‘हस्ताक्षर’ के दस साल: रोहित शर्मा

Hastakasharहिन्दी अगर देश के बड़े भूभाग की भाषा है तो यह स्वाभाविक है कि अनेक प्रयोग और नवाचार इस भाषा और साहित्य में होते हों। देश की राजधानी दिल्ली में सौ साल से भी अधिक पुराने हिन्दू कालेज में ऐसे एक प्रयोग को दस साल पूरे हुए। यहाँ के हिंदी विभाग द्वारा एक हस्तलिखित पत्रिका निकाली जाती है जिसके एक दशक हो जाने पर पिछले दिनों इस पत्रिका के दो विशेषांक प्रकाशित हुए और एक राष्ट्रीय संगोष्ठी भी आयोजित की गई। पत्रिका की संपादक डॉ रचना सिंह बताती हैं कि वर्ष 2005 में उन्होंने यह विचार अपने विभागीय सहयोगियों के मध्य रखा कि विद्यार्थियों में रचनाशीलता और श्रम के आनंद के अनुभव के लिए एक हस्तलिखित पत्रिका निकालनी चाहिए। विभाग के सहयोगियों ने इस प्रस्ताव को साकार करने में सहयोग दिया और विद्यार्थियों के लिए – विद्यार्थियों के द्वारा एक ऐसी पत्रिका आई जो बड़ों के लिए भी उपयोगी थी। हस्ताक्षर ऐसी पत्रिका के रूप में विकसित की गई जिसमें हर बार हिन्दी के किसी बड़े रचनाकार -कवि, कथाकार, आलोचक के साथ हिन्दू कालेज के विद्यार्थियों का साक्षात्कार और एक और किसी प्रतिनिधि रचनाकार की हस्तलिपि में उनकी प्रतिनिधि रचनाएँ प्रकाशित हो सके। डॉ सिंह बताती हैं कि इसके पीछे विचार यह था कि साहित्य के विद्यार्थी हमारे देश के मूर्धन्य रचनाकारों से निकटता का अनुभव कर सकें और एक वास्तविक रोमांच उनके भीतर उत्पन्न हो। हस्ताक्षर में अब तक कुंवर नारायण, त्रिलोचन, हरिशंकर परसाई, नन्द चतुर्वेदी, गुलज़ार, वीरेन डंगवाल, बच्चन सिंह, राजेश जोशी, उदय प्रकाश, मंगलेश डबराल, अरुण कमल, निर्मला जैन, विश्वनाथ त्रिपाठी, नंदकिशोर नवल, नित्यानंद तिवारी, राजेन्द्र यादव, मन्नू भंडारी, नरेश सक्सेना, चंद्रकांत देवताले, अशोक वाजपेयी, अनुपम मिश्र, निर्मला पुतुल जैसे रचनाकारों को प्रकाशित  किया जा चुका है।

HAstakshar1पत्रिका के संपादन से लगाकर उसे पाठकों के हाथ तक पहुंचाने का  सारा कार्य विद्यार्थियों द्वारा ही होता है। अध्यापक निर्देशक की भूमिका इसी तरह निभाते हैं कि कार्य योजना की मूल भावना कहीं गड्मड् न हो। वरिष्ठ और विद्यार्थी रचनाकारों से सामग्री एकत्र करना, उसे सुन्दर वर्तनी में तैयार करना, फोटो कापी करवाना, हाथ से अंक की प्रतियां तैयार करना और पाठकों तक पहुंचाना – इन सब कामों में विद्यार्थी जुटे  रहते हैं और तभी इन अंकों की बड़ी पहचान बनी है। आखिर नए और पहली पहली बार प्रकाशित होने वाले विद्यार्थियों के लिए यह कितने गौरव की बात है कि वे अपनी भाषा के श्रेष्ठ रचनाकारों के साथ छप रहे हैं। दस वर्ष होने पर उन्होंने पत्रिका के दो विशेषांक निकाले हैं जिनमें अनूठा प्रयोग है। पहले अंक में हिन्दी की प्रतिनिधि लम्बी कविताओं पर कवियों ने मूल्यांकन किया है तो दूसरे में हिन्दी की प्रतिनिधि लम्बी कहानियों पर कथाकारों ने। राम की शक्तिपूजा पर ज्ञानपीठ से सम्मानित केदारनाथ सिंह ने लिखा है तो दौड़ कहानी पर स्वयं प्रकाश ने। डॉ सिंह बताती हैं कि अगर युवाओं में साहित्य प्रेम के लिए ईमानदार कोशिश की जाए तो यह संभव है। कहना न होगा कि यह हस्ताक्षर जैसे प्रयोग यह सम्भव कर रहे हैं।

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