हफ्ते की किताब: पल्लव- ‘जलमुर्गियों का शिकार’

‘क्योंकि मैं हमेश से इस बात का कायल रहा हूँ कि आपके कहन की ख़ूबसूरती इसमें है कि आप जो कहते हैं,वह नहीं कहते। और मेरा तो कौल है कि मैं जो कहता हूँ, उससे बाहर बहुत-कुछ कहता हूँ।’                                                                                        ( ‘मसखरा और पिछलग्गू’ कहानी से )

dudhnathकहानी की दुनिया में दूधनाथ सिंह पुराना और प्रतिष्ठित नाम हैं। उनकी प्रत्येक रचना प्रकाशन के साथ पाठकों में भारी उत्सुकता जगाती है तो आलोचना के लिए चुनौती उत्पन्न करती है। दूधनाथ जी की विशेषता है कि वे किसी बंधी बंधाई शैली के कथाकार नहीं रहे। उन्होंने सदैव नए नए रास्तों की तलाश की और इसके लिए अलोकप्रियता की हद तक जोखिम उठाना पसंद किया। ‘जलमुर्गियों का शिकार’ उनका नया नया कहानी संग्रह है जिसे उन्होंने अंतिम भी कह दिया है। यहाँ आई कहानियां अधिकांशत: बीते एक दशक में लिखी गई हैं और इस बीते दशक के उन जटिल और परेशान करने वाले सामाजिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक परिवेश की गहरी छायाएँ इनमें मौजूद हैं।

ऐसा माना जाता है कि मनुष्य के भीतर बैठी दुष्टता की संसार में सबसे अधिक पहचान-अध्ययन शेक्सपीयर के नाटकों में है।  दूधनाथ सिंह मनुष्य के इसी कलुष का संधान करते हैं गोकि उनका लक्ष्य अंतत: उस दुष्टता का खात्मा है। ‘नरसिंह के नाम प्रेमपत्र’ ऐसी ही एक कहानी है जिसमें वाचक न जाने कितने खयाल बुनता है और यह माने बैठा है कि उसका मित्र ही उसका रकीब है। मान लेने की इस प्रक्रिया का वर्णन ही इस कहानी की विषय वस्तु है। वाचक की हालत देखने लायक है – ‘परसों ही मैंने खत पोस्ट किया है और जब तक मैं पहुँचूँगा,वह खत नरसिंह को मिल गया होगा, और इतवार का दिन भी होगा, जब मैं उन दोनों को रँगे हाथों पकड़ लूँगा। मैंने जल्दी-जल्दी कपडे बदले और हावड़ा के लिए ट्राम पकड़ी। गाड़ी में मेरा बुरा हाल था। मेरी नींद गायब,धड़कन तेज, आँखों और सिर में भारीपन। मैं बार- उँगलियाँ चटकाता और अगल-बगल के लोग मुझे हैरत से देखते।’  ईर्ष्या में भरा चेहरा और मन में बजबजाती कुंठा का हश्र मौजूं है क्योंकि जिन खतों को लेकर वाचक इतना परेशान है उनके लिए अंत में टिप्पणी है -‘जो लिखा,उसमें कुछ भी तो सच नहीं निकला।’ इसी दुष्टता का एक दृश्य ‘इज्ज़त’ में आया है जहाँ कन्नी नाम की एक स्त्री का चित्र है। बजबजाती गंदगी और सबसे निचला जीवन जीते लोग इस कहानी में आए हैं। दूधनाथ सिंह की पुरानी कहानियों में भी इन वर्जित इलाकों की यात्राएं मिलती हैं। ख़ास बात है वर्णन का धैर्य। आपको पढ़ते हुए उबकाई आने लगे और जी मिचलाने लगे लेकिन कथाकार सत्य का पीछा नहीं छोड़ता। वह अपने साथ आपको भी इस गंदगी में ले जाता है। यहाँ कन्नी की जिंदगी ही गलाजत से भरा अध्याय है और उसमें एक बलात्कार की जबरदस्ती भी आई है।

Jalmurgiyon ka shikar‘ मसखरा और पिछलग्गू ‘ इस संग्रह की सबसे बढ़िया कहानियों में है जहाँ देश की हालत को दूधनाथ जी अपने अंदाज में बताते हैं।  शैली भी देखने योग्य है।कहानी में मसखरा कह  रहा है- ‘क्योंकि यहाँ मेरा जन-पथ है। इधर देखो,वह कोतवाली,वह घंटाघर, वह रंडियों वाला होटल, और वह …. 1857 में फांसी वाला नीम का पेड़। जन-पथ और कहाँ सकता है ! और तुम्हें यहाँ क्यों ले आया ? क्योंकि आगे तो तुम्हें ही यह जिम्मेदारी संभालनी है। और मैं तुमसे भी कहता हूँ – यह ईमान -ईमान, और मियाँ मीर की तरह इश्क़ -इश्क़, और उद्धरण इत्यादि, और गांधी-फांधी और पढ़ाई-लिखाई और शायरी -फायरी हमने भी बहुत की है …. लेकिन हमारा समाज तो वही बना वही।  तो मेरा मन उस फाँसी वाले नीम के पेड़ को देखकर बहुत ललचाता है। क्यों? लेकिन क्यों? लेकिन फिर भी मैं हूँ कि हम सट्टेवालों को यह मौक़ा भी क्यों दें? हम उन्हें उल्ट भी तो सकते हैं – हम दिगम्बर …. नंगे-बूचे लोग। और हम यही करने के लिए इस विशाल छत के अँधेरे में रह रहे हैं भारतवर्ष !’  विडम्बना यह है कि ये बातें विश्वविद्यालय के दार्शनिक आचार्य के श्रीमुख से नहीं अपितु एक मसखरे के द्वारा सुनने को मिलती हैं। मुक्तिबोध की कविता ‘अँधेरे में’ का भयानक विस्तार हो चुका हमारे देश का वर्तमान जिस शक्ल में यहाँ आया है वह ट्रेजडी की गहराई को बढ़ाने वाला है। ‘नाम में क्या रखा है’ इसी ट्रेजडी की भयानक कहानी है जिसमें आ रहा हत्यारा हलाकू कहानी के अंत में ‘इस कंट्री का टॉप इंटेलेक्चुअल’ बन गया है और टिप्पणी यह है कि यह बात ‘सारा अमेरिका जानता है।’ भारतीय लोकतंत्र में हलाकू के सत्ता में शामिल होने और उस पर काबिज हो जाने से लगाकर उसके टॉप इंटेलेक्चुअल हो जाने का वृत्तांत दूधनाथ जी सुनाते हैं जिसे अविश्वसनीय मानने का कोई कारण हमारे पास नहीं है। शीर्षक उचित ही है -नाम में क्या रखा है।

‘अम्माएँ’ पुरानी प्रविधि की कहानी लगती है अंत में चौंका देने वाली-जैसे झटका देने वाली। कथा यह है कि वाचक एक गाँव में जनगणना के कारण गया है और गांव के बाहर खंडहरनुमा मकान में हो रही हलचल से ठहर जाता है कि इसे भी जनगणना में शामिल कर लिया जाए। गाँव बुंदेलखंड का है सूखे से उजाड़ हो चुका। वहां बच्चे थे और किशोर भी। लेकिन सब नंगे ही नंगे। पता चला कि घर में सिर्फ इनकी अम्माएँ हैं। आखिर एक अम्मा बाहर आती है और उससे हुआ संवाद चौंकाने वाला है।  बीच में वाचक इस दृश्य की तुलना कर रहा है -‘जब यह दृश्‍य घटित हो रहा था, मैं अचानक गुड़गाँव के मॉल्‍स में टहल रहा था। चारों ओर वस्‍त्रों के ढेर के ढेर की सजावट। कोई अपनी नाजनीं से फुसफसा रहा था, ‘इसमें चलते-चलते थक जाओगी, यह एक-डेढ़ किलोमीटर लंबा है। जो खरीदना है, ले लो।’ इतने कपड़े, इतनी तरह के, इतनी नाप के… वस्‍त्रों के उस लंबे गलियारे में… यहाँ से न जाने कहाँ तक। जयपुर हाइवे के बिल्‍कुल बगल तक। मैंने काँच की चमकती, विशाल दीवार के पार देखा। इतने रंग एक साथ झूल रहे थे। और इतनी सुहानी ठंडक, जैसे मैं शिमला के मॉल के नीचे की सीढ़ियों से उतरकर विंडो-शॉपिंग कर रहा हूँ। कुछ खरीद नहीं रहा, लेकिन जेम्‍स बांड की तरह अपने ओवरकोट की जेबों में हाथ डाले मेरी चहलकदमी पर किसी को भी एतराज नहीं है, और सभी मंद-मंद मुस्‍कुरा रहे हैं। ठीक इसी तरह मेरी आत्‍मा वहाँ मीलों लंबे वस्‍त्र-बाजार में टहल रही थी, जबकि मैं वहाँ था, उस पेड़ के नीचे, चूतड़ों पर गर्म-धूल और चींटियों के बिल और अपने कारकुनों के साथ, एक खँडहर का सामना करते हुए, जिसके भीतर शायद एक निर्वसन-निचाट खलबली थी।’ दूधनाथ सिंह इस निर्वसन-निचाट खलबली के कथाकार हैं जो बार बार अपनी कहानियों में इन्हें सुनने के लिए कान लगाते हैं। यहां ‘फूलों वाली लड़की’ और ‘कालीचरण कहाँ हैं ?’ जैसी कहानियों को भी याद किया जा सकता है जो अपने अलहदा शिल्प के कारण बहुत सुगम नहीं लगतीं।  विडंबना की निर्वसन-निचाट खलबली शीर्षक कहानी ‘जलमुर्गियों का शिकार’ में भी देखी-सुनी जा सकती है और यही दूधनाथ सिंह के आख्यान कौशल का शिखर है कि लाजवाब किस्सा सुनाते हुए भी वे किसी जानी मानी मंजिल तक पाठक को नहीं ले जाते। वे मनुष्य के भीतरी संसार के अनजाने प्रदेशों में अपनी कहानी को ले जाते हैं और उनकी प्रतिबद्धता किसी चुनावी निशान की मोहताज नहीं होती।

‘तू फ़ू’ उनकी चर्चित कहानी है। यहाँ चीनी भाषा के महान कवि के मार्फ़त वे जो कथा बुनते हैं वह हमारे वर्तमान के विद्रूप का उदघाटन करने वाली है – ‘सारे दरबारी और युद्ध – सरदार सोचते हैं कि कब नए बाश्शाह को पेशाब लगे। सारे लोग हमेश अपना मुँह आधा खुला रखते हैं। वे भर लेंगे और बाहर जाकर उगालदान में उगल देंगे। फिर कुल्ला भी नहीं करेंगे। मुँह पोछते ,मुस्कराते अपने आसान पर जाएँगे।  वे सोचते हैं कि ऐसा जिसके भी साथ पहली बार होगा, वही वज़ीरे-आला बनेगा। तुम उनके मुँह में मूतो,उनकी बीवी -बेटियाँ उठा लाओ,सरेआम स्वर्ण-सिंहासन पर उन्हें नंगा करो, कुछ भी करो,वे तालियाँ बजाएँगे….कुछ भी करो….कुछ भी, बस उनकी खिलअत और ख़िताब उन्हें अता करते रहो। इज्जत और शर्म और नाम क्या होता है?’ कहानी सिर्फ यही नहीं है। असल कहानी यह है कि तू फ़ू  सच्चाई को जान रहा है वह स्वीकार करता है – ‘मैं सच नहीं बोल सकता माँ ! मैं यह भी नहीं कह सकता कि जिन गीतों पर आपकी माँ या आप रीझे हुए हैं,वे भी मात्र मेरी कल्पना की उपज हैं।  मैंने न तो प्रेम किया,न युद्ध। वे भी सच नहीं हैं। ….दरअसल मैंने सच पर अमल कहाँ किया ! अमल तब करता जब मैं यहाँ होता,तेरे पास,तेरे खँडहर में। कब तक आप अपने रचे हुए सच और यश और दौलत के नशे में जिन्दा रहेंगे !’ तू फ़ू की यह विडम्बना बुद्धिजीवी समाज की विडम्बना है अंतर यही है कि इस नये बुद्धिजीवी समाज में तू फ़ू सा नैतिक साहस भी नहीं कि वह इसे स्वीकार भी सके।

‘क्या करूँ साSब जी !’ संग्रह की एक दिलचस्प कहानी है जिसमें फिर मामूली जिंदगी जीने वाले एक चपरासी और बड़े बुद्धिजीवियों का द्वंद्व है। असल में दूधनाथ सिंह सरल लीक पर लिखने वाले कथाकार नहीं हैं ‘अम्माएँ’ का वाचक एक स्थान पर कहता है  ‘मेरा दिमाग अजब फितूरी है। बाहर कुछ और होता रहता है और भीतर कुछ और चलता रहता है। ‘  यह कथाकार का सत्य भी हो तो आश्चर्य नहीं क्योंकि वे ही हैं जो हिंसा से भरे हमारे समय में यह सवाल पूछ सकते हैं -‘क्या बन्दूक से चींटियों को निशाना लगाया जा सकता है ?’

‘जलमुर्गियों का शिकार’

दूधनाथ सिंह

राजकमल प्रकाशन, दिल्ली

250/-

Advertisements

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s