसका यह प्रतिरोध असाधारण और हाशिए का प्रतिरोध नहीं है। यह भारतीय समाज की निरंतर गतिशीलता का एक रूप है।’ भारतीय समाज में ही नहीं, यह गतिशीलता प्रत्येक समाज में होती है।

पुस्तक के एक रोचक अध्याय छवि निर्माण का निष्कर्ष माधव हाड़ा के शोध का महत्त्व प्रतिपादित करता है। जहां आज के समय में बन चुकी मीरां की छवि पर सटीक बयान है- ‘धार्मिक चरित्र-आख्यानों और उपनिवेशकालीन इतिहासकारों ने मीरां का संत-भक्त रूप गढ़ने के लिए उसके विद्रोह और संघर्ष को अनदेखा कर दिया। बीसवीं सदी और उसके बाद मीरां का यही संत-भक्त रूप लोकप्रिय साहित्य, चित्रकथा, फिल्म और कैसेट्स-सीडीज में भी चल निकला। इन माध्यमों की पहुंच का दायरा आख्यानों और इतिहास की तुलना में बहुत बड़ा था, इसलिए मीरां का निर्मित संत-भक्त रूप जनसाधारण में लोकप्रिय हो गया। इन माध्यमों ने अपनी व्यावसायिक जरूरतों के अनुसार इसको पुष्ट और परिवर्तित भी किया।’ माधव हाड़ा की यह पुस्तक मीरां के जीवन और समाज के संबंध में प्रचलित आख्यानों से परे एक वस्तुनिष्ठ दृष्टि को अपनाती है और उक्त प्रसंगों को पुनर्परिभाषित करने का प्रयास करती है। अपने इन्हीं निहितार्थों में यह पुस्तक बहस का प्रस्ताव भी कर्ती है- विशेष रूप से मीरा के जीवन और समाज के संदर्भ में तथा व्यापक रूप से इतिहास लेखक ने संदर्भ में। साथ ही, तथ्यों और विवरणों के साथ माधव हाड़ा की पुस्तक पचरंग चोला पहर सखी री (मीरां का जीवन और समाज)’ मीरां के जीवन और उसके समकालीन समाज के विषय में कई नई जानकारियाँ भी उपलब्ध करवाती है। मतलब यह है कि यह  किताब मीरा की जीवनी भी है और उसके जीवन का विश्लेषण भी।

पचरंग चोला पहर सखी री : मीरां का जीवन और समाज : माधव हाड़ा, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2015, पृ. 166, सजिल्द, मूल्य: 375.00

(वागर्थ)

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मीरां के जीवन और समाज की पड़ताल: गणपत तेली&rdquo पर एक विचार;

  1. पिगबैक: 2015: हिन्दी साहित्य- गणपत तेली | Fifth Floor

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