इतनी मुलाक़ातों के बाद अजनबी: हिमांशु पंड्या

[भारत  और पाकिस्तान के संबंध हमेशा ही संवेदनशील रहे हैं और इन संबंधों में उतार-चढ़ाव दोनों देशों के अंदरूनी मसलों को भी प्रभावित करते हैं। भारत और पाकिस्तान के बीच होने वाली हिंसक कार्यवाहियों ने हमेशा ही अंध-राष्ट्रवादियों और कट्टरपंथियों  को मौका दिया है, जबकि दूसरा तबका हमेशा शांति और संवाद का पक्षधर रहा है। हालांकि हाल के पठानकोट मसले पर इनके तर्कों  का एक घालमेल हो गया है- ऐसा भी लगता है कि अंधराष्ट्रवादी चुप है, तो दूसरा पक्ष उन्हें ललकार रहा है। ऐसे समय में कुछ सालों पहले हिमांशु पंड्या द्वारा कृष्ण कुमार की किताब के बहाने लिखा गया यह लेख  प्रासंगिक  बन पड़ता है। ]

इंसान में हैवान यहाँ भी है, वहां भी
अल्लाह निगहबान यहाँ भी है, वहां भी
खूंखार दरिंदों के फ़क़त नाम अलग हैं
शहरों में बयाबान यहाँ भी है वहां भी

Himanshu ji2पाकिस्तान से लौटने के बाद लिखी गयी निदा फाज़ली की ये नज़्म मेरी  पसंदीदा रही है| हमारी सांझी साँस्कृतिक विरासत मुझ जैसे लोगों को एक सुकून भरा अहसास देती है जो दक्षिण एशिया में हथियारों की होड़ से मुकाबले के लिए ठोस आधार चाहते हैं| इस विचार दृष्टि पर पुनर्विचार की जरूरत पहली बार हाल ही में तब महसूस हुई जब मैंने प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री कृष्ण कुमार की सद्यप्रकाशित पुस्तक ‘शान्ति का समर’ (राजकमल प्रकाशन, 2008) पढ़ी| इस किताब को लिखे जाने की एक पृष्ठभूमि रही है| प्रतिष्ठित नेहरू फैलोशिप के तहत कृष्ण कुमार ने भारत और पाकिस्तान के स्कूलों में पढाई जा रही पाठ्यपुस्तकों में इतिहास की छवि का एक अध्ययन किया था| यह रोचक अध्ययन बाद में पुस्तकाकार रूप में ‘मेरा देश तुम्हारा देश’नाम से प्रकाशित हुआ| इस अध्ययन में कृष्ण कुमार ने दिखाया कि कैसे संदेह और अनजान भय से उपजे द्वेष की छवियों को परस्पर आईने की तरह एक दूसरे के सामने रखकर देखा जा सकता है और इस तरह सामने वाले के डर की अप्रासंगिकता से अपने डर की व्यर्थता/अनौचित्य को समझा जा सकता है| वह पुस्तक एक शिक्षाशास्त्री की शिक्षाशास्त्रीय सन्दर्भों वाली पुस्तक थी| शिक्षाशास्त्री कृष्णकुमार के किताब पूरी कर लेने के बाद चिन्तक कृष्णकुमार इस प्रश्न पर आगे भी सोचते रहे और इतिहास शिक्षण से आगे युद्ध-शांति, विभाजन-सांप्रदायिकता, जैसे मसलों पर भी यह आइना सक्रिय रहा| परिणाम है, यह पुस्तक|

सबसे पहले मैं इस पुस्तक की मूल-प्रस्तावना से बात शुरू करूंगा, जो हमें चौंकाती है और धर्मनिरपेक्ष समझ को अपनी प्रचलित परिपाटी से अलग सोचने का नया रास्ता देती है| हम  धर्मनिरपेक्ष समझ के भारतीय लोग भारत-पाक संबंधों में तनाव और शांति के स्थायित्व की प्राप्ति के लिए हमेशा दोनों देशों की सांझी विरासत और सामान तत्वों की बात करते हैं| दोनों देशों की भाषा, संगीत, खानपान, आचार-व्यवहार की सामान आदतें हमारे इस दावे की पुष्टि भी करते हैं। कृष्णकुमार के मुताबिक यह जिद पाकिस्तान के नागरिकों के लिए परेशान करनेवाली और आपत्तिपूर्ण होती है क्योंकि दरअसल पाकिस्तान के लिए भारत से भिन्न अपनी पहचान बनाना/ स्थापित करना उसकी सांस्कृतिक अस्मिता की खोज का महत्वपूर्ण आयाम रहा है। वर्त्तमान पाकिस्तान, विशेषरूप से 1970 के (बंगलादेश टूटने के) बाद की पीढी का समाजीकरण उसके लिए एक इस्लामिक राष्ट्र के रूप में बदलती आधुनिकता के साथ समंजन के तनाव से पैदा हुआ है और इस पीढी के लिए अपनी भिन्न (विशेष रूप से भारत के सन्दर्भ में) पहचान सबसे बड़ी कसौटी है|

इसे ठीक से समझाने के लिए कृष्णकुमार हमारी स्मृतियों और अनुभूतियों में बसे इतिहास, विशेष रूप से विभाजन की खरोंच की जांच करते हैं। भारतीय मानस के लिए विभाजन एक ‘षडयंत्र का दुष्परिणाम’ था। न सिर्फ इसका कोई असल कारण नहीं  था बल्कि इससे कुछ भी अच्छा निकल कर नहीं आया, आया तो सिर्फ विनाश और असहनीय दुःख। यह दोनों अन्तर्निहित मान्यताएं पाकिस्तानी  पाठ्यपुस्तकों में सतत नकारी जाती रही हैं। उनके अनुसार न सिर्फ यह उपमहाद्वीप में व्याप्त परिस्थितियों का तर्कपूर्ण परिणाम था बल्कि यह सचेत रूप से निष्पादित किया गया लक्ष्य था। अंततः यह एक महान उपलब्धि था, जिसे  बेशक बड़ी इंसानी कीमत चुकाकर हासिल किया गया. यह अपेक्षित भी है क्यों कि एक राष्ट्र के रूप में पाकिस्तान के जन्म का औचित्य इसी नींव पर टिका हुआ है।

पेंच यहीं है- शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की खोज हमें एक राष्ट्र के रूप में पाकिस्तान के अनौचित्य की ओर ले जाती है। हम, जाहिर है, अपनी बहुलतावादी लोकतंत्र की परियोजना को पाकिस्तान की इस्लामिक राष्ट्र परियोजना से बेहतर मानते हैं। अतः ‘पाकिस्तान’ का विचार या तो गलती है या षडयंत्र। कई बार तो विभाजन के पर्याय के रूप में ‘पाकिस्तान’ शब्द ही लोकप्रिय मानस में प्रयुक्त होता है। प्रसिद्ध लेखक कमलेश्वर के उपन्यास ‘कितने पाकिस्तान’ में इसकी अनुगूंज सूनी जा सकती है। अतः भारत-पाक तनाव का धर्मनिरपेक्ष हल भी अंततः जिस दिशा की ओर मार्ग प्रशस्त करता है, वह है- पाकिस्तान का भारत में विलय और इस तरह बहुलतावादी धर्मनिरपेक्षता और हिन्दू राष्ट्रवाद की शक्लें धुंधला कर एक हो जाती हैं। दूसरी ओर, पाकिस्तान भारत के धर्मनिरपेक्ष होने के दावे को छल मानता है और जब भारत में हिन्दू-मुस्लिम दंगे होते हैं तो अपने होने की न्यायसंगतता पर संतोष अनुभव करता है क्योंकि ये धर्मनिरपेक्ष होने के भारत के दावे को खंडित करते हैं। इस प्रकार, वह अद्भुत विडम्बना जन्म लेती है जहां शान्ति पृथक पहचान को गैरजरूरी बना देती है और ‘दूसरे’ का अस्तित्व तथा उसके कारण सतत भय,द्वेष अपनी राष्ट्रीय अस्मिता को पुष्ट करता है।

shantikasamarकृष्णकुमार दोनों देशों के महानायकों गांधी और जिन्ना की विरासत को अनदेखी किये जाने के कारणों की भी इस सन्दर्भ में जांच-पड़ताल करते हैं। गांधी के सन्दर्भ में उनका रूपक का चुनाव बेहद दिलचस्प है। वे सवाल उठाते हैं कि गांधीस्मृति के प्रतीक रूप में राजघाट का चुनाव क्यों किया जाता है, बिड़ला हाउस का क्यों नहीं, जहां उनकी हत्या हुई। गांधी की ह्त्या के राजनीतिक कारणों को अनदेखा करना ही तो इसका कारण नहीं? अपनी बात के पक्ष वे राजघाट की भौगौलिक संरचना की जांच करते हैं और पाते हैं कि अपनी सरंचना में वह इतिहास निरपेक्ष ढांचा है। संक्षेप में, राजघाट शांति देता है जब कि बिड़ला हाउस बेचैन करता है। यह शहादत और हत्या के बीच का फर्क है। गांधी की ह्त्या के राजनीतिक निहितार्थ थे। बेशक गोड़से ने गांधी के विरुद्ध कई आरोप लगाए जिनका मुख्य तर्क यही था कि वे मुसलमानों के समर्थक थे पर (गोड़से की नज़र में) गांधी का अक्षम्य अपराध यह था कि वे विभाजन के लिए जिम्मेदार थे। कृष्णकुमार पलटकर धर्मनिरपेक्षवादियों की ओर आते हैं कि हम जो विभाजन को एक तार्किक विवशता नहीं बल्कि स्वंतंत्रता की अवैध संतान मानते हैं और जो गांधी की राजनीतिक जादूगरी के प्रशंसक हैं; कहीं हम भी दिमाग के एक गुप्त कोने में विभाजन (पर गुस्सा और इस)के लिए गांधी पर इल्जाम तो नहीं लगाए बैठे हैं! कृष्णकुमार इतिहासकार सुचेता महाजन को उद्धृत करते हैं जिन्होंने दिखाया है कि गांधी को जनता के बड़े हिस्से में विभाजन की चाह और इसलिए उसकी वैधता का बोध था। यह हमारे बचपन से मिले शैक्षिक बोध, लोकप्रिय मीडिया से बनी छवि, सभी के उलट है और इसलिए सुपाच्य नहीं है। अतः, बकौल कृष्णकुमार, बिड़ला हाउस हमारे लिए वैसे ही प्रतीकात्मक महत्त्व रखता है, जैसे जापान या जर्मनी में क्रमशः हिरोशिमा और होलोकॉस्ट संग्रहालय। संक्षेप में, अपनी राष्ट्रीय अस्मिता के बारे में असुविधाजनक सवालों का सामना अंततः उस विरासत के प्रति हमें जिम्मेदार ही बनाता है।

अब जिन्ना; जिन्ना को द्विराष्ट्र सिद्धांत का जनक मानने वाले हम सब के लिए 12 अगस्त, 1947 का उनका बहुचर्चित भाषण (जो लालकृष्ण आडवानी द्वारा उद्धृत किये जाने के बाद भारत में फिर से उत्सुकता का विषय बना) काफी उलझन पैदा करने वाला है। यह प्रसिद्ध भाषण बताता है कि जिन्ना राष्ट्रवाद की धर्मनिरपेक्ष समझ के हिमायती थे. तो फिर द्विराष्ट्र सिद्धांत के साथ इसकी संगति कैसे बैठे? दरअसल कृष्णकुमार के अनुसार, हम इसे समझने में असमर्थ रहे हैं कि जिन्ना की सैद्धांतिक दुहाई घटनाओं की श्रंखला की महज एक कड़ी थी। द्विराष्ट्र सिद्धांत 30 के दशक के बाद आकार जरूर लेने लगा था पर इसके बीज हमें उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में ही दिखने लगते हैं जब मुस्लिम संभ्रांत वर्ग ने नई सामाजिक राजनीतिक व्यवस्था में अपनी हैसियत को सिकुड़ते देखा। गांधी के जादुई नेतृत्व में चल रहे आन्दोलन में अस्मिताओं का आपसी संघर्ष भी समानांतर रूप से चल रहा था और पृथकतावादी आन्दोलन मूलतः इस घबराहट से उपजा था कि हिन्दू बहुल भारत में इस्लामिक हित हाशिये पर चले जायेंगे। इसके बावजूद जिन्ना का इस्लामिक राष्ट्र ऐसा ही था जिसमें सभी आस्थाओं का पूरा सम्मान हो और सभी नागरिक सामान अधिकार पायें अर्थात आधुनिकता के सार्वभौम आदर्शो के साथ इस्लामिक राष्ट्र का विचार असंगत नहीं था। इसे इकबाल के विकास क्रम में भी देखा जा सकता है कि कैसे भारत को ‘सारे जहां से अच्छा’ कहने वाले इकबाल को शनैः-शनैः समझ आता गया कि यहाँ मुसलमानों का उत्पीडित भविष्य ही होगा। विडम्बना यह हुई कि ‘अस्मिता की आधुनिक लालसा’ रखने वाले जिन्ना को अपने सपनों के राष्ट्र को आकार देने का वक्त ही नहीं मिला। ‘इस्लाम’ उनके लिए अस्मितामूलक समुदाय की आधुनिक प्रगति यात्रा का प्रतीक ही था परन्तु बाद में ‘पाकिस्तान’ का बहुप्रचारित विचार ही हावी होता गया अर्थात राष्ट्र के अपारदर्शी और रूढिवादिता के शिकार होने के साथ साथ ‘पाकिस्तान’ के विचार की सांकेतिक महत्ता बढ़ती गयी. इसके साथ ही जिन्ना अप्रासंगिक होते चले गए।

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अतः, हम यह कह सकते हैं कि गांधी और जिन्ना दोनों की अपने अपने देश में उपस्थिति पूजनीय वास्तु के रूप में है, विचारों की असमाप्य श्रृखला के रूप में नहीं।

भारत पाकिस्तान के सन्दर्भ में दुर्भाग्यपूर्ण विडम्बना यह है कि शान्ति का काल अगले युद्ध की तैयारी का काल प्रतीत होता है. 71 से 99 के बीच के तीन दशकों के अंतराल में प्रक्षेपास्त्रों की खरीद का विस्मयकारी आंकडा इसका सबूत है। हम दुनिया के दो ऐसेमुल्क हैं जो जीवन गुणवत्ता के सूचकांक पर सबसे नीचे, जबकि हथियार खरीद की सूची में सबसे ऊपर आते हैं। इसमें इंदिरा गांधी के इस बयान को भी जोड़ लें कि एक अंतर्राष्ट्रीय प्रक्षेपास्त्र खर्चे के हिसाब से 340000 प्राथमिक विद्यालय या 65000 स्वास्थ्य केंद्र बनाने के बराबर है| निश्चय ही युद्ध शान्ति के नाम पर लड़ा जाता है पर वह सिर्फ शान्ति के लिए नहीं होता, कई बार तो बिलकुल भी शान्ति के लिए नहीं होता| युद्ध की अपरिहार्य विवशता को स्वीकार करते हुए भी तर्क यह है कि शांतिकाल का प्रत्याख्यान युद्ध स्तर पर हो ताकि अंततः युद्ध को अप्रासंगिक बनाया जा सके| यह निरी शान्ति से नहीं होगा बल्कि युद्ध के विचार से युद्ध करके ही होगा|

कृष्णकुमार अंततः जिस तर्क पर पहुँचते हैं वो ये कि ‘राष्ट्रवादी अस्मिता’ को व्यापक अर्थों में समझा जाया ताकि ‘स्व’ बनाम ‘अन्य’ के इकहरे खांचों से निकला जा सके| समानता-भिन्नता के रैखिक खांचे से अलग हमारे ‘अलग-पने’ की समंजन्कारी व्याख्या की जा सके। हमारी राष्ट्रीय अस्मिता को आशंकित किये बगैर एक सांझी क्षेत्रीय अस्मिता विकसित की जाए क्योंकि अंततः भूमंडलीकरण की प्रक्रिया से हम सब सामान रूप से प्रभावित हैं और हमारी नियति भी एक ही लग रही है।

आखिरकार, ‘दूसरे’ का स्वीकार -वह जैसा है वैसा ही स्वीकार-हमारे होने को भी अधिक गरिमावान बनाएगा।

himanshuko@gmail.com

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इतनी मुलाक़ातों के बाद अजनबी: हिमांशु पंड्या&rdquo पर एक विचार;

  1. जहां एक और बहुलतावादी देश में शान्ति पृथक पहचान को गैरजरूरी बना देती है और ‘दूसरे’ का अस्तित्व तथा उसके कारण सतत भय,द्वेष अपनी राष्ट्रीय अस्मिता को पुष्ट करता है। इससे सिर्फ इस निष्पत्ति तक पहुंचा जा सकता है की दोनों राष्ट्रों की स्मिताओं की पुष्टि हेतु जो मूल भावना है वह एक दुसरे के विरुद्ध है | लेकिन पृथक पहचान एक सत्य हो चूका है | यह सदिच्छा तो हो सकती है लेकिन व्यवहारिक दर्शन नही | यही पर हमे धर्मनिरपेक्ष ताकतों और अखंड भारत का नाद करने वाली वैचारिकी के अंतर को समझना पड़ेगा | धर्मनिरपेक्ष धारा जानती है इसलिए वह शान्ति की बात करती है , शान्ति ऐसी जो दो राष्ट्रों की सम्प्रभुता का सम्मान करे और शान्ति पूर्ण सहअस्तित्व में रहते है सीमाओं को अन्य अनेक सामजिक सांस्कृतिक आर्थिक तरीके से तरल करे परन्तु दूसरी धारा पृथक पहचान को खत्म कर एक ख़ास किस्म के सांस्कृतिक आवरण में समो लेना चाहती है | यह सत्य है की दो सार्वभौम और सम्प्रभु राष्ट्र अब ऐतहासिक राजनीतिक कारणों से पीछे नही जा सकते फिर से उसी तरह से एक नही हो सकते | जो इस सत्य को नकारते है वह शान्ति सह अस्तित्व को लाजमी तौर पर नकारेंगे |

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