हफ्ते की किताब: पल्लव- ‘बारिश, धुआँ और दोस्त’

‘कहानी क्या होती है?’ एक बार उसने पूछा था।

‘वह चीज, जिसके आईने में हम ज़िंदगी को नए सिरे से पहचानते हैं।‘

सवाल खत्म नहीं हुआ था।’कहानी कहां से मिलती है?’

’जिंदगी को क़रीब से देखने से, रुक कर।’                     ( ‘बारिश,धुआँ और दोस्त’ कहानी से )

कहानी लिखना इधर फैशन भी है। कहानीकार नयी नयी मुद्राओं में कहानियाँ लिख रहे हैं तो कवि, आलोचक, अध्यापक और पत्रकार भी हाथ आजमा रहे हैं। रचनात्मकता के लिहाज से यह शुभ है लेकिन कहानी कैरियर बनाने के लिए लिखी जाए तो साहित्य के लिए निश्चय ही अशुभ होता है। इतिहास में यह घटना कोई पहली बार नहीं है। नयी कहानी आंदोलन के बाद विभिन्न कथा आन्दोलनों का धूल -धुआँ आज भी इस जोखिम की याद दिलाता है। इधर परिदृश्य पर इतनी धुंध है कि अपने समय की प्रतिनिधि रचनाशीलता की पहचान दुष्कर है। प्रतिनिधि कहना भी शायद उचित नहीं लेकिन जब रचना को प्राप्ति का बायस बनाने के बेशर्म उपक्रम जारी हों तब कठोर निगाह आवश्यक है। प्रियदर्शन हरफनमौला रचनाकार हैं। कविता, कहानी, फ़िल्म समीक्षा, मीडिया, साहित्यालोचन, अनुवाद और सम्पादन – यानी उनकी सक्रियता व्यापक है। ऐसे में यह और भी कठिन है कि उनकी सृजनशीलता का उचित मूल्यांकन हो। आप कहेंगे कथाकार-वे कहेंगे कवि। बहरहाल इसी उहापोह में उनका नया कहानी संग्रह ‘बारिश,धुआँ और दोस्त’ पढ़ना विस्मय में डालता है। ताजगी से भरी भाषा और जीवन के नानाविध क्षेत्रों में कथाकार की निगाह। कहानी की कहन में नयेपन के साथ मामूली लोगों के दुखों को देखने-समझने का दुर्लभ सामर्थ्य। जबसे विचारधारा को पुरानी बात समझने का चलन आया है तब भला मामूली लोगों के जीवन में कौन झांके ? कवि ने कहा ही था -‘कितना ललित ललाम यार है भारत घोड़े पर सवार है।’

priya darshanगरीबी और गरीबों पर लिखना अभी फैशन हो सकता है लेकिन प्रियदर्शन सायास इस फैशन से बचते हैं। इस संग्रह की कहानियाँ नए मध्य वर्ग और मीडिया और मामूली लोगों के जीवन संघर्ष से बनी हैं। साम्प्रदायिकता की जटिलता पर भी प्रियदर्शन का ध्यान गया है। मीडिया के अंदर के दृश्य इधर कहानियों में आने लगे हैं लेकिन यहाँ मीडिया से जुड़े लोगों के अपने संघर्ष और सत्य आए हैं। पहले इन्हीं कहानियों को देखा जाए। ‘इस शहर में मनोहर’, ‘ब्रेकिंग न्यूज’ और ‘उठते क्यों नहीं कासिम भाई?’ में मीडिया के भीतरी दृश्य हैं। कुछ और कहानियों में भी मीडिया की उपस्थिति देखी जा सकती है लेकिन वहां मुख्य विषय भिन्न ही है। ‘ब्रेकिंग न्यूज’ में एक रिपोर्टर के दैनिन्दिन का अंश है जिसमें खबर की तात्कालिकता का नशा और सबसे पहले प्रसारित करने की हवस का चित्र है। यह हवस किसी पत्रकार को मृत्यु के समीप ले जा सकती है और यहां भी ऐसा ही हुआ। विस्फोट स्थल के समीप होने का सुख और उन्माद विशाल को घटना स्थल तक ले जाता है और सारी रिपोर्टिंग के बीच अचानक दूसरा धमाका हो जाता है। यहां एक बूढ़ा व्यक्ति घटना स्थल पर प्रत्यक्षदर्शी था। वह विशाल को बता रहा है – ‘आपको पता नहीं चलेगा, मैं बताता हूं, बम कहां फटा है। वो जो स्कूटरवाला था, असल में वो उस फलवाले के सामने था। हां, अब दुकान आपको नहीं दिखेगी। वो भी उड़ गई है। बम वहीं रखा हुआ था, वहीं से फटा।’ उसे लग रहा था कि  लोग उसकी बात पर यकीन नहीं कर रहे। तब आगे देखिये -‘उसने कहा चलिए आपको दिखाता हूं। वह तेज़ी से एक तरफ बढ़ने लगा। एक बिल्कुल काला पड़ चुका लकड़ियों का ढांचा गिरा पड़ा था। कैमरे वाले उसे दूर से ही देख रहे थे। कैमरे का फोकस ज़रूर उसका पीछा कर रहा था। बूढ़ा उस काले ढांचे के भीतर दाखिल हो गया। वह उसने झुक कर कुछ उठाने की कोशिश की…. …लेकिन फिर हुए एक ज़ोरदार धमाके ने जैसे सारा बना-बनाया दृश्य तहस-नहस कर दिया। एक लम्हे को बूढ़ा उछलता दिखा, फिर जैसे आग के गोले में समा गया। सारे कैमरे पीछे हो चुके थे। सारे रिपोर्टर दहशत से भरे हुए थे। धूल, धुएं, शोर और भगदड़ के एक रेले में जैसे सबकुछ खो गया। अगले लम्हे यह सब बैठा तो विशाल और प्रशांत ने एक-दूसरे को देखा। ये वे भी हो सकते थे। दोनों के माथे पर पसीना था। इत्तिफाक से धमाके का प्रभाव दूसरी तरफ था, रिपोर्टर्स की तरफ नहीं।’ कथाकार की टिप्पणी है ‘प्रशांत को वह विदेशी पत्रकार याद आया- ब्रेकिंग न्यूज बनाते-बनाते ख़ुद ब्रेकिंग न्यूज मत हो जाना।’ ब्रेकिंग न्यूज असल में उपभोगमूलक सभ्यता के त्वरित सुख लेने का ही एक रूप है इसका असल चेहरा कितना मनुष्य विरोधी हो सकता है यह प्रियदर्शन बूढ़े की मौत से साबित करते हैं। ‘इस शहर में मनोहर’ में मीडिया की ताकत की एक तस्वीर है। गेटकीपर मनोहर को जानकारी मिलती है कि गरीबों के बच्चे भी अंग्रेजी स्कूलों में मुफ्त पढ़ सकते हैं तो वह अपने चैनल की नमिता जी से सिफारिश लगवाने की सोचता है। यह प्रक्रिया दिलचस्प है। जिस नमिता जी को वह शक्तिशाली समझ रहा था उसका इस प्रस्ताव पर ध्यान न देना मनोहर को अखरता है। वह जिद छोड़ देता है लेकिन उसकी पत्नी नहीं। पत्नी का तर्क है – ‘जब निठारी के बच्चों की ख़बर दे रही थी तो उनके चेहरे पर कितनी तकलीफ़ थी। इतनी अच्छी औरत भला उसके बच्चे का ख़याल नहीं रखेगी?’ आखिर वह बच्चे और पत्नी को ही सीधा चैनल के दफ्तर के गेट पर ला खड़ा कर देता है। आगे देखिये – ‘नमिता पुरी ने नजर घुमाई। एक सहमा सा लड़का और उससे भी सहमी सी एक औरत उनके सामने खड़ी थी। उन्हें अचानक झल्लाहट हो आई। पहले ज़रूरी मीटिंग है और फिर बुलेटिन की तैयारी करनी है। तिस पर ये स्टुपिड अपने पूरे परिवार को लेकर चला आया है। जैसे वे स्कूल चलाती हों। वह तो इस आदमी का नाम तक नहीं जानतीं। झल्लाहट दिल में ही नहीं रही, मुंह पर चली आई, ‘आप लोग कमाल करते हैं। टाइम भी नहीं देखते। पूरे घर को उठाकर ले आए हैं। आप समझते हैं, मैं किसी स्कूल की प्रिंसिपल हूं?’ हालांकि बोलते-बोलते अपने सामने खड़े कातर चेहरों को देख उन्हें कुछ अफ़सोस हुआ।’ यह एक मध्यवर्गीय का अंतर्द्वंद्व भी है जो सद्भावना के बावजूद कुछ असक्षम है। मनोहर की तरह कथाकार के पास भी अपूर्व धैर्य है, ऐसे आसानी से हार मान ले ऐसा भारतीय वह नहीं – ‘लेकिन कुछ करना तो होगा ही। बेटे की पढ़ाई का सवाल है। तो उसने फिर हिम्मत की। नमिता मैम को टोक ही दिया। इस बार मैम का रुख पहले जैसा नहीं था। हालांकि बहुत दोस्ताना भी नहीं था। वह भौंहें तिरछी कर सुनती रही थी। फिर उन्होंने अपनी डायरी निकाली और फिर उसके बेटे का नाम, क्लास और उसका अपना नाम नोट किया। फिर उन्होंने कहा कि वे दो-तीन दिन में देखेंगी।’  फिर कई दिन निकले और अंत में – ‘बस वे रुकीं और हमदर्दी भरे लहजे में बोलीं, ‘मनोहर जी, इस साल नहीं हो पा रहा है, अगले साल देखती हूं कहीं।’  यह कहानी बहुस्तरीय है। केवल मीडिया की नहीं और न केवल गरीबी का दर्द लिखने वाली। स्त्री-पुरुष सम्बन्धों के तनाव का भी यहां प्रसंग आया है। जिस उलझी सच्चाई का सामना हमें करना होता है उसे अनेक स्तरों पर प्रियदर्शन देखते हैं -उद्घाटित करते हैं। यहाँ मनोहर क्रमश: तीन कसमें खाता है ठीक हिरामन की तरह और प्रियदर्शन पाठक को हिरामन की सायास याद दिलाते चले हैं। कहानी का अंत जिस निरुपायता में हुआ है वह उद्विग्न करती है और इसे कहानी की सफलता मानना चाहिए।

barish, dhua aur dost ‘उठते क्यों नहीं कासिम भाई?’ मीडिया स्टूडियो में काम करने वाले कासिम भाई की कहानी है। और यह कहानी हमारा पहला भ्रम यह तोड़ती है कि पर्याप्त पढ़े-लिखे  साम्प्रदायिक नहीं होते। साम्प्रदायिकता किस तरह हमारे अंतर्मन में जगह कर लेती है कि अवचेतन से निकल निकल कर अपना काम कर जाती है और हमें पता भी नहीं चलता। कासिम भाई एक टीवी चैनल में काम करते हैं और ओसामा को अमेरिका ने मार दिया है  इसके बाद के हालत पर कहानी बढ़ती है।  कथाकार बताता है -‘लेकिन कुछ ऐसा था कि कासिम भाई खुद को ओसामा के ज़िक्र से बचाने लगे। ओसामा की मौत से उन्हें तकलीफ न थी। उसकी वजह से दुनिया भर के मुसलमान बदनाम हुए। मुसलमान को सब आतंकवादी समझने लगे। लेकिन ओसामा को बनाया किसने था? मुसलमान को बदनाम किसने किया? फिर जिसे ख़ुद बनाया, उसे मारा क्यों? वो भी एक दूसरे मुल्क में घुस कर? जितने लोगों को ओसामा ने मारा, उससे कम लोग बुश और अमेरिका की वजह से नहीं मरे। लेकिन अमेरिका को कौन सज़ा देगा? अमेरिका ने तो अफगानिस्तान और इराक पर भी हमला किया। वहां बेगुनाह लोग नहीं मरे? सद्दाम हुसैन को तो उसने फांसी पर लटका दिया। बुश को कौन लटकाएगा? और अमेरिका का यही रवैया रहा तो वो कुछ भी कर सकता है। कल को वो किसी बहाने हिंदुस्तान पर टूट पड़े तो? मगर यह सब बोलते तो सबको उनकी मुस्लिम पहचान याद आ जाती। इसलिए चुप रहे और अपने काम में जुटे रहे। एक्सपर्ट आते, मुंडी हिलाते हुए पाकिस्तान और अमेरिका के रिश्तों पर बात करते और चले जाते।शाम को स्नैक्स के लिए कैंटीन पहुंचे तो एक गर्मजोशी भरी आवाज़ ने पुकारा, ‘अरे कासिम भाई, ये जवाहिरी कहां छुपा हुआ है? कहीं आपके जामिया नगर में तो नहीं? अमेरिका वहां भी बम मारेगा।’ यह है पढ़े लिखे लोगों की जमात। आदमी को आप बिहारी, मुसलमान या नीच -ऊँच के रूप में देखेंगे और फिर मासूमियत से कहेंगे – आरक्षण की क्या जरूरत है ? हम तो सबको बराबर समझते हैं। साथ खाना खाते हैं। कहानी में कासिम भाई की पत्नी का भय से भरा चेहरा भी आया है जब वह अपने चचेरे रिश्तेदार सैफ को गिरफ्तार होते देखती है –‘अल्ला, क्या ये भी आतंकवादी है?’ आगे की कार्रवाई के बाद जब सैफ बेदाग़ छूट गया तब भी उसे इस तमगे से मुक्ति नहीं मिली – ‘लेकिन इससे क्या हुआ। टीवी चैनल वालों ने तो उसे आतंकवादी बना डाला है। इस वाकये को चार साल हो गए हैं। लेकिन अब भी टीवी चैनल जामिया के आतंकवादियों को दिखाते हैं तो उन्हीं मासूम लड़कों को दिखाते हैं। अब तो जामिया एनकाउंटर बोलने पर उन्हीं की तस्वीर याद आती है। शुरू के दो साल लोग चैनलों के दफ्तर जाते रहे, चैनल वाले माफी मांग कर उन्हें हटाते रहे, लेकिन हर छह महीने, साल भर बाद वे फिर से दिखाई पड जाते। दरअसल टीवी चैनल से जुड़े होने के नाते कासिम भाई समझ गए कि वे शॉट आर्काइव में चले गए हैं जहां से डिलिट नहीं हो पा रहे। जब भी किसी को जामिया मुठभेड के शॉट चाहिए होते हैं, वह बेख़बरी में उन्हें ही निकाल लेता है, क्योंकि सबसे पहले शॉट वही हैं। उन्होंने लंबी सांस ली, बेचारे मुसलमान, बेमतलब आतंकवादी बनाए जा रहे हैं।’ जो जनमानस के मनोमस्तिष्क के ‘शॉट आर्काइव’ में साम्प्रदायिकता का जहर है उसे कैसे डिलीट किया जाए ? कासिम भाई जो तर्क की कसौटी पर सवाल करने की हिम्मत करता हैं अंतत: वह ‘कासिम भाई नहीं रह गए हैं, पाकिस्तान हो गए हैं, जिसे सबक सिखा दिया जाना है।’

कहानी संग्रह में कुछ अलग विषयों को भी देखने समझने का प्रयास मिलता है। शीर्षक कहानी इसका उदाहरण है। ‘बारिश,धुआँ और दोस्त’ में एक युवा लड़की और अधेड़ कथावाचक के सम्बन्ध का चित्र आया है। यह नए दौर का चित्र है जिसमें ,सम्बन्ध, निष्ठा और समपर्ण के पारम्परिक अर्थ नहीं खोज सकते। कहानी किसी नैतिक प्रतिज्ञा के सहारे आगे भी नहीं बढ़ती है बल्कि यह इस जटिल बदलाव को अपने ढंग से खोलने – समझने की कोशिश पाठक के साथ करती है। कहानी का अंत है -‘ मैं अवाक हूं। पहले रोहित, और अब ये बच्चा। न जाने कैसी है ये लड़की।

और न जाने कैसा हूं मैं।

मैं 42 का। वह 24 की।

कभी-कभी लगता है, वह 42 की है, मैं 24 का।

क्या हुआ जो मैंने इतनी ज्यादा किताबें पढ़ी हैं।

क्या हुआ जो उसने कम दुनिया देखी है।

गाड़ी उसके घर के सामने खड़ी है। वह चाबियां झुलाती हुई उतर रही है।

उसने हाथ हिलाया है। अब सीढ़ियां चढ़ रही है, ‘कल मिलती हूं’।

मैंने गाड़ी बढ़ा दी है।

देखें, कल कौन सी लड़की मिलती है।’

कहानी इसी कविताई पारदर्शिता और तरलता में गढ़ी गई है। संबंधों में आ रहे बदलाव और जीवन के सम्बन्ध में नयी दृष्टि को कहानी लक्षित करती है। यह दृष्टि उपभोगवादी है या स्वछंद इस पर जल्दी किसी निर्णय के पक्ष में कथाकार नहीं है। प्रियदर्शन की दृष्टि में कहें तो यह वह आईना है जिसमें वे जीवन को पहचानने की कोशिश कर रहे हैं। यहीं प्रियदर्शन की कथा भाषा पर भी थोड़ी बात करनी चाहिए । वे सावधान कथाकार हैं और भाषा से दुहरे-तिहरे अर्थ उपजाने की क्षमता रखते हैं । पात्रों की बोली को जस का तस पकड़ना और उनके मुहावरे से व्यंग्य उत्पन्न करना प्रियदर्शन को आता है। असल बात है यह भाषा उनकी कमाई हुई है किताबी या सुनी-सुनाई नहीं। वे अपने अनुभव से इसे सिद्ध करते हैं।

 ‘शेफाली चली गई’ की शेफाली की कथा नए समय के त्रास से उपजी है। यहाँ लेखक संबंधों में उपभोग की लोलुपता का विरोध कर रहा है। एक असुंदर लड़की शेफाली की इस कहानी को प्रियदर्शन अपनी क्षिप्रता और तरलता के साथ गढ़ते हैं। कथावाचक, जो शेफाली का मित्र है, से वह अपनी व्यथा कह रही है – ‘तुम कुछ मत बोलो। बस सुनो, जब अपनी काबिलियत की आग में मैं सबकुछ जला और सुखा चुकी थी, तब आया ये मनीष। तुम नहीं समझोगे, अब मैं समझती हूं। वह मेरे काबिल नहीं था। लेकिन उसमें एक काबिलियत थी। उसने मेरे अकेलेपन को पहचान लिया था। मेरी छाया बनने का भरोसा दिलाया था। मैं इस भरोसे के चंगुल में क्यों आ गई? इसलिए कि और कोई नहीं था जो इतना भी भरोसा दिलाए। लेकिन वह बस एक मर्द था जो मेरे भीतर की एक औरत को शिकार बनाना चाहता था। और उसने बनाया रोहित। मैं बिछती चली गई। वह जब बुलाता, मैं चली जाती। मैं कॉलगर्ल नहीं थी, लेकिन उसने मेरे साथ कुछ वैसा ही सलूक किया!’ कथाकार यहाँ मूल्य निर्णय से बचता नहीं है और वह कथावाचक को कठघरे में लाता है – ‘शेफाली रो रही थी। लेकिन सन्नाटा उसकी रुलाई से कहीं ज्यादा बड़ा था। एक सन्नाटा जो लगातार पड़ते घूसे की तरह तुम्हारी छाती पर बज रहा था। तुम बैठे रहे थे। शेफाली चली गई थी।’ ऐसे ही ‘सुधा का फोन’ संबंधों में आ रहे उपयोगितावाद की कथा है जिसमें वाचक के स्कूली दिनों की एक मित्र का पति इसलिए सम्बन्ध बढ़ाता है कि वाचक के प्रभाव का उपयोग कर वह राजनीति में आ सके। प्रकारांतर में यहां नयी राजनीति का दावा करने वाली आम आदमी पार्टी का उल्लेख है जो यह बताता है कि ठोस वैचारिकी के बिना राजनीति में कैसे स्वार्थी तत्त्व आ जाते हैं। दिक्कत तब है जब आप मूल्यों की बात कर राजनीति में एक नया दल खड़ा कर रहे हैं और उसमें इन तत्त्वों को रोक नहीं रहे।

आखिर में वे कहानियाँ जिनमें प्रियदर्शन निम्न वर्ग के जीवन को करीब से दिखाने की कोशिश करते हैं। ‘इस शहर में मनोहर’ में भी निम्न वर्ग के ही चरित्र थे और उनका जीवन था लेकिन वहां उद्देश्य अलग थे। ‘घर चले गंगाजी’ में गंगा नाम का एक चपरासी है जो चैनल में चाय पिलाने का काम करता है।  एक दिन टीवी पर बाबरी विध्वंस की बरसी पर आ रहे दृश्य पर वह  पहचान लेता है तब वाचक की अचानक उसमें समाजशास्त्रीय दिलचस्पी जाग उठती है और बात होने पर वह बताता है कि इस घटना के बाद हुए दंगों में उसकी दूकान जल गई थी लेकिन मुआवजा नहीं मिला क्योंकि वह हिन्दू था। वाचक का कथन है – ‘मैंने एक दरार पकड़नी चाही। पूछा, ‘यानी आपको हिंदू होने के चलते मुआवजा नहीं मिला, मुसलमान होते तो मिल जाता।‘ लेकिन इस मोड़ पर गंगाजी मुझसे ज्यादा खरे निकले। बोले, ‘हिंदू-मुसलमान का मामला नहीं है सरजी। बहुत तरह की मुसीबत है। गरीब आदमी की सुनने वाला कोई नहीं होता है। फिर हम बिहारी- बंगलौर में सबको ऐसे ही गड़ते थे। पुलिसवाला पान खा के चला जाता था, पैसा मांगते थे तो बोलता था, कन्नड़ बोलो। किसी से कंप्लेन करो तो हंसता था, बोलता था, कावेरी का पानी पीना है तो कन्नड़ बोलना होगा।‘ अब वाचक का हाल देखिये – मैं हैरान था। देख रहा था, गंगाराम को, जिन्हें अपनी हैसियत, अपनी हकीकत मालूम थी। वे बाबरी मस्जिद के नतीजों पर मेरे शोध और अध्ययन से कहीं ज़्यादा प्रामाणिक राय रखते थे।’ कहानी का अंत दुखद है। गंगाजी की छंटनी हो जाती है और अपने स्वास्थ्य की कीमत पर भी उन्हें मुंह पर कपड़ा बांधकर पेट्रोल भरने का काम करना पड़ता है। ‘थप्पड़’ में एक सोसायटी के सुरक्षा गार्ड रामचरन जी की कथा है जिन्हें सोसायटी में चोरी हो जाने पर पुलिस उठा ले जाती है। यहाँ रामचरन जी की पत्नी और बच्चे का भयातुर चेहरा भी आया है। प्रियदर्शन का कौशल है कि भूमंडलीकरण के चकाचक उजाले में फ़ैल रहे अन्धकार को देखने के लिए वे रामचरन जी की झुग्गी में जाते हैं और उन्हें तथा उनके मासूम बेटे को पड़े थप्पड़ की मार पाठक तक पहुंचाते हैं। इसी वर्ग के हैं सिपाही शिवपाल यादव, जो ‘बाएं हाथ का खेल’ में आए हैं। ठीक है कि वे हवलदार हैं,सरकारी नौकर हैं  लेकिन उनकी ड्यूटी झुग्गी के इलाके में है जहां ‘मुश्किल दूसरी है। काम जैसा भी हो, कमाई बिल्कुल नहीं है। झुग्गी-झोंपड़ी से ऐसा कुछ मिलता भी नहीं जिसे घर ले जाएं। नंग-धड़ंग इधर-उधर भागते बच्चे और कोसती-रोती औरतें,कहीं विरोध करते तो कहीं बेबसी में तमाशा देखते मर्द।’ होता यह है कि कोर्ट के आदेश से यह झुग्गी ध्वस्त करने के लिए एक बुलडोजर आ गया है और अफरा-तफरी मची हुई है। शिवपाल जी ‘क़ानून के पक्के आदमी हैं। कानून जहाँ बोले,वहां खड़े हो जाते हैं।,लाठी भांजने लगते हैं।’  यहाँ भी इस ड्यूटी पर वे मुस्तैद हैं और लगे हुए हैं कि  अवरोध न आ जाए। तभी एक औरत बच्चे को लेकर बुलडोजर के आगे आ जाती है ,उसका आग्रह है कि ‘बच्चा बीमार है सिपाही जी। धुप बरदास नई करेगा। बोल रहे हैं साम को गिरा देना घर। रात कहीं काट लेंगे।’ लेकिन बुलडोजर वाला तैयार नहीं। शिवपाल जी भी कड़क हैं। आखिर उसे हटना पड़ा। औरत बच्चे को एक पेड़ के नीचे लिटा देती है जिसकी छाया में यादव जी भी हैं। ‘शिवपाल यादव देखना नई चाहते हैं लेकिन बच्चा पर नजर पड़ ही जाती है। लाल है बच्चा का चेहरा। लेकिन न बोल रहा है न रो रहा है। कुछ धक्क रह जाता है शिवपाल यादव का कलेजा। न चाहते हुए भी छू लेते हैं बच्चा का माथा -एकदम गरम। भट्ठी जैसा तप रहा है।’ बस यह वही क्षण है जब शिवपाल यादव का जैसे लेखक आविष्कार कर रहा है।  देखिए तो – ‘अब शिवपाल यादव को पसीना आ रहा है। यही सब समय उनके लिए सबसे मुश्किल होता है। अपना बच्चा याद आने लगता है । शिवपाल यादव बच्चा के पास बैठ गए हैं। वहीं एक टूटा हुआ पंखा दिख रहा है। लगता है,मां बच्चे के साथ लाई है। शिवपाल यादव पंखा उठा के बच्चा को झेलने लगते हैं। बाएं ही हाथ से। साला टीवी वाला न देख ले। नई तो फ़िर बीवी मजाक बनाएगी। बोलेगी, बच्चा खेलाने का ड्यूटी लगा है। लेकिन का करें शिवपाल यादव। बच्चा को बचाएं कि कानून को?’ यह ज़िंदगी को नए सिरे से पहचानना है। प्रियदर्शन इसके लिए नए इलाकों में नहीं जाते न वर्जित फल चखने का आग्रह करते हैं। यह मनुष्यता का संधान है और यह जिद है मनुष्यता की जिसे हर कहीं देखने का सपना कथाकार को बड़ा बनाता है। मुक्ति अकेले में नहीं मिलती और न ही किश्तों में। मुक्ति गंगाजी की होनी है, कासिम भाई की, शेफाली की और शिवपाल यादव जी की भी। कथाकार सबके साथ है और सबकी अभिव्यक्ति बन सका है।

बारिश,धुआँ और दोस्त

प्रियदर्शन

राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली

200/-

pallavkidak@gmail.com

Advertisements

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s