हफ्ते की किताब: पल्लव- ‘नीलकान्त का सफ़र’

pallav2कहानी कहना मनुष्य की आदिम प्रवृत्ति है और कहानीकारों में उन्हीं लेखकों को स्मृति में स्थान मिल पाता है जो कहानी लिखने और सुनाने का भेद पाट सकें। अस्सी के दशक में नयी कहानी के बाद उठ खड़े हुए अनेक कहानी आन्दोलनों के कारण कहानी में बहुत अराजकता फ़ैल गई थी। इस दौर में जिन कुछ कथाकारों कहानी को हिन्दी की जातीय परम्परा से जोड़कर उसे पुनर्नवा किया उनमें स्वयं प्रकाश अग्रणी हैं। ‘नीलकान्त का सफ़र’ में उनकी ग्यारह कहानियां हैं और इसे खुद कथाकार के समृद्ध सफर के रूप में देखा जा सकता है। भीड़ से बजबजाते रेल के डिब्बे से शुरू हुआ यह सफर किसी संधान तक पहुँच पाया है तो इसका आधार कथाकार की गहरी लोक संपृक्ति में देखना चाहिए।

मामूली लोगों और उनके जीवन को देखने की यह गहरी चेष्टा और इस जीवन के संकटों की पहचान का विवेक स्वयं प्रकाश को हिन्दी के बड़े कथाकारों की पांत में लाता है। ‘नीलकांत का सफर’ में वे एक रूपक गढ़ते हैं जिसमें रेल के साधारण डिब्बे में भारी भीड़ में फंसे नीलकांत की हवा और रोशनी की तलाश जिन लोगों के सहयोग से पूरी हो रही है वे लोग भले उपेक्षित और हाशिये के हों लेकिन श्रम संस्कृति का उज्ज्वल पक्ष उन्हें पथ प्रदर्शक बना रहा है। यहाँ वाचक का लोगों को देखना और स्थितियों की जकड़न को महसूस करना पाठक को प्रभावित करता है। कहानी में कोई सुसम्बद्ध कथावस्तु न होने पर भी यह ऐसी कहानी बन गई है कि हमारे समय की क्रूर विडम्बनाएं इसमें नजर आ जाती हैं। गाय के से चहरे वाले बाबाजी, दाढ़ी वाला आदमी जो खिड़की तोड़ने के लिए लोगों को उकसा रहा है, नाजुक मिजाज नीलकांत और ग्रामीण मजदूर जिन्हें वाचक लोग लुगाइयाँ कहता है सब मिलकर ऐसा प्रभाव उत्पन्न करते हैं कि कहानी स्मृति में रह जाती है। एक अंश दृष्टव्य है -‘नीलकांत की इच्छा हुई, वापस उसी संडास में चले जायँ। खड़ें यहाँ भी हैं, वहाँ भी थे। वहाँ कम से कम थोड़ी बहुत हवा तो थी, मानाकि बदबू और गंदगी और सबसे ज्यादा अपने संडास में होने का अहसास। ऐसी ही कुछ परेशानियाँ थीं, पर यहाँ क्या कम परेशानी है? और सुविधा क्या है? सिवा इन गरिमा के कि डिब्बे में हैं, संडास में नहीं? लिहाजा चलो वापस संडास में। लेकिन वापस जाना असम्भव था।’ आकस्मिक नहीं कि देश की वर्तमान स्थितियों से घबराकर कर अंग्रेजों के जमाने की तारीफ़ करने वाले बूढ़े यहाँ याद आ जाएं। यह कौशल स्वयं प्रकाश के पास है कि वे मामूली जीवन स्थितियों और घटनाओं के बीच से किसी कहानी का निर्माण कर लेते हैं और उसे हमारे जीवन सत्य के इतना करीब ला रखते हैं कि उसे कहानी मानने में भी संकोच होता है। ‘एक खूबसूरत घर’ और ‘अविनाश मोटू उर्फ़ एक आम आदमी’ उनकी ऐसी ही कहानियाँ हैं। यहां साधारण से दिखाई देने वाले परिवार का एक चित्र असल में भारतीय परिवार की सामूहिकता और गहरे जुड़ाव को दर्शाने वाला है – ‘हां, यह घर था। और हमारी दुनिया में जो कुछ ही खूबसूरत बातें रह गई हैं, उनमें से एक खूबसूरत बात यह भी है कि यह था।’ इस घर में पापा मम्मी और दो बच्चों का परिवार है। एक दिन पापा को  हो जाती है और तब घर में हो रही बेचैनी घर की असल सामूहिकता का चित्र उपस्थित करती है। वहीं ‘अविनाश मोटू उर्फ़ एक आम आदमी’ में बिजली के तारों से बात करने वाला अविनाश की अपने अपने काम के प्रति अनन्य निष्ठा जिस श्रम संस्कृति का उजास फैलाती है वह अपने प्रभाव में अद्वितीय है। जिंदगी में सफलता की जो कसौटियाँ उपभोगमूलक दृष्टिकोण से उपज गई हैं अविनाश मोटू जैसे व्यक्ति उन कसौटियों को खारिज करते हैं और अपने दम पर चुपचाप एक दुनिया रचते जाते हैं जो लालच और इकलखुरेपन से न बनी हो। देखिए तो कैसा प्रतिरोध है -‘अपने को नहीं पचेगा भैया। एक बार ले लिया था भाई लोगों की फूँक में आकर, तो रात को पेट में ऐसी मरोड़ उठी कि पूछो मत। तीन दिन तक हड़ड़-हड़ड़ उल्टियाँ करता रहा। खाऊँ और बाहर। खाऊँ और बाहर। तबसे कान पकड़ लिए। हाँ, हम मना नहीं करते। तुम्हे जँचता हो तो लाओ। पचता हो तो खाओ। पर अविनाश को तो आप माफ ही करो।’

nilkantkasafarस्वयं प्रकाश मुख्यत: शहरी मध्य वर्ग के कथाकार के रूप में ख्यात हैं तथापि ‘नैनसी का धूड़ा’ जैसी कहानी में वे एक बैल के मार्फ़त मनुष्य और पशु के आदिम संबंधों का बयान रचते हैं यहां पशु के दुखांत के साथ मनुष्य के साथ हो रहे अन्याय और अनाचार को वे नहीं भूलते। ग्रामीण जीवन खेती किसानी पर निर्भर है और खेती किसानी का सत्य है वर्षा। यहाँ दो साल बारिश न होना कैसा दृश्य उपस्थित कर रहा है – ‘बुआई के बाद एक छींट पड़ी और बस। अंकुर फूटे और बस। थोड़ा चारा हुआ और बस। बेरों का पानी नीचे उतर गया। जहाँ बेरों पर मोटर लगी थीं, वहाँ हरियाली थी और बस।’ यह बस साधारण किसानों की बेबसी से निकल रहा है जो मजदूर होते जाने को अभिशप्त हैं और उनकी नियति नष्ट हो जाने में है। स्त्री जीवन पर ‘बलि’ और ‘अगले जनम’ कहानियाँ स्वयं प्रकाश के सूक्ष्म पर्यवेक्षण का उदाहरण है। बलि में आदिवासी लड़की के त्रास के साथ औद्योगिक सभ्यता के कारण विस्थापन की कथा आई है। कहानी के प्रारम्भ में साहब के घर में नौकरानी बनकर आई आदिवासी लड़की के मन में गहरा आक्रोश है – ‘मामी लड़की को ऐसी चीजों के लिए भी कोसती, जिन पर लड़की का कोई बस नहीं था। मसलन कहेगी, ‘कैसी भाषा बोलते हो तुम लोग! जैसे लोटे में कंकड़ डालकर हिला रहे हो! या क्या वाहियात इलाका है! पानी बरस रहा है तो बस पागलों की तरह बरसता ही जा रहा है! मार सीलन-ही-सीलन, कीचड़-ही-कीचड़! या जैसे ’यहां के अनाज में वह स्वाद ही नहीं है!‘ या जैसे ‘जमाना कहां-से-कहां पहुंच गया, ये वैसे-के-वैसे ही रहे! जंगली के जंगली!’ लड़की इसका प्रतिवाद करने के लिए  ही मानो संकल्प लेती है – ‘वह इसी मामी के यहां काम करेगी. लेकिन दिखा देगी कि जो-जो और जैसे-जैसे मामी खुद करती है और दूसरी मामियां करती हैं…वह भी कर सकती है। बल्कि उनसे भी अच्छा। घर में जितने भी काम होते हैं — खाना-पकाना, सीना-पिरोना, काढ़ना-बुनना, बोलना-चालना, लिखना-पढ़ना…वह सब सीखेगी…इन्हीं से सीखेगी और एक दिन इन्हीं से अच्छा करके दिखा देगी। हरदम हँसती रहेगी। कभी किसी बात की खुद से भी शिकायत नहीं करेगी। हँसी और सेवाभावऋयही उसके हथियार होंगे। और जिस दिन मामी मान जाएगी कि ये जंगली लोग भी उनसे किसी बात में कम नहीं, बस मौका मिलने की बात है…और जिस दिन मनुष्य की तरह व्यवहार करने लगेगी, जंगली लोगों से बराबरी का बरताव-वह उसे उसके हाल पर छोड़कर अपनी दुनिया में वापस आ जाएगी ’एक उन्मुक्तता और उत्फुल्ल प्राकृतिक दुनिया’ जिसका रूप, रस, गंध और स्पर्श मामी जैसों के नसीब में ही नहीं है।’ लड़की अपने संकल्प में उत्तीर्ण होती है लेकिन यह सफलता भी त्रास देने वाली है क्योंकि अब इसके बाद उसके अपने लोगों के बीच उसके लिए जगह नहीं है। जीवन की इस विडम्बना को कहानी खूब गहराई से देखती है और अभिव्यक्त करती है। इसी में आदिवासी जीवन और विस्थापन के जटिल सवाल भी आ गए हैं। ‘अगले जनम’ में प्रसव पीड़ा से गुजर रही सुमि का चित्र सामाजिक विषमताओं का चित्र भी बन जाता है। स्त्री संतान के पैदा होने से उपजे दृश्य के लिए ही कहानी नहीं लिखी गई है अपितु इस कहानी की सार्थकता एक मनुष्य के जन्म लेने के बारीक दृश्य और सामाजिक विभेद के मानसिक स्थलों की पहचान के लिए है।

साम्प्रदायिकता के कारण पैदा होने वाले सामाजिक विभाजन को कलात्मक प्रस्तुति देना सबके बस की बात नहीं। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद के हालातों पर ‘क्या तुमने कभी कोई सरदार भिखारी देखा है ?’ सामूहिक चित्त के हिंसक होने का दृश्य है वहीं संभ्रात नागरिकों के मौन रहने पर व्यंग्य भी। इस कहानी में सम्भ्रान्त के विरुद्ध कोई टिप्पणी न करके भी स्वयं प्रकाश ने उनके क्रियाकलापों से यह बताया है कि उन्हें अपनी सुख सुविधाओं के इतर कुछ भी सोचना गवारा नहीं है। एक हाहाकारी समय में, जबकि इन्सान क़त्ल किए जा रहे हैं और चारों और भय फैला है, कहानी में आए तीनों सम्भ्रान्त ऐसी रेलयात्रा में यूरोप के कि़स्से सुना रहे हैं और शराब पी रहे हैं। वे भूल से भी चल रही घटनाओं पर विचार नहीं करना चाहते और जब एक बूढ़े सरदारजी की वज़ह से वे ‘परेशान’ हो ही जाते हैं तो उनमें से एक कहता है- ‘ऐसी हालत में इन लोगों को घर से बाहर ही नहीं निकलना चाहिए।’ ‘पार्टीशन’ रोजमर्रा के जीवन में घुस आई साम्प्रदायिकता को दर्शाती है जहां कुर्बान भाई जैसे रोशन ख्याल आदमी को नमाज के जुलूस में धकेल दिया जाता है। उनकी पीड़ा तो देखिये –  ‘आप क्या ख़ाक हिस्ट्री पढ़ाते हैं ? कह रहे हैं पार्टीशन हुआ था !हुआ था नहीं, हो रहा है, जारी है।’

भूमंडलीकरण के नए दौर के चित्र ‘गौरी का गुस्सा’ और ‘संधान’ में आए हैं। लोककथा की शैली में लिखी गई गौरी का गुस्सा इधर की बढ़ती लालसाओं पर टिप्पणी है तो संधान में देशज स्थानिकता में रास्ता खोजने की कोशिश। अपनी इच्छाएं पूरी करता हुआ मनुष्य अंतत: जहाँ पहुंचता है वह सम्पन्नता का शिखर होकर भी कैसा है – ‘वहाँ सब कुछ था, लेकिन कुछ नहीं था। भोजन था, लेकिन भूख नहीं थीं प्यास थी और पेयपदार्थ भी थे, लेकिन तृप्ति नहीं थीं नींद थी लेकिन सपने नहीं थे। भोग था, लेकिन तुष्टि नहीं थीं बच्चे थे, लेकिन बचपन नहीं था। यौवन था, लेकिन अल्हड़पन नहीं था। सूचनाएँ अपार थीं, बोध गायब था। समुदाय थे, लेकिन सामाजिकता नदारद थीं संगीत था, लेकिन सुरीलापन नहीं था। चित्र थे, लेकिन सुंदरता गायब थीं फूल ढेरों थे, खुशबू ज़रा भी नहीं। पंछी अनेक थे, लेकिन चहचहाहट का पता नहीं था। हताशा थी, सांत्वना नहीं थीं दर्दनाशक बहुत थे, हमदर्द एक भी नहीं। संपर्क था, लेकिन संवाद नहीं था। मनुष्य थे, लेकिन मनुष्यता ढूँढ़नी पड़ती थीं बस्तियाँ थीं, लेकिन बसावट नहीं थीं लोग थे, लेकिन लगावट गायब थी।’ इसी तरह संधान में देशज स्थानिकता की तलाश राहत देने वाली है जहाँ ‘विश्वमोहन जी को लग रहा है कि ‘छोटे लोगों को सुख भी दुखी क्यों कर जाते हैं?’ ‘प्रतीक्षा’ में युवा बेरोजगारी का चित्र आया है और जिस तड़प को स्वयं प्रकाश ने कहानी बनाया है वह कहानी को केवल पढ़कर भूल जाने की चीज़ से कहीं आगे ले जाती है। शिल्प के स्तर पर भी यहां नया प्रयोग है जिसमें कथावाचक बीच में क्षेपक की तरह पूछता है – ‘…किस तरह का समाज बनाना चाहते थे हम? और किस तरह का बन गया समाज?’ यह टिप्पणी कहानीकार की अपनी ट्रेजडी भी हो सकती है। मार्क्सवाद और प्रगतिशीलता के रास्ते पर चलने वाले – चमक और सत्ता की कामना से दूर रहकर जनपक्षधरता को अपना ध्येय मानने वाले क्या असफल हो गए हैं ? ऊपर से भले ऐसा दिखाई देता हो लेकिन क्या चमक और चकाचौंध से भरे इस नए दृश्य में मनुष्य का हाहाकार समाप्त हो गया है ? क्या गैर बराबरी अब अतीत है ? क्या पूंजीवादी सम्पन्नता ने गरीबी को वाकई ख़त्म कर दिया है ? कहना न होगा कि इस्तेमाल करो और भूल जाओ के इस दौर में ये मनुष्यता के पक्ष में जिरह करती मूल्यवान कहानियाँ हैं।

‘नीलकांत का सफर’

स्वयं प्रकाश

अरू पब्लिकेशन्स प्रा लि , नई दिल्ली

195 /-

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