विद्यासागर नौटियाल से लक्ष्मण व्यास की बातचीत

nautiyal-jiविद्यासागर नौटियाल कथा लेखन का सुपरिचित नाम हैं।सूरज सबका है और उत्तर बायां है’ जैसे उपन्यासों के लिए चर्चित विद्यासागर नौटियाल ने लेखन 1949 में प्रारम्भ किया था और नयी कहानी के उर्वर दिनों में उन्होंने भैंस का कट्या जैसी अविस्मरणीय कहानी लिखी। फिर वे अरसे तक लेखन से दूर रहे। सन् 1990 में उन्होंने दुबारा लेखन की दुनिया में दस्तक दी और इसके बाद उन्होंने उपन्यासों, कहानियों के साथ मोहन गाता जाएगा’ जैसा आत्मकथ्य भी लिखा। उनके अब तक सात उपन्यास और छह कहानी संग्रह प्रकाशित हुए हैं। राजनीति और लेखन दोनों को अपने सिद्धान्तों और मूल्यों की कसौटी पर परखने वाले नौटियाल सामाजिक विषमताओं से लड़ना मुख्य चुनौती मानते थे। प्रस्तुत है लेखन और समसामयिक विषयों पर लक्ष्मण व्यास द्वारा उनसे की गई एक पुरानी बातचीत –

आपको लेखक बनाने में बचपन का क्या प्रभाव रहा?

मेरा बचपन अपने पैतृक निवास से दूर-दूर घने जंगलों के बीच बीता। पिता वनाधिकारी थे। उनकी तैनाती हमेशा ही टिहरी-गढ़वाल रियासत के अलग-अलग स्थानों पर होती रहती थी। उस जमाने में वन-सेवा कर रहे कर्मचारियों के सामने सबसे बड़ी समस्या अपने बच्चों की शिक्षा की होती थी। सामंती शासन की कोशिश रहती थी कि आम आदमी के बच्चे शिक्षित न हो सकें। लिहाजा रियासत के बच्चे रोटी-रोजगार की तलाश में अंगे्रजी भारत के विभिन्न शहरों में चले जाया करते थे। दिल्ली, लाहौर, क्वैटा, कराची से लेकर ढाका व चटगाँव तक के घरों में टिहरी-गढ़वाल रियासत के अनपढ़ लड़के मुख्यतया बर्तन माँजने का काम करते थे।

आस-पास कहीं विद्यालयों के अभाव में मेरे पिता मुझे घर पर ही पढ़ाते थे। उन्हें अक्सर वनों के दौरे भी करने होते थे। अपने दौरों पर वे मुझे भी साथ ले जाते। जब भी कहीं पर थोड़ा भी समय मिलता, मेरी किताब खुल जाती और पढ़ाई शुरू हो जाती। गाँवों के भ्रमण के दौरान मैं आम आदमी के जीवन से बहुत करीब से परिचित होने लगा। उनके अभाव और कष्ट मुझे मानसिक तौर पर दुखाने लगते। महिलाओं के वेदनामय जीवन की अनेक घटनाएँ मेरी स्मृतियों में समाने लगती और बाद में भी मुझे बेचैन करती रहती। बाद के दिनों में अपने लोगों के जीवन की वे तमाम स्मृतियाँ मेरे लेखन पर हावी होती चली गईं ।

आपकी रचनात्मक यात्रा के बारे में जानना आपके पाठकों के लिए दिलचस्प होगा।

तेरह-चैदह वर्ष की उम्र से मैं अपने विचारों को कागज पर उतारने लगा था। 1942 में मुझे पढ़ाई के लिए पिता के मुख्यालय कसेडी-बंगाण (शिमला पर्वतमाला के पास टिहरी रियासत की सरहद का क्षेत्र) से टिहरी भेज दिया गया। कसेडी से एक सौ मील की चढ़ाई-उतराई की विकट राहों  को पैदल पार करता हुआ मैं पाँचवे दिन टिहरी पहुँचा था।

सन् 1951 तक मैं टिहरी में ही पढ़ाई करता रहा। टिहरी में शुरुआत कविताओं से हुई। उन्हें कविता नहीं, तुकबन्दी कहना ज़्यादा बेहतर होगा। राजभक्त, राजगुरु परिवार में जन्म लेने के बावजूद मैं रियासती प्रजामंडल का सक्रिय कार्यकर्ता बन गया। भारत के स्वतंत्र हो जाने के बाद  पारंपरिक सामन्ती शासन से रियासती प्रजा की आज़ादी के लिए प्रजामंडल ने अंतिम आँदोलन छेड दिय़ा। उसमें सक्रिय होने के कारण छः अन्य प्रजामंडल कार्यकर्ताओं के साथ मुझे भी 18 अगस्त 1947 को गिरफ्तार कर दिया गया। उनमें बिरला कॉलेज पिलानी से पढ़ाई रोक कर टिहरी चले आए मेरे बड़े भाई बुद्धिसागर नौटियाल भी शामिल थे। मुझे कॉलेज से भी निष्कासित कर दिया गया। जेल में हम सब पर न्याय का नाटक करते मुकदमे की सुनवाई शुरू की गई। पर तब तक मैं प्रजामंडल द्वारा देहरादून (स्वतंत्र भारत) में आयोजित कार्यकर्ताओं की बैठक में भाग लेने के लिए वहाँ पहुँच चुका था। मुझे भगोड़ा घोषित करते हुए मजिस्ट्रेट ने मुझ पर छः सौ रुपये और अन्य कार्यकर्ताओं को कै़द और जुर्माना की सज़ा सुना दी। जुर्मानों की रकमों को वसूल करने की जिम्मेदारी मेरे प्रभागीय वनाधिकारी पिता को सौंपी गई। उनके मना करने पर उनकी राजकीय सेवा समाप्त कर दी गई। 11 जनवरी 1948 को सामन्ती हाकिमान ने उस आँदोलन में प्रसिद्ध कम्युनिस्ट नेता नागेन्द्र सकलानी और मोलाराम भरदारी को गोलियों से भून डाला। मैं सकलानी के साथी के रूप में जाना जाता था। 14 जनवरी 1948 को रियासती प्रजा ने प्रजामंडल के नेतृत्व में सामन्ती शासन को समाप्त कर सत्ता अपने हाथ में ले ली। मुझे फिर अपनी पढ़ाई जारी करने का अवसर मिल गया। तब मेरा रूझान लेखन की ओर होने लगा। अनेक कविताओं के अलावा मैंने अपनी पहली कहानी मूक बलिदान भी लिखी, जो 1951 में कॉलेज मैगजीन में प्रकाशित हुई थी। बाद में, मैं बी.ए. में दाखिला लेने 1952 में काशी विश्वविद्यालय में चला गया।

काशी में मुझे हिन्दी के अनेक नए व शीर्षस्थ साहित्यकारों के निकट संपर्क में आने का अवसर मिलने लगा। डा0 हजारीप्रसाद द्विवेदी, त्रिलोचन शास्त्री, ठाकुर प्रसाद सिंह की उपस्थिति में, गोष्ठियों में मैं भी अपनी कहानियाँ सुनाने लगा। नामवर सिंह, शिवप्रसाद सिंह, रामदरश मिश्र आदि नियमित तौर पर हमें कक्षाओं में पढ़ाने लगे। केदारनाथ सिंह और विश्वनाथ त्रिपाठी मेरे सहपाठी बने। विष्णुचन्द्र शर्मा से प्रगाढ़ मैत्री स्थापित हो गई। आज के हिन्दी के पाठक इन सभी नामों से सुपरिचित हैं। मेरी किसी साहित्यिक पत्रिका (कल्पना) में 1954 में प्रकाशित होने वाली पहली कहानी भैंस का कट्या1953 में लिखी गई थी। उस अकेली कहानी ने मुझे साहित्य-जगत से सुपरिचित करा दिया। बाद में और कहानियाँ भी लिखीं।

मैं काशी में आठ साल तक रहा। मेरी अधिकांश कहानियों का लेखन, प्रकाशन अथवा बीजारोपण काशी-प्रवास के ही दौरान हो गया था ।

काशी से टिहरी लौट आने के बाद मैं कम्युनिस्ट पार्टी का कुलवक़्ती कार्यकर्ता बन कर पहाड़ी  गाँवों और चोटियों-घाटियों का लगातार भ्रमण करता रह गया । तीस वर्षों के साहित्यिक वनवास के बाद 1990 में मैंने अपनी पहली कहानी फट जा पंचधार’ लिखी। पाठकों ने उसे पसन्द किया। उसके बाद मैं पूरी तरह लेखन कार्य में ही लग गया। कहानियों के अलावा उपन्यास भी लिखने लगा ।

इतनी लम्बी रचना यात्रा में क्या कभी मन में सन्देह हुआ- इसके प्रभाव को लेकर, लोगों को प्रभावित कर बदलाव लाने की क्षमता पर ?

मैं इस ग़लतफहमी में कभी नहीं रहा कि मेरे लेखन से समाज में कोई बड़ा परिवर्तन आ सकेगा। मैं सिर्फ यही कोशिश करता रहता था, और करता रहता हूँ कि मेरी रचनाएँ कहीं हलकी या घटिया किस्म की न बन बैठें। तीस बरसों के साहित्यिक बनवास के कारण मेरे अध्ययन की अपनी सीमाएँ हैं, जिनसे मैं बखूबी परिचित हूँ। मुझे मालूम है कि मैं विद्वान नहीं हूँ लेकिन मेरा यह भी मानना है कि रचनात्मक साहित्य का सर्जन करने के लिए पोथियों का विद्वान होना अनिवार्य नहीं, हो जाय तो सोने सुहागा। इस मामले में मैं अपने को एक मिसाल की तौर पर पेश कर सकता हूँ कि मेरे जैसे अल्पज्ञ भी रचनात्मक साहित्य का ठीक-ठाक सर्जन कर सकते हैं। असली बात दृष्टि की होती है। आपका नज़रिया सही होगा तो रचना में अपने गुणात्मक सुधार आने लगेगा।

अपने लेखन पर, उसकी गुणात्मक क्षमता पर, मुझे कभी सन्देह हुआ ही नहीं। लेखन के मामले में मैं कभी हड़बड़ी में नहीं रहता। जब तक मेरी कोई रचना ठीक तरह से पक नहीं जाती, मैं उसे कागज पर नहीं उतारता, पाठकों के सामने पेश नहीं करता। अपनी रचनाओं को बार-बार तराशते रहने की मुझे आदत है। कई रचनाओं को, उपन्यासों को भी, मैं बीसियों बार काट-छाँट करता रहा हूँ। स्याहियों के रंग और कागज बदलते रहते हैं। वक़्त लगे तो लगे, अपने पास वक़्त की क्या कमी है! मेरी कई रचनाओं का बीजारोपण, मैंने ऊपर बताया कि मेरे काशी-प्रवास के दौरान हुआ (1952-60)। उनमें से कुछ को 1990 के उपरान्त ही पूरा किया जा सका। फट जा पंचधार’ एक ऐसी ही कहानी है। लेकिन रचना सिर्फ उसी को प्रभावित कर सकती है, जो उसे पढ़े। हिन्दी में रचनात्मक साहित्य के पाठकों की संख्या हमेशा ही न्यूनतम रहती आई है ।

 साहित्य मुख्यधारा से हाशिये पर चला गया है, इस प्रक्रिया को आप किस तरह देखते हैं?

साहित्य, मेरे ख़्याल में कमसे कम हिन्दी में, मुख्यधारा में कभी रहा ही नहीं। अगर वैसा होने लगे तो समाज की नकेल को अपनी जकड़ में रखने वाले दौलतपति और उनकी सेवा में अपना जीवन खपाने वाले राजनीतिज्ञ बेसहारा हो उठेंगे। तब वे कहाँ जाएँगे? यह याद दिलाना चाहूँगा कि मैक्सिम गोर्की ने अपने लेख पीले-शैतान की नगरी’ में दोनों के चरित्र किस खूबी से उजागर किए हैं। साहित्यकार जलती मशाल को अपने हाथों में ऊँचा करके समाज के आगे-आगे चलने वाला भविष्यद्रष्टा होता है। उसे इस बात की चिन्ता नहीं होती कि उसके अनुयायियों की संख्या क्या है। वह तत्काल उनके वोटों’ को प्राप्त करने के लिए लोगों की मनभावन मीठी-मीठी बातें करने वाला विचारशून्य व्यक्ति नहीं होता। उसकी अपनी दृढ़ धारणाएँ (कन्विक्षन्स) होती हैं, हवाओं के झोंकों से आए दिन बदलते रहने वाले हलकी किस्म के विचार’ मात्र नहीं। अपनी उन दृढ़ धारणाओं के प्रति समर्पित वह ध्रुवतारे की तरह अविचल रहता है। लेकिन वह कठमुल्ला नहीं होता। अपनी मशाल की ज्वलन्त रोशनी में उसका उद्देश्य समाज को वह सब कुछ दिखा देना होता है, जिसे अपनी सीमाओं के कारण लोग देख नहीं पाते। वह आम आदमी की चेतना को झकझोर देना चाहता है ताकि वे बदल सकें। कभी-कभी बेहद कड़वी और बहुमत को अप्रिय लगने वाली बातें लिख कर। सत्यम ब्रूयात प्रियम ब्रूयात मा ब्रूयात सत्यम अप्रियम’ का सुगम सिद्धान्त मेरे खयाल में हर युग में सिर्फ मतलब-परस्त महानुभाव को ही लुभा सकता है ।

 प्रेमचंद के शब्दों में समाज और राजनीति के आगे चलती मशाल’ अब पिछलग्गू बन कर रह गई है। या आप मानते हैं कि यह स्थापना ही गलत है?

स्थापना गलत नहीं, शतप्रतिशत सही है। प्रेमचन्द के ज़माने में कलम के बल पर सत्ताधीशों की तबियत खुश कर देने वालों और उनके दुर्गुणों की अनदेखी कर उनको छुपाने या उनकी बिरदावली गाने वाले भाटों की संख्या बढ़ने लगी थी। उस युग के सभी तथाकथित साहित्यकार आम भारतवासियों को स्वतंत्रता-संग्राम में जुट कर विदेशी दासता की बेड़ियों को तोड़ डालने का आह्वान करने वाले लोग नहीं थे और उसके साथ-साथ देशी-सामन्तों साहूकारों और उनके पिछलग्गुओं के ताने-बाने को भंग कर एक नए समाज की स्थापना करने का आह्वान करने वाले लोग भी नहीं थे। वही पीड़ा झलकती है, प्रेमचन्द के उपरोक्त शब्दों से।  प्रेमचन्द की दृष्टि एकदम अलग थी। उन्होंने साहित्य में पारंपरिक, दकियानूसी, समाज को पीछे की ओर धकेलने वाले विचारों का विरोध कर सकने वाले लेखकों का नेतृत्व अपने हाथों में लिया था। ऐसे ज़माने में जबकि मुख्य राजनीतिक दल काँग्रेस के नेतृत्व में ज़मींदारों और साहूकारों का बहुमत और बर्चस्व था, प्रेमचन्द ने होरी और सूरदास को साहित्य में सिर्फ प्रवेश ही नहीं करवाया, उन्हें अपने और आने वाले युगों के हीरो के रूप में स्थापित कर दिया था। उस ज़माने में दलितों की पीड़ा को अभिव्यक्ति देने वालों में वे अग्रणी पंक्ति में थे ।

दुनिया में तेजी से हो रहे परिवर्तनों को समझना कठिन है। कथा प्रविधि इस इस पल-पल बदलते यथार्थ को पकड़ पाने में कितनी सक्षम है?

हाँ! यह सही है कि नई तकनीकी के कारण दुनिया में परिवर्तन हो रहे हैं, जिनकी गति बहुत तेज है। कथा-प्रविधि इस पल-पल बदलते यथार्थ को पकड़ पाने में पूरी तरह सक्षम साबित नहीं हो पा रही है। थोड़ी देर के लिए कथा को भुला कर पत्रकारिता के बारे में भी विचार कर लिया जाय, जिनकी कलम पर दैनिक घटनाओं का चिट्ठा रखने का स्थायी उत्तरदायित्व रहता है। पत्रकार भी उन परिवर्तनों को पूरी तरह समझने में सफल नहीं हो पा रहे हैं। विश्लेषण तो दूर की बात। इन परिवर्तनों और उनसे उपज रहे प्रभावों की भविष्यवाणी करने में भी उन्हें पर्याप्त परेशानी होती है। और हिन्दी कथा-साहित्य की अपनी सीमाएँ हैं। हमारे पूरे सूचना-तंत्र पर संयुक्त राज्य अमरीका की साम्राजी व्यवस्था हावी है। इसलिए दक्षिण-अमरीकी देशों के बारे में हमारी जानकारी बेहद सीमित है। एशियाई-अफ्रीकी देशों के बारे में भी वही स्थिति है। उन सबके बारे में हम सिर्फ उतना जानते हैं जितना, संचार के साधनों पर हावी, अमरीका चाहता है कि हम जान सकें। यह बात कि दक्षिण अमरीकी देशों के अंदर संयुक्त राज्य अमरीका का वर्चस्व पूरी तरह समाप्त नहीं तो मृतप्राय हो चुका है, हमारे लोगों को कभी भी मालूम नहीं होने दी जाती। संयुक्त राज्य के राष्ट्राध्यक्ष का दक्षिण-अमरीकी देशों के राष्ट्राध्यक्षों के समूह के बीच पहुँच कर यह बयान देना कि वे अपने को उन सभी के बराबरी पर मानते हैं, एक गहरी कूटनीतिक चाल है। इस वक्तव्य में दो गूढ़ तथ्य समाहित हैं। पहला- इकबाल किया जा रहा है कि उन मुल्कों की जनता के बीच संयुक्त राज्य की दादागिरी का ज़माना लद गया है और दूसरा कि नया प्रशासन पिछले प्रशासनों के द्वारा पैदा की गई रिश्तों की ऐतिहासिक कड़वाहटों (सिर्फ खटास नहीं) को मिटाने-भुलाने को तैयार है, लेकिन अपनी शर्त पर। शर्त यह कि उन देशों की जनता का मूल्यांकन करने का उसका नज़रिया नहीं बदलेगा। और उसे बदलने के लिए उस पर ज़ोर भी न डाला जाय। आधी सदी से अमरीकी आर्थिक और सैन्य घेरे के कारण क्यूबाई मेहनतकशों और आम नागरिकों के जीवन के दुख-दर्दों और पीड़ा की एकदम अनदेखी करते हुए, ओबामा प्रशासन आज भी वहाँ के सत्ताच्युत, षड्यंत्रकारी भगोड़ों (अमरीका की नज़रों में ‘बेचारे’ की पीड़ा को दूर करने के प्रयास करना चाहता है। इन ‘बेचारों’ को संयुक्त राज्य के सभी प्रशासन आधी सदी से अपनी धरती पर पालते हुए क्यूबा की निर्वाचित, लोकप्रिय सरकारों के खिलाफ षडयंत्र करते रहने को लगातार असीमित साधन मुहैया कराते रहे हैं। तो बदलाव क्या हुआ? पिछले तमाम प्रशासन भी इसी नीति पर तो काम करते आए हैं!

किसी भी अपरिचित स्थान का दस दिन भ्रमण करने के बाद, वहाँ के बारे में पोथे लिख डालने में माहिर हमारे किसी भी नामी-गिरामी कथाकार ने, इन तथ्यों पर कभी गौर नहीं किया। गूगल, याहू और दूसरी दैत्याकार कंपनियाँ दुनिया के दूसरे मुल्कों में इंटरनेट पर अपने वर्चस्व के कारण जो उत्पात मचाने लगी हैं, वह आसानी से समझ में आने वाली बात नहीं है।

जिस नई पीढ़ी का आगमन हुआ है, इसके संस्कार इलेक्ट्रॅानिक मीडिया ने तय किए हैं। इनके जीवन का मूलमंत्र है- तुरंत तृप्ति। इस पीढ़ी के ध्यानाकर्षण हेतु साहित्यकार कथ्य व शैली के स्तर पर क्या परिवर्तन अपनाए?

ऊपर हम इसी से जुड़े प्रश्न पर कुछ हद तक विचार कर चुके हैं। नई पीढ़ी दो भागों में बँटी है- नागरीय और देहाती। देहाती में आदिवासी भी शामिल हैं। इन दोनों पर अलग-अलग विचार किया जाना ज़रूरी होगा। पहले नगरों पर विचार कर लें। मेरा मानना है कि इतिहास में पहली बार एक ऐसी नई पीढ़ी ने जन्म लिया है, जिसकी जानकारी की कुल पूँजी अपनी पिछली तमाम पीढि़यों से न केवल ज़्यादा है बल्कि उसमें गुणात्मक भिन्नता भी है। यह भिन्नता पर्याप्त नहीं, पूर्णत: है। मैं इसे उसकी दौलत न कह कर जानबूझकर पूँजी कह रहा हूँ। अपनी विद्या की उस पूँजी से यह नई पीढ़ी और  पूँजी, और पूँजी बटोरने में लगी रहती है।

फिर भी मैं इसके लिए ‘संस्कार’ शब्द का उपयोग नहीं करना चाहता। मुझे संस्कार शब्द में सामन्ती बू मालूम होती है- मान्य परंपराओं के औचित्य या अनौचित्य पर उँगली उठाए बग़ैर, उन परंपराओं को शत-प्रतिशत सही मानते हुए जीवन्त रूप में आगे बढ़ाते रहने की सतत प्रक्रिया। हमारी नई पीढ़ी इस मामले में विलक्षण है कि वह उस तरह की परंपराओं में दीक्षित नहीं हो पाई। अपने पिता को पिता न कह कर सीधे-सीधे उसके नाम से संबोधित करने लगी है। उसे किसी दादी या नानी से कोई कहानी नहीं सुननी है। उस दादी या नानी को अपने जीवन (और दुनिया) में कतई गै़रज़रूरी मानते हुए वह माउस की एक क्लिक के सहारे पूरी दुनिया के देशों, उसके जल-थल, वायुमंडल, अन्तरिक्ष और उससे भी आगे के आश्चर्यलोकों का भ्रमण करने में लगी रहती है। उसे पीछे की ओर देखने की कोई ज़रूरत ही नहीं महसूस होती। उसके बाप-दादों ने क्या किया- यह उसके लिए कोई मायने नहीं रखता। यह आकस्मिक नहीं कि अभी कुछ ही समय पहले हिन्दी के एक जाने-माने समाचारपत्र का उत्तराधिकारी युवा स्वामी अपने पिता की मृत्यु के बाद उसके दफ्तर में जायज़ा लेने आया और वहाँ की व्यवस्था को देखकर अचानक बिफर गया। एक बहुत बड़े हॉल में बनाई गई आलमारियों में करीने से वर्ष और तिथिवार रखी गई पत्रों की पुरानी फाइलों और दुर्लभ पुस्तकों को देखकर उसने पूछा कि ये सब क्या हैं। उनके बारे में जानकारी मिलते ही उसने दूसरा प्रश्न किया कि इन फालतू चीजों का यहाँ की जगह को घेरने का क्या मतलब है। तत्काल उसने उन सबको वहाँ से हटा कर नीलामी करवा देने का फ़रमान भी जारी कर दिया। यह नई पीढ़ी पुरखों और उनके संचित ज्ञान की निधि को फालतू मानते हुए उसे कूड़ेदान में फेंक देने को उतवाली हो जाती है। और वह कूड़ादान उसका निजी नहीं होता। वह उसके घर के अंदर नहीं, घर के बाहर रखा रहता है और कॉलोनी का साझा होता है। उनकी आवश्यकताओं के अनुरूप बनाए गए, सेंटीमीटरों तक के हिसाब से निर्मित उनके नए-भव्य अपार्टमेंट्स और फ्लैट्स के अंदर किसी भी फालतू चीज़ को संग्रहीत रख सकने लायक कोई जगह नहीं बनाई जा सकती। भीष्म साहनी का ज़माना लद चुका है। माँ को छुपाए रखने लायक पुराने गूदड़ों का अब घर के अंदर कहीं पर भी ढेर नहीं लगाया जा सकता। यह भी है कि अब किसी चीफ़ की दावत किसी बड़े, आलीशान होटल में ही आयोजित की जी सकती है, घर के दरबे के भीतर नहीं। किसी पुरानी चीज़ को मरम्मत के लिए ले जाने के बजाय उसके लिए सर्वोत्तम स्थान सड़क पर रखा गया कूड़ादान माना जाता है। अपनी रिहाइश के उन फ्लैट्स से भी उनका किसी भी तरह का भावनात्मक लगाव नहीं होता। अपनी बढ़ती माली हैसियत के अनुसार वे उसे किसी भी समय बदल सकते हैं। उसे छोड़ कर नए फ्लैट के अंदर प्रवेश कर सकते हैं। माउस की एक अकेली क्लिक से पुरानी लिखतों की फाइल को ऑब्लीटरेट कर देने की तरह वे उस पुराने निवास की यादों को अपने दिल से हमेशा-हमेशा के लिए गायब कर सकते हैं।

प्रश्न के दूसरे भाग के उत्तर में मैं इस तथ्य की ओर भी ध्यान दिलाना चाहूँगा कि पीढ़ी का यह अंश ही सब कुछ नहीं है। यह सही है कि वे हमारी अर्थव्यवस्था पर हावी हो चुके हैं। शिक्षा-स्वास्थ्य, प्रशिक्षण-प्रशासन आदि उनके शिकंजे में कसते जा रहे हैं। उनकी बिरादरी की  राजनेताओं-सत्ताधारकों के बीच आश्चर्यजनक गति से संख्या बढ़ने लगी है। लेकिन इस पीढ़ी के चमकीले-भड़कीले, दिशाहीन नौजवानों के अलावा और उनके समानान्तर इस देश के करोड़ों वंचितों की साधनहीन-अवसरविहीन भी पीढ़ी के अंश हैं। उनकी शिक्षा-दीक्षा कूड़ादानों के इर्द-गिर्द, अपराधजगत के साए में होती है। उन्हें अक्षरज्ञान मिल जाना उनके जीवन में एक उपलब्धि होती है। देहाती विद्यालयों में धुन-खाई शहतीरों के साए में बाराखड़ी बाँचने वाले अभागे भी हैं। कभी नई पीढ़ी का यह अंश भी जागेगा। साहित्यकार को उन्हें ध्यान में रख कर लिखना चाहिए, खासकर गैर-अंग्रेजी साहित्यकारों को। मानसिक तौर पर ग्लैमर की दुनिया में रहने वाले और उससे आकर्षित लोगों का यों भी हमारे साहित्य से कोई मतलब नहीं रहता। वे हमारी लिखी किताबों के बारे में जानना भी नहीं चाहते।

जहाँ तक सवाल है कि इस पीढ़ी के ध्यानाकर्षण हेतु साहित्यकार कथ्य व शैली के स्तर पर क्या परिवर्तन अपनाए तो यह प्रश्न आप किसी अन्य लेखक से करें, तो शायद उचित उत्तर मिल सकेगा।… जहाँ तक मेरा सवाल है मैं अपने को काली कमली वाला रचनाकार रहने देने में ही मगन रहना पसन्द करता हूँ। किसी की इच्छा-अनिच्छा को ध्यान में रखते हुए मैंने आज तक एक भी रचना नहीं लिखी। कोई संपादक, कोई निर्णायक, कोई आलोचक, कोई समीक्षक, यहाँ तक कि कोई पाठक……जिन्हें मेरी रचनाएँ रूचिकर नहीं लगतीं उनकी पसन्दगी या नापसन्दगी को ध्यान में रखते हुए यानी उनको खुश करने के लिहाज से, अपने लेखन में मैं किसी भी तरह का परिवर्तन नहीं कर सकता।

साहित्य सृजन को ही जीविकोपार्जन का साधन बनाने की इच्छा हिन्दी के लेखकों के मन में रही है। विदेशी और भारत की कुछ अन्य भाषाओं में यह संभव भी हो पाया है, पर हिन्दी समाज में, एक-दो अपवाद ही हैं, यह संभव नहीं है। जबकि हिन्दी बोलने-पढ़ने वाले करोड़ों में हैं। क्या कारण हैं उसके?

मेरे खयाल में इस प्रश्न का संबंध दो-एक को छोड़कर समस्त भारतीय भाषाओं से है। हिन्दी-पंजाबी के जाने-माने कथाकार गुरदयालसिंह कुछ समय पहले महाराष्ट्र का दौरा करे लौटे। मुझसे फोन पर बातें करते हुए उन्होंने आश्चर्य प्रकट करते हुए वहाँ के प्रत्येक गाँव में बने पुस्तकालयों की बात बताई। पुस्तकालयों का परिव्यय और रख-रखाव ग्रामवासी स्वयं करते हैं। उनमें साहित्यिक पुस्तकें भरी रहती हैं और सभी ग्रामवासी उन पुस्तकों को रुचिपूर्वक पढ़ते हैं। अपने साहित्यकारों को जैसा सम्मान महाराष्ट्र की जनता करती है, वैसा उदाहरण अन्यत्र नहीं मिल सकता।

हिन्दी के अलावा उर्दू के लेखकों की स्थिति बेहतर होनी चाहिए थी। उर्दू के शायर मुशायरों-महफि़लों में जो वाहवाही लूटते हैं उसे देखकर बहुत सी दूसरी भाषाओं के साहित्यकार रश्क कर सकते हैं। लेकिन उनकी किताबों की बिक्री के हालात हिन्दी से भी गुजरे हैं। दूसरे संस्करणों तक पहुँच पानी वाली किताबें कम ही होती हैं। बिक्री के मामले में उर्दू के रिसालों की भी हिन्दी के मुकाबले कोई बहुत अच्छे हाल नहीं हैं। लेकिन उनकी स्थिति और  भी बदत्तर है।

भाषाओं के लेखकों में ऐसे बहुत कम हैं जो मात्र लेखन के बल पर जीवित रह सकें। सभी को रोज़गार के लिए कोई दूसरा जुगाड़ करना पड़ता है। हाँ, सपने बहुत सँजोते हैं। हिन्दी में इस वक़्त जिनकी किताबों की खपत हो रही है, उनकी स्थिति की भी अंग्रेजी में लिखने वालों से कोई तुलना ही नहीं की जा सकती। मेरे देखने में इसका एक कारण हिन्दी में खरीद कर पढ़ने वाले पाठकों का अभाव है। हिन्दी बोलने वाले लोग करोड़ों की संख्या में हैं…..तो हैं। साहित्य से उनका कोई लगाव नहीं रहता। पुस्तकों के पाठक लाखों में भी नहीं। इस संबंध में प्रकाशकों की आलोचना हम सभी लोग करते रहते हैं। ज़्यादातर सही आलोचना। लेकिन पूरे हिन्दी समाज में पढे-लिखे, संपन्न लोगों के ऐसे कितने घर होंगे जहाँ हिन्दी के दो-चार लेखकों की रचनाएँ भी मौजूद हों? चन्द साहित्यकारों के अलावा ऐसे कितने सामान्य घर होंगे जिनमें अतिथियों-रिश्तेदारों के सामान्य मिलन के अवसरों पर साहित्य की और लेखकों की चर्चा होती हो? हिन्दी में ऐसी कोई संस्कृति अभी जन्म नहीं ले पाई।

सोवियत संघ में साम्यवादी ढाँचे का ढहना इन लेखकों के लिए बड़ा धक्का था जो इसे मार्क्सवादी सोच की व्यावहारिक प्रयोगशआला के रूप में देखते थे, इस घटना का पूर्वानुमान भी नहीं कर पाये। ऐसा क्यों हुआ?

मुझे कभी-कभी ऐसा भी लगता है कि इस मामले में मेरा कुछ कहना छोटे मुह बड़ी बात हो जाएगी। सोवियत संघ की अपनी दूसरी और अंतिम यात्रा के दौरान मुझे उसका कुछ-कुछ आभास हो गया था। कुछ प्रसंगों का हवाला देते हुए उस बात का खुलासा मैंने अपने संस्मरण में किया था जिसके कुछ अंश पत्रिकाओं में प्रकाशित भी हुए हैं। अपनी परिचित धीमी गति में अपनी 1957 से 2005 तक सोवियत संघ से संयुक्त राज्य अमरीका तक की कुल विदेश-यात्राओं के संस्मरणों की पुस्तक कलीसा मेरे आगेपर भी  काम कर रहा हूँ।

मेरा आज भी मानना है कि सोवियत संघ में मार्क्सवादी ढाँचा नहीं ढहा बल्कि वहाँ की कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर गहरी जड़ें जमाए बैठी नौकरशाही प्रवृत्ति परास्त हुई है। वे लेनिन की मृत और सुरक्षित देह की आरती उतारने लगे थे, उनके जीवन की सादगी को निजी जीवन और व्यवहार में पूरी तरह भुलाते हुए। पार्टी की परंपराओं और लेनिन के नाम को कमोडिटी’ बना कर वे उसे भुनाने में जुटे रहते थे। बहुत सारे मुल्कों में तकसीम हो जाने के बावजूद मार्क्सवाद को ही अपना दर्शन मानने वाली वहाँ की कम्युनिस्ट पार्टियों का अस्तित्व समाप्त नहीं हुआ है। और राजसत्ता के हाथ से छिन जाने के बाद अब असली बोल्शेविकों की पहचान भी होने लगी है। सत्ता-सुख लूटने वाले अब सोवियत संघ के मिटने के सदमों को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं। मलाई के गायब हो जाने के कारण वे छँट चुके हैं। उनमें से कई हज़रात आए दिन सोवियत संघ की ग़लतियों का वर्णन करने में और कम्युनिस्ट पार्टियों के लौह अनुषासन के अग्रगामी आलोचक बन कर दिशाहीन कम्युनिस्ट-विरोधी लेखकों की वाहवाही लूटने में लगे रहते हैं। अपने देश में भी ऐसे उद्भट विद्वानों-विचारकों की कोई कमी नहीं है।

घटना के बाद वे किस विकल्प की खोज में हैं? इस विकल्प का कोई केन्द्र भी है? विभिन्न बिखरे हुए जनसंघर्ष हैं पर कोई केन्द्रीयकृत संगठन-वाद- विचारधारा नहीं है। मार्क्सवाद सिद्धान्त और विचारधारा के रूप में अभी भी प्रासंगिक है, पर व्यावहारिक रूप पहनाने की चुनौती विश्वस्तर पर अभी भी मौजूद है। किस तरह के विकल्प आप देख पा रहे हैं?

इसका आंशिक उत्तर मैं ऊपर ही दे चुका हूँ। वे माने कौन लोग व्यासजी? विचारों का, विचारधारा का भी क्या कोई विकल्प हो सकता है? विश्व के पैमाने पर जब तक शोषण कायम रहेगा तब तक सिर्फ मार्क्सवाद ही एकमात्र दर्शन है जिसके अंदर विभिन्न मुल्कों में शोषितों-पीडि़तों के मुक्ति-संग्रामों को बल प्रदान करने की क्षमता पाई जा सकती है। शोषित-पीडि़त जनगण के  जनसंघर्ष, विभिन्न क्षेत्रों में, बनते-बिगड़ते राष्ट्रों के भीतर अपनी ही ज़रूरत के अनुसार संचालित होते आए और संचालित होते रहेंगे। उसके लिए विश्व के पैमाने पर किसी एक केन्द्रीयकृत, शक्तिशाली संचालक-संगठन (जनरल स्टाफ) की स्थापना कर देने का विचार मार्क्सवाद के मूल सिद्धान्त के ही खिलाफ है। संघर्ष लातीन अमरीकी वेनेजुएला की या अफ्रीका के किसी देश की जनता का और संचालन-केन्द्र उससे बाहर कहीं और? वह केन्द्र रिमोट कंट्रोल के सहारे उस देश के अंदर क्रान्ति का संचालन करेगा? मार्क्सवाद के अनुसार क्रान्ति का आयात या निर्यात नहीं किया जा सकता। यहाँ पर किसी देश की संघर्षशील जनता की सहायता करने की बात एकदम जुदा बात है। सोवियत संघ ने ब्रिटेन को बारह घंटे के अंदर स्वैज नहर से बाहर निकल जाने का अल्टीमेटम दे दिया था, अवधि के पूरा होते ही सोवियत फौजों के लंदन पर बम बरसाने की स्पष्ट चेतावनी के साथ। स्वैज नहर पर मिश्र की सरकार के अपना कब्जा स्थापित करने की योजना मॉस्को में तो नहीं बनाई गई थी? क्यूबा की क्रांति का संचालन मॅास्को ने तो नहीं किया था, लेकिन उस पर हमला करने के संयुक्त राज्य अमरीकी दुष्चक्र के विरुद्ध सोवियत संघ ने उसे कैरिबयन में उत्पात मचाने से बाज़ आने की खुली चेतावनी दे डाली थी। दक्षिण अफ्रीका के मुक्ति-संग्राम में नेल्सन मंडेला और अफ्रीकी नेशनल काँग्रेस के साथी रणबाँकुरों को सोवियत संघ की कम्युनिस्ट सरकार हर प्रकार की सहायता और साधन उपलब्ध कराती रहती थी। ये सब सहायता के उदाहरण हैं, जहाँ तक विचारधारा का सम्बंध है, वह तो अपनी     जगह कायम है और कायम रहेगी लेकिन उस विचारधारा को अमली जामा प्रत्येक देश के क्रांतिकारी अपनी स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार करते रहेंगे। न कि किसी बिग ब्रदर की बिग स्टिक के निर्देशों के अनुसार। भारत के कम्युनिस्ट विद्वान  पी0सी0 जोशी ने अपने एक लंबे लेख- बिग ब्रदर यस, बिग स्टिक नो!’ में इस बारे में बरसों पहले इस बात को साफ कर दिया था ।

वर्तमान समय में उभरते बड़े मुद्दे जिनकी तरफ रचनाकारों को जरूर ध्यान देना चाहिए।

पर्यावरण को प्रदूषित करने के साम्राज्यवादी शक्तियों के बढ़ते हुए षडयंत्र, जिनके कारण मानवता का जीवन संकटग्रस्त होने लगा है। साहित्य, कला, संस्कृति, शिक्षा और वैज्ञानिक शोध के क्षेत्रों में बहुराष्ट्रीय कंपनियों का कसता हुआ शिकंजा। शिक्षा के क्षेत्र में राज्य के अपने हाथ खींच लेने और उसके स्थान पर निजीकरण को खुली छूट दे दिए जाने के फलस्वरूप जन साधारण के बेटे-बेटियों के लिए ज्ञान और विद्या हासिल करने के तमाम अवसरों का उनकी पहुँच से बाहर हो जाना। भारत की कुछ सड़ी-गली परंपराओं को कायम रखने के नाम पर देश के अंदर यथास्थितिवादी और साम्प्रदायिक काली ताकतों की घिनौनी हरकतों का तेजी से होता जा रहा उभार। जिसे लहू के सिवा कोई रंग रास न आए ध्हमें हयात के उस पैरहन से नफ़रत है।

आपने गद्य की लगभग सभी विधाओं में लिखा है– कहानी, उपन्यास, नाटक, निबन्ध . . . आपका मन किस विधा में सबसे ज्यादा रमता है? विषयवस्तु विधा का निर्माण करती है या विधा चुनने के उपरान्त इसके अनुरूप कथ्य चुनते हैं?

मुझे उपन्यास लिखना सबसे अच्छा लगता है और कहानी लिखने की मैं आज भी हिम्मत नहीं कर पाता। कहानी लिखना बहुत कठिन काम लगता है। मैं सुबह किसी कहानी पर काम करता हूँ और शाम को उपन्यास को आगे बढ़ाने लगता हूँ। मेरा मन सभी विधाओं में रम जाता है। यह भी बता दूँ कि मेरा ध्यान सिर्फ अपने कथ्य को अभिव्यक्ति देने पर रहता है विधा तो अपने आप पीछे-पीछे चली आती है ।

उम्र के इस पड़ाव पर पीछे मुड़कर आप देखते हैं तो अपनी लेखकीय यात्रा के कौन से मुकाम महत्वपूर्ण नज़र आते हैं, जिन्हें आप रेखांकित करना चाहें?

1950 में पहली कहानी मूक बलिदान’ का लिखा जाना। 1953 में काशी में भैंस का कट्या का लेखन और 1954 की कल्पना में उसके प्रकाशन के साथ ही साहित्य जगत में मेरी पहचान स्थापित हो जाना। आठ बरसों के काशी प्रवास के दौरान अनेक कहानियों और एक उपन्यास उलझे रिश्ते का सृजन। 1960 के बाद काशी से टिहरी लौट आने के बाद करीब तीस बरसों का साहित्यिक बनवास। लेखन और पढ़ने तक से भी पूरी तरह छुट्टी। 1990 में फट जा पंचधारकहानी के प्रकाशन के साथ ही साहित्य की दुनिया में वापसी और दूसरे कामों को अलविदा कहते हुए कुलवक़्ती लेखक बन जाना।

सामंती युग की समस्याओें से आच्छादित कहानियों की आज कितनी सार्थकता है?

सामन्ती जीवन अभी समाप्त कहाँ हुआ है? सामन्ती शासन खत्म हुए हैं लेकिन समाज में सामन्ती प्रवृत्तियाँ तो काफी हद तक जस-की-तस कायम हैं।

हर परिवार का पुरुष अपने घर में एक छोटा-मोटा सामन्त होता है। उस युग की कहानियाँ समाज की नई पीढ़ी के सामने एक आईने का काम निभाती रहेंगी, ऐसा मेरा विश्वास है।

आप किस रूप में पहचाने जाना पसंद करेंगे ?

आंदोलनकारी कार्यकर्ता की ख्याति दूध की तरह होती है। उससे शक्ति तभी तक मिलती है, जब तक उसका सेवन करते रहें। यहाँ मैं गढ़वाली या पर्वतीय जनता की तर्ज पर अपनी बात कहने की कोशिश कर रहा हूँ। घी की ताकत स्थायी होती है। साहित्य किसी व्यक्ति के जीवन में घी की तरह होता है। राजनीति बहुत अस्थायी होती है। उसका प्रभाव तभी तक रहता है जब तक कार्यकर्ता सक्रिय रह सकता है। राजनीति में दो वर्ष की अनुपस्थिति कार्यकर्ता की याद को जनता के मन से भुला देती है। साहित्य के साथ ऐसा नहीं होता। सुन्दरलाल बहुगुणा और कम्युनिस्ट नेता रूस्तम सैटिन ने मेरे बारे में अपनी बात यों कही थी कि मैंने राजनीति में अपना समय गॅवा दिया लेकिन मुझे उसका कोई अफसोस नहीं। राजनीति में सक्रिय रहते हुए मैंने जो अनुभव हासिल किए वे कुर्सी पर बैठ कर लेखन करने से हर्गिज उपलब्ध नहीं हो सकते थे। राजनीति ने मुझे स्पष्ट दृष्टि दी, मनुष्यों को निरखने-परखने की क्षमता प्रदान की और जीवन में अदम्य उत्साह भर दिया। मैं उसे अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि मानता आया हूँ। मुझे संतोष रहता आया है कि वक़्त की पुकार पर मैं किसी बिल में नहीं जा छुपा था।

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