एक अधूरा साक्षात्कार: प्रो. मणीन्‍द्रनाथ ठाकुर

कवि विद्रोही का जीवन दर्शन

Prof. Manindra Thakurकल शाम अचानक पता चला कि कवि ‘विद्रोही’ नहीं रहे. वैसे तो आजकल कम ही कवि विद्रोही रह गए हैं, लेकिन मैं बात कर रहा हूँ कवि रमाशंकर यादव ‘विद्रोही’ की जिनका वजूद ही एक तरह का विद्रोह था; जवाहरलाल नेहरु विश्व विद्यालय के प्रांगन में लगातार बने रह कर व्यवस्था को चुनौती देना जिनका जीवन था. कल शाम फेसबुक खोलते ही खबर मिली कि विद्रोही जी नहीं रहे, यकीन ही नहीं हुआ क्योंकि एक दिन पहले ही पुस्तकालय के पीछे के हिस्से में कुर्सी पर बैठे दिखे थे. काफी गंभीर मुद्रा में कुछ सोच रहे थे और ऐसा लग रहा था कि विस्फारित नयनों से दुनिया जी भर कर देख रहे हों और अलविदा कहने की तैय्यारी में थे. मैंने हाथ हिला कर उन्हें आकर्षित करने का प्रयास किया लेकिन उन्होंने ध्यान नहीं दिया. मैं भी जल्दी में था, आगे बढ़ गया. अब अपने आप पर गुस्सा आ रहा है कि क्यों नहीं रुक कर उनसे बात कर ली, क्यों नहीं उस महान आत्मा से थोड़ी और मुलाक़ात कर ली.
मैं नया-नया जे० एन० यू आया ही था, अपने एक विभागीय दोस्त के साथ चाय पीने पुस्तकालय के पीछे कैंटीन में बैठा था. हमारे पास ही चट्टान पर बैठा एक व्यक्ति कुछ बुदबुदा रहा था. गौर से सुनने पर समझ में आया कि किसी को माँ बहन की गलियाँ दे रहा था. बिखरे बाल, गंदे कपडे, छोटी-छोटी उगी हुई दाढ़ी, बिना किसी की ओर मुखातिब हुए बोलना, सबकुछ देख कर समझने में देर नहीं लगी कि मामला सामान्य नहीं है. मेरे एक मित्र मुझसे अक्सर प्रश्न करते हैं कि मैं ऐसे असामान्य लोगों में रूचि क्यों लेता हूँ. मेरे जबाब हर बार यही होता है कि उनमें ही कुछ असामान्य बाते होती हैं जिसमें कुछ रचनात्मकता होती है. बंकि हम लोग विच्छिप्त होते तो हैं लेकिन सामान्य समझे जाते हैं क्योंकि अपनी पुरजोर कोशिश से सामान्य दीखते हैं. मेरे विभागीय मित्र ने कहा अब यहाँ से चलना चाहिए क्योंकि उनके लिए ये गलियाँ असहनीय हो रही थीं. मेरे अन्दर की उत्सुकता और जग गयी और मैंने उन्हें समझने का प्रयास शुरू कर दिया.

लोगों से पूछने पर अक्सर लोग इतना ही बता पाते थे कि विद्रोही जी हैं और कवि हैं, थोडा खिसक गए हैं. लेकिन मेरा मन संतुष्ट नहीं होता था. अक्सर जे० एन० यू० में जहाँ-तहां दिख जाते थे. यहीं रहते थे. प्रकृति के साथ. किसी कमरे में नहीं बल्कि नीले आकाश के नीचे. एक कम्बल कंधे पर और पेंट, शर्ट, जूते या चप्पल में. मौन भाव से कभी पुस्तकालय कैंटीन, कभी मामू ढ़ाबा, कभी गंगा ढाबा तो कभी ‘ट्वेंटी फोर बाई सेवेन’ और कभी सड़क पर दिख जाते थे. धीरे-धीरे मुझे उनके बारे में जानकारी मिलने लगी और मेरी उत्सुकता और बढ़ने लगी. फिर एक दिन जाड़े की सुबह टहलने के बाद लौट रहा था कि ‘ट्वेंटी फोर बाई सेवेन’ ढाबे पर चाय पीते दिख गए. मैं भी थोडा फुर्सत में था और उनकी दो पंक्तियाँ जिसे मैं अक्सर दुहराता था कि ‘दिन भर पढ़ना, रात भर लिखना; जिंदगी है क्या कोई परियोजना’ को याद कर चाय का एक कप लेकर उनके पास जा बैठा. और एक साक्षात्कार के मूड में उनसे कुछ सवाल करना शुरू किया. फिर मुझे बहुत कुछ पता चला जिसे मैं जानना चाहता था. सोचा था कि एक दिन औपचारिक साक्षात्कार करूंगा, लेकिन कल अपने पर बहुत गुस्सा आया कि ऐसा क्यों नहीं कर पाया.
मैंने उनसे पूछा ‘कैसे हैं विद्रोही जी, सब ठीक तो चल रहा है?’. हो सकता है कि मेरे कहने के अंदाज से उन्हें यह बात समझ में आ गयी कि मेरा सवाल केवल उनका हाल-चाल पूछने के लिए नहीं किया गया था, बल्कि उनके विचित्र जीवन के बारे में जानना चाहता था. इस सवाल के जबाब में उन्होंने अपनी पूरी राम कहानी ही कह डाली. कहने लगे ‘मैं ठीक हूँ डाक्टर साहेब, अब बिलकुल ठीक हूँ. अब जीवन सफल हो गया इसलिए निश्चिंत हूँ.’ बात कुछ मी समझ में नहीं आयी, क्योंकि अक्सर ऐसे लोगों के बारे में हमारा समाज समझता है कि इनका जीवन असफल रहा है. मैं ने उत्सुकता भरी निगाह से उनकी ओर देखा. विद्रोही जी की गुत्थी धीरे-धीरे खुलने लगी. कहने लगे ‘ डाक्टर साहेब! मैं जे० एन० यु० के हिंदी विभाग में एम० ए० करने आया था. सब कुछ ठीक चल रहा था. लेकिन मेरे दिमाग में एक बात चलती थी कि इस व्यवस्था में लिख कर परीक्षा देने की परंपरा क्यों है और मैं अपने आप को कवि मानता था, इसलिए यह भी सवाल था कि इस व्यवस्था में कवियों को भी लिख कर सबकुछ व्यक्त करने की क्या जरुरत है. मैं ने लिखित परीक्षा देने से मना कर दिया. नतीजतन, व्यवस्था ने मुझे बाहर कर दिया. मैंने उस दिन प्रण किया कि मैं अपने जीवन को यह प्रमाणित करने में लगा दूंगा कि इस व्यवस्था का यह सोच सही नहीं है.’ मैंने उनके बेतरतीब से चेहरे पर पड़ी उम्र की झुर्रियिओं के बीच एक विचित्र सा दृढ संकल्प देखा. लग कहीं खो गए हैं यादों में और अपनी जवानी में लौट गए हैं. रात भर ठंढ में, खुले में सोने के बावजूद उनके चेहरे पर थकन या खीज या पश्चाताप का नामोनिशान नहीं था. ऐसा लग रहा था कि किसी अदृश्य दुश्मन से रात भर लड़ते रहे हों और एक राउंड की जीत का जश्न सुबह की चाय के साथ मनाना चाहते हों.
मैं यह बता दूँ कि यह जे० एन० यू० जैसे विश्वविद्यालय की खासियत है कि यहाँ ऐसे अनेक लोग पाए जाते हैं जिन्हें कैंटीन वाले भी जानते हैं और उनसे कभी खाने के पैसे नहीं मांगते. यदि कभी उन्होंने दे दिया तो ठीक, नहीं दिया तो ठीक. छात्रों के दिल में भी इनके लिए सम्मान ही रहता है. ये माहौल विद्रोही जी के लिए ठीक था, उनके विद्रोह की यहाँ कद्र थी. मैं अभी उनकी बातों को समझने की कोशिश ही कर रहा था कि चाय के दूसरे खेप लिए पुकारा गया. हम दोनों उठ कर गए और गरम-गरम चाय लेकर वापस लोहे की कुर्सियों जम गए. बातों के सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए मैंने पूछा ‘विद्रोही जी बात कुछ समझ में नहीं आयी कि व्यवस्था के जिस सोच के खिलाफ आप लड़ रहे हैं उसमें तो कोई परिवर्तन दिखता ही नहीं है फिर आप सफल कैसे हो गए’. उन्होंने कहानी आगे बढाई और कहने लगे: ‘डाक्टर साहब! व्यवस्था तो इतनी जल्दी बदलेगी नहीं. मेरा प्रण तो इतना ही था कि मेरे जीवन के तरीके को भी मान्यता मिल जाये. लोग यह मान जाएँ कि विद्रोही का भी अपना तरीका हो सकता है. किसी एक ही घिसे पिटे तरीके को आदर्श मानने की जिद वे छोड़ दें. व्यक्ति के अस्तित्व को समाज और व्यवस्था को स्वीकार करना होगा. सिस्टम तो हमें ही निगल जाता है फिर उसका फायदा ही क्या है. अपने अस्तित्व की लड़ाई में मैं सफल इसलिए हूँ कि मैं कवितायेँ लिखता और छापता नहीं हूँ, मैं कवितायेँ बोलता हूँ. व्यवस्था बोलने को मान्यता ही नहीं देता है, कहता है लिखना जरुरी है, छापना भी जरुरी है. अब कवि क्या-क्या करे. उसे तो लोगों से संवाद करना है. अपनी बात लोगों तक पहुंचानी है. अदृश्य लोग नहीं, ज़िंदा लोग जो विद्रोही की बातों को समझ सके, उसके भावों को महसूश कर सके और कवि भी श्रोता के भावों के उत्थान पतन को देख सके. भावों का यही खेल तो कवि-कर्म है.’ मैं उनके इस दर्शन से बेहद प्रभावित हुआ. कवि-कर्म की यह परिभाषा मुझे बिलकुल मौलिक लगी. खासकर ऐसे युग में जब ज्यादातर कवि या तो दरबारी हो गए हैं या फिर कारोबारी हो गए हैं.. सुनने मैं आया है कि कवियों के भी सचिव होते हैं और ग्राहकों के साथ भावों का तोलमोल होता है. कवि सम्मेलनों में कमाए पैसे पर उन्हें भी इनकम टैक्स देना पड़ता है. है न यह आश्चर्य की बात कि ऐसे युग में कोई ऐसा भी कवि है जो कहता है कि कवि-कर्म तो भावों के उत्थान और पतन का खेल है, इसका अर्थोपार्जन से क्या लेना-देना है.

Vidrohi by Uday Shankar

Photo: Uday Shankar

‘आप कैसे कह सकते हैं कि लोगों ने आपकी इस बात को स्वीकार कर लिया कि जीने का आपका अपना तरीका भी हो सकता है और बिना छपे भी आप कवि मान लिए जा सकते हैं?’ मैंने पूछा. उनके जवाब में मेरे लिए नई सूचनाएँ भी थीं. कहने लगे ‘ आप यह समझ लो कि मैंने आधी जंग उस दिन जीत ली जिस दिन बी० बी० सी० ने मेरे ऊपर एक फ़िल्म बना डाली. अब कितने कवि हैं जिनके ऊपर ऐसी कोई फिल्म बनी है. और आप समझ सकते हैं कि इसके लिए मैंने कोई प्रयास नहीं किया होगा. मैं तो पत्रकारों को जानता तक नहीं हूँ. किसी को जानने की कोशिश भी नहीं करता हूँ. न ही बी० बी० सी० की फ़िल्म को लिए अपने महान कवि होने का परिचय देने के लिए भटकता फिरता हूँ. मुझे केवल इस बात का संतोष हुआ कि बिना लिखे भी समाज मुझे कवि मान सकता है. मेरी जिद बिना वजह नहीं थी. मैं तो इस व्यवस्था को समझाना चाहता हूँ कि जीवन जीने के अनेक तरीके होते हैं उन्हें साँचें में मत ढालें.’ यह बात मुझे बेहद अच्छी लगी क्योंकि मेरा खुद का भी यह मानना है कि जीवन के अनेक रंग होते हैं और हर आदमी अपने तरीके से जीना चाहता है. आस पास के लोगों को उसके इस चुनाव का सम्मान करना चाहिए. व्यवस्था को भी इसका ध्यान रखना चाहिए. अक्सर व्यवस्था के मापदंड स्थापित करने की बात को लेकर मुझे चिढ़ होती है. कुछ विद्वान् ऐसे होते हैं जो आपका आकलन ही उस मापदंड पर करते हैं. यह आधुनिकता की बिडम्बना है. गांधी का स्वराज भी यही है कि लोगों को अपने जीवन को अपनी तरह से जीने की स्वतंत्रता होनी चाहिए और उन्हें अपने निर्णयों के लिए जिम्मेद्दार भी होना चाहिए. इसका मतलब अराजकता कतई नहीं है, एक व्यक्ति की स्वतंत्रता सब के लिए स्वतंत्रता का आधार होना चाहिए. इसका मतलब केवल इतना है कि सबों को मानव होने का सम्मान मिलना चाहिए. आजकल विज्ञान के दर्शन पर चिंतन करने वाले कई चिन्तक इस बात पर शोध कर रहे हैं कि जीवन के अनेक रंग कैसे एक साथ मिल कर दुनियां का निर्माण करते हैं, फिर एक सर्वव्यापी और सर्वमान्य जीवन कला की मांग का क्या औचित्य है. गाँधी के बारे में विद्रोही जी के विचार में एक खास बात है. गाँधी पर बोलते हुए उन्होंने इसबात का जिक्र किया था कि उनके जीवन पर गाँधी का बड़ा प्रभाव था. कक्षा दो में उन्होंने कोई कविता पढ़ी थी जिसमें लिखा था कि गाँधी के पास जीवन जीने के दो सूत्र थे: सदा सच बोलना और सबों को गले लगाना. उसी समय से विद्रोही जी ने इन दो सूत्रों को अपना आदर्श बना लिया. फिर कक्षा चार में कोई कविता सुनी जिसका आशय था कि गाँधी जी बिडला के घर में सो गए. लेकिन विद्रोही जी को ये बात सही नहीं लगी. उनका मानना था कि गांधी टोपी खुद गाँधी ने तो नहीं पहनी लेकिन कुछ लोगों ने उसे बेचा. ये बेचने वालों में कौन थे यह कहने की जरुरत नहीं है.
क्रन्तिकारी कवि विद्रोही गांधीवादी भी थे. यह जान कर मुझे बड़ा सुखद आश्चर्य हुआ. गाँधी, मार्क्स और अम्बेडकर के विचारों के बीच जिस संवाद की बात मैं किया करता हूँ, विद्रोही जी से बात करने पर मुझे उसका जीवंतरूप दिखने लगा था. मैंने उनसे पूछा कि क्या जिन लोगों के लिए आप कवितायेँ लिखते हैं उनपर भी कोई प्रभाव उन्हें दिखता है. उनका उत्तर था: ‘मैं इस बात की चिंता नहीं करता हूँ. मैं तो अपना कवि-कर्म करता हूँ. लोग मुझे सुनते हैं. इसी का मुझे संतोष है. मैं किसी सम्मलेन के लिए कवितायेँ नहीं पढ़ता हूँ. मैं तो लोगों के लिए कवितायेँ कहता हूँ. जवाहरलाल नेहरु वि० वि० के छात्रों ने मुझे बहुत सुना है अक्सर सुनते रहते हैं. सुबह शाम जब भी कहीं लड़के मिलते हैं उनके आग्रह पर कवितायेँ कहता हूँ. उनके द्वारा किये गए विरोध प्रदर्शनों में कवितायेँ कहता हूँ. कुछ काम आ जाता हूँ उनके. यही मेरा पारितोषिक है. यही मेरा जीवन है.’ मेरा मन उनके लिए सम्मान से भर गया. मैं कभी सोच भी नहीं सकता था कि पागल से दिखने वाले यह व्यक्ति वास्तव में एक क्रांतिकारी दार्शनिक है जो नीत्से की तरह संवेदनशील है. मन में विद्रोह की ज्वाला है लेकिन व्यवहार में शांत है, उग्र नहीं है. अक्सर चुप चाप रहता है, लेकिन चुप्पी में में भी विद्रोह के स्वर हैं.
अब मुझे उनके पारिवारिक जीवन के बारे में भी कुछ जानने की इच्छा हुई. कई कहानियां वि० वि० परिसर में प्रचलित थीं. कोई कहता था विद्रोही जी का परिवार है, कोई कहता इनका कोई नहीं है. सुनाने में यह भी आता था कि कोई सप्ताह में एक दो बार इनके लिए कुछ भोजन ले आया करता था और कपड़े बदल जाया करता था. मैं ने किसी से यह कहते तो नहीं सुना कि उसने ऐसा होते देखा हो, लेकिन यह बात भी आम थी कि इनका परिवार भी है. मैं ने विद्रोही जी को प्रश्नवाचक निगाहों से देखा और उन्हें अपने बारे में कुछ कहने को प्रेरित किया. विद्रोही जी ने कहना शुरू किया: ‘आज में खास तौर पर बेहद खुश हूँ. क्योंकि कल खबर आयी है कि मैं दादा बन गया हूँ. डाक्टर साहब आप इस बात से सहमत होंगे कि जब आपके बच्चों को बच्चा हो जाये तो अपना कर्तव्य पूरा होने का एहसास होता है. मुझे लगता था कि अपनी जिद में मैं ने परिवार का अनदेखा किया है. लेकिन इस बात ने मुझे गहरा संतोष दिया है कि मेरे इस जिद के बावजूद मेरा परिवार भी फलता फूलता रहा है.’ परिवार के प्रति इतनी संवेदनशीलता देख कर मुझे अच्छा भी लगा और आश्चर्य भी हुआ. उनकी कविताओं में स्त्री विमर्श का राज समझ में आने लगा. ‘जो पहली स्त्री जलाई गयी थी, मैं उसे नहीं जानता लेकिन वह मेरी माँ थी. जो आखिरी स्त्री जलाई जायेगी, मैं उसे नहीं जानता, लेकिन वह मेरी बेटी होगी. और मैं ऐसा नहीं होने दूंगा.’ इन पंक्तियों में उनका दर्शन भी है और संकल्प भी. उनके चेहरे पर संतोष का एक भाव था. मैं भी उस सुबह को भूल नहीं सकता हूँ. उसके बाद से मेरे रिश्ते विद्रोही जी के साथ बदल गए. उनकी कई पंकियों ने मेरे लिए तकिया कलाम का रूप लेने लगीं. कवितायेँ जीवन को प्रभावित करती हैं. जीवन को परियोजना समझनेवालों को उनसे सबक लेने की जरूरत है. जीवन कोई प्रोजेक्ट नहीं है.
Nayi Khetiमैं ने उनकी कविताओं का संकलन करना चाहा, लेकिन इस बोलनेवाले कवि की कवितायेँ कहाँ मिलेंगी, कुछ समझ नहीं पा था. तभी पता चला कि किसी क्रांतिकारी छात्र संगठन ने उन्हें संकलित कर प्रकाशित भी कर दिया है और बहुत सी बोली हुई कवितायेँ यू टूब पर भी उपलब्ध हैं. सचमुच विद्रोही जी एक जनकवि थे. उनकी मृत्यु के बाद जिस तरह से छात्र समुदाय शोकाकुल है उसे देख कर लगता है कि समाज में अभी उम्मीद है और उस उम्मीद को जगाये रखने वाला केवल विद्रोही जैसा कवि ही हो सकता है. ऐसे कवि की समाज को जरुरत होती है जो यह कह सके कि ‘कबीरा खड़ा बजार में लिए लिखती हाथ, जो घर जारे आपनो चले हमारे साथ’. ‘कामरेड विद्रोही को लाल सलाम’ के नारों से गूंजती उनकी शव यात्रा इस बात का प्रमाण है कि उनका जीवन सफल रहा है. जिस जिद पर वे अड़े थे वह पूरा हुआ है. इस यात्रा में शायद गाँधी की इस बात को वे दुहराते हुए प्रतीत हो रहे थे कि ‘मेरा जीवन ही मेरा सन्देश है’.

manindrat@gmail.com

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